Tuesday, October 24, 2017

टीपू सुल्तान -- इंसान या हैवान

        पता नहीं कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को शान्त कर्नाटक में अशान्ति उत्पन्न करने और अलगाववाद को हवा देने में कौन सा आनन्द आता है। कभी वे हिन्दी के विरोध में वक्तव्य देते हैं तो कभी कर्नाटक के लिए जम्मू कश्मीर की तर्ज़ पर अलग झंडे की मांग करते हैं। आजकल उन्हें टीपू सुल्तान को राष्ट्रीय नायक और स्वतन्त्रता सेनानी घोषित करने की धुन सवार है। वे राजकीय स्तर पर १० नवंबर को टीपू सुल्तान की जयन्ती मनाने की घोषणा कर चुके हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि टीपू सुल्तान ने इस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ़ युद्ध लड़ा था जिसमें वह मारा गया था। वह युद्ध उसने अपने हितों की रक्षा के लिए लड़ा था न कि भारत की स्वतन्त्रता के लिए। उस समय भारत एक राजनीतिक इकाई था ही नहीं। मात्र इतने से वह राष्ट्रीय नायक नहीं बन जाता। उसने अपने शासन काल में अपनी प्रजा, विशेष रूप से हिन्दुओं पर जो बर्बर अत्याचार किए थे, उन्हें नहीं भुलाया जा सकता। उसके कार्य बाबर, औरंगज़ेब, तैमूर लंग और मोहम्मद गज़नी से तनिक भी कम नहीं थे।
      कर्नाटक का कूर्ग जिला दुर्गम पहाड़ियों से घिरा हुआ एक सुंदर और रमणीय पर्यटन स्थल है। इसी जिले के तल कावेरी से पवित्र कावेरी नदी का उद्गम होता है। इस जिले में हजारों मन्दिर थे। कई रमणीय जलप्रपात इसे दर्शनीय बना देते हैं। यहां के निवासी अत्यन्त धार्मिक और संपन्न थे। यहां के निवासियों को कोडवा कहा जाता है। कर्नाटक सरकार द्वारा टीपू सुल्तान की जयन्ती मनाने का यहां सर्वाधिक विरोध होता है क्योंकि टीपू सुल्तान ने वहां के निवासियों के साथ जो बर्बर अत्याचार किए थे, उसके घाव अभी भी नहीं सूखे हैं। टीपू का पिता हैदर अली था जिसने धोखे से मैसूर की सत्ता हड़प ली थी। उसने कूर्ग के हिन्दुओं का सामूहिक नरसंहार किया था। ब्रिटिश इतिहासकार लेविन बावरिंग लिखते हैं – हैदर ने कुर्ग के एक कोडवा के सिर के लिए पांच रुपए का ईनाम घोषित किया था जिसके तुरन्त बाद उसके सामने सात सौ निर्दोष कोडवा हिन्दुओं के सिर प्रस्तुत किए गए। हैदर अली बहुत दिनों तक कूर्ग को अपने नियंत्रण में नहीं रख सका। १७८० में कूर्ग फिर आज़ाद हो गया। लेकिन १७८८ में टीपू सुल्तान ने इसे श्मशान बना दिया। नवाब कुर्नूल रनमस्त खान को लिखे अपने एक पत्र में टीपू ने यह स्वीकार किया है कि कूर्ग के विद्रोहियों को पूरी तरह कुचल दिया गया है। हमने विद्रोह की खबर सुनते ही तेजी से वहां के लिए प्रस्थान किया और ४०,००० कोडवाओं को बंदी बना लिया। कुछ कोडवा हमारे डर से जंगलों में भाग गए जिनका पता लगाना चिड़ियों के वश में भी नहीं है। हमने वहां के मन्दिर तोड़ डाले और सभी ४०,००० बंदियों को वहां से दूर लाकर पवित्र इस्लाम में दीक्षित कर दिया। उन्हें अपनी अहमदी सेना में भर्ती भी कर लिया। अब वे अपनों के खिलाफ़ हमारे लिए लड़ेंगे। टीपू सुल्तान ने कूर्ग के लगभग सभी गांवों और शहरों को जला दिया, मन्दिरों को तोड़ दिया और हाथ आए कोडवाओं को इस्लाम में धर्मान्तरित कर लिया। इतना ही नहीं, उसने बाहर से लाकर ७००० मुस्लिम परिवारों को कूर्ग में बसाया ताकि हमेशा के लिए जनसंख्या संतुलन मुसलमानों के पक्ष में रहे। वहां के हिन्दू आज भी टीपू सुल्तान से इतनी घृणा करते हैं कि गली के आवारा कुत्तों को ‘टीपू’ कहकर पुकारते हैं।
