Sunday, September 16, 2018

लोकतन्त्र में विरोध का अधिकार


           इस समय विरोध के अधिकार पर बहस जारी है, जिसे पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के जज डी.वाई. चन्द्रचूड़ की इस टिप्पणी ने और हवा दी है कि लोकतन्त्र में विरोध सेफ़्टी वाल्व का काम करता है। अगर उसे इस्तेमाल नहीं करने दिया गया तो कूकर फट जाएगा। यह टिप्पणी हाल ही के सबसे चर्चित विवादित उन पांच शहरी नक्सलियों की गिरफ़्तारी के संबन्ध में है जिन्हें पुलिस ने देशद्रोहियों की मदद के आरोप में गिरफ़्तार किया। इस समय ये घर में नज़रबन्द हैं।
      हमारा संविधान जाति, नस्ल आदि के भेदभावों से ऊपर उठकर सबको अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, परन्तु भारत में जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है, इस अधिकार का जितना दुरुपयोग होता है, शायद विश्व के किसी कोने में नहीं होता होगा। सुप्रीम कोर्ट भी अभिव्यक्ति की आज़ादी की वकालत तो करता है, लेकिन नागरिकों के कर्त्तव्य पर मौन साध लेता है। सुप्रीम कोर्ट ने ही अपने आदेश से विरोध के रूप में किसी तरह के बन्द और सड़क जाम पर प्रतिबन्ध लगा रखा है, लेकिन उस आदेश की रोज ही धज्जियां उड़ाई जाती हैं और सुप्रीम कोर्ट कोई संज्ञान नहीं लेता। बन्द के दौरान की गई हिंसा और माब लिंचिंग में कोई अन्तर नहीं है। माब लिंचिंग पर तो सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान ले लेता है और निन्दा के अलावे कार्यवाही भी करता है, पर बन्द के लिए उन तत्त्वों और राजनीतिक पार्टियों पर न तो कोई कार्यवाही करता है और न निन्दा करता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाले, नारे लगाने वालों और समाज को बांटने की कोशिश करनेवालों को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। इस समय समाज को बांटने वाले और सामाजिक समरसता को तार-तार करनेवाले संगठन और नेता कुकुरमुत्ते की तरह उग आये हैं। जब भी सरकार इनके पर कतरने की कोशिश करती है, न्यायपालिका आड़े आ जाती है। क्या कश्मीर के आतंकवादियों और नक्सलवादियों को अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर खुली छूट दी जा सकती है? क्या देश की एकता और अखंडता से समझौता किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट और सत्ता गंवाने के बाद विक्षिप्त हुई पार्टियों और नेताओं को इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
      देश की आज़ादी की लंबी लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी ने कभी बन्द का आह्वान नहीं किया। एक बार असहयोग आन्दोलन के दौरान भीड़ ने जब चौराचौरी थाने पर कब्जा करके कई पुलिस वालों को ज़िन्दा जला दिया था, तो गांधीजी ने आन्दोलन ही वापस ले लिया। क्या ऐसी नैतिकता कोई भी राजनीतिक पार्टी दिखा सकती है? भारत में बन्द कम्युनिस्ट पार्टी की देन है। यह विचारधारा तो पूरे विश्व में आज मृतप्राय है, लेकिन इसकी गलत आदत सबसे ज्यादा भारत की जनता को लग गई है। भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन की यह एकमात्र सफलता है जो नासूर का रूप धारण करता जा रहा है। अमेरिका में भी ट्रंप के विरोधी कम संख्या में नहीं हैं, लेकिन कभी किसी ने अमेरिका बन्द या विरोध के नाम पर उग्र हिंसा या तोड़फोड़ की खबरें नहीं पढ़ी होगी। कभी-कभी ऐसा लगता है कि क्या अपना देश और अपनी जनता लोकतन्त्र का मतलब भी समझती है? छोटी-छोटी बातों के लिए आपस में उलझना और राष्ट्रीय संपत्ति को शत्रु की संपत्ति की तरह नष्ट कर देना अत्यधिक चिन्तनीय है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता अराजकता का रूप लेती जा रही है जिसे न कानून मान्यता देता है और न हमारा संविधान। लोकतन्त्र का भीड़तन्त्र का रूप लेते जाना कही इस मुहावरे को चरितार्थ तो नहीं कर रहा है -- बन्दर के हाथ में उस्तरा।

