Tuesday, December 18, 2012

पदोन्नति में आरक्षण



  कोई भी व्यक्ति या संस्था अगर सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना करती है, तो पूरे देश में एकसाथ बवाल मच जाता है, लेकिन अगर सरकार ही इस संवैधानिक संगठन के आदेश को मानने से इंकार कर दे, तो क्या किया जा सकता है! केन्द्र की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय से लेकर सीएजी, सीबीआई, सीवीसी तक प्रत्येक स्वायत्तशासी संगठन को अपने अनुसार चलाने का कार्य किया है। अगर इन संगठनों ने देशहित और न्याय के हित में सरकार के अनुकूल कोई काम नहीं किया तो सरकार ने इनकी विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एनडीए के कार्यकाल में अपना निर्णय देते हुए प्रोन्नति में आरक्षण को अवैध घोषित किया था। सारी राजनीतिक पार्टियों ने वोट की राजनीति करते हुए संविधान में संशोधन करके प्रोन्नति में आरक्षण को बहाल कर दिया। इसके खिलाफ़ विभिन्न कर्मचारी संगठनों ने देश के लगभग प्रत्येक भाग से विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की। सभी याचिकाओं को एकसाथ सुनवाई के लिए मंजूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मार्च महीने में प्रोन्नति में आरक्षण को खारिज़ करते हुए अपना निर्णय सुनाया। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रोन्नति में आरक्षण संविधान में वर्णित समानता के सिद्धान्त का उल्लंघन है। नौकरी में आरक्षण को जायज ठहराते हुए कोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि नौकरी प्राप्त करने के समय सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए समानता प्राप्त करने हेतु आरक्षण उचित है लेकिन एक बार समानता प्राप्त कर लेने के बाद पुनः आरक्षण देना अपने कुछ नागरिकों को जाति के आधार पर विशेषाधिकार देने के समान है जो संविधान की मूल आत्मा के हनन के समान होगा। सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी बार प्रोन्नति में आरक्षण के खिलाफ़ अपना निर्णय सुनाया। इसपर गंभीरता से सोच-विचार के बदले सरकार ने अपनी सत्ता की रक्षा हेतु बसपा सुप्रीमो मायावती के तुष्टीकरण के लिए संविधान में संसोधन करना ही मुनासिब समझा। बिल राज्यसभा से पारित हो चुका है और लोकसभा से भी इसका पारित होना निश्चित है। मुलायम सिंह यादव की सपा को छोड़कर सभी राजनीतिक दल संगठित दलित वोटों की चाहत में इसका विरोध करने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं।
      सत्ता की राजनीति ने इस देश का जितना अकल्याण किया है, उतना विदेशी शासकों ने भी नहीं किया है। देश के बंटवारे से लेकर समाज के विभाजन के खेल खेले गए। सारे देश को सन २०२० तक विकसित राष्ट्र बनाने का सपना दिखाया जाता है परन्तु अक्षम और अयोग्य व्यवस्था के साथ क्या यह सपना पूरा किया जा सकता है? प्रोन्नति में आरक्षण के कारण सभी ऊंचे पदों पर आरक्षित जातियों के अधिकारी और कर्मचारी छा जाएंगे। उनसे दक्ष और वरिष्ठ अधिकारी तथा कर्मचारी अपने मूल पद से ही सेवानिवृत्ति के लिए वाध्य होंगे जैसा उत्तर प्रदेश में मार्च २०१२ के पहले हो रहा था।
      मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग में स्नातक होने के बाद सन १९७८ में तब के उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद में सहायक अभियन्ता के पद पर नियुक्ति के साथ नौकरी शुरु की थी। नियम के अनुसार मुझे सात वर्षों के बाद अधिशासी अभियन्ता के पद पर पहली प्रोन्नति मिलनी चाहिए थी। लेकिन नहीं मिली। मेरे साथ सहायक अभियन्ता के पद पर नियुक्ति पाने वाले मेरे ही साथियों को जो अनुसूचित जाति से आते थे, सात वर्ष के बाद प्रोन्नति मिल गई। वे सात वर्षों के बाद अधिशासी अभियन्ता, अगले पांच वर्षों के बाद अधीक्षण अभियन्ता और उसके अगले तीन वर्षों के बाद मुख्य अभियन्ता के पद पर प्रोन्नति पा गए। मैं २६ वर्षों तक अपने मूल पद पर सहायक अभियन्ता के रूप में कार्य करता रहा जबकि आरक्षित वर्ग के मेरे साथी और कनिष्ठ २० वर्षों में ही प्रबन्ध निदेशक के उच्चतम पद पर आसीन थे। इस दौरान मुझे अपने से १५ साल जूनियर अधिकारी की मातहती में काम करना पड़ा। मुझे लगातार कई वर्षों तक उत्कृष्ट कार्य करने का प्रमाण पत्र भी मिला लेकिन यह किसी काम का नहीं था। मैंने सन २००४ में अधिशासी अभियन्ता के पद पर पहला प्रोमोशन पाया और आठ साल बाद पिछले मई में अधीक्षण अभियन्ता का प्रोमोशन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद पाया। देश के सारे प्रदेशों में कमोबेस यही स्थिति है। देश की सारी विकास योजनाएं राज्य सरकारों द्वारा ही लागू की जाती हैं। राज्य सरकारों में विभिन्न विभागों में सर्वोच्च पदों पर नीति निर्धारक और कार्यान्यवन अधिकारी के रूप में जाति के आधार पर आरक्षण पाए अधिकारी ही उपलब्ध होंगे जिनपर विकास की जिम्मेदारी होगी। उनकी टीम में सबसे निचले स्तर पर वे लोग होंगे जो उनसे वरिष्ठ, कुशल, दक्ष और प्रतिभाशाली हैं। जातीय आधार पर बंटे प्राशासकीय तंत्र से किस तरह के चमत्कार की उम्मीद की जा सकती है। एक तरफ होंगे भग्न हृदय, भग्न मनोबल वाले निम्न अधिकारी और कर्मचारी तथा दूसरी ओर होंगे राजनीतिज्ञों से अभयदान प्राप्त आरक्षित वर्ग के कनिष्ठ और अपेक्षाकृत अकुशल अधिकारी/कर्मचारी।
      राजनीतिक दलों को न देश की चिन्ता है, न विकास की और ना ही सामाजिक समरसता की। उनकी आंखें तो सिर्फ कुर्सी पर है चाहे वह जिस विधि मिले -
तमाम मुल्क अंधेरे में डूब जाए तो क्या,
वो चाहते हैं कि सूरज उन्हीं के घर में रहे।

