Friday, September 22, 2017

रक्षक बने भक्षक


आज समाचार पत्रों में मुख्य समाचार है कि लखनऊ के प्राइवेट मेडिकल कालेज में दाखिले से संबन्धित मामलों को रफ़ादफ़ा करने की साज़िश में हाई कोर्ट के पूर्व जज समेत छः लोग गिरफ़्तार। यह डील एक करोड़ की थी। हाई कोर्ट के पूर्व जज हैं -- उड़ीसा हाई कोर्ट के पूर्व जज इसरत मसरूर कुद्दुसी। गिरफ़्तारी के बाद सबको सी.बी.आई. ने दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने सभी आरोपियों को सी.बी.आई. की हिरासत में भेज दिया गया। सी.बी.आई. अपने मुख्यालय में चार दिन तक उनसे पूछताछ करेगी। हमारी न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की यह एक छोटी सी मिसाल है। मेरे एक मित्र सत्र न्यायालय में जज हैं। जब भी उनके साथ बैठकी होती है, वे हमेशा इंजीनियर, डाक्टर, आई.ए.एस द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की चर्चा करते हैं। एक दिन मुझसे रहा नहीं गया और मैंने कह ही दिया कि भ्रष्टाचार की जननी न्यायपालिका है। मैंने कहा कि मेरे विभाग में किसी भी कर्मचारी की हिम्मत नहीं है कि मेरे ही कक्ष में मेरे सामने किसी से रिश्वत ले ले। लेकिन किसी भी कोर्ट में यह लेन-देन सबके सामने होता है। कोर्ट में पेशकार जज के सामने ही मुवक्किल से घूस लेता है और तब फाइल देखकर अगली डेट बताता है। कम पैसे मिलने पर वह फाइल छूने भी नहीं देता। वकील/ मुवक्किल और पेशकार के बीच इस लेनदेन को, ऐसा कोई भी नहीं होगा, जो कभी न्यायालय गया हो और नहीं देखा हो। जज साहब ने उत्तर दिया कि यह कोर्ट का दस्तूर है जो अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है। अपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए इसे ‘दस्तूर’ का नाम दिया गया है। किसी भी जज ने इसे रोकने की कोशिश नहीं की। परिणाम यह निकला कि यह दस्तूर भयंकर भ्रष्टाचार में परिवर्तित हो गया और लोवर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को प्रभावित करने लगा।
दूसरी ताज़ी घटना है -- पंजाब की नाभा जेल ब्रेक कांड के मुख्य आरोपी गोपी घनश्यामपुरिया को छोड़ने के लिए हुई एक करोड़ की डील के मामले की जांच के लिए यू.पी. के ए.डी.जी. कानून व्यवस्था आनन्द कुमार वृहस्पतिवार को अमृतसर रवाना हो गए। वे पंजाब पुलिस द्वारा गिरफ़्तार अपराधियों से पूछताछ कर रिश्वत कांड  की हकीकत पता लगाने की कोशिश करेंगे। ज्ञात हो कि इस कांड में यू.पी. के एक सिनियर आई. पी..एस. अफसर का नाम जांच के दायरे में है। इस समय कई आई.ए.एस. अफसर भी भ्रष्टाचार के सिद्ध आरोपों में जेल में सजा काट रहे हैं।
