Saturday, April 21, 2018

ओछी हरकत


ओछी हरकत
      इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के खिलाफ़ महाभियोग का प्रस्ताव कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने उप राष्ट्रपति को सौंपा है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर पद के दुरुपयोग समेत पाँच बेबुनियाद आरोप लगाए गए हैं। कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी बहुत दिनों से महाभियोग प्रस्ताव लाने की ताक में थे। जस्टिस लोया की मृत्यु को जब सुप्रीम कोर्ट ने स्वाभाविक मृत्यु करार दिया और किसी तरह की अगली जाँच की संभावना को खारिज कर दिया तो पप्पू का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने एनसीपी, सपा, बसपा, माकपा, भाकपा और मुस्लिम लीग जैसी देशद्रोही पार्टियों से हाथ मिलाते हुए महाभियोग की नोटिस दे ही डाली। सबको यह तथ्य मालूम है कि कांग्रेस द्वारा लाया गया यह प्रस्ताव किसी भी सूरत में पास होनेवाला नहीं है। नियमानुसार प्रस्ताव लाने के लिए तो सिर्फ ५० संसद सदस्यों के हस्ताक्षर की आवश्यकता है लेकिन इसके बाद संबन्धित सदन के सभापति द्वारा तीन सदस्यीय समिति गठित करने का प्रावधान है। इस समिति के सदस्य होते हैं -- सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान जज, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक कानून विशेषज्ञ। यह समिति उचित छानबीन कर अपनी रिपोर्ट लोकसभा के स्पीकर या राजसभा के अध्यक्ष को देती है। आरोप सही नहीं पाए जाते हैं तो प्रस्ताव वहीं समाप्त हो जाता है और महाभियोग की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जाती। अगर आरोप सही पाए गए तो सदन में इसकी चर्चा कराई जाती है। इस दौरान आरोपी जज को अपने बचाव का पूरा मौका दिया जाता है। चर्चा के बाद मतदान कराया जाता है। प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए दोनों सदनों के दो तिहाई सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है। प्रस्ताव स्वीकृत होने पर अन्तिम आदेश के लिए इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
            कांग्रेस को अच्छी तरह पता है कि उसके पास संख्या बल नहीं है। अगर संख्या बल होता तो राहुल गांधी प्रधान मन्त्री होते। महाभियोग प्रस्ताव का गिरना तय है। इसका उद्देश्य देश के सर्वोच्च न्यायालय और विशेष रूप से चीफ जस्टिस को बदनाम करना है। अगर महाभियोग प्रस्ताव लाना ही था तो सुप्रीम कोर्ट के उन चार जजों के खिलाफ़ लाना चाहिए था जिन्होंने पद, मर्यादा, गोपनीयता और संवैधानिक जिम्मेदारियों की धज्जियां उड़ाते हुए राज नेताओं की तरह प्रेस कान्फ़ेरेन्स करके सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा को तार-तार किया था। उस समय कांग्रेस और कम्युनिस्ट उन जजों की पीठ थपथपा रहे थे, लेकिन जैसे ही जस्टिस लोया के मामले में मनमाफिक फैसला नहीं आया, सब के सब महाभियोग का मिसाइल ले दौड़ पड़े। उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस मामले में दोषी करार दिए जायेंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अत: कांग्रेस ने न्यायपालिका को धमकाने के लिए महाभियोग जैसी शक्ति का राजनीतिक हथियार के रूप में दुरुपयोग का निर्णय लिया। इस पूरे मामले को हल्के में लेना खतरानाक हो सकता है। यह मामला पूरी न्यायपालिका की आज़ादी के लिए गंभीर खतरा है। सभी राजनीतिक दलों को इसकी गंभीरता समझनी चाहिए। महाभियोग की शक्ति बेहद अहम है। इसके दुरुपयोग से संवैधानिक संस्थाओं पर प्रतिकूल असर होगा। कांग्रेस और राहुल गांधी ऐसा करके सार्वजनिक संस्थाओं को खत्म करने पर तुले हुए हैं। कई पूर्व न्यायाधीशों ने भी कांग्रेस के इस कदम पर गंभीर चिन्ता जाहिर की है। अगर इस कार्य को हतोत्साहित नहीं किया गया तो कोई भी पक्ष जो न्यायालय के निर्णय से संतुष्ट नहीं है क्या बार-बार महाभियोग का प्रस्ताव लाएगा? माना कि राहुल गांधी अपरिपक्व हैं, लेकिन अन्य विचारशील लोगों को उन्हें उचित सलाह देनी चाहिए थी। ऐसा प्रस्ताव लोकतन्त्र और संविधान दोनों के लिए खतरे की घंटी है। सत्ता के लिए बावले पप्पूजी उचित-अनुचित में भेद करने में अक्षम हैं। इसकी जितनी निन्दा की जाय, कम है।