      १९७०-८० में सेकुलरिस्टों ने टीपू सुल्तान को सेकुलर और सहिष्णु घोषित करने का काम किया। इस तरह इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा गया। उसके पहले कोई मुसलमान भी अपने बच्चे का नाम ‘टीपू’ नहीं रखता था।
      टीपू सुल्तान ने अपने १७ वर्ष के शासन-काल में हिन्दुओं पर असंख्य अत्याचार किए। हिन्दुओं को वह काफ़िर मानता था, जिनकी हत्या करना और इस्लाम में लाना, उसके लिए पवित्र धार्मिक कृत्य था जिसे वह ज़िहाद कहता था। कर्नाटक के कूर्ग जिले और केरल के मालाबार क्षेत्र में उसने हिन्दुओं के साथ जो बर्बरता की वह ऐतिहासिक तथ्य है, जिसके लिए किसी नए प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। उसने कालिकट शहर को जो मसालों के निर्यात के लिए विश्व-प्रसिद्ध था जलाकर राख कर दिया और उसे भूतहा बना दिया। लगभग ४० वर्षों तक कालिकट गरीबी और भूखमरी से जूझता रहा क्योंकि टीपू सुल्तान ने वहां की कृषि और मसाला उद्योग को बुरी तरह बर्बाद कर दिया था। टीपू सुल्तान ने अपने मातहत अब्दुल दुलाई को एक पत्र के माध्यम से स्वयं अवगत कराया था कि अल्लाह और पैगंबर मोहम्मद की कृपा से कालिकट के सभी हिन्दू इस्लाम में धर्मान्तरित किए जा चुके हैं। कोचिन राज्य की सीमा पर कुछ हिन्दू धर्मान्तरित नहीं हो पाए हैं, लेकिन मैं शीघ्र ही उन्हें इस्लाम धर्म कबूल कराऊंगा, ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है। अपने इस उद्देश्य को मैं ज़िहाद मानता हूं। टीपू सुल्तान ने जहां-जहां हिन्दुओं को हराया वहां के प्रमुख शहरों के नामों का भी इस्लामीकरण कर दिया। जैसे –
ब्रह्मपुरी – सुल्तानपेट, कालिकट – फ़रुखाबाद, चित्रदुर्गा – फ़ारुख-यब-हिस्सार, कूर्ग – ज़फ़राबाद, देवनहल्ली – युसुफ़ाबाद, दिनिगुल – खलीलाबाद,  गुट्टी – फ़ैज़ हिस्सार, कृष्णगिरि – फ़ल्किल आज़म और मैसूर – नज़राबाद। टीपू सुल्तान की मौत के बाद स्थानीय निवासियों ने शहरों के नए नाम खारिज़ कर दिए और पुराने नाम बहाल कर दिए। टीपू सुल्तान ने प्रशासन में भी लोकप्रिय स्थानीय भाषा कन्नड़ को हटाकर फरसी को सरकारी भाषा बना दिया। सरकारी नौकरी में भी उसने केवल मुसलमानों की भर्ती की, चाहे वे अयोग्य ही क्यों न हों।
      दक्षिण भारत में हिन्दुओं पर टीपू सुल्तान ने अनगिनत अत्याचार किए। उसने लगभग पांच लाख हिन्दुओं का कत्लेआम कराया, हजारों औरतों को बलात्कार का शिकार बनाया और जनता में स्थाई रूप से भय पैदा करने के लिए हजारों निहत्थे हिन्दुओं को हाथी के पैरों तले रौंदवा कर मार डाला। उसने करीब ८००० हिन्दू मन्दिरों को तोड़ा। उसके शासन-काल में मंदिरों में धार्मिक क्रिया-कलाप अपराध था। हिन्दुओं पर उसने जाजिया की तरह भांति-भांति के टैक्स लगाए।