आखिर १९७० के बाद भारत में कौन सी बयार बही कि कोई भी महकमा भ्रष्टाचार से अछूता नहीं रहा? पैसे की हवस पिछले बीस वर्षों में इतनी बढ़ी है कि सारे नैतिक मूल्य तार-तार हो गए। इसके लिए अगर कोई सबसे ज्यादा जिम्मेदार है तो वे हैं राजनीतिक पार्टियां और मुख्य रूप से कांग्रेस पार्टी। राजनेताओं ने भ्रष्टाचार को आम आदमी का संस्कार बना दिया। इन लोगों ने समाज को जाति और मज़हब में इस तरह बांट दिया कि अपनी जाति के नेताओं द्वारा किया गया भ्रष्टाचार उस जाति के मतदाताओं को दिखाई ही नहीं पड़ता। इसे मतदाताओं ने सामाजिक स्वीकृति प्रदान कर दी है। लालू, मुलायम, मायावती, करुणानिधि आदि नेता इसी की फसल काट रहे हैं। जातिवाद भ्रष्टाचार को बढ़ाने में सबसे बड़ा सहायक है। आजकल कांग्रेस इन भ्रष्टाचारी नेताओं की सबसे बड़ी हमदर्द बन गई है। अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार की सारी सीमाएं तोड़ने वाली कांग्रेस कभी लालू की रैली में शामिल होती है, तो कभी अखिलेश और मायावती से गठबन्धन करती है तो कभी करुणानिधि से गलबहियां का खेल खेलती है। उसे भ्रष्ट और देशद्रोही हुरियत कान्फ़ेरेन्स को समर्थन देने में भी शर्म नहीं आती है। आजकल पप्पू भैया अमेरिका जाकर भ्रष्टाचार का उन्मूलन कर रहे हैं।
मोदी राज में मन्त्री स्तर से तो भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है, लेकिन निचले स्तर पर हर विभाग में यह ज्यों का त्यों कायम है। बच्चों को नैतिकता की शिक्षा देने का काम पहले माता-पिता और स्कूल किया करते थे। अब माता-पिता सारी जिम्मेदारी स्कूल को सौंपकर मजे ले रहे हैं और स्कूल में इसी समाज से आए शिक्षकों और कर्मचारियों का बहुमत है। आए दिन शिक्षको द्वारा अपनी ही शिष्याओं से बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आ रही हैं। अब बच्चे जो भी सीखते हैं उनका आधार टी.वी. और फिल्में हैं जिनपर किसी का नियंत्रण नहीं है। वे जो भी परस दें, बच्चे उसे ग्रहण करने के लिए वाध्य हैं। समझ में नहीं आता कि कौन सा अवतार आएगा जब भारत से भ्रष्टाचार खत्म होगा।