Thursday, April 5, 2018

आन्दोलन या अराजकता

           भारत में लोकतन्त्र अराजकता का पर्याय बनता जा रहा है। संसद के हर सत्र में सत्ता न मिलने की कुंठा से ग्रस्त वंशवादी राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष ने जिस तरह अराजकता फैलाकर संसद का कामकाज ठप्प कर रखा है, उसका वीभत्स रूप पिछले २ अप्रिल को दलितों के आह्वान पर भारत बंद में देखने को मिला। पिछले कई वर्षों से यह देखा जा रहा है कि कोई भी आन्दोलन बिना हिन्सा के समाप्त नहीं हो रहा है। रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में मुस्लिमों द्वारा मुंबई के आज़ाद पार्क में आयोजित धरना प्रदर्शन देखते ही देखते हिंसक आन्दोलन में परिवर्तित हो गया। बसें जलाई गईं और हिन्दुओं की दूकनें फूंक दी गईं। कई लोगों को मौत के घाट भी उतारा गया। आरक्षण के लिए जाट आन्दोलन, गुर्जरों का आन्दोलन, पाटीदारों का आन्दोलन भी हिंसक रूप ले चुका है। सरकारी बसों को जलाना, रेलवे लाइन पर धरना देकर ट्रेनों को रोकना, पुलिस पर हिंसक हमला और आगजनी आज के अन्दोलनों के आवश्यक अंग बन चुके हैं। जाति, धर्म, क्षेत्र, आरक्षण और पानी के लिए लगभग सारे राजनीतिक दल आये दिन आन्दोलन करते रहते हैं, जो गहरी चिन्ता का विषय है। एक फिल्म के रिलिज को लेकर राजस्थान और अन्य प्रदेशों में राजपुतों के संगठन करणी सेना ने जो हास्यास्पद आन्दोलन किया उसका मतलब समझ में नहीं आया। बिना फिल्म देखे लोगों की भावनाओं को भड़काया गया और अपार सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। फिल्म रिलिज भी हुई और चली भी। आत्मदाह की धमकी देनेवाले करणी सेना के जवान और महिलाएं बिल में घुस गईं। समझ में नहीं आया कि वह आन्दोलन किसके इशारे पर चलाया गया। कभी-कभी संदेह होता है कि इसके पीछे फिल्म की पब्लिसिटी के लिए फिल्म के निर्माता का हाथ तो नहीं था! मैं अमूमन आजकल की फिल्में नहीं देखता, लेकिन आन्दोलन के कारण जिज्ञासा इतनी बढ़ी कि ३०० रुपए का टिकट लेकर मैंने फिल्म देखी और कुछ भी आपत्तिजनक नहीं पाया।
पिछले २ अप्रिल को दलितों द्वारा किया गया हिंसक भारत बंद भी बेवज़ह था। निर्णय सुप्रीम कोर्ट का था और खामियाजा भुगता सरकारी संपत्ति और जनता ने। आन्दोलन के दौरान ९ निर्दोष लोगों की हत्या की गई और करोड़ों की सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। पूरा आन्दोलन प्रायोजित था। आन्दोलनकारी लाठी डंडा, तलवार, पेट्रोल और आग्नेयास्त्रों से लैस थे। उन्होंने मासूम बच्चों को ले जा रही स्कूल बसों को भी अपना निशाना बनाया। इस आन्दोलन ने सामाजिक समरसता को तार-तार कर दिया। अगर समाज के दो वर्ग इसी तरह आपस में भिड़ते रहे तो देश का क्या भविष्य होगा। श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधान मन्त्री बनने के बाद से ही वंशवादी जो दिल्ली की गद्दी को बपौती मान रहे थे, तरह-तरह के हथकंडे फैलाकर सरकार को अस्थिर करने का प्रयास करते रहे हैं। कभी ये हैदराबाद यूनिवर्सिटी जाकर जातिवाद को हवा देते हैं, तो कभी जे.एन.यू. में जाकर भारत के टुकड़े करने का मंसूबा पाल रहे देशद्रोहियों के साथ धरने पर बैठते हैं, कभी गुप्त रूप से सपरिवार चीनी राजनयिकों से भेंट करके गुप्त योजनाएं बनाते हैं, कभी आतंकवादियों के पक्ष में गुहार लगाते हैं तो कभी पाकिस्तानी मदद के लिए अपने विश्वस्त को पाकिस्तान भेजते हैं। इनका एकमात्र एजेंडा है, दिल्ली की सत्ता पार काबिज़ होना। इसके लिए ये कुछ भी कर सकते हैं। आश्चर्य तो तब हुआ जब २ अप्रिल को भारत बंद के दौरान हुई हिंसा की किसी विपक्षी पार्टी ने निन्दा नहीं की, उल्टे मौन समर्थन दिया। हमेशा उटपटांग बयान देनेवाले राहुल बाबा ने तो सारा दोष भाजपा पर मढ़ते हुए कहा कि SC/ST Act भंग कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। सरकार ने उसी दिन Review Petition भी फाईल कर दिया लेकिन कर्नाटक की जनसभाओं और ट्विट के माध्यम से राहुल बाबा ने दलितों को भड़काने का अभियान जारी रखा। उन्होंने दलित समाज की दयनीय स्थिति के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया। झूठा और गैरजिम्मेदाराना बयान देने के कारण ही राहुल बाबा की विश्वसनीयता हमेशा संदेह के घेरे में रहती है। लेकिन देश तोड़ने के लिए उनकी गतिविधियों पर केन्द्र सरकार को पैनी दृष्टि रखनी चाहिए। यह कैसा लोकतन्त्र है जिसमें कन्हैया, ओवैसी, आज़म, फ़ारुख, माया, ममता, केजरीवाल और राहुल बाबा को कुछ भी कहने और करने का विशेषाधिकार प्राप्त है? लोकतन्त्र और देश की अखण्डता के लिए यह कही से भी शुभ संकेत नहीं है। राष्ट्रप्रेमियों को इसकी काट के लिए गंभीरता से विचार करना चाहिए।