Sunday, September 9, 2018

सर्वोच्च न्यायालय और तुष्टीकरण


ऐसा लगता है कि जब से कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ अवमानना की नोटिस दी थी, तब से सर्वोच्च न्यायालय दबाव में आ गया। कांग्रेस का यही उद्देश्य था और इसमें वह सफल रही। अवमानना की नोटिस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने लगातार ऐसे कार्य किए और ऐसे फैसले लिए जिन्हें तुष्टीकरण की श्रेणी में डाला जा सकता है। करुणानिधि के निधन के बाद उनको दफ़नाए जाने की जगह को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने रात भर सुनवाई की। कर्नाटक में नई सरकार के गठन और विश्वास प्रस्ताव के लिए भी सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी ही त्वरित सुनवाई की और हैरान करने वाला फैसला सुनाया। कल को पूरा मरीना बीच कब्रगाह बन जाय, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। राज्यपाल और राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्ति का भी प्रयोग सर्वोच्च न्यायालय कर रहा है। अबतक यही ज्ञात था कि भारत में संसद ही सर्वोच्च है और उसे ही कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारणा को निर्मूल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए वर्तमान विवादित कालेजियम सिस्टम के स्थान पर संसद ने एक बिल पारित किया था जिसे राष्ट्रपति की भी मंजूरी मिल गई थी। स्पष्ट है कि राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद वह बिल कानून बन गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। उस कानून के लागू होने से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति में मनमानी और भाई-भतिजावाद पर रोक लगने का खतरा था। सारी सीमाओं को लांघते हुए संसद के दोनों सदनों से आम सहमति से पारित और राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित कानून को सु्प्रीम कोर्ट ने कैसे रद्द कर दिया, समझ के परे है। संसद और राष्ट्रपति - दोनों संवैधानिक संस्थाएं सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बौनी नजर आईं।
अभी-अभी शहरी नक्सलियों के प्रति अत्यधिक सहानुभूति दिखाते हुए सर्वोच्च न्यायालय के जजों ने जिस तरह की टिप्पणी की है और आदेश पारित किया है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सुप्रीम कोर्ट स्वयं एक पार्टी हो। राष्ट्रद्रोह में लिप्त होना और प्रधान मन्त्री की हत्या की साज़िश रचना सुप्रीम कोर्ट के लिए बहुत मामूली घटना लग रही है। सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीश सेवा में रहते हुए प्रेस कांफेरेन्स कर सकते हैं, सुप्रीम कोर्ट उनपर कोई कार्यवाही नहीं कर सकता, लेकिन महाराष्ट्र का एक पुलिस अधिकारी अगर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए प्रेस कांफेरेन्स करता है तो वह अवमानना का विषय बन जाता है और कड़ी फटकार का पात्र बन जाता है। क्या यह दोहरी मानसिकता या दोहरा मापदण्ड नहीं है?
कुछ ही दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को मान्यता प्रदान करते हुए भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३७७ को लगभग रद्द कर दिया है। अति आधुनिक और पश्चिम के अनैतिक खुलेपन से होड़ लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए प्रकृति के नियमों को भी ध्यान में नहीं रखा। प्रकृति ने सभी प्राणियों को मर्यादा में बांध रखा है। मनुष्य के अतिरिक्त कोई भी प्राणी प्रकृति प्रदत्त सीमा से बाहर जाकर यौनाचार करता दिखाई नहीं पड़ता। जंगल में रहने वाले स्वच्छन्द प्राणी भी प्राकृतिक क्रम में और सन्तानोत्त्पत्ति के लिए ही यौनाचार करता है। मनुष्यों के आदिवासी समाज में भी समलैंगिकता दूर-दूर तक प्रचलन में नहीं है। केवल तथाकथित सभ्य मानव ही अपने अहंकार की तुष्टि के लिए अमर्यादित चर्या की ओर आकृष्ट होता है। उससे भी आगे बढ़कर आज बहुशिक्षित समाज में विशेष रूप से पाश्चात्य समृद्ध देशों में व्यक्ति जिन कुंठाओं के बीच जीवन-यापन करता दिखाई देता है और जिस प्रकार के मादक पदार्थों के सेवन के बीच अपनी वासनाओं से संघर्ष करता है, वहाँ इस तरह की गतिविधियों का चलन तेजी से बढ़ा है। दूसरी बात यह भी है कि वहाँ हमारी तरह कोई समाज व्यवस्था नहीं है, जिसका अंकुश परोक्ष रूप से किसी व्यक्ति पर लगता हो। वहाँ की आबादी की इकाई व्यक्ति ही है और सारे कानून भी व्यक्ति को ध्यान में रखकर बने होते हैं। इसी का परिणाम यह रहा कि व्यक्ति स्वतंत्र रहने के बजाय स्वच्छन्द हो गया। सुप्रीम कोर्ट के समलैंगिकता के पक्ष में दिए गए फैसले से एक और विषम परिस्थिति देश और समाज के सामने आनेवाली है। जो लड़के या लड़की समलैंगिकता की ओर आकर्षित हो जाते हैं, वे शादी करने को कभी राजी नहीं होते। इस स्थिति में माँ-बाप को बिलखते हुए और समाज की दृष्टि में उपेक्षित होते हुए देखा जा सकता है। ऐसे लड़के-लड़कियों पर न किसी की सलाह का असर होता है और न ही विपरीत लिंगीय आकर्षण होता है। जीवन का एक तरह से यह एक बड़ा नैतिक विघटन और पतन है। स्वतंत्रता सबको चाहिए, किन्तु हमारे देश में समाज-व्यवस्था भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितना कानून। अगर इसे ध्यान में नहीं रखा गया तो खाप पंचायतों का प्रचलन अपने आप बढ़ जाएगा।
हमारी परंपराएं कानून के समकक्ष मानी गई हैं। सभी तरह की सेवाओं पर भी इसका असर पड़ेगा। इस तरह के कानून तो समाज की मर्यादा के भीतर ही अपना अस्तित्व तय करें, उसी में देश और समाज का कल्याण शामिल है। अगर ऐसे ही फैसले आते रहें, तो एक काल के बाद हमें भी इस देश में सांस्कृतिक पवित्रता तार-तार होती दिखने लग जाएगी। चंद लोगों की मनमानी के कारण हमारे सनातन और पुराने ज्ञान की यही उच्छृंखल लोग सार्वजनिक स्थलों पर सरे आम होली जलाएंगे।