Saturday, December 8, 2012

सन्देह के घेरे में अरविन्द केजरीवाल




      दिनांक ६ दिसंबर को अन्ना हजारे जी ने अरविन्द केजरीवाल के विरुद्ध जो वक्तव्य दिया उससे अरविन्द केजरीवाल की निष्ठा सन्दिग्ध हुई है। अन्नाजी ने कहा कि अरविन्द केजरीवाल सत्ता और धन के लिए राजनीति कर रहे हैं और वे कभी भी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के पक्ष में वोट नहीं डालेंगे। अन्नाजी कोई दिग्विजय सिंह नहीं हैं जिनके कथन को हवा में उड़ा दिया जाय। अन्नाजी के कारण ही केजरीवाल ज़ीरो से हीरो बने। उन्होंने यश और प्रसिद्धि के लिए अन्ना जी का भरपूर दोहन किया। अन्नाजी को जब केजरीवाल की असली मन्शा का पता लगा तो उन्होंने अविलंब केजरीवाल से संबन्ध तोड़ लिया। अन्ना के जन आन्दोलन के साथ अरविन्द केजरीवाल की निष्ठा आरंभ से ही सन्दिग्ध रही है। कांग्रेस के एजेन्ट स्वामी अग्निवेश केजरीवाल की ही अनुशंसा पर अन्ना की कोर कमिटी के सदस्य बने। अग्निवेश के चरित्र को सबसे पहले किरण बेदी ने पहचाना और वीडियो के माध्यम से आम जनता के सामने रखा। किरण बेदी और केजरीवाल के बीच मतभेदों की यही शुरुआत थी। आज भी स्वामी अग्निवेश से केजरीवाल के संबन्ध पूर्ववत हैं। सन २००५-०६ में केजरीवाल ने स्वामी अग्निवेश के माध्यम से सोनिया गांधी तक उनकी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्यता पाने के लिए जोरदार लाबिंग की थी। किसी तरह आमंत्रित सदस्य के रूप में दिनांक ४ अप्रिल २००११ को स्वामी अग्निवेश के साथ राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बैठक में सोनिया गांधी के साथ चाय पीने की उनकी आकांक्षा सफल हो पाई।
      केजरीवाल के दादा हरियाणा के एक सफल व्यवसायी थे। धन के प्रति केजरीवाल का लोभ भी जगजाहिर हो चुका है। अन्नाजी ने उनके इस लोभ को सार्वजनिक किया है। केजरीवाल अपने और अपने एनजीओ के लिए देसी या विदेशी, कहीं से भी धन लेने में तनिक भी परहेज़ नहीं करते। वे घोषित रूप से  मुख्यतया ‘परिवर्तन’ और ‘कबीर’ नामक दो एनजीओ से संबन्धित हैं। उनकी संस्था ‘कबीर’ ने अमेरिका के फोर्ड फाउन्डेशन से वर्ष २००५ मे १,७२००० एवं वर्ष २००६ में १,९७,००० डालर प्राप्त किए। इसके पर्याप्त साक्ष्य हैं। उन्होंने वर्ष २०१० में भी लाखों डालर फोर्ड फाउन्डेशन से प्राप्त किए। इन सभी अनुदानों का क्या उपयोग हुआ और और किन उद्देश्यों के लिए प्राप्त किए गए, आज तक रहस्य बने हुए हैं। फोर्ड एक मज़े हुए व्यवसायी हैं। बिना लाभ के वे एक धेला भी खर्च नहीं कर सकते। उनके माध्यम से अमेरिका विदेशों में अपने हित साधन करता है। अमेरिका में ‘आवाज़’ नामक एक एनजीओ है जिसे वहां के उद्योगपति चलाते हैं। इस संस्था ने विश्व में अमेरिका के हित में कार्य करते हुए अनेक संस्थाओं को प्रत्यक्ष वित्तीय अनुदान दिया है। मिस्र के तहरीर चौक में आन्दोलन चलाने के लिए इसने करोड़ों डालर खर्च किए, लीबिया में तख्ता पलट के लिए उसने सारे खर्चे उठाए और अब सीरिया में गृह युद्ध के लिए यह संस्था दोनों हाथों से धन ऊलीच रही है। केजरीवाल के दोनों एनजीओ ‘आवाज़’ से संबद्ध हैं। 
      केजरीवाल को कांग्रेस तथा सरकार में तबतक कोई बुराई या भ्रष्टाचार दिखाई नहीं पड़ा जबतक वे सोनिया गांधी के नेतृत्व में कार्यरत राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्यता के प्रति आशान्वित थे। सरकार के आशीर्वाद से ही लगभग २० वर्षों तक आयकर विभाग में वे दिल्ली में ही पदस्थापित थे। दिल्ली के बाहर उनका एक बार भी स्थानान्तरण नहीं हुआ। जबकि उनके स्तर के अन्य अधिकारियों को इतनी ही अवधि में पूरा देश दिखा दिया जाता है। उनकी पत्नी श्रीमती सुनीता केजरीवाल जो उनकी बैचमेट हैं, आज भी विगत २० वर्षों से अतिरिक्त इन्कम टैक्स कमिश्नर के पद पर दिल्ली में ही जमी हुई हैं। उनका भी आज तक दिल्ली के बाहर एक बार भी तबादला नहीं हुआ है। ये उनकी कुछ ऐसी कमजोरियां हैं जिनका केन्द्रीय सरकार जब चाहे अपने पक्ष में इस्तेमाल करती हैं। भाजपा के नेताओं पर केजरीवाल ने कांग्रेस के इशारे पर ही आरोप लगाए थे। वे मुकेश अंबानी, अनु पटेल इत्यादि के चुटकी भर धन के विदेशी बैंकों में जमा होने का भंडाफोड़ करते हैं। मुकेश अंबानी एक अन्तराष्ट्रीय व्यवसायी हैं, उनके यदि सौ करोड़ विदेशी बैंकों में जमा हैं, तो कौन सी आश्चर्य की बात है? केजरीवाल ऐसे ही रहस्योद्घाटन करते हैं। विदेशों में कार्यरत या वहां से वापस आने वाले भारत के  लाखों इन्जीनियरों, डाक्टरों, प्रबन्धकों, वैज्ञानिकों और उद्यमियों के खाते विदेशी बैंकों में हैं। क्या उनके द्वारा जमा धन काला धन है? केजरीवाल सोनिया गांधी और राजीव गांधी के विदेशी बैंकों में जमा लाखों करोड़ रुपयों पर रहस्यमयी चुप्पी साध लेते हैं। बाबा रामदेव पूरे हिन्दुस्तान में प्रमाणों के साथ चिल्ला-चिल्ला कर यह बात कहते हैं, सुब्रहमण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री को भेजी अपनी २५६ पेज की याचिका में प्रमाणों के साथ इन तथ्यों का खुलासा किया है, लेकिन केजरीवाल सोनिया जी पर एक शब्द भी नहीं बोलते।
      १९७४-७५ में इन्दिरा सरकार और कांग्रेस आज की तरह ही भ्रष्टाचार और निरंकुशता का प्रतीक बन चुकी थी। इन्दिरा गांधी के लोकसभा के चुनाव को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया था, जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रान्ति का देशव्यापी आन्दोलन अपने चरम पर था। इन्दिरा जी ने आपात्काल लागू करके अपनी सत्ता बचा ली और लोकतंत्र का गला घोंट दिया। उस समय कांग्रेस के कुशासन और तानाशाही से देश की मुक्ति के लिए सभी विरोधी दलों का एकीकरण अत्यन्त आवश्यक था। जयप्रकाश नारायण ने यह असंभव कार्य कर दिखाया और १९७७ में पहली बार मोरारजी भाई के नेतृत्व में एक प्रभावी और भ्रष्टाचारमुक्त गैरकांग्रेसी सरकार बनी। अपने ढाई साल के कार्यकाल में उस सरकार ने जिस तरह महंगाई, भ्रष्टाचार और तानाशाही के विरुद्ध प्रभावशाली नियंत्रण स्थापित किया उसे हिन्दुस्तान की जनता आज भी याद करती है। अल्प समय में ही वह सरकार कांग्रेस के षडयंत्र का शिकार बन गई। उस समय राजनारायण और चौधरी चरण सिंह ने इन्दिरा जी के इशारे पर जनता के साथ जो विश्वासघात किया, वही कार्य सोनिया जी के इशारे पर आज अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया कर रहे हैं। अगर २०१४ के आम चुनावों के बाद भ्रष्ट और निकम्मी कांग्रेस पुनः सत्ता में वापस आती है, तो इसका पूरा श्रेय राहुल-सोनिया को नहीं, अरविन्द केजरीवाल को जाएगा जो विपक्ष की विश्वसनीयता को सन्देह के घेरे में लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं

Friday, November 16, 2012

राजनीति ही क्यों




महात्मा गांधी ने कांग्रेस को लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुंचाया। उन्होंने इसके माध्यम से देश को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त भी कराया। लेकिन क्या उन्होंने सपने में भी सोचा था कि उनकी कांग्रेस बोफ़ोर्स, २-जी स्कैम, राष्ट्रमंडल घोटाला, कोलगेट जैसे घोटालों में आकण्ठ डूब जाएगी? जबतक कांग्रेस गांधीजी के आभामंडल के आस-पास थी, देश के लिए काम किया। सरदार पटेल, डा. राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई जैसे चरित्रवान नेता कांग्रेस की ही देन थे। लेकिन जब से कांग्रेस ने चरित्र को बाहर का रास्ता दिखाया, तब से यह राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, नारायण दत्त तिवारी, चिदंबरम, वाड्रा, अभिषेक सिंघवी और दिग्विजय सिंह की पार्टी बनकर रह गई। भारत की ऐसी कौन सी राजनीतिक पार्टी है जो अपने घोषणा पत्र में घोटालों और भ्रष्टाचार की वकालत करती है? कौन पार्टी वंशवाद को अपना नैतिक अधिकार मानती है?  सबके सिद्धान्त अच्छे प्रतीत होते हैं। उनके कार्यक्रम भी लोक लुभावन हैं।  फिर ऐसा कौन सा कारण है कि कोई भी पार्टी भ्रष्टाचार को रोकने में सफल नहीं हो पा रही है? कारण एक ही है - चरित्र की कमी। विवेकानन्द ने कहा था - I want a man with capital M. इस समय capital M वाले मनुष्यों की समाज के हर क्षेत्र में कमी हो गई है जिसका परिणाम घोटाले, भ्रष्टाचार, बलात्कार, लूटपाट, आगजनी, दंगा इत्यादि के रूप में सबके सामने है। क्या पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम, मनरेगा, मिड डे मिल, वृद्धावस्था पेन्शन, पंचायती राज, सांसद/विधायक निधि की योजनाएं गलत हैं? शायद नहीं। लेकिन भ्रष्टाचार के घुन ने इन्हें इतना खोखला कर दिया है कि सभी योजनाएं लक्ष्य से भटक गईं हैं। स्वराज प्राप्ति के पश्चात सुराज कि अत्यन्त आवश्यकता थी और इसके लिए अधिक चरित्रवान और निष्ठावान कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता थी, लेकिन दुर्भाग्य से देश में चरित्र निर्माण करने वाले संगठनों की भारी कमी होने के कारण हम चरित्रवान नागरिकों का निर्माण नहीं कर पाए। ले-देकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी एक ही संस्था देश को उपलब्ध हुई जिसने चरित्रवान कार्यकर्त्ताओं की कई पीढ़ियों का निर्माण किया। राजनीति और इसके इतर भी इसके कार्यकर्ताओं ने अपने कार्य से राष्ट्र की महत्तम सेवा की है। पंडित दीन दयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण अडवानी ने अपने अपने क्षेत्र में मील के पत्थर स्थापित किए, परन्तु आज की तिथि में येदुरप्पा, मधु कोड़ा और नीतिन गडकरी के क्रिया कलापों को देख मन में यह संशय घर करने लगता है कि इस महान संगठन के प्रशिक्षण में भी कही कोई दोष तो नहीं?
आजकल हर आदमी कुछ दिन समाज सेवा करता है, आन्दोलन चलाता है और फिर राजनीति में घुस जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि राजनीति से अधिक श्रेष्ठ समाज सेवा है। समाज श्रेष्ठ होगा तो सरकारें स्वयं ही श्रेष्ठ बन जाएंगीं। स्व. लोकमान्य तिलक अपने समय के सर्वमान्य राजनेता थे। वे अपने युग की राजनीति के शिखर पुरुष थे। उनका नारा - स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, वन्दे मातरम की तरह देश पर मर मिटने वालों के लिए ध्येय वाक्य था। उन्हीं दिनो तिलक जी से किसी पत्रकार ने पूछा -
"यदि इन कुछ वर्षों में स्वराज मिल गया तो आप भारत सरकार के किस पद को संभालना पसंद करेंगे?"
इस सवाल को पूछने वाले ने सोचा था कि तिलक महाराज उत्तर में अवश्य प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने की मंशा जाहिर करेंगे। लेकिन उसे लोकमान्य तिलक का उत्तर सुनकर अत्यन्त हैरानी हुई। बाल गंगाधर तिलक ने कहा था -
" मैं तो देश के स्वाधीन होने के पश्चात स्कूल का अध्यापक होना पसंद करूंगा क्योंकि देश को सबसे बड़ी आवश्यकता अच्छे नागरिक एवं उन्नत व्यक्तियों की होगी जिसे शिक्षा एवं समाज सेवा के द्वारा ही पूरा किया जाना संभव है।"
हजार वर्षों की गुलामी के कारण अपना सबकुछ खो बैठने वाले समाज में अनगिनत बुराइयों के साथ नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर किया जाना आज की तिथि में सबसे बड़ा काम है और इसे किसी राजनीति के द्वारा नहीं बल्कि सामाजिक सत्प्रवृतियों के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। समाजसेवा के लिए अनगिनत क्षेत्र हैं। निरक्षरता की समस्या अभी खत्म नहीं हुई है। प्रौढ़ों और महिलाओं को पढ़ाने की सुध किसे है? सरकार तो अपने वर्तमान शैक्षणिक ढांचे को चलाने में ही चरमरा रही है। ऐसी स्थिति में शिक्षा की सामयिक चुनौती को समर्पित लोकसेवी ही पूरी कर सकते हैं। खर्चीली शादियां, तंबाकू, शराब, भांग, अफ़ीम, दिखावा आदि में समाज के हजारों लाखों करोड़ नित्य ही व्यर्थ जा रहे हैं। यह धन २-जी स्कैम और कोलगेट से ज्यादा है। यदि इस धन को बचाया जा सके तो न जाने कितनी राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के साथ अनगिनत परिवारों की खुशियां वापस लौट सकती हैं। 
जात-पांत के नाम पर हजारों टुकड़ों में बंटे-बिखरे समाज को फिर से एकता-समता के सूत्र में बांधने की आवश्यकता है। गृह उद्योगों के अभाव में देश की महिलाएं एवं वृद्ध निठल्ला जीवन जीते हैं। यदि इन्हें विकसित किया जाय तो घरों के साथ देश की आर्थिक स्थिति भी सुधर सकती है। देश का युवा वर्ग आज के सिनेमा और टीवी चैनलों से दिशा प्राप्त कर रहा है। सार्थक साहित्य का सृजन ठप्प है। ये पंक्तियां समाज सेवा की अनगिनत जरुरतों में से कुछ की ही चर्चा करती हैं। इनके अतिरिक्त और भी अनेकों कार्य करने को पड़े हैं जिन्हें हाथ में लेकर व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। लेकिन ये सारे कार्य करेगा कौन? सोनिया या अरविन्द केजरीवाल?