Thursday, March 29, 2018

बिजली विभाग का निजीकरण

          पता नहीं क्यों, बिजली विभाग पर भाजपा की कुदृष्टि हमेशा से ही क्यों रही है? जब-जब भाजपा की सरकार आई है, बिजली विभाग को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। जब भाजपा के स्व. राम प्रकाश गुप्त यू.पी. के मुख्यमन्त्री थे और नरेश अग्रवाल ऊर्जा मन्त्री थे तो बिजली विभाग को चार टुकड़ों में बांट दिया गया जिससे प्रशासनिक खर्च तो बढ़ गया, हासिल कुछ भी नहीं हुआ। सरकारी संगठनों का निजीकरण किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। ५० और ६० के दशक में विद्युत उत्पादन और वितरण स्थानीय स्तर पर था, जिसे मार्टिन बर्न जैसी कंपनियां संभालती थीं। तब बिजली सिर्फ बड़े शहरों को मिला करती थी। सरकार ने इसे सर्वसाधारण को सुलभ बनाने के लिए राष्ट्रीयकरण किया और प्रत्येक प्रान्त में राज्य विद्युत परिषद अस्तित्व में आए। निस्सन्देह इसका लाभ गरीबों और गांवों को भी मिला। फिर आरंभ हुआ लाभ और हानि की गणना का सिलसिला। लगभग सभी सरकारों ने बिजली विभाग को घाटे का संगठन घोषित किया और अपने स्तर से निजीकरण के प्रयास किए। वितरण के क्षेत्र में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग वितरण कंपनियां बनाई गईं। इससे प्रशासनिक खर्च बढ़ने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिला। इस बीच स्वयं बिजली विभाग ने उन बिन्दुओं और व्यवस्था  को चिह्नित किया जिसमें सुधार करके उपभोक्ताओं की कठिनाइयां कम की जा सकती थीं और इसे एक लाभ वाले संगठन में परिवर्तित किया जा सकता था। इसकी शुरुआत online billing से हुई। मैंने स्वयं कंप्यूटर बिलिंग सर्विस सेन्टर में अधिशासी अभियन्ता के रूप में कार्य करते हुए व्यवस्था का अध्ययन किया और बड़ी मिहनत से online billing के पक्ष में एक शोधपत्र तैयार किया जिसे मैंने लखनऊ, शक्ति भवन में एक उच्चस्तरीय कार्यशाला में तात्कालीन चेयरमैन को भेंट भी किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से मेरे प्रयास की सराहना की और online billing के लिए सघन प्रयास करने का आश्वासन भी दिया। स्वाभाविक है, सारे अच्छे कामों के प्रयोग के लिए पहले शहरों को ही चुना जाता है। पूर्वांचल में इसके लिए वाराणसी को चुना गया और online billing की शुरुआत की गई। मैं आरंभ से अन्त तक इस योजना से जुड़ा रहा। मुझे परम संतुष्टि और खुशी मिली जब वाराणसी शहर में कुछ आरंभिक कठिनाइयों के बावजूद online billing सफलता पूर्वक काम करने लगी। अब बिल में हेराफेरी की संभावना नगण्य हो गई और राजस्व वसूली में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज़ की गई। वाराणसी में मिली सफलता के बाद पूरे प्रदेश में online billing की व्यवस्था लागू की गई, जो एक बहुत बड़ा सुधार था। फिर बिजली की चोरी रोकने और तारों का जाल कम से कम करने पर कार्य आरंभ हुआ। सरकार ने धन की व्यवस्था की और विद्युत कर्मियों ने एचटी लाइन को भूमिगत करने का काम हाथ में लिया। नंगे एलटी तारों की जगह एबीसी लगाने का कार्य युद्धस्तर पर किया गया जिससे कंटियामारी पर विराम लगा और लाइन लास कम हुआ। केन्द्र और राज्य सरकारों की नीतियों के अनुसार हजारों गांवों का विद्युतीकरण किया गया। अब जब उपरोक्त सुधारों के कारण मुख्य शहरों की विद्युत व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुआ और विभाग लाभ अर्जित करने की स्थिति में आया, तो सरकार इन्हीं चुने हुए शहरों को निजी हाथों में देने का निर्णय ले रही है, जो निन्दनीय है और जनविरोधी भी है। इससे सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा होता है। अगर सरकार सुधार के मामले में इतनी ही गंभीर है, तो क्यों नहीं ग्रामीण क्षेत्रों का वितरण निजी हाथों में देने का फैसला लेती है? क्या कोई भी निजी कंपनी बलिया, गाजीपुर या सोनभद्र के सुदूर गांवों की बिजली आपूर्ति और राजस्व वसूली का दायित्व ले सकती है? मैं दावे के साथ कह सकता हूं -- नहीं और कभी नहीं। बिजली विभाग जब बछिया को पाल-पोस कर दुधारु गाय बना देता है तो ये निजी कंपनियां गिद्ध की तरह मलाई खाने के लिए मंडराने लगती हैं। सरकार और जनता को यह बात समझ में आनी चाहिए।
     रेलवे में दस रुपए का टिकट नहीं कटाने पर रेलवे का मजिस्ट्रेट बेटिकट यात्री को जेल भेज देता है, जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है, लेकिन बिजली विभाग में जो जे.ई. या एस.डी.ओ. किसी उपभोक्ता को रंगे हाथ बिजली चोरी करते हुए पकड़ता है, उसे एफ.आई.आर. दायर करके लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अगर रेलवे के मजिस्ट्रेट की तरह बिजली विभाग के अधिकारियों को भी अधिकार मिल जाये, तो बिजली की चोरी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है। सबसे पहले जनता और सरकार के दिमाग में यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि बिजली विभाग कोई Commercial organisation नहीं है। यह चिकित्सा, शिक्षा, न्याय, सिंचाई आदि विभागों की तरह एक Wefare organisation है जिसमें जनता का हित सर्वोपरि है। गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों के लिए लगभग मुफ़्त आपूर्ति, किसानों और ग्रामीणों के लिए लागत के एक चौथाई मूल्य पर, बुनकरों आदि समाज के कमजोर तबकों के लिए आधे मूल्य पर विद्युत आपूर्ति क्या कोई Commercial organisation कर सकता है? कदापि नहीं। क्या बिजली विभाग की यही नियति है कि पहले इसका निजीकरण से सरकारीकरण किया गया और अब फिर सरकारीकरण से निजीकरण किया जाय। अबतक का अनुभव तो यही रहा है कि निजी कंपनियां शोषण का प्रयाय रही हैं। कुछ वर्षों के बाद सरकार पुनः सरकारीकरण करने के लिए बाध्य होगी, लेकिन तबतक बहुत नुकसान हो चुका होगा। यह दिल्ली से दौलताबाद की दौड़ बन्द होनी चाहिए। जनहित में ईश्वर सरकार को सद्बुद्धि दे। बिजली कर्मचारियों से भी अपेक्षा है कि वे भी अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए जिस डाल पर बैठे हैं, उसे ही काटने का प्रयास बंद कर दें जो वे अबतक करते आये हैं। उपभोक्ता को अपनी आय का स्रोत न समझकर अपना मित्र समझें, तभी समाज का भी सहयोग संभव है।