Thursday, September 6, 2018

माब लिंचिंग

     पूरे विश्व का मनुष्य तीन गुणों से युक्त है। वे हैं -- तमो गुण, रजो गुण और सत्व गुण। मनुष्य के रहन-सहन, खान-पान और व्यवहार में भी तीनों गुण परिलक्षित होते हैं। इन तीन गुणों की की व्यक्ति में उपस्थिति का अनुपात ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण करता है। कम या अधिक मात्रा में ये तीनों गुण सदैव विद्यमान रहते हैं। इसीलिए गीता में भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने अर्जुन को तीनों गुणों से परे अर्थात गुणातीत होने का परामर्श दिया है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए गुणातीत होना अत्यन्त आवश्यक है, परन्तु व्यवहारिक जीवन में गुणातीत होना असंभव तो नहीं लेकिन अत्यन्त दुष्कर अवश्य है। क्रोध और हिंसा रजो गुण के अंग हैं जो प्रत्येक मनुष्य की स्वभाविक प्रवृत्ति है। माब लिंचिंग या भीड़ की हिंसा इसी की देन है। मनोवैज्ञानिकों ने गहन शोध के बाद यह निश्कर्ष निकाला है कि हर व्यक्ति, चाहे वह बड़ा से बड़ा अपराधी क्यों न हो, उचित और अनुचित का भेद समझता है। उसके अन्तस्‌ में उचित के प्रति समर्थन और अनुचित के प्रति विरोध सदैव रहता है, भले ही वह सुप्तावस्था में ही क्यों न हो। जब कोई चोर चोरी करते हुए पकड़ा जाता है, तो पास से गुजरने वाले व्यक्ति के मन में चोरी के प्रति सुप्त विरोध प्रकट हो जाता है। अगर भीड़ ने चोर को पकड़ा है, तो आसपास के लोग भी विरोध से सम्मोहित हो जाते हैं और ऐसा काम कर बैठते हैं जिसे अकेले करने के लिए वे सोच भी नहीं सकते थे। भीड़तंत्र में सभी सम्मोहन की स्थिति में होते हैं, इसलिए एक या दो मुखर व्यक्ति जो निर्देश ऊँचे स्वर में देते हैं, भीड़ बिना परिणाम का विचार किए उसका पालन करने लगती है। जनमानस सार्वजनिक स्थलों पर चोरी, लूट, महिलाओं से अभद्र व्यवहार, हिंसा आदि के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होता है। वह ऐसे अपराधियों को सजा देने के लिए कानून या पुलिस की प्रतीक्षा नहीं करता। वह हाथ के हाथ सजा देकर मामले का निपटारा कर देता है। भीड़ की इस मानसिकता के कारण शंका के आधार पर भी निर्दोष की हत्या हो जाती है। लेकिन भीड़ के इसी डर के कारण दिन के उजाले में सार्वजनिक स्थानों पर अपराधी अपराध करने से डरते भी हैं। भीड़तंत्र के लाभ भी हैं और हानियां भी हैं। कभी तो यह कानून-व्यवस्था को बनाये रखने में सहायक होता है और कभी कानून को ही अपने हाथ में ले लेता है। सिर्फ कानून बनाकर इसपर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता। मनुष्यों में नैतिकता की मात्रा बढ़ाकर अर्थात सतो गुण की वृद्धि करके इसपर काबू पाया जा सकता है। इसके लिए विद्यालयों में उचित नैतिक शिक्षा की व्यवस्था करना आवश्यक है। सभी राजनीतिक दलों को दलीय स्वार्थ से ऊपर उठकर नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सर्वसम्मति से कार्य करना चाहिए। सभी धर्मों के नैतिक आदर्श से विद्यार्थियों को परिचित कराना चाहिए, तभी हम माब लिंचिंग पर नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं।