Friday, November 9, 2012

दिग्विजय की राह पर केजरीवाल




अपुष्ट प्रमाणों के आधार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर किसी का भी चरित्र-हनन करना अरविन्द केजरीवाल का स्वभाव बन चुका है। वे अपने उद्देश्य से भटक गए हैं। अन्ना हजारे को लगभग दो वर्षों तक उन्होंने भुलावे में रखा। जन लोकपाल बिल के लिए अन्ना के आन्दोलन से ही अरविन्द केजरीवाल अचानक नायक की भांति उभरे।  अन्ना के गिरते स्वास्थ्य की चिन्ता किए बिना उन्होंने अन्नाजी को मुंबई और दिल्ली में अनिश्चित काल के लिए अनशन पर बैठा दिया। अन्नाजी को अरविन्द केजरीवाल की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा को पहचानने में दो वर्ष लग गए। एक कहावत है - साधु, चोर और लंपट ज्ञानी, जस अपने तस अनका जानी। साधु अन्ना अपनी तरह ही अपने सलाहकारों को साधु समझते रहे। उन्हें पहला झटका स्वामी अग्निवेश ने दिया, दूसरा झटका केजरीवाल ने। जब आन्दोलन के पीछे केजरीवाल की राजनीतिक मंशा से पर्दा हटा, तो उन्होंने न केवल इसका विरोध किया, अपितु केजरीवाल से अपना संबन्ध विच्छेद भी कर लिया। किरण बेदी ने भी यही किया। अन्नाजी ने सार्वजनिक रूप से अपने नाम का उपयोग करने से केजरीवाल को स्पष्ट मनाही कर दी। आज दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। एक व्यवस्था परिवर्तन चाहता है, तो एक अन्ना के आन्दोलन का लाभ उठाकर सत्ता। प्रश्न यह है कि अगर अरविन्द केजरीवाल के सपनों का जन लोकपाल कानून बिना किसी काट-छांट के पास भी कर दिया जाय, तो क्या गारन्टी है कि यह भारत की न्याय-व्यवस्था की तरह भ्रष्टाचार का केन्द्र बनने से बच पाएगा? हमारी सारी समस्याओं की जड़ हमारा उधारी संविधान, इसके द्वारा संचालित व्यवस्था और इसके द्वारा उत्पन्न चारित्रिक गिरावट है। एक नहीं, सौ लोकपाल बिल पास आ जाएं, फिर भी भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आएगी, वरन बढ़ेगा। अवैध धन कमाने का एक और काउंटर खुल जाएगा। अन्नाजी ने देर से इस तथ्य को समझा। इसीलिए वे बाबा रामदेव, किरण बेदी और जनरल वी.के.सिंह के साथ व्यवस्था परिवर्तन के लिए कार्य कर रहे हैं।
अरविन्द केजरीवाल अब दिग्विजय सिंह की राह पर चल पड़े हैं। सलमान खुर्शीद, वाड्रा, मुकेश अंबानी और गडकरी पर उन्होंने जो आरोप लगाए हैं, वे मात्र सनसनी फैलाने के लिए हैं। २-जी, कामनवेल्थ और कोलगेट के मुकाबले ये घोटाले कही ठहरते नहीं हैं। उन्हें डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी की तरह पूरे प्रमाणों के साथ कोर्ट में जाना चाहिए ताकि राष्ट्र का कल्याण हो सके। २-जी स्कैम के लिए अगर स्वामी सुप्रीम कोर्ट में नहीं गए होते, तो इसे कभी का दबा दिया गया होता। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने देश पर एक बड़ा उपकार किया है। सरकार की अनैतिक गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ उनका संघर्ष सही दिशा में है। केजरीवाल या तो दिग्भ्रान्त हैं या अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए कटिबद्ध हैं। वे अपने रहस्योद्घाटनों से यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि सभी राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं। ऐसा करके परोक्ष रूप से वे भ्रष्टाचार की जननी कांग्रेस की ही मदद कर रहे हैं। वे यह धारणा बनवा रहे हैं कि पूरे भारत में उनके अतिरिक्त कोई भी ईमानदार नहीं है। यदि उन्हें बेहतर राजनीतिक विकल्प देने की चिन्ता होती, तो वे राजनीतिक पार्टी बनाने की दिशा में ठोस पहल करते, जो कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बनने की क्षमता रखती। राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाना कोई हंसी ठठ्ठा नहीं है। उनके पास हिमाचल और गुजरात के चुनावों से आरंभ करने का एक सुनहरा अवसर था, जिसे उन्होंने खो दिया। यदि उनकी पार्टी २०१४ के लोकसभा के चुनाव से कार्य आरंभ करना चाहती है, तो भी सदस्य बनाने, संगठन बनाने, चुनाव कोष एकत्रित करने और ५४२ योग्य उम्मीदवारों का चयन कोई छोटी प्रक्रिया नहीं है। वर्तमान व्यवस्था में बड़ी जटिल प्रक्रिया है यह। इसके अतिरिक्त श्री केजरीवाल को राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों, यथा अर्थव्यवस्था, विदेश नीति, आतंकवाद, कश्मीर, बांग्लादेशी आव्रजन, सर्वधर्म समभाव, पूंजीवाद, समाजवाद, स्वदेशी, रक्षानीति, व्यवस्था परिवर्तन, जनलोकपाल में मीडिया, एन.जी.ओ. और कारपोरेट घरानों को सम्मिलित करने के विषय में, राष्ट्रीयकरण, निजीकरण, निवेश, ऊर्जा नीति, आणविक नीति, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय पद्धति, कृषि, उद्योग, ब्यूरोक्रेसी और आरक्षण पर अपने सुस्पष्ट विचारों से भारत की जनता को अवगत कराना चाहिए।
कांग्रेस के साथ भाजपा की विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाकर कुछ भी हासिल नहीं होनेवाला। कल्पना कीजिए - अगर केजरीवाल के प्रयासों के कारण भाजपा की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है, तो देश की जनता के पास क्या विकल्प रहेगा? केजरीवाल विकल्प नहीं दे सकते। क्या भारत की जनता सन २०१४ के बाद भी अगले पांच सालों तक कांग्रेस को झेलने के लिए पुनः अभिशप्त होगी? अन्ना के आभामंडल का भरपूर दोहन कर केजरीवाल जनता में भ्रम की स्थिति का निर्माण कर रहे हैं। वे पूर्ण रूप से दिग्विजय सिंह की राह पर चल चुके हैं, परिणाम की परवाह किए बिना। हिन्दी न्यूज चैनलों के समाचार वाचकों की तरह चिल्ला-चिल्ला कर बोलने से न तो समस्याएं कम होती हैं और न समाधान निकल पाते हैं। सनसनी समाधान नहीं बन सकती।