Wednesday, March 14, 2018

आरक्षण

        मेरे गांव में एक दलित (चमार) है। लालजी राम उसका नाम है। उसकी पत्नी ने मेरी माँ की बहुत सेवा की थी। लालजी राम भी मेरे पिताजी के हर आदेश पर एक पैर पर खड़ा रहता था। वह लगभग रोज ही सवेरे मेरे घर आता था। आम के बगीचे की देखभाल उसी के जिम्मे थी। पिताजी तो अब नहीं रहे, लेकिन मेरे परिवार के सभी लोग उसे आज भी बहुत प्यार करते हैं। उसमें और उसकी पत्नी में एक ही बुरी आदत थी। वह यह कि दोनों अत्यधिक कच्ची शराब का सेवन करते थे। पसिया टोली मेरे घर के पास ही है जो आज भी नीतीश कुमार की शराबबंदी को ठेंगा दिखाते हुए देसी शराब का जिले में सबसे बड़ा केन्द्र बन चुका है। लालजी की पत्नी पाँच साल पहले कच्ची शराब के सेवन से इस लोक से चली गई। लालजी भी शराबियों के आपसी संघर्ष में एक बार बुरी तरह पिटा जिसके कारण रीढ़ की हड्डी में चोट आई, फलस्वरूप वह मुश्किल से चल-फिर सकता है, कोई काम नहीं कर सकता। वृद्धावस्था पेंशन और मेरे घर से प्राप्त आर्थिक सहायता ही उसका संबल है। उसके दो बच्चे हैं। बारी-बारी से दोनों उसे खिलाते हैं। बड़े बेटे वीरेन्द्र का पढ़ने में मन नहीं लगा। किसी तरह कक्षा आठ तक पढ़ा। उसके बाद वह जयपुर चला गया जहां मेरे गांव के अधिकांश युवक दिहाड़ी मज़दूर के रूप में काम करते हैं। छोटा बेटा प्रदीप पढ़ने में कुछ अच्छा था। उसे हमलोगों ने प्रोत्साहित किया, रुपए-पैसे, किताब-कापी की व्यस्था की। येन केन प्रकारेण उसने बी.ए. पास कर लिया। मुझे उम्मीद थी कि दलितों के आरक्षण कोटे के तहत उसे नौकरी मिल जाएगी। लेकिन वहां हर एक पद के लिए उसकी प्रतियोगिता दलित समाज के क्रीमी लेयर के उन लड़कों से थी जिनके पिता आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी नौकरी पाने के बाद शहरों में बस गए थे। प्रदीप ने कई प्रयास किए लेकिन हर बार असफलता ही मिली। इस बीच उसकी शादी भी हो गई। अत्यधिक तनाव और आर्थिक तंगी के कारण उसके पेट में दर्द रहने लगा। डाक्टरों ने बताया कि उसके पेट में ट्यूमर है। सबने उसे टाटा मेमोरियल हास्पीटल, मुंबई जाने की सलाह दी। लेकिन वहां जाकर इलाज़ कराना उसके वश में नहीं था। गांव के ही कुछ युवक पिछली गर्मियों में घर आए थे। वे उसे लेकर जयपुर गए। वहां सवाई माधो सिंह अस्पताल में उसका इलाज हुआ। आपरेशन करके ट्यूमर बाहर निकाल दिया गया। गांव के जो युवक जयपुर में रह रहे थे, उन्होंने ही चन्दा लगाकर उसका इलाज कराया। इलाज में डेढ़ लाख रुपए खर्च हुए। जातीय भावना से ऊपर उठकर युवकों ने उसका इलाज़ कराया। अभी होली में प्रदीप से मेरी मुलाकात हुई थी। अब वह ठीक है। वह सरकारी नौकरी पाने की उम्र पार कर चुका है। एक कंपनी के घरेलू उत्पाद घूम-घूमकर बेचकर वह अपनी आजीविका चला रहा है।
बिहार के पिछले विधान सभा के चुनाव में लालू-नीतीश गठबन्धन को प्रचंड बहुमत मिला था। मैं जब भी घर जाता हूं, लालजी मुझसे मिलने अवश्य आता है। मैं जबतक रहता हूं, उसे खैनी खाने के लिए प्रतिदिन बीस रुपए देता हूं। मेरे चचेरे बड़े भाई स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहते हैं। वे भाजपा के मंडल अध्यक्ष हैं। विधान सभा चुनाव के बाद मैं घर गया था। मैंने लालजी से पूछा - “चुनाव में तुमने किसे वोट दिया था?” उसने भैया को न बताने के आश्वासन के बाद बताया -- “ मैं सबसे झूठ बोल सकता हूं, लेकिन आपसे नहीं। आप मनोज भैया को मत बताइयेगा। उन्होंने मुझसे कमल पर वोट डालने के लिए कहा था, लेकिन मैंने तीर (नीतीश) को वोट दिया।” मैंने फिर प्रश्न किया -- “तीर में तुम्हें क्या अच्छाई दिखाई पड़ी?” “ बबुआ आप समझते नहीं। लालू भैया ने मीटिंग में कहा था कि कमल वाले पावर में आने पर दलितों का आरक्षण खत्म कर देंगे।” उसने तपाक से उत्तर दिया। मैंने उससे पूछा कि आरक्षण से तुम्हें कभी कोई फायदा हुआ है? तुम्हारा बी.ए. पास बेटा दर-दर की ठोकरें खाता रहा, लेकिन उसे चपरासी की भी नौकरी नहीं मिली। इसके बाद भी तुमने लालू की बातों पर विश्वास कर लिया। उसने कहा कि जाने दीजिए; बिरादरी के किसी न किसी को फायदा तो मिलता ही होगा।
मैं उसकी त्याग-भावना के आगे नतमस्तक था। मैं घर जाता हूं तो वह पहले की तरह ही आने का समाचार पाकर मिलने के लिए आता है और खैनी का पैसा लेता है। उसका बेटा प्रदीप सायकिल से अब भी घूम-घूमकर घरेलू उत्पाद बेचता है। प्रदीप की पत्नी मेरे ही घर में झाड़ू-पोंछा करती है। लालजी का परिवार साठ साल पहले जैसा था, आज भी वैसा ही है। उसे आरक्षण की आजतक कोई सुविधा नहीं मिली लेकिन वह आरक्षण नीति में किसी तरह के बदलाव का प्रबल विरोधी है।