Tuesday, June 26, 2018

लोकतन्त्र का काला दिन

          आज से ४३ वर्ष पूर्व आज के ही दिन कांग्रेस की तथाकथित महानतम नेत्री इन्दिरा गाँधी द्वारा देश पर इमर्जेन्सी थोपकर लोकतन्त्र की हत्या की गई थी। वे राय बरेली से लोकसभा का चुनाव लड़ी थीं और विजयी भी हुई थीं लेकिन चुनाव में जमकर सरकारी साधनों और अधिकारियों का दुरुपयोग किया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह आरोप प्रमाणित भी हो गया और इसके आधार पर हाई कोर्ट ने इन्दिरा गाँधी के चुनाव को अवैध घोषित करते हुए छ: साल तक उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया। उन दिनों लोक नायक जय प्रकाश नारायण का जन आन्दोलन चरम पर था। इन्दिरा गांधी की कुर्सी खतरे में पड़ गई थी। देश के हर कोने से उनके त्यागपत्र की मांग जोरों से उठने लगी थी। शालीनता से इस्तीफा देने के बदले इन्दिरा गांधी ने सत्ता और संविधान का दुरुपयोग करते हुए आपात्काल की घोषणा कर दी और जनता के सारे मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए। 
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रहार -- इमर्जेन्सी की सबसे अधिक गाज पहले दिन से ही पत्रकारों और समाचार पत्रों पर गिरी। अभिव्यक्ति की आज़ादी पूरी तरह छीन ली गई। समाचार छापने के पूर्व सरकार द्वारा गठित समिति से छापने का अनुमोदन लेना अनिवार्य कर दिया गया। विरोध में कुछ समाचार पत्रों ने सारे पृष्ठ काली स्याही से रंग दिए और कोई समाचार छापा ही नहीं। परिणाम स्वरूप पत्रकार भी गिरफ़्तार हुए। इमर्जेन्सी के दौरान वही पत्रकार बाहर रहे जो इन्दिरा गांधी का गुणगान करते रहे। Illustrated Weekly के संपादक खुशवन्त सिंह ने युवराज संजय गांधी को Man of the year घोषित किया और वे मलाई खाते रहे। कुलदीप नायर ने विरोध किया और उन्हें प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
विपक्षी दलों पर प्रहार-- सभी विपक्षी दल -- जनसंघ से लेकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सारे छोटे-बड़े नेताओं को रातो-रात गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया। स्व. जय प्रकाश नारायण, मोररजी देसाई, चन्द्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवानी, चरण सिंह, पीलू मोदी जैसे राष्ट्रीय नेताओं को गिरफ़्तार करके अज्ञात जेलों में डाल दिया गया। RSS पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया तथा इसके छोटे से छोटे कार्यकर्त्ता से लेकर सरसंघचालक तक को जेल में डाल दिया गया। इन्दिरा गांधी ने RSS से अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए स्वयंसेवकों को ठीक उसी तरह की यातनायें दीं जिस तरह कि यातनायें वीर सावरकर को अंडमान जेल में दी गई थीं। थाने में उनसे नानाजी देशमुख और रज्जू भैया के ठिकाने पूछे जाते और नहीं बताने पर नाखून उखाड़ लिए जाते। कई स्वयंसेवकों को अपना ही मूत्र पीने के लिए विवश किया गया। जय प्रकाश नारायण जैसे नेता को जेल में इतनी यातना दी गई कि उनके गुर्दे खराब हो गए। १९७७ में रिहाई के बाद भी वे स्वस्थ नहीं हुए और कुछ ही समय के बाद परलोक सिधार गए। पश्चिम बंगाल में सैकड़ों CPM कार्यकर्ताओं को नक्सली बताकर गोली मार दी गई। बारातियों से भरी बस को रोककर सभी बारातियों की जबर्दस्ती नसबन्दी कराई गई। चूंकि सारे मौलिक अधिकार समाप्त कर दिए गए थे अतः विरोध में लिखना या बोलना जेल जाने के लिए पर्याप्त से ज्यादा था। सिर्फ RSS के भूमिगत कार्यकर्ताओं के प्रयास से कुछ लघु समाचार पत्र सीमित संख्या में गुप्त रूप से जनता तक पहुँचते थे जिनमें सही  समाचारों का उल्लेख रहता था। इन पत्रों में ‘रणभेरी’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘लोकसमाचार’ उल्लेखनीय थे। देश के हर कोने में वहां की भाषा में ऐसे लघु समाचार पत्र गुप्त रूप से निकलते रहते थे, जिनकी जनता बेसब्री से इन्तजार करती थी। आकाशवाणी इन्दिरा का भोंपू बन गया था और अखबार २० सूत्री कार्यक्रम के विज्ञापन। संजय गांधी और इन्दिरा गांधी के चित्रों से अखबार पटे रहते थे। BBC सुनना प्रतिबन्धित था। BBC सुनने की शिकायत पर जेल जाना तय था। अपने जमाने के बेहद लोकप्रिय नेता जार्ज फर्नांडिस पर फर्जी डायनामाइट केस कायम कर उन्हें देशद्रोह के अपराध में गिरफ़्तार किया गया। विरोधियों को प्रताड़ित करने में इन्दिरा गांधी ने अंग्रेजों को भी पीछे छोड़ दिया
संविधान पर हमला -- इमर्जेन्सी में विपक्ष के सारे नेता, सांसद और विधायक जेल में थे। इन्दिरा गांधी ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए संविधान में मनचाहे संशोधन किये। यहां तक कि संविधान की प्रस्तावना (Preamble) भी बदल दी गई।
न्यायपालिका पर हमला -- इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज श्री जग मोहन लाल ने इन्दिरा गांधी के खिलाफ फैसला दिया था। उन्हें तत्काल गुजरात हाई कोर्ट में स्थानान्तरित कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों की वरिष्ठता को नज़र अन्दाज़ करते हुए श्री ए. के. रे को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया जिनके माध्यम से इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को पलटा गया और इन्दिरा गांधी के पक्ष में निर्णय कराया गया जिससे उनकी संसद में सदस्यता कायम रह सकी। MISA और DIR जैसे बदनाम कानून बनाए गए जिसके आधार पर किसी को कभी भी, कहीं से भी बिना कारण बताए गिरफ़्तार करके जेल भेजा जा सकता था। MISA में तो जमानत भी नहीं मिलती थी। भारत के तात्कालीन एटार्नी जेनेरल ने कहा था कि इमर्जेन्सी के दौरान किसी को भी संदेह के आधार पर गोली मारी जा सकती है। पूरा भारत कारागार में परिवर्तित हो गया था।
सेना प्रमुखों के साथ दुर्व्यवहार -- उस समय बंसी लाल देश के रक्षा मंत्री थे। मुंबई में तीनों सेना प्रमुखों की एक महत्त्वपूर्ण बैठक बुलाई गई थी जिसमें बंसी लाल जी को शामिल होना था। वे बैठक में संजय गांधी के साथ पहुंचे। संजय गांधी के पास कोई सरकारी जिम्मेदारी नहीं थी। प्रोटोकाल के अनुसार उस बैठक में सिर्फ रक्षा मंत्री शामिल हो सकते थे। सेना प्रमुखों ने संजय गांधी को बाहर जाकर प्रतीक्षा करने की सलाह दी। इसपर वे आग बबूला हो गए और सेना प्रमुखों के साथ अभद्र व्यवहार करते हुए गाली तक दे दी। बैठक रद्द कर दी गई और संजय गांधी को बन्सी लाल के साथ एक कमरे में बंद कर दिया गया। सेना प्रमुखों ने सभी मुख्यालयों को किसी भी अप्रिय घटना के लिए तैयार रहने के निर्देश भी जारी कर दिए। इतने में इन्दिराजी के किसी वफ़ादार ने उन्हें सूचना दे दी। वे एक विशेष विमान से मुंबई पहुंची और सेना प्रमुखों से मिलीं। उन्होंने संजय गांधी के कृत्यों के लिए स्वयं माफ़ी मांगी और किसी तरह अनहोनी को टाला। दिल्ली पहुंचकर उन्होंने बंसी लाल को पदमुक्त कर दिया। श्री कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक ‘The judgement' में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है।
इन्दिरा गांधी के परिवार के DNA में तानाशाही है। जब यह परिवार सत्ता में रहता है, तो देश पर तानाशाही थोपता है और बाहर रहता है तो अपनी ही पार्टी पर तानाशाही थोपता है। वित्त मन्त्री अरुण जेटली ने इमर्जेन्सी देखी भी है और जेल में रहकर भोगी भी है। अत: उनका कथन कि इन्दिरा गांधी और हिटलर में कोई फर्क नहीं है, शत प्रतिशत सत्य है।