Saturday, September 9, 2017

खोदा पहाड़ निकली चुहिया

                   आज पन्द्रह दिन से ज्यदा हो गए, टी.वी. न्यूज चैनल पर बाबा राम रहीम के किस्से ही छाए हुए हैं। मीडिया ने बाबा के किसी व्यक्तिगत सुरक्षा गार्ड का साक्षात्कार लिया, तो डेरा के किसी पुराने असंतुष्ट कर्मचारी का। जिसको भी टी.वी. पर अपना चेहरा दिखाने की इच्छा बलवती हुई, उसने किसी न्यूज चैनल को फोन करके स्वयं को हनीप्रीत या बाबा का पूर्व सहयोगी बताया। फिर क्या था, सारे न्यूज चैनलों में उसका चेहरा और साक्षात्कार दिखाने की होड़ मच गई। चैनलों ने खुद ही यह कहते हुए डेरा के फोटोग्राफ जारी किए कि वह चैनल ही पहली बार ऐसी दुर्लभ तस्वीरें जारी कर रहा है। चैनलों ने खुद ही मामला बनाया, मुकदमा चलाया और फैसला भी दे दिया कि बाबा को बीस साल नहीं, जिन्दगी भर जेल में रहना पड़ेगा। बाबा के सिरसा के डेरे को इतना रहस्यात्मक बना दिया जैसे वह पाकिस्तान के क्वेटा का परमाणु घर हो जिसमें सैकड़ों परमाणु बम छिपाकर रखे गए हों। बाबा के डेरे के टोकन को समानान्तर करेन्सी कहकर प्रचारित किया गया। हमेशा विदेश यात्राओं पर टी.वी. पर छाए रहने वाले प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी भी बाबा राम रहीम के बाद दूसरे स्थान पर फिसल गए। अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए इन टी.वी. चैनलों ने पता नहीं कितने सच्चे-झूठे, नैतिक-अनैतिक समाचार गढ़े और चटकारे लेकर सुनाए और दिखाए। आदमियों के साथ शेर के बच्चों और काले घोड़ों की भी हत्या की दास्तान सुनाई गई। भयभीत हरियाणा सरकार १४ दिनों के बाद ५००० पुलिस और पारा मिलिटरी जवानों, खुदाई करने वाली भारी मशीनों, आधे दर्ज़न मजिस्ट्रेट, न्यायिक अधिकारी, सैकड़ों कर्मचारी, रिटायर्ड जज, स्निफ़र डाग, ताला टोड़ने वाले लोहारों और तरह-तरह के विशेषज्ञों के साथ डेरे पर छापा मारने गई। छापा मारने के लिए १४ दिन का समय क्यों लिया गया, यह भी डेरे के रहस्य से कम रहस्यमय नहीं है। क्या कोई भी अपराधी १४ दिनों तक अपने अपराधों का प्रमाण अपने ही घर में रख सकता है? खैर, छापामारी की गई जिसमें अभी तक जूतों, कपड़ों, टोकन और पटाखों के सिवा कुछ नहीं मिला है। हरियाणा पुलिस जो तलाशी अभियान की मुखिया है, बाबा के सभी सहयोगियों को भगाने में सफल रही। यह समझ के बाहर है कि जो हनीप्रीत बाबा के साथ अदालत में मौजूद थी, हेलिकाप्टर में बाबा के साथ बैठकर रोहतक जेल तक गई वह पुलिस के सामने से फ़रार कैसे हो गई। आज उसे ढूंढ़ने के लिए पुलिस की टीम मुंबई से लेकर नेपाल तक की खाक छान रही है। क्या यह जनता की आंखों में धूल झोंकने के समान नहीं है? इसमें कोई दो राय नहीं कि बाबा राम रहीम बलात्कारी, ढोंगी और अपराधी है लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि उसकी पहुंच ऊंचे अधिकारियों और राजनीतिक गलियारे तक है। सिरसा की इस घटना ने हरियाणा सरकार की छवि धूमिल की है। मुख्यमंत्री श्री खट्टर भाजपा शासित राज्यों के सबसे कमजोर मुख्यमंत्री सिद्ध हुए हैं। सरकार की लापरवाही और बाबा से मिलीभगत के लिए हरियाणा सरकार पर भी मुकदमा चलना चाहिए।