Sunday, February 11, 2018

वर्णसंकर

महाराज शान्तनु भीष्म पितामह के पिता थे। वे हस्तिनापुर के सम्राट थे। उनकी पहली पत्नी गंगा से देवव्रत पैदा हुए जो अपनी भीष्म प्रतिज्ञा के लिए भीष्म नाम से प्रसिद्ध हुए। वे महान पराक्रमी, धर्मज्ञ और शास्त्रों के ज्ञाता थे। महाराज शान्तनु ने उन्हें हस्तिनापुर के युवराज के पद पर अभिषिक्त भी कर दिया था। अचानक बुढ़ापे के उस चरण में जिस समय पुत्र का ब्याह करके आदमी पुलकित होता है, शान्तनु को प्रेम-रोग हो गया। वे एक केवट-कन्या सत्यवती पर मोहित हो गए और उससे प्रणय-निवेदन कर बैठे, लेकिन सत्यवती के पिता ने शर्त रख दी कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। देवव्रत पहले ही युवराज घोषित किए जा चुके थे। शान्तनु ने शर्त नहीं मानी और अपनी राजधानी लौट आए, लेकिन सत्यवती को न पाने का मलाल इतना अधिक था कि वे बीमार रहने लगे। शीघ्र ही देवव्रत ने कारण पता कर लिया और स्वयं अपने पिता के लिए सत्यवती का हाथ मांगने के लिए केवट के पास पहुंच गए। केवट ने अपनी शर्त फिर दुहराई। देवव्रत ने शर्त मानते हुए यह प्रतिज्ञा की कि वे आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करेंगे ताकि भविष्य में सिंहासन के लिए कोई संघर्ष न हो। इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत भीष्म कहलाए और इसी नाम से जगप्रसिद्ध हुए। शान्तनु को सत्यवती मिल गईं। भीष्म पितामह ज़िन्दगी भर कुंवारे रहे और सिंहासन की रक्षा करते रहे। सत्यवती से शान्तनु को दो पुत्र प्राप्त हुए -- विचित्रवीर्य और चित्रांगद। बुढ़ापे की सन्तान होने के कारण दोनों बचपन से ही कमजोर और अस्वस्थ थे। जब वे किशोरावस्था में पहुंचे, उसी समय महाराज शान्तनु की मृत्यु हो गई और चित्रांगद एक युद्ध में मारा गया। राजसिंहासन पर विचित्रवीर्य को बैठाया गया। सारी व्यवस्था भीष्म संभालते थे। वंश चलाने के लिए विवाह की आवश्यकता थी लेकिन विचित्रवीर्य के स्वास्थ्य को देखते हुए कोई राजा अपनी कन्या उन्हें देने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। अन्त में भीष्म पितामह ने काशीराज के यहां चल रहे स्वयंवर से उनकी तीन कन्याओं -- अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का अपहरण कर लिया। बाद में उन्होंने अम्बा को स्वतंत्र कर दिया तथा अम्बिका एवं अम्बालिका से विचित्रवीर्य का विवाह कर दिया। विचित्रवीर्य तो अस्वस्थ रहते ही थे, विवाह के बाद अतिशय भोग के कारण उन्हें क्षयरोग हो गया और वे बिना सन्तान उत्पन्न किए स्वर्गवासी हो गए। भीष्म अपनी प्रतिज्ञा से बंधे होने के कारण विवाह कर नहीं सकते थे, वंश आगे बढ़े तो कैसे। सत्यवती को यह चिन्ता खाए जा रही थी। ऐसे में उन्होंने कुंवारे में उत्पन्न अपने पुत्र व्यासजी को बुलवाया और उनसे अपनी अनुज-वधुओं से संपर्क कर सन्तान उत्पन्न करने का आग्रह किया। व्यासजी ने माता का आग्रह स्वीकार किया। यही से कुरुवंश के पतन की पटकथा लिख दी गई। अनुज-वधू पुत्री के समान होती है। त्रेता में श्रीराम ने अनुज-वधू को पत्नी बनाने के अपराध को इतना बड़ा माना था कि उन्होंने बाली का वध तक कर दिया। हस्तिनापुर में व्यासजी और अनुजवधूओं के संपर्क से दो पुत्र उत्पन्न हुए -- धृतराष्ट्र और पांडु। ये दोनों ही वर्णसंकर थे। महाभारत की आगे की कथा इन वर्णसंकरों के पुत्रों के आपसी विवाद और संघर्ष की है जिसका अन्तिम परिणाम महायुद्ध के रूप में सामने आया और विजयी पक्ष को दुःख, आंसू और सर्वनाश के अतिरिक्त कुछ भी हासिल नहीं हुआ।
आज भी महान भारत वर्णसंकर-संस्कृति से प्रभावित नज़र आ रहा है। जब राजा वर्णसंकर हो जाता है तो देश, धर्म और प्रजा का विनाश सुनिश्चित हो जाता है। राहुल गांधी की कांग्रेस-अध्यक्ष पद पर ताजपोशी पर जो लोग बहुत प्रसन्न हैं, उन्हें महाभारत की उपरोक्त कथा को एकबार अवश्य पढ़ना चाहिए। कांग्रेस में चरित्र-निर्माण कभी भी प्राथमिकता की सूची में नहीं रहा है। महात्मा गांधी निर्वस्त्र युवतियों के साथ सोते थे और अपने ब्रह्मचर्य की परीक्षा स्वयं लेते थे। बुढ़ापे मे लेडी माउण्टबैटन के प्रेम में पंडित नेहरू के पागल होने की कीमत देश को विभाजन और कश्मीर समस्या के रूप में चुकानी पड़ी। इन्दिरा गांधी ने फिरोज़ खां से शादी करके वर्णसंकर सन्तानें उत्पन्न की। उनके पुत्रों -- राजीव और संजय ने भी यह परंपरा कायम रखी। राहुल गांधी खानदानी वर्णसंकर हैं। अगर नरेन्द्र मोदी २०१९ का चुनाव हार गए तो दिल्ली के सिंहासन पर एक वर्णसंकर की ताजपोशी अवश्यंभावी है। लगता है इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करके मानेगा। पर तब एक और महाभारत भी कोई रोक नहीं सकता है।