      प्रसिद्ध इतिहासकार संदीप बालकृष्ण ने अपनी पुस्तक – Tipu Sultan : The Tyrant of Mysore में स्पष्ट लिखा है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि टीपू सुल्तान दक्षिण का औरंगज़ेब था। जिस तरह औरंगज़ेब ने १८वीं शताब्दी की शुरुआत में दिल्ली और उत्तर भारत में हिन्दुओं पर अमानुषिक अत्याचार किए, उनके हजारों मंदिर गिराए, उसी तरह १८वीं सदी के अन्त में टीपू सुल्तान ने दक्षिण में औरंगज़ेब के कार्यों की पुनरावृत्ति की। जो काम औरंगज़ेब ने अपने ५० साल के लंबे शासन-काल में किया, वही काम टीपू सुल्तान ने धार्मिक कट्टरता और हिन्दू-द्वेष से प्रेरित होकर अपने १७ साल की छोटी अवधि में कर दिखाया। यह बड़े अफसोस और दुःख की बात है कि कर्नाटक की कांग्रेसी सरकार ने तमाम विरोधों के बावजूद टीपू सुल्तान जैसे घोर सांप्रदायिक और निर्दयी शासक की जयन्ती मनाने का निर्णय किया है। इसकी जितनी भी निन्दा की जाय, कम होगी।

Saturday, October 21, 2017

हिन्दू-मुस्लिम समस्या

    १९८० के दशक तक मेरे गांव में हिन्दुओं और मुसलमानों में जो आपसी सौहार्द्र था वह अनुकरणीय ही नहीं आदर्श भी था। मेरे गांव के मुसलमान ताज़िया बनाते थे। पिताजी के पास बांस के चार कोठ थे। इसलिए मुसलमान पिताजी से ताज़िया बनाने के लिए बांस भी ले जाते थे, साथ ही सहयोग राशि भी ले जाते थे। पिताजी उन लोगों को अपनी बंसवारी से बांस उसी प्रसन्नता से देते थे जिस तरह किसी हिन्दू लड़की के विवाह के लिए मण्डप निर्माण के लिए बांस देते थे। मुस्लिम भी मुहर्रम के दिन जब ताज़िया का जुलूस निकालते थे तो मेरे घर पर जरुर आते थे। दरवाजे के सामने ताज़िया रखकर तरह-तरह के करतब दिखाते थे। मेरे घर की महिलाएं बाहर निकलकर ताज़िए का पूजन करती थीं। जुलूस में ज्यादा संख्या में हिन्दू ही लाठी-भाला लेकर मुसलमानों के साथ ताज़िए के साथ चलते थे। हमलोग उसदिन पटाखे छोड़ते थे। लगता ही नहीं था कि मुहर्रम हमारा त्योहार नहीं है। मुसलमान भी हिन्दुओं के त्योहार मनाते थे। मेरे गांव की कई मुस्लिम औरतें छठ का व्रत रखती थीं और पूरे विधि-विधान से अर्घ्य देती थीं। मेरे गांव में वसी अहमद एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। वे और उनका परिवार हिन्दुओं के साथ होली खेलता था। होली की मंडली के स्वागत के लिए पूरा परिवार पूरी व्यवस्था रखता था। वे शिया संप्रदाय के थे। उन्हें और उनके पड़ोसियों को रंग-अबीर से कोई परहेज़ नहीं था। शादी-ब्याह, व्रत-त्योहार में परस्पर बहुत सहयोग था। लेकिन १९८० के बाद माहौल में बदलाव आना शुरु हो गया। कुछ मौलाना तहरीर के लिए गांव में आने लगे। उनकी तहरीर रात भर चलती थी। उनकी तहरीर सिर्फ मुसलमान ही नहीं सुनते थे बल्कि हिन्दुओं को भी लाउड स्पीकर के माध्यम से जबर्दस्ती सुनाया जाता था। परिणाम यह हुआ कि दोनों समुदायों में सदियों पुराना पारस्परिक सहयोग घटते-घटते बंद हो गया। अब ताज़िए के जुलूस में हिन्दू शामिल नहीं होते। इन सबके बावजूद भी शिया मुसलमानों के संबन्ध आज भी हिन्दुओं के साथ सौहार्द्रपूर्ण हैं। मेरे गांव के शिया मुसलमान सुन्नियों के साथ कम और सवर्ण हिन्दुओं के साथ उठना-बैठना ज्यादा पसंद करते हैं। जहां सुन्नी मुसलमान अलग बस्ती में रहते हैं, वहीं शिया मुसलमान बिना किसी भय के हिन्दुओं से घिरी बस्ती में सदियों से रहते आ रहे हैं। न कोई वैमनस्य, न कोई झगड़ा। क्या भारत के सुन्नी मुसलमान शियाओं की तरह उदार नहीं हो सकते? जब हमें साथ-साथ ही रहना है तो क्यों नहीं उदारता, सहिष्णुता और एक दूसरे के धर्मों के प्रति सम्मान के साथ रहा जाय?