Saturday, April 21, 2018

ओछी हरकत


ओछी हरकत
      इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के खिलाफ़ महाभियोग का प्रस्ताव कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने उप राष्ट्रपति को सौंपा है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर पद के दुरुपयोग समेत पाँच बेबुनियाद आरोप लगाए गए हैं। कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी बहुत दिनों से महाभियोग प्रस्ताव लाने की ताक में थे। जस्टिस लोया की मृत्यु को जब सुप्रीम कोर्ट ने स्वाभाविक मृत्यु करार दिया और किसी तरह की अगली जाँच की संभावना को खारिज कर दिया तो पप्पू का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने एनसीपी, सपा, बसपा, माकपा, भाकपा और मुस्लिम लीग जैसी देशद्रोही पार्टियों से हाथ मिलाते हुए महाभियोग की नोटिस दे ही डाली। सबको यह तथ्य मालूम है कि कांग्रेस द्वारा लाया गया यह प्रस्ताव किसी भी सूरत में पास होनेवाला नहीं है। नियमानुसार प्रस्ताव लाने के लिए तो सिर्फ ५० संसद सदस्यों के हस्ताक्षर की आवश्यकता है लेकिन इसके बाद संबन्धित सदन के सभापति द्वारा तीन सदस्यीय समिति गठित करने का प्रावधान है। इस समिति के सदस्य होते हैं -- सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान जज, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक कानून विशेषज्ञ। यह समिति उचित छानबीन कर अपनी रिपोर्ट लोकसभा के स्पीकर या राजसभा के अध्यक्ष को देती है। आरोप सही नहीं पाए जाते हैं तो प्रस्ताव वहीं समाप्त हो जाता है और महाभियोग की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जाती। अगर आरोप सही पाए गए तो सदन में इसकी चर्चा कराई जाती है। इस दौरान आरोपी जज को अपने बचाव का पूरा मौका दिया जाता है। चर्चा के बाद मतदान कराया जाता है। प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए दोनों सदनों के दो तिहाई सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है। प्रस्ताव स्वीकृत होने पर अन्तिम आदेश के लिए इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
            कांग्रेस को अच्छी तरह पता है कि उसके पास संख्या बल नहीं है। अगर संख्या बल होता तो राहुल गांधी प्रधान मन्त्री होते। महाभियोग प्रस्ताव का गिरना तय है। इसका उद्देश्य देश के सर्वोच्च न्यायालय और विशेष रूप से चीफ जस्टिस को बदनाम करना है। अगर महाभियोग प्रस्ताव लाना ही था तो सुप्रीम कोर्ट के उन चार जजों के खिलाफ़ लाना चाहिए था जिन्होंने पद, मर्यादा, गोपनीयता और संवैधानिक जिम्मेदारियों की धज्जियां उड़ाते हुए राज नेताओं की तरह प्रेस कान्फ़ेरेन्स करके सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा को तार-तार किया था। उस समय कांग्रेस और कम्युनिस्ट उन जजों की पीठ थपथपा रहे थे, लेकिन जैसे ही जस्टिस लोया के मामले में मनमाफिक फैसला नहीं आया, सब के सब महाभियोग का मिसाइल ले दौड़ पड़े। उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस मामले में दोषी करार दिए जायेंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अत: कांग्रेस ने न्यायपालिका को धमकाने के लिए महाभियोग जैसी शक्ति का राजनीतिक हथियार के रूप में दुरुपयोग का निर्णय लिया। इस पूरे मामले को हल्के में लेना खतरानाक हो सकता है। यह मामला पूरी न्यायपालिका की आज़ादी के लिए गंभीर खतरा है। सभी राजनीतिक दलों को इसकी गंभीरता समझनी चाहिए। महाभियोग की शक्ति बेहद अहम है। इसके दुरुपयोग से संवैधानिक संस्थाओं पर प्रतिकूल असर होगा। कांग्रेस और राहुल गांधी ऐसा करके सार्वजनिक संस्थाओं को खत्म करने पर तुले हुए हैं। कई पूर्व न्यायाधीशों ने भी कांग्रेस के इस कदम पर गंभीर चिन्ता जाहिर की है। अगर इस कार्य को हतोत्साहित नहीं किया गया तो कोई भी पक्ष जो न्यायालय के निर्णय से संतुष्ट नहीं है क्या बार-बार महाभियोग का प्रस्ताव लाएगा? माना कि राहुल गांधी अपरिपक्व हैं, लेकिन अन्य विचारशील लोगों को उन्हें उचित सलाह देनी चाहिए थी। ऐसा प्रस्ताव लोकतन्त्र और संविधान दोनों के लिए खतरे की घंटी है। सत्ता के लिए बावले पप्पूजी उचित-अनुचित में भेद करने में अक्षम हैं। इसकी जितनी निन्दा की जाय, कम है।