Tuesday, July 4, 2017

चीन की पैंतरेबाज़ी


चीन एक विस्तारवादी देश है। उसकी इस आदत के कारण उसके पड़ोसी सभी देश परेशान हैं। उसके विस्तारवाद के कारण ही विएतनाम, दक्षिण कोरिया, कंबोडिया और जापान परेशान हैं। रुस से भी उसका सीमा-विवाद वर्षों तक चला। दोनों देशों की सीमा पर स्थित ‘चेन माओ’ द्वीप को लेकर रुस और चीन के संबन्ध असामान्य रहे। रुस हर मामले में उससे बीस पड़ रहा था। अतः अन्त में चीन ने समर्पण कर दिया और ‘चेन माओ’ द्वीप पर रुस का आधिपत्य स्वीकार किया, फिर दोनों देशों के संबन्ध सामान्य हुए। अपनी विस्तारवादी नीति के अन्तर्गत ही चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया। वरना उससे हमारी सीमाएं कहीं मिलती ही नहीं थीं। तिब्बत एक बफ़र स्टेट था लेकिन चीन द्वारा उसपर कब्जे के बाद ही वह भारत के सीधे संपर्क में आ गया। नेहरू जी की अदूरदर्शिता ने विरासत में भारत को ऐसी समस्या दी जिसका कोई समाधान ही नहीं है। वह तो लद्दाख और अरुणाचल पर भी अपना दावा करता है। पाकिस्तान ने गुलाम कश्मीर का अक्साई चिन वाला कुछ भूभाग उसे नज़राने में देकर उसका मन बढ़ा दिया है। वर्तमान दोकलम में सड़क निर्माण भी चीन की इसी नीति का परिणाम है। उसे मालूम था कि भूटान एक कमजोर देश है। अतः उसकी सीमा में घुसकर कुछ भी किया जा सकता है। भूटान की सुरक्षा का दायित्व एक संधि के अनुसार भारत के पास है। सामरिक रूप से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दोकलम में चीन द्वारा सड़क निर्माण सीधे भारत की सुरक्षा से जुड़ा है। चीन को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि भारत इस मामले में सीधा हस्तक्षेप करेगा। फिलहाल सड़क निर्माण रुका हुआ है और चीन की बौखलाहट बढ़ती जा रही है।
चीन ने यह कहकर तिब्बत पर कब्ज़ा किया था कि इतिहास के किसी कालखंड में तिब्बत चीनी साम्राज्य का एक हिस्सा हुआ करता था। यह ठीक वैसा ही है जैसे हिन्दुस्तान यह कहकर अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्ला देश और म्यामार पर  कब्ज़ा कर ले कि इतिहास के किसी कालखंड में ये सभी देश उसके अंग थे। तिब्बत सैकड़ों साल तक एक स्वतंत्र देश के रूप में विश्व के मानचित्र पर रहा है। चीन का उसपर कब्ज़ा और तात्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा चीनी कब्जे को मान्यता देना अवैध है। तिब्बत के शासन-प्रमुख और शीर्ष धार्मिक नेता दलाई लामा हिमाचल के धर्मशाला में आज भी निर्वासन झेल रहे हैं। धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार आज भी काम करती है। चीन इससे चिढ़ता है और भारत को परेशान करने का कोई भी मौका वह हाथ से नहीं जाने देता। भारत तिब्बत पर चीन के स्वामित्व को दी गई मान्यता वापस लेकर चीन को जवाब दे सकता है। हम यह कह सकते हैं कि हमारी कोई सीमा चीन से नहीं मिलती। किसी तरह के सीमा-विवाद के लिए वह तिब्बत की निर्वासित सरकार से बात करने की पहल करे। तिब्बत के मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में उठाकर भी चीन की बांह मरोड़ी जा सकती है। अगर तिब्बत पर चीन के कब्जे को भारत ने मान्यता नहीं दी होती तो अमेरिका ने भी तिब्बत का समर्थन किया होता। उस समय चीन इतना मजबूत भी नहीं था। अमेरिका और भारत के संयुक्त प्रयास से तिब्बत ने अबतक आज़ादी भी प्राप्त कर ली होती जो आज महज एक सपना है। लमहों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।