      कुछ हिन्दूवादी संगठन मुसलमानों की घर वापसी के पक्षधर हैं। मेरा उनसे एक ही सवाल है कि अगर कोई मुसलमान घर वापसी करता है तो उसे किस जाति में रखा जायेगा? सैकड़ों जातियों में बंटा जो हिन्दू समुदाय आज तक एक हो  नहीं सका वह मुसलमानों को कहां स्थान देगा? यह विचार अव्यवहारिक है। मुसलमानों में भी जो पढ़े-लिखे हैं और इतिहास का ज्ञान रखते हैं, उनका मानना है कि अखंड भारत के ९९% मुसलमान परिस्थितिवश हिन्दू से ही मुसलमान बने हैं। हमारे पूर्वज एक ही हैं और हमारा डीएनए भी एक ही है। भारत के मुसलमानों का डीएनए अरब के मुसलमानों से नहीं मिलता। जिस दिन भारत का मुसलमान इस सत्य को स्वीकार कर लेगा, उसी दिन हिन्दू-मुस्लिम समस्या का सदा के लिए अन्त हो जाएगा। इसके लिए हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के प्रबुद्ध वर्ग को सामने आकर यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। अलग रहने की हमने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। अब साथ रहकर हम विश्व को नई दिशा दिखा सकते हैं। हिन्दुओं ने जैसे बौद्धों, जैनियों, सिक्खों को अपने से अभिन्न स्वीकार किया है, उसी तरह अलग पूजा पद्धति को मान्यता प्रदान करते हुए मुसलमानों का भी मुहम्मदपंथी हिन्दू के रूप में दिल खोलकर स्वागत करेंगे। फिर हमलोग ईद-बकरीद, दिवाली-दशहरा और होली साथ-साथ मनायेंगे। न कोई राग होगा, न कोई द्वेष, न लड़ाई न झगड़ा। 