Thursday, April 5, 2018

आन्दोलन या अराजकता

           भारत में लोकतन्त्र अराजकता का पर्याय बनता जा रहा है। संसद के हर सत्र में सत्ता न मिलने की कुंठा से ग्रस्त वंशवादी राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष ने जिस तरह अराजकता फैलाकर संसद का कामकाज ठप्प कर रखा है, उसका वीभत्स रूप पिछले २ अप्रिल को दलितों के आह्वान पर भारत बंद में देखने को मिला। पिछले कई वर्षों से यह देखा जा रहा है कि कोई भी आन्दोलन बिना हिन्सा के समाप्त नहीं हो रहा है। रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में मुस्लिमों द्वारा मुंबई के आज़ाद पार्क में आयोजित धरना प्रदर्शन देखते ही देखते हिंसक आन्दोलन में परिवर्तित हो गया। बसें जलाई गईं और हिन्दुओं की दूकनें फूंक दी गईं। कई लोगों को मौत के घाट भी उतारा गया। आरक्षण के लिए जाट आन्दोलन, गुर्जरों का आन्दोलन, पाटीदारों का आन्दोलन भी हिंसक रूप ले चुका है। सरकारी बसों को जलाना, रेलवे लाइन पर धरना देकर ट्रेनों को रोकना, पुलिस पर हिंसक हमला और आगजनी आज के अन्दोलनों के आवश्यक अंग बन चुके हैं। जाति, धर्म, क्षेत्र, आरक्षण और पानी के लिए लगभग सारे राजनीतिक दल आये दिन आन्दोलन करते रहते हैं, जो गहरी चिन्ता का विषय है। एक फिल्म के रिलिज को लेकर राजस्थान और अन्य प्रदेशों में राजपुतों के संगठन करणी सेना ने जो हास्यास्पद आन्दोलन किया उसका मतलब समझ में नहीं आया। बिना फिल्म देखे लोगों की भावनाओं को भड़काया गया और अपार सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। फिल्म रिलिज भी हुई और चली भी। आत्मदाह की धमकी देनेवाले करणी सेना के जवान और महिलाएं बिल में घुस गईं। समझ में नहीं आया कि वह आन्दोलन किसके इशारे पर चलाया गया। कभी-कभी संदेह होता है कि इसके पीछे फिल्म की पब्लिसिटी के लिए फिल्म के निर्माता का हाथ तो नहीं था! मैं अमूमन आजकल की फिल्में नहीं देखता, लेकिन आन्दोलन के कारण जिज्ञासा इतनी बढ़ी कि ३०० रुपए का टिकट लेकर मैंने फिल्म देखी और कुछ भी आपत्तिजनक नहीं पाया।
पिछले २ अप्रिल को दलितों द्वारा किया गया हिंसक भारत बंद भी बेवज़ह था। निर्णय सुप्रीम कोर्ट का था और खामियाजा भुगता सरकारी संपत्ति और जनता ने। आन्दोलन के दौरान ९ निर्दोष लोगों की हत्या की गई और करोड़ों की सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। पूरा आन्दोलन प्रायोजित था। आन्दोलनकारी लाठी डंडा, तलवार, पेट्रोल और आग्नेयास्त्रों से लैस थे। उन्होंने मासूम बच्चों को ले जा रही स्कूल बसों को भी अपना निशाना बनाया। इस आन्दोलन ने सामाजिक समरसता को तार-तार कर दिया। अगर समाज के दो वर्ग इसी तरह आपस में भिड़ते रहे तो देश का क्या भविष्य होगा। श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधान मन्त्री बनने के बाद से ही वंशवादी जो दिल्ली की गद्दी को बपौती मान रहे थे, तरह-तरह के हथकंडे फैलाकर सरकार को अस्थिर करने का प्रयास करते रहे हैं। कभी ये हैदराबाद यूनिवर्सिटी जाकर जातिवाद को हवा देते हैं, तो कभी जे.एन.यू. में जाकर भारत के टुकड़े करने का मंसूबा पाल रहे देशद्रोहियों के साथ धरने पर बैठते हैं, कभी गुप्त रूप से सपरिवार चीनी राजनयिकों से भेंट करके गुप्त योजनाएं बनाते हैं, कभी आतंकवादियों के पक्ष में गुहार लगाते हैं तो कभी पाकिस्तानी मदद के लिए अपने विश्वस्त को पाकिस्तान भेजते हैं। इनका एकमात्र एजेंडा है, दिल्ली की सत्ता पार काबिज़ होना। इसके लिए ये कुछ भी कर सकते हैं। आश्चर्य तो तब हुआ जब २ अप्रिल को भारत बंद के दौरान हुई हिंसा की किसी विपक्षी पार्टी ने निन्दा नहीं की, उल्टे मौन समर्थन दिया। हमेशा उटपटांग बयान देनेवाले राहुल बाबा ने तो सारा दोष भाजपा पर मढ़ते हुए कहा कि SC/ST Act भंग कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। सरकार ने उसी दिन Review Petition भी फाईल कर दिया लेकिन कर्नाटक की जनसभाओं और ट्विट के माध्यम से राहुल बाबा ने दलितों को भड़काने का अभियान जारी रखा। उन्होंने दलित समाज की दयनीय स्थिति के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया। झूठा और गैरजिम्मेदाराना बयान देने के कारण ही राहुल बाबा की विश्वसनीयता हमेशा संदेह के घेरे में रहती है। लेकिन देश तोड़ने के लिए उनकी गतिविधियों पर केन्द्र सरकार को पैनी दृष्टि रखनी चाहिए। यह कैसा लोकतन्त्र है जिसमें कन्हैया, ओवैसी, आज़म, फ़ारुख, माया, ममता, केजरीवाल और राहुल बाबा को कुछ भी कहने और करने का विशेषाधिकार प्राप्त है? लोकतन्त्र और देश की अखण्डता के लिए यह कही से भी शुभ संकेत नहीं है। राष्ट्रप्रेमियों को इसकी काट के लिए गंभीरता से विचार करना चाहिए।