Saturday, October 27, 2012

नौकरी के नौ सिद्धान्त - अशोक खेमका के नाम एक खुला पत्र




प्रिय खेमका जी,
हमेशा खुश रहिए।
दिनांक १६ अक्टुबर के पहले न मैं आपको जानता था और न आप मुझे। लेकिन अब तो मैं ही क्या सारा हिन्दुस्तान आपको जान गया है। मुझे जानने की आपको कोई जरुरत नहीं। वैसे भी नौकरशाही के शीर्ष पर बैठे किसी भी अधिकारी को अपने से छोटे ओहदेवालों को जानना या याद करना पद की गरिमा के अनुकूल नहीं होता। फिर भी मैं आपको बता दूं कि उत्तर प्रदेश  में एक उच्च पदस्थ अधिकारी हूं। सरकारी नौकरी करने का मेरा अनुभव आपसे १४ वर्ष ज्यादा है। उम्र भी अधिक है। अतः बिना मांगे भी मुफ़्त की सलाह आपको देने का मुझे स्वाभाविक अधिकार प्राप्त है। 
आपने हरियाणा के चकबन्दी महानिदेशक के पद पर रहते हुए १५ अक्टुबर को राज जमाता कुंवर राबर्ट वाड्रा द्वारा डीएलएफ को बेची गई ३.५३ एकड़ ज़मीन का म्यूटेशन (दाखिल खारिज़) रद्द कर दिया। यह म्यूटेशन २० सितंबर को गुड़गांव के कर्त्तव्यनिष्ठ, वफ़ादार और आज्ञाकारी सहायक चकबन्दी अधिकारी ने किया था। आपने बिना सोचे-समझे सहायक चकबन्दी अधिकारी का आदेश रद्द कर दिया। उसी दिन आपका तबादला कर दिया गया। यह तो होना ही था। शुक्र कीजिए कि हरियाणा एक छोटा प्रान्त है। हुड्डा जी आपका ट्रान्सफर कहां करेंगे - चन्डीगढ़, गुड़गांव, भिवंडी या हिसार। सारी जगहें राजमाता की राजधानी के पास ही हैं। कल्पना कीजिए, आप यू.पी. में होते! ऐसे अपराध के लिए आपका ट्रान्सफर पीलीभीत से बलिया या नोएडा से सोनभद्र भी हो सकता था। पता नहीं आपको नौकरी का सहूर क्यों नहीं आता। आपने मसूरी और हैदराबाद में सही प्रशिक्षण लिया भी था अथवा नहीं? २० साल की नौकरी में ४३ तबादले! अपने तौर-तरीके बदलिए ज़नाब वरना केजरीवाल की तरह सड़क पर आने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। उन्हें तो अन्ना जैसा एक गाड फादर मिल गया। आपको कौन मिलेगा? माना कि आप नौकरशाही के शीर्ष पद पर हैं, पर हैं तो नौकर ही न। जिस तरह न्यूटन ने गति के तीन नियम प्रतिपादित किए थे उसी तरह सरकारी नौकरी में सफलता के लिए मैंने नौ नियम प्रतिपादित किए हैं। मुगल काल से लेकर आज तक जिसने भी इन नियमों का ईमानदारी और निष्ठा से पालन किया है, उसकी दसों उंगलियां हमेशा शुद्ध देसी घी में रही हैं। अपने लंबे शोध और अनुभव के आधार पर मैंने इन्हें लिपिबद्ध किया है। आप बहुत बड़े आई.ए.एस. आफिसर हैं। मेरे इस शोध के लिए मेरा नाम अगर नोबेल प्राइज़ के लिए भेजने में यदि दिक्कत हो तो कम से कम रेवड़ी की तरह बंटने वाले राष्ट्रीय पद्म पुरस्कारों के लिए अनुमोदित तो कर ही सकते हैं। आप तो जानते ही हैं कि बिना पैरवी के सरकारी नौकरी में वार्षिक वेतनवृद्धि भी नहीं मिलती। विषयान्तर हो गया। कभी-कभी मेरा मन भी Inadia Against Corruption के नेताओं की तरह लक्ष्य से भटक जाता है।
सरकारी नौकरी के नौ सिद्धान्त
१. सदैव याद रखें - बास हमेशा सही होता है - Boss is always right.
२. अपने बास को कभी ‘ना’ मत कहो - Never say `No' to your boss.
३. इस देश में दो तरह का राजस्व होता है - (अ) पी.आर. (personal revenue), (ब) एस.आर (State revenue)
             पी.आर. बढ़ाने के लिए सतत त्रुटिहीन तकनीक डिजाइन करो।
४. प्राप्त पी.आर. का मात्र ५०% ही अपनी आनेवाली सात पीढ़ियों के लिए सुरक्षित जगह पर रखो। शेष ५०% को मंत्रियों, नेताओं, बास और मीडिया में ईमानदारी से बांट दो।
५. हमेशा आज्ञाकारी रहो और हर हाइनेस (Her Highness)  यानि Mrs. Boss की हर पुकार पर एक पैर पर खड़े रहो।
६. श्रीमती बास की मखमली गोद में खेलते हुए अपने बास के सफ़ेद, प्यारे, नन्हे पामेलियन बबुआ कुत्ते को हमेशा पुत्रवत स्वाभाविक प्यार और स्नेह दो।
७. इस तथ्य को हृदयंगम कर लो कि तुम सत्ताधारी पार्टी के नौकर हो, केन्द्र या राज्य सरकार के नहीं।
८. काम कम दिखावा ज्यादा - Work less, show more.
९. बातें कम, सुनना ज्यादा - Talk less, listen more.
खेमका भाई! आप मेरे छोटे भाई की तरह हैं। इसलिए मैंने ३४ वर्षों के अनुभव के आधार पर स्वयं द्वारा प्रतिपादित इन शाश्वत सिद्धान्तों को आपके हित में सार्वजनिक किया। आप इन सूत्रों को अमली जामा पहनाइए। फिर देखिए यू.पी. की नीरा यादव, अखंड प्रताप सिंह और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बाल कृष्णन की तरह लक्ष्मी आपकी दासी होंगीं और कुबेर सबसे विश्वस्त दास। रिटायरमेन्ट के बाद भी नौकरी पक्की।
कम लिखना, ज्यादा समझना।
                               ।इति।
       शुभकामनाओं के साथ,
                                                   आपका शुभचिन्तक
                                                    यादव सिंह कृष्णन