Saturday, October 14, 2017

बनारस और प्रधानमन्त्री मोदी


मैं बनारस में रहता हूं। मेरी शिक्षा-दीक्षा भी यहीं हुई है और अपनी नौकरी के उत्तरार्ध के १८ वर्ष मैंने यहीं व्यतीत किए हैं। एक लंबे समय से मैं बनारस से जुड़ा हूं। मेरे छात्र जीवन में बनारस जैसा था आज भी लगभग वैसा ही है; बस एक परिवर्तन को छोड़कर। पहले सड़क पर हम किसी भी वाहन से या पैदल चल सकते थे। यहां टांगा भी चला करते थे लेकिन अब पैदल चलना भी दुश्वार है। लंका की सड़कें सबसे चौड़ी हैं, फूटपाथ भी है लेकिन बी.एच.यू. के सिंहद्वार से लेकर रविदास गेट तक दिन भर जाम लगा रहता है। आप कार से गोदौलिया जाने की सोच भी नहीं सकते हैं। बढ़ती जनसंख्या, गाड़ियों की संख्या और आवारा साढ़ों तथा गायों की संख्या ने यातायात को दयनीय बना दिया है। सीवर और ड्रेनेज की समस्या ज्यों की त्यों है। मुख्य मार्गों पर भी सीवर का पानी बहते हुए देखा जा सकता है। मोदी जी के यहां से सांसद और प्रधान मन्त्री बनने के बाद बनारसियों की उम्मीदें आसमान छूने लगीं। वे भी जापान के प्रधानमन्त्री के साथ यहां आए और बनारस को क्योटो बनाने की घोषणा की। जबतक अखिलेश यादव मुख्यमन्त्री थे, तब यही कहा जाता था कि केन्द्र सरकार दिल्ली से पैसे तो भेज रही है लेकिन राज्य सरकार न योजना बना रही है और ना ही पैसे का सदुपयोग कर रही है। कुल मिलाकर जनता में यह भाव भरा गया कि राज्य सरकार के असहयोग के कारण बनारस का विकास नहीं हो पा रहा है। लेकिन अब तो दिल्ली में मोदी हैं, लखनऊ में योगी हैं, जिले के सभी सांसद और विधायक भाजपा के हैं तथा नगर निगम भी भाजपा के कब्जे में है। दुःख के साथ लिखना पड़ता है कि कोई भी सांसद या विधायक कभी भी जनता से संपर्क नहीं करते हैं और ना ही अपने क्षेत्रों का सघन दौरा करते हैं। यहां के ब्यूरोक्रैट्स मोदी जी के बनारस आगमन के समय उन सड़कों को चमका देते हैं, जहां से मोदी जी को गुजरना होता है। उसके बाद उनके कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है। कुछ परियोजनाओं के विवरण निम्नवत हैं जो वर्षों से पूर्णता की प्रतीक्षा कर रही हैं --
१. केन्द्र सरकार ने अपने पहले बजट में ही बनारस के लिए एक अलग AIMS की स्थापना की घोषणा की थी जिसे योगी जी गोरखपुर के लिए ले उड़े। मैंने स्वयं और बनारस के हजारों लोगों ने बनारस में ही AIMS खोलने के लिए सरकार को अडिग रहने के लिए पत्र लिखे लेकिन कोई जवाब नहीं आया। मोदी से योगी भारी पड़ गए।
२. मंडुआडीह में रेलवे क्रोसिंग के उपर एक फ़्लाईओवर का निर्माण वर्षों से हो रहा है जो अभी भी अधूरा है। फ़्लाईओवर बनने के पहले दोनों तरफ सर्विस रोड बनाई जाती है। बनारस में इसका पालन नहीं किया जाता है।
३. कैन्ट रेलवे स्टेशन के सामने अन्धरा पुल और लहरतारा के फ़्लाईओवर को एक नए फ़्लाईओवर से जोड़ने का काम भी वर्षों से चल रहा है। सन २०१९ तक भी इसके पूरा होने की संभावना नहीं है क्योंकि उसपर कोई काम होता हुआ दिखाई ही नहीं पड़ता। सर्विस रोड की हालत अत्यन्त दयनीय है जिसके कारण २४ घंटे जाम लगा रहता है। रोज ही किसी की ट्रेन छूटती है तो किसी की फ़्लाइट। 
४. मोदी जी के प्रधानमन्त्री बनने के बाद बनारस के एयरपोर्ट बाबतपुर से शिवपुर तक शहर को जोड़ने के लिए एक लंबे फ़्लाईओवर पर काम शुरु हुआ जो आज भी अधूरा है। बनारस की परंपरा के अनुसार ही सर्विस रोड की हालत दयनीय है। पता नहीं वह शुभ दिन कब आएगा जब यह फ़्लाई ओवर पूरा होगा। इतना तो निश्चित है कि वह शुभ दिन २०१९ के पहले नहीं आएगा।
       मैं मोदीजी का आलोचक या विरोधी नहीं हूं बल्कि उनका प्रबल समर्थक हूं। लेकिन अपने दिल का दर्द दिल में नहीं रखता। बनारस अगर कूड़े का ढेर भी बन जाएगा तो भी वोट मैं मोदीजी को ही दूंगा क्योंकि मुझे यह अटूट विश्वास है कि यह देश उनके नेतृत्व में ही सुरक्षित है। स्थानीय हित को देशहित के लिए कुर्बान करने के लिए मैं तैयार हूं लेकिन सभी बनारसी मेरा अनुकरण करेंगे, इसमें संदेह है। वादे सुनते-सुनते बनारसियों के कान पक गए हैं।

