Tuesday, July 4, 2017

चीन की पैंतरेबाज़ी


चीन एक विस्तारवादी देश है। उसकी इस आदत के कारण उसके पड़ोसी सभी देश परेशान हैं। उसके विस्तारवाद के कारण ही विएतनाम, दक्षिण कोरिया, कंबोडिया और जापान परेशान हैं। रुस से भी उसका सीमा-विवाद वर्षों तक चला। दोनों देशों की सीमा पर स्थित ‘चेन माओ’ द्वीप को लेकर रुस और चीन के संबन्ध असामान्य रहे। रुस हर मामले में उससे बीस पड़ रहा था। अतः अन्त में चीन ने समर्पण कर दिया और ‘चेन माओ’ द्वीप पर रुस का आधिपत्य स्वीकार किया, फिर दोनों देशों के संबन्ध सामान्य हुए। अपनी विस्तारवादी नीति के अन्तर्गत ही चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया। वरना उससे हमारी सीमाएं कहीं मिलती ही नहीं थीं। तिब्बत एक बफ़र स्टेट था लेकिन चीन द्वारा उसपर कब्जे के बाद ही वह भारत के सीधे संपर्क में आ गया। नेहरू जी की अदूरदर्शिता ने विरासत में भारत को ऐसी समस्या दी जिसका कोई समाधान ही नहीं है। वह तो लद्दाख और अरुणाचल पर भी अपना दावा करता है। पाकिस्तान ने गुलाम कश्मीर का अक्साई चिन वाला कुछ भूभाग उसे नज़राने में देकर उसका मन बढ़ा दिया है। वर्तमान दोकलम में सड़क निर्माण भी चीन की इसी नीति का परिणाम है। उसे मालूम था कि भूटान एक कमजोर देश है। अतः उसकी सीमा में घुसकर कुछ भी किया जा सकता है। भूटान की सुरक्षा का दायित्व एक संधि के अनुसार भारत के पास है। सामरिक रूप से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दोकलम में चीन द्वारा सड़क निर्माण सीधे भारत की सुरक्षा से जुड़ा है। चीन को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि भारत इस मामले में सीधा हस्तक्षेप करेगा। फिलहाल सड़क निर्माण रुका हुआ है और चीन की बौखलाहट बढ़ती जा रही है।
चीन ने यह कहकर तिब्बत पर कब्ज़ा किया था कि इतिहास के किसी कालखंड में तिब्बत चीनी साम्राज्य का एक हिस्सा हुआ करता था। यह ठीक वैसा ही है जैसे हिन्दुस्तान यह कहकर अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्ला देश और म्यामार पर  कब्ज़ा कर ले कि इतिहास के किसी कालखंड में ये सभी देश उसके अंग थे। तिब्बत सैकड़ों साल तक एक स्वतंत्र देश के रूप में विश्व के मानचित्र पर रहा है। चीन का उसपर कब्ज़ा और तात्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा चीनी कब्जे को मान्यता देना अवैध है। तिब्बत के शासन-प्रमुख और शीर्ष धार्मिक नेता दलाई लामा हिमाचल के धर्मशाला में आज भी निर्वासन झेल रहे हैं। धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार आज भी काम करती है। चीन इससे चिढ़ता है और भारत को परेशान करने का कोई भी मौका वह हाथ से नहीं जाने देता। भारत तिब्बत पर चीन के स्वामित्व को दी गई मान्यता वापस लेकर चीन को जवाब दे सकता है। हम यह कह सकते हैं कि हमारी कोई सीमा चीन से नहीं मिलती। किसी तरह के सीमा-विवाद के लिए वह तिब्बत की निर्वासित सरकार से बात करने की पहल करे। तिब्बत के मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में उठाकर भी चीन की बांह मरोड़ी जा सकती है। अगर तिब्बत पर चीन के कब्जे को भारत ने मान्यता नहीं दी होती तो अमेरिका ने भी तिब्बत का समर्थन किया होता। उस समय चीन इतना मजबूत भी नहीं था। अमेरिका और भारत के संयुक्त प्रयास से तिब्बत ने अबतक आज़ादी भी प्राप्त कर ली होती जो आज महज एक सपना है। लमहों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।