Wednesday, October 17, 2012

राष्ट्रीय जमाता - वाड्रा बाबू




भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहां अपने-अपने धर्म की रीति और परंपराओं के अनुसार जीने का हर नागरिक को अधिकार है। अपने देश में जमाता को विशेष दर्ज़ा मिला हुआ है। विवाह के पूर्व भी वह दान-दक्षिणा, जिसे मूर्ख लोग दहेज कहते हैं, लेता है और विवाह के पश्चात भी जीवन भर बर-बिदाई लेना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। इतना ही नहीं, ससुराल में पत्नी की सुन्दर बहनों, सहेलियों और भाभियों से छेड़छाड़ का भी अधिकार उसे परंपरा से प्राप्त है। बारात दरवाजे पर लगते समय बाजा की आवाज़ जहां तक जाती है, वहां तक के लोग स्वतः उसके साले-ससुर और साली-सरहज बन जाते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, हमारा भारत महान नेहरू परिवार की जागीर है। तभी तो आपातकाल के दौरान तात्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष स्वर्गीय देवकान्त बरुआ जी ने घोषणा की थी - India is Indira and Indira is India. आज की तिथि में भी यह पवित्र घोषणा सोनिया जी पर लागू होती है। उन्हें भारत महान में राजमाता का दर्ज़ा प्राप्त है। राहुल बाबा युवराज हैं, प्रियंका बिटिया राजकुमारी और वाड्रा बाबू कुंवरजी यानि राष्ट्रीय जमाता हैं। जमाता जब भी ससुर गृह, ससुर के भ्राता गृह या ससुर के अभिन्न मित्र गृह में विशेष अतिथि के रूप में पदार्पण करता है, तो उसके स्वागत की विशेष तैयारियां होती है - तरह-तरह के व्यंजन - आमिष-निरामिष बनते हैं, सुन्दर सालियां चुहलबाज़ी और संगीत से मनोरंजन करती हैं, गांव के जवान और बुज़ुर्ग भक्तिभाव से उसका प्रवचन सुनते हैं और विदाई के वक्त अपनी औकात के अनुसार उसकी ज़ेबें नोटों से भर देते हैं। किसी की औकात पांच रुपए की होती है, किसी की ग्यारह, किसी की इक्यावन, तो किसी की एक सौ एक की। लेकिन ज़रा यह भी सोचिए कि हमारा राष्ट्रीय जमाता यदि डीएलएफ़ के मालिक के.पी.सिंह, जिनसे गांधी परिवार के घनिष्ठ संबंध हैं, के घर जाता है, तो क्या वे जमाता की विदाई एक सौ एक रुपए से करेंगे? उनके पास लाखों करोड़ रुपयों की घोषित-अघोषित संपत्ति है। यदि उन्होंने अपनी और राष्ट्रीय जमाता के सोसल स्टेटस को ध्यान में रखते हुए जमाई राजा की विदाई ८५ करोड़ से कर ही दी, तो इसमें शोर मचाने वाली कौन सी बात है? जमाई राजा ने ठीक ही कहा है कि श्री के.पी.सिंह के साथ उनका पारिवारिक उठना-बैठना है। दोनों के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते हैं। हमलोगों में लेन-देन चलता रहता है। जमाई राजा की इतनी शानदार बर-बिदाई करने वालों में डीएलएफ अकेले नहीं है। उसके साथ बेदरवाला इन्फ़्राप्रोजेक्ट, निखिल इन्टरनेशनल और वी.आर.एस. इन्फ़्रास्ट्रक्चर भी शामिल हैं। केजरीवाल पगला गया है या ईर्ष्या की आग में जल रहा है। हो सकता है ससुराल से उसको एक धेला भी न मिला हो। भाजपा भी अपने हिन्दू परंपराओं से दूर जा रही है। सरकार की आलोचना का मतलब यह तो नहीं कि राष्ट्रीय जमाता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाय? राबर्ट बाबू जैसे सोनिया जी के दामाद हैं, वैसे ही सुषमा जी के हैं। वे जैसे राहुल बाबा के जीजा हैं, वैसे ही अरविन्द केजरीवाल के भी हैं। रिश्तों की नज़ाकत तो इनलोगों को समझना ही चाहिए। राजनीतिक महत्वाकांक्षा अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन भारत महान की स्वस्थ धार्मिक परंपराओं का अपमान, चाहे वह भाजपा की ओर से हो, अरविन्द केजरीवाल की ओर से हो या स्वयं अन्ना जी की ओर से हो, बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। 
राष्ट्रीय जमाता पर कुछ सिरफिरे आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने राजमाता के प्रभाव का अपने हित में उपयोग किया।   ये लोग यह भूल जाते हैं कि जनवरी २००२ में राबर्ट बाबू ने सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि उनके पिता और भाई, दोनों ही उनके गांधी परिवार का दामाद होने का नाज़ायज़ लाभ उठाना चाहते हैं। नाराज़ पिता ने पुत्र के इस सुकृत्य पर मानहानि का दावा भी किया था। शायद वे यह भूल गए थे कि सोनिया जी ने कन्यादान नहीं किया था बल्कि उन्होंने पुत्रदान किया था। ऐसे सिद्धान्तप्रिय और निष्पक्ष जमाता पर लाभ लेने का आरोप लगाना घोर निन्दनीय कृत्य है।