Thursday, June 29, 2017

एक पत्र बरखा रानी के नाम


प्रिय बरखा रानी,
तोहरे वियोग में हम पागल होके कमरे में बंद हूँ, तुन्हारा भाई लू, लट्ठ लेकर पीछे पड़ा है, तुम्हारी महतारी गर्मी हाथ धोकर पीछे पड़ गई है और तुम्हारा बाप बादल आवारागर्दी कर रहा है -- आकाश के जिस कोने में चाहे, विचरण कर रहा है। एक तुम्हीं हो जो सिर्फ तड़पा रही हो, पास आने का नाम नहीं ले रही हो। तुम्हारे आने की तारीख महीनों पहले हिन्दुस्तान के नामी मौसम वैज्ञानिकों ने बता दी थी, बड़ी खुशी हुई थी कि तुम पिछले साल से दस दिन पहले ही आ जाओगी। जेठ के महीने में भी आषाढ़ की फुहार आंखों के सामने नाचने लगी। प्रचंड गर्मी में भी जनवरी की सिहरन महसूस होने लगी। इन्तज़ार करते-करते आषाढ़ भी आधा हो गया, लेकिन तुम नहीं आई। अभी-अभी खबर मिली है कि तुम पटना में आकर ठिठक गई हो। तोके कैसे बतायें कि जवन मज़ा मोदी के बनारस में है वह लालू के पटना में कभियो नहीं मिलेगा। उहां ढेर दिन टिक जाओगी तो १२वीं या हाई स्कूल में टाप कराके जेल में बंद करा देंगे। नीतीश के राज में सोमरस के लिए तड़पती रह जाओगी। सुना है कि तुम केरल, कर्नाटक और मुंबई में भी आ गई हो। समझ में नहीं आ रहा है कि तोके काशी में कैसे बुलाएं। यहां का लंगड़ा कार्बाइड में झुलस गया है, रविदास पार्क में रोज रोमांस करने वाले प्रेमी युगल अस्सी पर गंगा-आरती देखने के लिए मज़बूर हो गए हैं, सारनाथ सूना हो गया है और हम पाकिट में प्याज रखकर एटीएम जा रहे हैं। तुमको तनिको तरस नहीं आ रहा है? अरे मेरी रानी। जेतना दुष्यन्त शकुन्तला से, रोमियो जूलियट से, हीर अपनी रांझा से और मजनू लैला से करता था, ओसे तनिको कम हम तुमसे मुहब्बत नहीं करते हैं। आशिक को ज्यादा तड़पाना ठीक नहीं है। तुम आंधी के साथ आओ, बिजली के साथ आओ, बाप बादल की पीठ पर सवार होकर आओ, लेकिन आओ। हम तोके कचौड़ी गली की कचौड़ी खिलाऊंगा, लंगड़ा आम खिलाऊंगा, गोदौलिया की मलाई वाली भांग की ठंढ़ई पिलाऊंगा, रामनगर की लस्सी पिलाऊंगा और लंका के केशव का बनारसी पान खिलाऊंगा। तुम कहोगी तो आईपी माल में ले जाकर हाफ गर्लफ़्रेंड भी दिखा दूंगा। लहंगा-चोली - जो कहोगी सिलवा दूंगा, विवो का स्मार्ट फोन भी दिला दूंगा, होटल ताज में डिनर भी कराऊंगा। बस, अब आ जाओ। राहुल बाबा जैसे इटली में ठहर गये हैं, उसी तरह पटना में ही मत रुकी रहो। एक हमहीं तोहर आशिक नहीं हैं, पूर्वांचल के करोड़ों युवक ही नहीं, बच्चे, बूढ़े, औरत-मर्द सब तुम्हारे प्रेमी हैं। करोड़ों का दिल तोड़ना अच्छा नहीं है। कालिदास के मेघदूत की प्रेमिका ने इसी आषाढ़ में काले-काले मेघों के माध्यम से अपने प्रेमी को संदेश भेजा था। मैं भी आषाढ़ के महीने में ही सोसल मीडिया के माध्यम से अपना प्रेम-पत्र भेज रहा हूं। आ जा, अब विलंब न कर। मुकेश के दर्दभरे गीतों से काम नहीं चल रहा है। हम घर, आंगन, दुअरा, खेत, खलिहान, राजपथ, पगडंडी -- हर जगह तुम्हारा नृत्य देखना चाहते हैं।
        कम लिखना, ज्यादा समझना।
इति।
                   तुम्हारा पुराना प्रेमी
                    चाचा बनारसी