Friday, September 22, 2017

रक्षक बने भक्षक


आज समाचार पत्रों में मुख्य समाचार है कि लखनऊ के प्राइवेट मेडिकल कालेज में दाखिले से संबन्धित मामलों को रफ़ादफ़ा करने की साज़िश में हाई कोर्ट के पूर्व जज समेत छः लोग गिरफ़्तार। यह डील एक करोड़ की थी। हाई कोर्ट के पूर्व जज हैं -- उड़ीसा हाई कोर्ट के पूर्व जज इसरत मसरूर कुद्दुसी। गिरफ़्तारी के बाद सबको सी.बी.आई. ने दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने सभी आरोपियों को सी.बी.आई. की हिरासत में भेज दिया गया। सी.बी.आई. अपने मुख्यालय में चार दिन तक उनसे पूछताछ करेगी। हमारी न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की यह एक छोटी सी मिसाल है। मेरे एक मित्र सत्र न्यायालय में जज हैं। जब भी उनके साथ बैठकी होती है, वे हमेशा इंजीनियर, डाक्टर, आई.ए.एस द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की चर्चा करते हैं। एक दिन मुझसे रहा नहीं गया और मैंने कह ही दिया कि भ्रष्टाचार की जननी न्यायपालिका है। मैंने कहा कि मेरे विभाग में किसी भी कर्मचारी की हिम्मत नहीं है कि मेरे ही कक्ष में मेरे सामने किसी से रिश्वत ले ले। लेकिन किसी भी कोर्ट में यह लेन-देन सबके सामने होता है। कोर्ट में पेशकार जज के सामने ही मुवक्किल से घूस लेता है और तब फाइल देखकर अगली डेट बताता है। कम पैसे मिलने पर वह फाइल छूने भी नहीं देता। वकील/ मुवक्किल और पेशकार के बीच इस लेनदेन को, ऐसा कोई भी नहीं होगा, जो कभी न्यायालय गया हो और नहीं देखा हो। जज साहब ने उत्तर दिया कि यह कोर्ट का दस्तूर है जो अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है। अपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए इसे ‘दस्तूर’ का नाम दिया गया है। किसी भी जज ने इसे रोकने की कोशिश नहीं की। परिणाम यह निकला कि यह दस्तूर भयंकर भ्रष्टाचार में परिवर्तित हो गया और लोवर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को प्रभावित करने लगा।
दूसरी ताज़ी घटना है -- पंजाब की नाभा जेल ब्रेक कांड के मुख्य आरोपी गोपी घनश्यामपुरिया को छोड़ने के लिए हुई एक करोड़ की डील के मामले की जांच के लिए यू.पी. के ए.डी.जी. कानून व्यवस्था आनन्द कुमार वृहस्पतिवार को अमृतसर रवाना हो गए। वे पंजाब पुलिस द्वारा गिरफ़्तार अपराधियों से पूछताछ कर रिश्वत कांड  की हकीकत पता लगाने की कोशिश करेंगे। ज्ञात हो कि इस कांड में यू.पी. के एक सिनियर आई. पी..एस. अफसर का नाम जांच के दायरे में है। इस समय कई आई.ए.एस. अफसर भी भ्रष्टाचार के सिद्ध आरोपों में जेल में सजा काट रहे हैं।