Sunday, January 7, 2018

एक पाती लालू भाई के नाम

प्रिय लालू भाई,
जय राम जी की।
आगे राम जी की कृपा से हम इस कड़कड़ाती ठंढ में भी ठीकठाक हैं और उम्मीद करते हैं कि आप भी हज़ारीबाग के ओपेन जेल में राजी-खुशी होंगे। अब तो बिहार और झारखंड का सभी जेलवा आपको घरे जैसा लगता होगा। इस बार आपकी पूरी मंडली आपके साथ होगी। आप चाहें तो कबड्डी भी खेल सकते हैं और क्रिकेट भी खेल सकते हैं। हम ई देख के बहुते खुश हुए कि जेल जाते समय भी आपके चेहरे पर मुस्कान पहले की तरह ही थी। मेरे शहर में एक बदनाम मुहल्ला है। उसमें नाचने-गाने वाली रहती हैं। शहर के रईस वहां रात में आनन्द लेते हैं। कभी-कभी उनके घरों पर पुलिस का छापा पड़ता है तो बिचारियां गिरफ़्तार हो जाती हैं लेकिन कुछ ही दिनों में ज़मानत पर छूटकर आ भी जाती हैं। फिर सारा कार्यक्रम पहले की तरह ही चालू हो जाता है। एक दिन एक सब्जीवाले के यहां उनमें से एक सब्जी खरीद रही थी। दोनों में पुरानी जान-पहचान थी। सब्जी वाले ने पूछा -- “बाई जी कब आईं वहां से?” “यही दो-तीन दिन हुआ,” बाई जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। “वहां कवनो दिक्कत-परेशानी तो नहीं हुई,” सब्जीवाले ने प्रश्न किया। “नहीं, तनिको नहीं। हर जगह हमलोगों को चाहने वाले मिल जाते हैं, वहां भी मिल गए। तबहियें तो इतना जल्दी वापस आ गए, बाईजी ने हँसते हुए जवाब दिया। सब्जीवाले ने भी हँसी में भरपूर साथ दिया और बाईजी की झोली सब्जी से भर दी। बाईजी ने जाने के पहले पूछा - “कितना हुआ रामलालजी?” “जो आपकी मर्ज़ी हो दे दीजिए। आपसे क्या भाव-ताव करना?” बाईजी ने मुस्कुराते हुए दस के कुछ नोट उसकी ओर बढ़ाए और सब्जीवाले ने स्पर्श-सुख के साथ उन्हें ग्रहण किया। उसके लिए तो बाईजी की मुस्कान ही काफी थी। बाईजी आसपास के लोगों पर अपनी नज़रों की बिजली गिराते हुए, इठलाते और मुस्कुराते हुए अपने गंतव्य पर चली गईं। लालू भाई! आपको जब-जब टीवी पर जेल जाते हुए और आते हुए देखता हूं तो मुझे अपने शहर की बाईजी की याद आती है। आप उसी की तरह मुस्कुराते हुए जेल जाते हैं और कुछ ही दिनों में मुस्कुराते हुए वापस भी आ जाते हैं। आपके चेहरे की चमक तनिको कम नहीं होती। कमाल है। लगता है देसी शुद्ध घी सिर्फ आप ही खाते हैं। आपको देखकर विश्वास हो जाता है -- चोर का मुंह चांद जैसा।