जिस कार्य के लिए राष्ट्रीय जमाता जी को ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए उसी काम के लिए कुछ असामाजिक तत्त्व उनकी आलोचना कर रहे हैं। यार-दोस्तों से किसी तरह ५० लाख रुपए जुटाकर अपनी कंपनी ‘एरटेक्स’ शुरु की थी जमाई राजा ने। २००७ से २०१० के बीच उन्होंने अपनी प्रतिभा, कुशलता, संपर्क, दूरदृष्टि और कठिन श्रम के बूते स्काईलाइट हास्पीटलिटी, स्काईलाइट रियलिटी, ब्लू ब्रिज ट्रेडिंग और नार्थ इंडिया आई.टी. पार्क जैसी चार बड़ी कंपनियां खड़ी कर दीं। ये सभी कंपनियां २६८, सुखदेव विहार, नई दिल्ली के एक ही मकान से चलती हैं। इन सबकी निदेशक राजमाता की एकमात्र समधिन श्रीमती मारिन वाड्रा हैं। बिना कर्मचारियों के इन कंपनियों ने आशा से अधिक मुनाफ़ा कमाया है। राबर्ट बाबू आजकल ३०० करोड़ रुपए के मालिक हैं। उनके अनुभवों को देशहित तथा युवा उद्यमियों के हित में देश के प्रत्येक व्यक्ति के पास पहुंचाना हम सबका पुनीत राष्ट्रीय कर्त्तव्य है। इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ मैनेजमेन्ट, इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नोलाजी तथा देश के सभी कामर्स कालेजों में राबर्ट बाबू का लेक्चर आयोजित करना चाहिए, उन्हें डाक्टर आफ मैनेजमेन्ट की मानद उपाधि से सम्मानित करना चाहिए। लेकिन हो इसका उल्टा रहा है। नेता और उद्योगपति को भारी छूट प्राप्त है - नेता को सैकड़ों करोड़ का चारा खाने का अधिकार है, कोलटार पी जाने का अधिकार है, कोयला खा जाने का अधिकार है। टाटा, माल्या, अंबानी, जिन्दल.........को दोनों हाथों से देश की पूंजी लूटने का अधिकार है। हमारे राष्ट्रीय जमाता ने ३०० करोड़ की पूंजी क्या बना ली, सब की आंख लग गई। बुरी नज़र वाले, तेरा मुंह काला।
दक्षिण भारत से एक समाचार पत्र निकलता है - The Hindu. नाम तो हिन्दू है लेकिन काम है पूरी तरह अहिन्दू का। दिनांक ११.१०.१२ के अंक में अखबार लिखता है - सरकारी कारपोरेशन बैंक, मंगलोर ने राबर्ट बाबू को महज़ एक लाख की जमा राशि पर २००७-०८ में ८ करोड़ रुपया उनकी स्काईलाइट हास्पीटलिटी को हंसते-हंसते दे दिया। अरे भाई! दामाद को कुछ भी देने में दिल हमेशा रोता है लेकिन चेहरे को तो हंसना ही पड़ता है। अखबार आगे लिखता है कि जमाई राजा ने अन्य स्रोतों से भी कुछ इसी तरह १५.३८ करोड़ रुपए जुटाए और मनेसर, हरियाणा में जमीन खरीदी। वही जमीन डीएलएफ को ५८ करोड़ में बेंच दी। दिनांक १२.१०.१२ के अमर उजाला में जमीन-खरीद का एक समाचार ओम प्रकाश चौटाला जी ने दिया है। चौटाला जी कहते हैं कि मेवात जिले में फ़िरोजपुर झिनका के शकरपुरी गांव में २९ एकड़ जमीन, जमाई राजा ने मुख्यमंत्री हुड्डा के आशीर्वाद से सस्ते में खरीद ली है। कलेक्टर रेट १६ लाख रुपए प्रति एकड़ था, मार्केट रेट ४५ लाख रुपए प्रति एकड़ था मगर राबर्ट बाबू ने मात्र २ लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से यह अचल संपत्ति खरीदी। इसके बदले अहमद परिवार को उनके मूल गांव खानपुर की जमीन को रेजिडेन्सियल ज़ोन में तब्दील करा दिया गया। भारत की सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता है; लेकिन इस महान सभ्यता और संस्कृति की सही जानकारी न तो अमर उजाला को है, न दि हिन्दू को है, न केजरीवाल को है और ना ही ओम प्रकाश चौटाला को है। इन्हें शर्म भी नहीं आती, दामाद पर उंगली उठाते हुए। इस मामले में भारत सरकार की भूमिका प्रशंसनीय है। सभी मंत्री और सभी कांग्रेसी सियार एक साथ, एक जगह बैठकर, एकजुट हो, मुंह को उपर करके एक स्वर में क्या सुन्दर राग अलाप रहे हैं - हमारा दामाद भ्रष्टाचारी नहीं हो सकता। जय राजमाता! जय राज जमाता!!

Thursday, October 4, 2012

हम सेक्युलर हैं





हम सेक्युलर हैं, क्योंकि --

१. हम भारत के संविधान में निहित प्रावधानों का उल्लंघन करके अल्पसंख्यकों को आरक्षण देते हैं।

२. हम बांग्लादेश के घुसपैठी मुसलमानों का हिन्दुस्तान में सिर्फ़ स्वागत ही नहीं करते, बल्कि राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र बनवाकर भारत की नागरिकता भी देते हैं।

३. हम हिन्दू-तीर्थस्थलों की यात्रा के लिए एक पैसा भी नहीं देते, उल्टे टिकट और अन्य सुविधाओं के लिए सर्विस टैक्स भी वसूलते हैं।

४. हम सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को दरकिनार करके हज़ यात्रियों को हिन्दुओं पर जाजिया टैक्स लगाकर भारी सब्सिडी देते हैं।

५. हम हिन्दुओं के लिए एक पत्नी रखने का कानून बनाते हैं और मुसलमानों के चार पत्नियां रखने के अधिकार को जायज ठहराते हैं।

६. हम हिन्दू लड़कियों के घटते वस्त्र को नारी स्वातंत्र्य का जीवन्त उदाहरण मानते हैं और मुसलमानों की बुर्का प्रथा का समर्थन करते हैं।

७. हम भारत माता और हिन्दू देवी-देवताओं की नंगी तस्वीर बनाने वाले को सर्वश्रेष्ठ पेन्टर का खिताब देते हैं।

८. हम भारत माता को सार्वजनिक रूप से डायन कहने वाले को कैबिनेट मंत्री के पद से सम्मानित करते हैं।

९. हम राष्ट्रगीत "वन्दे मातरम" को अपमानित करने वालों को राज्य और केन्द्र सरकार में ऊंचे ओहदे देते हैं।