Wednesday, March 22, 2017

सुप्रीम कोर्ट की चाल


            गत् मंगलवार को रामजन्मभूमि-बाबरी मस्ज़िद मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह सलाह देकर कि मामले का समाधान आपसी बातचीत के द्वारा निकालना ज्यादा अच्छा होगा, अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट अपने दायित्वों से भागने की कोशिश कर रहा है, जिसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती। कल को सुप्रीम कोर्ट यह भी सलाह दे सकता है कि सेना और आतंकवादी मिलबैठकर कश्मीर में पत्थरबाज़ी रोकने का समाधान निकाल लें तो बहुत अच्छा होगा। तीन तलाक के मुद्दे पर भी कोर्ट कह सकता है कि मौलाना और मुस्लिम महिलाएं बातचीत से समाधान तलाश करें।
            मन्दिर-मस्ज़िद विवाद कितना जटिल है, सुप्रीम कोर्ट को पता होना चाहिए। सन्‌ १५२८ में बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा तोड़े जाने के पूर्व वहां एक भव्य राम मन्दिर था। हिन्दू धर्म में आस्था रखनेवालों का यह अटूट विश्वास है कि प्रभु श्रीराम का जन्म वहीं हुआ था। हिन्दुओं ने रामजन्मभूमि फिर से प्राप्त करने के लिए असंख्य संघर्ष किए हैं। अकबर के समय भी तुलसीदास ने वहां रामकथा कहने का निर्णय लिया था। जनमानस के दबाव में वहां राम चबूतरा बनवाकर अकबर को रामकथा की अनुमति देनी पड़ी। मन्दिर-मस्ज़िद का मामला पहली बार अदालत में तब पहुंचा जब एक हिन्दू पुजारी ने १८८५ में एक याचिका दायर करके मस्ज़िद के बगल में मन्दिर बनाने की इज़ाज़त मांगी। काशी और मथुरा में मन्दिर और मस्ज़िद साथ-साथ हैं। हालांकि वहां भी मन्दिर तोड़कर ही मस्ज़िद बनाई गई थी, लेकिन वर्तमान में न कोई तनाव है और ना ही कोई विशेष विवाद है। कोर्ट ने समस्या का कोई समाधान नहीं निकाला और समस्या बनी रही। लगभग ६५ वर्षों के बाद सन्‌ १९४९ में मस्ज़िद में जिसे हिन्दू मन्दिर का गर्भगृह मानते हैं प्रभु श्रीराम का विग्रह प्रकट हुआ और उस समय से लगातार हिन्दू वहां पूजा-अर्चना करने लगे। तात्कालीन कांग्रेस सरकार ने मस्ज़िद से मूर्ति हटाने का प्रयास किया लेकिन १९५० में महन्थ परमहंस रामचन्द्रदास ने अदालत से मूर्ति न हटाए जाने की गुहार की और मूर्ति यथावत रही और अखंड कीर्तन भी जारी रहा। १९५९ में निर्मोही अखाड़ा ने परिसर के स्वामित्व का दावा कोर्ट में ठोका जिसकी प्रतिक्रिया में सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड ने भी १९६१ में अपना दावा ठोका। कोर्ट में मामला चलता रहा। इसी बीच विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल पर भव्य मन्दिर की स्थापना के लिए एक देशव्यापी प्रभावी आन्दोलन आरंभ किया। फ़ैज़ाबाद की ज़िला अदालत ने १९८६ में विवाद का आंशिक समाधान तलाशते हुए गर्भगृह का ताला खुलवाया और पूजा करने की अनुमति प्रदान की। इस निर्णय के विरोध में बाबरी मस्ज़िद एक्शन कमिटी का गठन किया गया। उनके विरोध को नज़रअन्दाज़ करते हुए तात्कालीन प्रधान मन्त्री राजीव गान्धी ने विश्व हिन्दू परिषद को १९८९ में विवादित स्थल के समीप ही मन्दिर के शिलान्यास की अनुमति प्रदान की और शिलान्यास कार्यक्रम सफलता पूर्वक संपन्न भी हो गया। सितंबर १९९० में भव्य राम मन्दिर निर्माण के लिए विश्व हिन्दू परिषद द्वारा चलाए जा रहे प्रबल जन आन्दोलन का भारतीय जनता पार्टी का सक्रिय सहयोग मिला। श्री लालकृष्ण आडवानी ने मन्दिर निर्माण के समर्थन में ऐतिहासिक रामरथ-यात्रा निकाली। आन्दोलन को खत्म करने की नीयत से तात्कालीन प्रधान मन्त्री वी. पी. सिंह ने एक अध्यादेश लाकर विवादित भूमि विश्व हिन्दू परिषद को देने की तैयारी कर ली थी, तभी रथयात्रा के दौरान बिहार के समस्तीपुर में आडवानी को गिरफ़्तार करके लालू यादव ने सारे किए कराए पर पानी फेर दिया। रामजन्मभूमि आन्दोलन थमने के बजाय वृहद्‌ रूप लेता गया जिसकी परिणति कारसेवकों द्वारा विवादित ढांचे को ६, दिसंबर १९९२ में जबरन गिराए जाने के रूप में हुई। विवादित स्थल पर एक अस्थाई मन्दिर का निर्माण भी आन्दोलन के दौरान कर दिया गया लेकिन सरकारी हस्तक्षेप के कारण मन्दिर की छत नहीं पड़ पाई। आज की तारीख में वहां मूर्ति भी है, तिरपाल की छत के साथ एक छोटा मन्दिर भी है तथा पुलिस की देखरेख में पूजा-अर्चना भी चल रही है।
            इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्वामित्व का मामला फिर गरमाया। कोर्ट के निर्देश पर भारतीय पुरातत्त्व विभाग ने मन्दिर के पास काफी खुदाई कराई और १५२८ के पूर्व वहां मन्दिर होने के अनेक साक्ष्य प्राप्त किए जिसके आधार पर ३०, सितंबर २०१० को हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपना ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसके अनुसार विवादित परिसर की एक तिहाई जमीन मुसलमानों को और शेष दो तिहाई जमीन हिन्दुओं को देने का आदेश पारित किया गया। लेकिन कोर्ट ने गर्भगृह पर रामलला का ही स्वामित्व स्वीकार किया। मुसलमानों ने कोर्ट के इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट की शरण ली। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी आदत के अनुसार बड़ी आसानी से हाई कोर्ट के  आदेश पर मई २०११ में स्टे लगा दिया। मामला आज भी वहां लंबित है। ६ साल के बाद टालने के अंदाज़ में सुप्रीम कोर्ट ने आपसी बातचीत के द्वारा समाधान निकालने की सलाह दी है। ऐसा नहीं है कि आपसी बातचीत द्वारा समाधान निकालने के प्रयास नहीं हुए हैं। १९९० में स्व. चन्द्रशेखर के प्रधान मन्त्री के काल एवं उसके बाद स्व. नरसिंहा राव के प्रधान मन्त्री के काल में भी दोनों पक्षों के धार्मिक नेताओं द्वारा स्वयं प्रधान मन्त्री के सक्रिय सहयोग से वार्ताओं के कई दौर चले लेकिन सफलता दूर की कौड़ी रही। सन्‌ २००२ में प्रधान मन्त्री बनने के बाद श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधान मन्त्री कार्यालय में अलग से एक अयोध्या सेल का गठन किया और वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी श्री शत्रुघ्न सिंह उसके प्रभारी बनाए गए। वार्ताओं के कई दौर चले लेकिन मुस्लिम धार्मिक गुरुओं की हठधर्मी के कारण कोई परिणाम नहीं निकल सका। सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सेक्रेटरी जेनरल मौलाना वली रहमानी ने  कहा है कि वार्त्ता से समस्या का समाधान निकलना असंभव है। इस मुकदमें पर निर्णय सुप्रीम कोर्ट को ही लेना होगा।
            सुप्रीम कोर्ट को यह समझना चाहिए कि समाधान के जब सारे रास्ते बंद हो गए, तभी दोनों पक्ष उसकी शरण में गए। सुप्रीम कोर्ट को अपना प्रो-सेकुलर चरित्र का त्याग करते हुए मुकदमे की त्वरित सुनवाई करनी चाहिए। समझ में नहीं आता है कि आतंकवादियों के मुकदमें सुप्रीम कोर्ट रात में भी सुनता है, गोवा में सरकार बनाने के राज्यपाल के आमंत्रण पर विचार करने के लिए मा. मुख्य न्यायाधीश रात के १२ बजे भी कांग्रेसियों के लिए अपने दरवाजे खोल देते हैं और राम मन्दिर के मुकदमे की त्वरित सुनवाई करने के बदले सिर्फ सलाह देकर छुट्टी पा लेते हैं। क्या कश्मीर समस्या का समाधान बातचीत से संभव है? क्या ISIS को बातचीत के माध्यम से आतंकवाद से विमुख किया जा सकता है? हमारी समझ से कभी नहीं। उसी तरह बातचीत से मन्दिर-मस्ज़िद विवाद के निपटारे की बात सोचना दिवास्वप्न के अलावे और कुछ भी नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुसलमानों को हजार वर्ष बाद देश के दोनों बड़े समुदायों के बीच सौहार्द्र स्थापित करने का एक सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ है, लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं कि वे इसका सदुपयोग नहीं कर पायेंगे।