  लालू भाई! जब आपने अदालत को बताया कि आप सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में वकील हैं तो मालूम भया कि आप पढ़े-लिखे भी हैं; नहीं तो आपके मुखमंडल और बतकही से तो तनिको नहीं लगता है कि आप मैट्रिको पास किए होंगे। जरा नीतीश भैयवा को तो देखिए। खैनी तो वह भी खाता है लेकिन पढ़ा-लिखा लगता है। खैर जाने दीजिए ये सब। आप अखबार तो पढ़ते ही होंगे। समाचार आया था कि बिहार और झारखंड के नक्सली एरिया कमांडर जनता और ठेकेदारों से पैसा लूटते हैं, खुद जंगल में रहते हैं लेकिन अपने बच्चों को कलकत्ता और चेन्नई के डिलक्स स्कूल-कालेजों में पढ़ाते हैं। वे भी नहीं चाहते हैं कि उनके बच्चे उनकी तरह बनें। फिर आपने अपने बच्चों को क्यों अपनी राह पर ही चलना सिखाया? बिचारी मीसा भारती, आपकी बड़की बिटियवा भरी जवानी में हसबैंड के साथ कोर्ट कचहरी का चक्कर लगा रही है। उ कवनो दिन गिरफ़्तार होकर जेल जा सकती है। दामादो को आपने अपना हुनर सिखा दिया। कम से कम ओकरा के तो बकश ही देते। डाईन को भी दामाद पियारा होता है। कवनो जरुरी है कि मीसा और उसके हसबैंड को एक ही जेल मिले। आपका तो एक पैर जेल में रहता है और एक बाहर रहता है। लेकिन भौजाई कैसे जेल में रह पायेंगी। रेलवे का होटल बेचना था तो अकेले ही बेचते, उनको अपना पार्टनर काहे को बना लिया। सुशील मोदिया बहुत बदमाश है। आपके साथ पटना यूनिवर्सिटी में महामंत्री था, सरकार में भी आपके ही मातहत मंत्री था, लेकिन भारी एहसान फरामोश आदमी निकला। आपने उसको ठीक से पहचाना नहीं था क्या। अब तो सारा पोलवा वही खोल रहा है। और आपको भी पटना में ही माल बनाने की क्या सूझी? दुबई में बनवाते, सिंगापुर में बनवाते, हांगकांग में बनवाते -- किसी को कानोकान खबर नहीं होती। सोनिया भौजी का इतना चक्कर लगाते हो, पपुआ से गठबंधन करते हो; अकूत धन को विदेश में सही ढंग से ठिकाने लगाने का फारमुला उनसे काहे नहीं सीख लिए। माल तो सीज हो ही गया, जवान लड़के को मिट्टी बेचने के जुर्म में फंसा दिया। पटना जू को मिट्टी बेचने की क्या जरुरत थी। गोपालगंज में गंडक पर बांध ही बनवा दिए होते।
लालू भाई। सरकारी पैसा हड़पने और सामाजिक न्याय में कवन सा संबन्ध है, आजतक हमारे दिमाग में नहीं आया। वैसे भी हमारे दिमाग में भूसा नहीं भरा है। सब भूसा तो आप ही खा गए। लेकिन आप और आपके चाहनेवाले यही कह रहे हैं। कहती है दुनिया, कहती रहे, क्या फर्क पड़ता है। आप तो वही करेंगे जिसमें दू पैसा की आमदनी हो। लेकिन भाई! बेटा, बेटी, दामाद और मेहरारू को फंसाना कवनो एंगिल से उचित नहीं है। नीतीश कुमार जी को कम से कम इतना तो सोचना ही चाहिए।
    जेलवा में जेलर से हाथ-पांव जोड़कर एक जोड़ी कंबल एक्स्टरा ले लीजिएगा। हज़ारीबाग में ठंढ कुछ बेसिये पड़ती है। चाह में आदी का रस मिलाके पीजिएगा, नहीं तो तबीयत खराब हो जाएगी। अपना खयाल रखियेगा, पटना में परिवार का खयाल रखने के लिए बहुते यादव है। थोड़ा लिखना जियादा समझना। इति।
        आपका अपना ही -- चाचा बनारसी