१०. हम १५ अगस्त के दिन पाकिस्तानी झंडा फ़हराने वालों और तिरंगा जलानेवालों को दिल्ली में बुलाकर बिरयानी खिलाकर वार्त्ता करते हैं।

११. हम कश्मीर घाटी से हिन्दुओं को जबरन खदेड़े जाने पर चुप्पी साध लेते हैं और असम के कोकराझार के बांग्लादेशियों के विस्थापन को राष्ट्रीय शर्म (शेम) मानते हैं।

१२.हम अमेरिका में बनी फ़िल्म "इनोसेन्स आफ़ मुस्लिम्स" के खिलाफ़ हिन्दुस्तान में हर तरह के प्रदर्शन, हिंसा, दंगा, तोड़फ़ोड़ और आगजनी को जायज मानते हैं।

१३.हम गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की बोगियों में आग लगाकर हिन्दुओं को ज़िन्दा जला देने की घटना पर चुप्पी साध लेते हैं और प्रतिक्रिया में उपजी हिंसा को दुनिया की सबसे बड़ी सांप्रदायिक घटना मानते हैं।

१४.हम देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार मुस्लिम लीग से केरल और केन्द्र में सत्ता की साझेदारी करते हैं और राष्ट्रवादी संगठन आरएसएस पर बार-बार प्रतिबंध लगाते हैं।

१५ हम बाबरी ढांचा गिराने के अपराध में यूपी, एमपी, राजस्थान और सुदूर हिमाचल प्रदेश की सरकारें पलक झपकते बर्खास्त करते हैं तथा कश्मीर में मन्दिरों को तोड़नेवालों के साथ सत्ता की साझेदारी करते हैं।

१६.हम मदरसों में आतंकवाद की शिक्षा देनेवालों को सरकारी अनुदान देते हैं एवं सरस्वती शिशु मन्दिरों पर नकेल लगाते हैं।

१७. हम भारतीय नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय खलनायक मानते हैं और इटालियन को राजमाता - Long live our queen.

१८. हम भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल और कन्हैया लाल माणिक लाल मुन्शी के प्रयासों से सोमनाथ मन्दिर के पुनर्निर्माण को सेक्युलर मानते हैं और राम मन्दिर निर्माण को घोर सांप्रदायिक।

१९.हम रामसेतु तोड़कर जलमार्ग बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और बाबरी निर्माण के लिए भी कृतसंकल्प हैं।

२०. हम १९८४ के सिक्खों के कत्लेआम को इन्दिरा गांधी की मृत्यु से उत्पन्न सामान्य प्रतिक्रिया मानते हैं और गुजरात की हिंसा को महानतम सांप्रदायिक घटना।

२१.हम मज़हब के आधार पर देश के विभाजन को मिनारे पाकिस्तान पर जाकर मान्यता देते हैं और अन्यों को भी भविष्य में इसी घटना की पुनरावृत्ति के लिए प्रोत्साहन देते हैं।

२२. हम देश की प्राकृतिक संपदा पर मूल निवासी होने के कारण मुसलमानों का पहला हक मानते हैं और हिन्दुओं (आर्यों) को बाहर से आया हुआ बताते हैं।

२३. हम मस्जिदों में जमा अकूत आग्नेयास्त्रों की खुफ़िया जानकारी प्राप्त होने के बाद भी छापा नहीं मारते हैं और हिन्दू मन्दिरों की संपत्ति छापा डालकर रातोरात ज़ब्त कर लेते हैं।

२४. हम मन्दिरों की संपत्ति और रखरखाव के लिए सरकारी ट्रस्ट बना देते हैं और अज़मेर शरीफ़, ज़ामा मस्ज़िद की संपत्ति से नज़रें फेर लेते हैं।

२५. हम हिन्दुओं के शादी-ब्याह, जन्म-मृत्यु, उत्तराधिकार, जीवन शैली, पूजा-पाठ के लिए सैकड़ों कानून बना देते हैं लेकिन मुस्लिम पर्सनल ला की चर्चा करना भी अपराध मानते हैं।

२६. हम मुसलमानों को रास्ता रोककर नमाज़ पढ़ने की इज़ाज़त देते हैं और मन्दिर प्रांगण में एकत्रित श्राद्धालुओं पर लाठी चार्ज करते हैं।

२७. हम "वीर शिवाजी" पर आधारित टी.वी. सिरीयल पर प्रतिबंध लगाते हैं और "मुगले आज़म" को राष्ट्रीय पुरस्कार देते हैं।

२८. हम मुसलमानों को अपना व्यवसाय खोलने के लिए आसान किश्तों पर ५ लाख रुपए का ऋण कभी न चुकाने के आश्वासन के साथ देते हैं और हिन्दू किसानों को ऋण न चुकाने के कारण आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं।

२९. हम रमज़ान के महीने में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य गण्यमान व्यक्तियों द्वारा सरकारी पैसों से रोज़ा अफ़्तार का आयोजन करते हैं तथा होली-दिवाली पर एक पैसा भी खर्च नहीं करते।

३०. हम हज़रत मोहम्मद पर डेनमार्क में बने कार्टून पर बलवा करनेवालों पर लाठी के बदले फूल बरसाते हैं और राम-कृष्ण को गाली देनेवालों को पद्म पुरस्कार देते हैं।

३१. हम म्यामार और कोकराझार की घटना पर पूरी मुंबई के यातायात और संपत्ति को उग्र मुस्लिम प्रदर्शनकारियों के हवाले कर देते हैं और हिन्दुओं की बारात पर भी लाठी चार्ज करते हैं।

३२. हम पाकिस्तान से आए हिन्दुओं को ज़बरन भेड़ियों के हवाले कर देते हैं और बांग्लादेशियों के लिए स्वागत द्वार बनाते हैं।

३३. हम जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में "गोमांस पार्टी" का आयोजन करते हैं और बाबा रामदेव के शहद को प्रतिबंधित करते हैं।

३४. हम अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी की शाखाएं देश के कोने-कोने में खोलने के लिए सरकारी पैकेज देते हैं और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का अनुदान रोक देते हैं।

३५. हम आतंकवादियों के घर (आज़मगढ़) जाकर आंसू बहाते हैं और शहीद जवानों की विधवाओं और बच्चों को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं।

३६.हम आतंकवादियों से मुठभेड़ को फ़र्ज़ी एनकाउंटर कहते हैं और हिन्दू साधु-सन्तों को आतंकवादी।

३७. हम सलमान रश्दी को भारत आने की अनुमति नहीं देते, तसलीमा नसरीन को भारत में रहने की इज़ाज़त नहीं देते लेकिन वीना मलिक को अनिश्चित काल के लिए सरकारी मेहमान बनाते हैं।