आखिर १९७० के बाद भारत में कौन सी बयार बही कि कोई भी महकमा भ्रष्टाचार से अछूता नहीं रहा? पैसे की हवस पिछले बीस वर्षों में इतनी बढ़ी है कि सारे नैतिक मूल्य तार-तार हो गए। इसके लिए अगर कोई सबसे ज्यादा जिम्मेदार है तो वे हैं राजनीतिक पार्टियां और मुख्य रूप से कांग्रेस पार्टी। राजनेताओं ने भ्रष्टाचार को आम आदमी का संस्कार बना दिया। इन लोगों ने समाज को जाति और मज़हब में इस तरह बांट दिया कि अपनी जाति के नेताओं द्वारा किया गया भ्रष्टाचार उस जाति के मतदाताओं को दिखाई ही नहीं पड़ता। इसे मतदाताओं ने सामाजिक स्वीकृति प्रदान कर दी है। लालू, मुलायम, मायावती, करुणानिधि आदि नेता इसी की फसल काट रहे हैं। जातिवाद भ्रष्टाचार को बढ़ाने में सबसे बड़ा सहायक है। आजकल कांग्रेस इन भ्रष्टाचारी नेताओं की सबसे बड़ी हमदर्द बन गई है। अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार की सारी सीमाएं तोड़ने वाली कांग्रेस कभी लालू की रैली में शामिल होती है, तो कभी अखिलेश और मायावती से गठबन्धन करती है तो कभी करुणानिधि से गलबहियां का खेल खेलती है। उसे भ्रष्ट और देशद्रोही हुरियत कान्फ़ेरेन्स को समर्थन देने में भी शर्म नहीं आती है। आजकल पप्पू भैया अमेरिका जाकर भ्रष्टाचार का उन्मूलन कर रहे हैं।
मोदी राज में मन्त्री स्तर से तो भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है, लेकिन निचले स्तर पर हर विभाग में यह ज्यों का त्यों कायम है। बच्चों को नैतिकता की शिक्षा देने का काम पहले माता-पिता और स्कूल किया करते थे। अब माता-पिता सारी जिम्मेदारी स्कूल को सौंपकर मजे ले रहे हैं और स्कूल में इसी समाज से आए शिक्षकों और कर्मचारियों का बहुमत है। आए दिन शिक्षको द्वारा अपनी ही शिष्याओं से बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आ रही हैं। अब बच्चे जो भी सीखते हैं उनका आधार टी.वी. और फिल्में हैं जिनपर किसी का नियंत्रण नहीं है। वे जो भी परस दें, बच्चे उसे ग्रहण करने के लिए वाध्य हैं। समझ में नहीं आता कि कौन सा अवतार आएगा जब भारत से भ्रष्टाचार खत्म होगा।