Friday, January 5, 2018

यह कैसी जुगलबन्दी

         जब-जब यह देश महानता की ओर बढ़ने की कोशिश करता है, कुछ आन्तरिक शक्तियां बौखला जाती हैं और इसे कमजोर करने की अत्यन्त निम्न स्तर की कार्यवाही आरंभ कर देती है। जाति और संप्रदाय इस देश के सबसे नाजुक मर्मस्थान हैं। इसे छूते ही आग भड़क उठती है। विगत सैकड़ों वर्षों का इतिहास रहा है कि भारतीय समाज की इस कमजोरी का लाभ उठाकर विदेशियों ने हमको गुलाम बनाया और हमपर राज किया। अंग्रेजों ने भारत की इस कमजोरी का सर्वाधिक दोहन किया। फूट डालो और राज करो की नीति उन्हीं की थी जिसे कांग्रेस ने अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए ज्यों का त्यों अपना लिया। महात्मा गांधी और महामना मालवीय जी ने विराट हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता के लिए बहुत काम किया लेकिन उनके राजनीतिक उत्तराधिकारियों ने सत्ता के लिए सारे ऊंचे आदर्श भुला दिए और एक समुदाय के तुष्टिकरण के लिए  देश का विभाजन तक करा दिया। द्विराष्ट्र के सिद्धान्त के अनुसार मुसलमानों को पाकिस्तान जाना था और हिन्दुओं को हिन्दुस्तान में रहना था। कांग्रेस के समर्थन से पाकिस्तान तो बन गया लेकिन अधिकांश मुसलमान हिन्दुस्तान में ही रह गए। जिस समस्या के समाधान के लिए देश का बंटवारा हुआ था, वह ज्यों की त्यों बनी रही। बंटवारे के ईनाम के रूप में हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने १९५२ के आम चुनाव में कांग्रेस को थोक में वोट दिया। कांग्रेस को राजनीतिक गणित समझने में देर नहीं लगी। नेहरूजी कहते थे -- By accident I am a Hindu. वही नेहरूजी अपने नाम के आगे पंडित लगाना नहीं भूलते थे। जब लोग उन्हें पंडितजी कहकर संबोधित करते थे तो वे अत्यन्त प्रसन्न होते थे। भोला-भाला ब्राह्मण समाज जो सदियों से सत्ता से बहुत दूर था, नेहरूजी के रूप में अपने को सत्ताधारी समझने लगा। नेहरू जी ने नाम के आगे पंडित लगाकर ब्राह्मणों का वोट साध लिया। जाति के आधार पर नौकरियों और जन प्रतिनिधियों के चुनाव का प्राविधान संविधान में डलवाकर उन्होंने दलितों को भी अपने पाले में कर लिया। भारतीय समाज के तीन बहुत बड़े वर्ग -- मुसलमान, दलित और ब्राह्मण कांग्रेस के वोट-बैंक बन गए जिसका लाभ सोनिया गांधी तक ने उठाया। लेकिन शीघ्र ही इन तीनों समुदायों को यह समझ में आ गया कि कांग्रेस ने धरातल पर इनके लिए कुछ किया ही नहीं। परिणाम यह निकला कि कांग्रेस का यह वोट बैंक तितर-बितर हो गया। दक्षिण में द्रविड पार्टियों ने इसका लाभ उठाया तो उत्तर में लालू, मुलायम और मायावती ने। लालू और मुलायम ने M-Y(मुस्लिम यादव) समीकरण बनाया तो मायावती ने DMF(दलित मुस्लिम फोरम)। कुछ वर्षों तक यह समीकरण काम करता रहा और सबने सत्ता की मलाई जी भरकर खाई। किसी ने चारा खाया तो किसी ने समाजवादी पेंशन। किसी ने टिकट के बदले अथाह धन कमाया तो किसी ने फिल्मी सितारे नचवाए। जनता ने सब देखा। मोहभंग स्वाभाविक था। इधर पश्चिम के क्षितिज गुजरात में पूरे देश ने विकास और राष्ट्र्वाद के सूरज को उगते हुए देखा। नरेन्द्र मोदी के रूप में देश ने एक महानायक का उदय देखा। पूरा हिन्दू समाज मतभेदों को भूलाकर एक हो गया और दिल्ली ही नहीं अधिकांश राज्यों में राष्ट्रवादी सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गए। ये जतिवादी और भ्रष्ट नेता मोदी को जितनी ही गाली देते, उनकी लोकप्रियता उतनी ही बढ़ती। सभी विरोधियों को बारी-बारी से मुंह की खानी पड़ी। फिर सबने अंग्रेजों और कांग्रेसियों की पुरानी नीति -- फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने का एकजूट प्रयास किया।
महाराष्ट्र के कोरेगांव की घटना मात्र एक संयोग नहीं है। समझ में नहीं आता कि भारतीयों पर अंग्रेजों के विजय को भी एक उत्सव के रूप में मनाया जाएगा? कोरेगांव में अंग्रेजों के विजयोत्सव की २००वीं वर्षगांठ मनाने के लिए गुजरात से तथाकथित दलित नेता जिग्नेश मेवाणी पहुंचते हैं तो जे.एन.यू. दिल्ली से उमर खालिद। अंबेडकर जी के पोते प्रकाश अंबेडकर भी कहां पीछे रहनेवाले थे। वे भी आग में घी डालने पहुंच ही गए। खुले मंच से जाति विशेष को गालियां दी गईं। दंगा भड़क उठा। इसे देशव्यापी करने की योजना है। उमर खालिद, जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल और राहुल गांधी की जुगलबन्दी कोई आकस्मिक नहीं है। तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम पुरुष वर्ग तो पूरे देश में अराजकता फैलाने के लिए उचित समय का इन्तज़ार कर ही रहा है, खालिद, मेवाणी, पटेल और राहुल की जुगलबन्दी भी सत्ता सुख के लिए देश को अस्थिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। यह और कुछ नहीं, राष्ट्रवाद के उदय और तमाम तिकड़मों के बाद भी चुनावों में हो रही लगातार हारों से उपजी हताशा का परिणाम है। लेकिन यह देशहित में नहीं है। योजनाएं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की राष्ट्रद्रोही धरती पर बनती हैं और क्रियान्यवन गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की धरती पर किया जाता है। इसमें अच्छा खासा विदेशी धन खर्च किया जा रहा है। सरकार का यह कर्त्तव्य बनता है कि इन राष्ट्रद्रोही शक्तियों की आय का स्रोत, इन्हें समर्थन करनेवाली ताकतों और इनके असली लक्ष्य का पता लगाए और समय रहते इनपर कार्यवाही करे।