Thursday, March 29, 2018

बिजली विभाग का निजीकरण

          पता नहीं क्यों, बिजली विभाग पर भाजपा की कुदृष्टि हमेशा से ही क्यों रही है? जब-जब भाजपा की सरकार आई है, बिजली विभाग को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। जब भाजपा के स्व. राम प्रकाश गुप्त यू.पी. के मुख्यमन्त्री थे और नरेश अग्रवाल ऊर्जा मन्त्री थे तो बिजली विभाग को चार टुकड़ों में बांट दिया गया जिससे प्रशासनिक खर्च तो बढ़ गया, हासिल कुछ भी नहीं हुआ। सरकारी संगठनों का निजीकरण किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। ५० और ६० के दशक में विद्युत उत्पादन और वितरण स्थानीय स्तर पर था, जिसे मार्टिन बर्न जैसी कंपनियां संभालती थीं। तब बिजली सिर्फ बड़े शहरों को मिला करती थी। सरकार ने इसे सर्वसाधारण को सुलभ बनाने के लिए राष्ट्रीयकरण किया और प्रत्येक प्रान्त में राज्य विद्युत परिषद अस्तित्व में आए। निस्सन्देह इसका लाभ गरीबों और गांवों को भी मिला। फिर आरंभ हुआ लाभ और हानि की गणना का सिलसिला। लगभग सभी सरकारों ने बिजली विभाग को घाटे का संगठन घोषित किया और अपने स्तर से निजीकरण के प्रयास किए। वितरण के क्षेत्र में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग वितरण कंपनियां बनाई गईं। इससे प्रशासनिक खर्च बढ़ने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिला। इस बीच स्वयं बिजली विभाग ने उन बिन्दुओं और व्यवस्था  को चिह्नित किया जिसमें सुधार करके उपभोक्ताओं की कठिनाइयां कम की जा सकती थीं और इसे एक लाभ वाले संगठन में परिवर्तित किया जा सकता था। इसकी शुरुआत online billing से हुई। मैंने स्वयं कंप्यूटर बिलिंग सर्विस सेन्टर में अधिशासी अभियन्ता के रूप में कार्य करते हुए व्यवस्था का अध्ययन किया और बड़ी मिहनत से online billing के पक्ष में एक शोधपत्र तैयार किया जिसे मैंने लखनऊ, शक्ति भवन में एक उच्चस्तरीय कार्यशाला में तात्कालीन चेयरमैन को भेंट भी किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से मेरे प्रयास की सराहना की और online billing के लिए सघन प्रयास करने का आश्वासन भी दिया। स्वाभाविक है, सारे अच्छे कामों के प्रयोग के लिए पहले शहरों को ही चुना जाता है। पूर्वांचल में इसके लिए वाराणसी को चुना गया और online billing की शुरुआत की गई। मैं आरंभ से अन्त तक इस योजना से जुड़ा रहा। मुझे परम संतुष्टि और खुशी मिली जब वाराणसी शहर में कुछ आरंभिक कठिनाइयों के बावजूद online billing सफलता पूर्वक काम करने लगी। अब बिल में हेराफेरी की संभावना नगण्य हो गई और राजस्व वसूली में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज़ की गई। वाराणसी में मिली सफलता के बाद पूरे प्रदेश में online billing की व्यवस्था लागू की गई, जो एक बहुत बड़ा सुधार था। फिर बिजली की चोरी रोकने और तारों का जाल कम से कम करने पर कार्य आरंभ हुआ। सरकार ने धन की व्यवस्था की और विद्युत कर्मियों ने एचटी लाइन को भूमिगत करने का काम हाथ में लिया। नंगे एलटी तारों की जगह एबीसी लगाने का कार्य युद्धस्तर पर किया गया जिससे कंटियामारी पर विराम लगा और लाइन लास कम हुआ। केन्द्र और राज्य सरकारों की नीतियों के अनुसार हजारों गांवों का विद्युतीकरण किया गया। अब जब उपरोक्त सुधारों के कारण मुख्य शहरों की विद्युत व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुआ और विभाग लाभ अर्जित करने की स्थिति में आया, तो सरकार इन्हीं चुने हुए शहरों को निजी हाथों में देने का निर्णय ले रही है, जो निन्दनीय है और जनविरोधी भी है। इससे सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा होता है। अगर सरकार सुधार के मामले में इतनी ही गंभीर है, तो क्यों नहीं ग्रामीण क्षेत्रों का वितरण निजी हाथों में देने का फैसला लेती है? क्या कोई भी निजी कंपनी बलिया, गाजीपुर या सोनभद्र के सुदूर गांवों की बिजली आपूर्ति और राजस्व वसूली का दायित्व ले सकती है? मैं दावे के साथ कह सकता हूं -- नहीं और कभी नहीं। बिजली विभाग जब बछिया को पाल-पोस कर दुधारु गाय बना देता है तो ये निजी कंपनियां गिद्ध की तरह मलाई खाने के लिए मंडराने लगती हैं। सरकार और जनता को यह बात समझ में आनी चाहिए।
     रेलवे में दस रुपए का टिकट नहीं कटाने पर रेलवे का मजिस्ट्रेट बेटिकट यात्री को जेल भेज देता है, जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है, लेकिन बिजली विभाग में जो जे.ई. या एस.डी.ओ. किसी उपभोक्ता को रंगे हाथ बिजली चोरी करते हुए पकड़ता है, उसे एफ.आई.आर. दायर करके लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अगर रेलवे के मजिस्ट्रेट की तरह बिजली विभाग के अधिकारियों को भी अधिकार मिल जाये, तो बिजली की चोरी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है। सबसे पहले जनता और सरकार के दिमाग में यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि बिजली विभाग कोई Commercial organisation नहीं है। यह चिकित्सा, शिक्षा, न्याय, सिंचाई आदि विभागों की तरह एक Wefare organisation है जिसमें जनता का हित सर्वोपरि है। गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों के लिए लगभग मुफ़्त आपूर्ति, किसानों और ग्रामीणों के लिए लागत के एक चौथाई मूल्य पर, बुनकरों आदि समाज के कमजोर तबकों के लिए आधे मूल्य पर विद्युत आपूर्ति क्या कोई Commercial organisation कर सकता है? कदापि नहीं। क्या बिजली विभाग की यही नियति है कि पहले इसका निजीकरण से सरकारीकरण किया गया और अब फिर सरकारीकरण से निजीकरण किया जाय। अबतक का अनुभव तो यही रहा है कि निजी कंपनियां शोषण का प्रयाय रही हैं। कुछ वर्षों के बाद सरकार पुनः सरकारीकरण करने के लिए बाध्य होगी, लेकिन तबतक बहुत नुकसान हो चुका होगा। यह दिल्ली से दौलताबाद की दौड़ बन्द होनी चाहिए। जनहित में ईश्वर सरकार को सद्बुद्धि दे। बिजली कर्मचारियों से भी अपेक्षा है कि वे भी अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए जिस डाल पर बैठे हैं, उसे ही काटने का प्रयास बंद कर दें जो वे अबतक करते आये हैं। उपभोक्ता को अपनी आय का स्रोत न समझकर अपना मित्र समझें, तभी समाज का भी सहयोग संभव है।