Saturday, September 9, 2017

खोदा पहाड़ निकली चुहिया

                   आज पन्द्रह दिन से ज्यदा हो गए, टी.वी. न्यूज चैनल पर बाबा राम रहीम के किस्से ही छाए हुए हैं। मीडिया ने बाबा के किसी व्यक्तिगत सुरक्षा गार्ड का साक्षात्कार लिया, तो डेरा के किसी पुराने असंतुष्ट कर्मचारी का। जिसको भी टी.वी. पर अपना चेहरा दिखाने की इच्छा बलवती हुई, उसने किसी न्यूज चैनल को फोन करके स्वयं को हनीप्रीत या बाबा का पूर्व सहयोगी बताया। फिर क्या था, सारे न्यूज चैनलों में उसका चेहरा और साक्षात्कार दिखाने की होड़ मच गई। चैनलों ने खुद ही यह कहते हुए डेरा के फोटोग्राफ जारी किए कि वह चैनल ही पहली बार ऐसी दुर्लभ तस्वीरें जारी कर रहा है। चैनलों ने खुद ही मामला बनाया, मुकदमा चलाया और फैसला भी दे दिया कि बाबा को बीस साल नहीं, जिन्दगी भर जेल में रहना पड़ेगा। बाबा के सिरसा के डेरे को इतना रहस्यात्मक बना दिया जैसे वह पाकिस्तान के क्वेटा का परमाणु घर हो जिसमें सैकड़ों परमाणु बम छिपाकर रखे गए हों। बाबा के डेरे के टोकन को समानान्तर करेन्सी कहकर प्रचारित किया गया। हमेशा विदेश यात्राओं पर टी.वी. पर छाए रहने वाले प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी भी बाबा राम रहीम के बाद दूसरे स्थान पर फिसल गए। अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए इन टी.वी. चैनलों ने पता नहीं कितने सच्चे-झूठे, नैतिक-अनैतिक समाचार गढ़े और चटकारे लेकर सुनाए और दिखाए। आदमियों के साथ शेर के बच्चों और काले घोड़ों की भी हत्या की दास्तान सुनाई गई। भयभीत हरियाणा सरकार १४ दिनों के बाद ५००० पुलिस और पारा मिलिटरी जवानों, खुदाई करने वाली भारी मशीनों, आधे दर्ज़न मजिस्ट्रेट, न्यायिक अधिकारी, सैकड़ों कर्मचारी, रिटायर्ड जज, स्निफ़र डाग, ताला टोड़ने वाले लोहारों और तरह-तरह के विशेषज्ञों के साथ डेरे पर छापा मारने गई। छापा मारने के लिए १४ दिन का समय क्यों लिया गया, यह भी डेरे के रहस्य से कम रहस्यमय नहीं है। क्या कोई भी अपराधी १४ दिनों तक अपने अपराधों का प्रमाण अपने ही घर में रख सकता है? खैर, छापामारी की गई जिसमें अभी तक जूतों, कपड़ों, टोकन और पटाखों के सिवा कुछ नहीं मिला है। हरियाणा पुलिस जो तलाशी अभियान की मुखिया है, बाबा के सभी सहयोगियों को भगाने में सफल रही। यह समझ के बाहर है कि जो हनीप्रीत बाबा के साथ अदालत में मौजूद थी, हेलिकाप्टर में बाबा के साथ बैठकर रोहतक जेल तक गई वह पुलिस के सामने से फ़रार कैसे हो गई। आज उसे ढूंढ़ने के लिए पुलिस की टीम मुंबई से लेकर नेपाल तक की खाक छान रही है। क्या यह जनता की आंखों में धूल झोंकने के समान नहीं है? इसमें कोई दो राय नहीं कि बाबा राम रहीम बलात्कारी, ढोंगी और अपराधी है लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि उसकी पहुंच ऊंचे अधिकारियों और राजनीतिक गलियारे तक है। सिरसा की इस घटना ने हरियाणा सरकार की छवि धूमिल की है। मुख्यमंत्री श्री खट्टर भाजपा शासित राज्यों के सबसे कमजोर मुख्यमंत्री सिद्ध हुए हैं। सरकार की लापरवाही और बाबा से मिलीभगत के लिए हरियाणा सरकार पर भी मुकदमा चलना चाहिए।