Thursday, June 29, 2017

एक पत्र बरखा रानी के नाम


प्रिय बरखा रानी,
तोहरे वियोग में हम पागल होके कमरे में बंद हूँ, तुन्हारा भाई लू, लट्ठ लेकर पीछे पड़ा है, तुम्हारी महतारी गर्मी हाथ धोकर पीछे पड़ गई है और तुम्हारा बाप बादल आवारागर्दी कर रहा है -- आकाश के जिस कोने में चाहे, विचरण कर रहा है। एक तुम्हीं हो जो सिर्फ तड़पा रही हो, पास आने का नाम नहीं ले रही हो। तुम्हारे आने की तारीख महीनों पहले हिन्दुस्तान के नामी मौसम वैज्ञानिकों ने बता दी थी, बड़ी खुशी हुई थी कि तुम पिछले साल से दस दिन पहले ही आ जाओगी। जेठ के महीने में भी आषाढ़ की फुहार आंखों के सामने नाचने लगी। प्रचंड गर्मी में भी जनवरी की सिहरन महसूस होने लगी। इन्तज़ार करते-करते आषाढ़ भी आधा हो गया, लेकिन तुम नहीं आई। अभी-अभी खबर मिली है कि तुम पटना में आकर ठिठक गई हो। तोके कैसे बतायें कि जवन मज़ा मोदी के बनारस में है वह लालू के पटना में कभियो नहीं मिलेगा। उहां ढेर दिन टिक जाओगी तो १२वीं या हाई स्कूल में टाप कराके जेल में बंद करा देंगे। नीतीश के राज में सोमरस के लिए तड़पती रह जाओगी। सुना है कि तुम केरल, कर्नाटक और मुंबई में भी आ गई हो। समझ में नहीं आ रहा है कि तोके काशी में कैसे बुलाएं। यहां का लंगड़ा कार्बाइड में झुलस गया है, रविदास पार्क में रोज रोमांस करने वाले प्रेमी युगल अस्सी पर गंगा-आरती देखने के लिए मज़बूर हो गए हैं, सारनाथ सूना हो गया है और हम पाकिट में प्याज रखकर एटीएम जा रहे हैं। तुमको तनिको तरस नहीं आ रहा है? अरे मेरी रानी। जेतना दुष्यन्त शकुन्तला से, रोमियो जूलियट से, हीर अपनी रांझा से और मजनू लैला से करता था, ओसे तनिको कम हम तुमसे मुहब्बत नहीं करते हैं। आशिक को ज्यादा तड़पाना ठीक नहीं है। तुम आंधी के साथ आओ, बिजली के साथ आओ, बाप बादल की पीठ पर सवार होकर आओ, लेकिन आओ। हम तोके कचौड़ी गली की कचौड़ी खिलाऊंगा, लंगड़ा आम खिलाऊंगा, गोदौलिया की मलाई वाली भांग की ठंढ़ई पिलाऊंगा, रामनगर की लस्सी पिलाऊंगा और लंका के केशव का बनारसी पान खिलाऊंगा। तुम कहोगी तो आईपी माल में ले जाकर हाफ गर्लफ़्रेंड भी दिखा दूंगा। लहंगा-चोली - जो कहोगी सिलवा दूंगा, विवो का स्मार्ट फोन भी दिला दूंगा, होटल ताज में डिनर भी कराऊंगा। बस, अब आ जाओ। राहुल बाबा जैसे इटली में ठहर गये हैं, उसी तरह पटना में ही मत रुकी रहो। एक हमहीं तोहर आशिक नहीं हैं, पूर्वांचल के करोड़ों युवक ही नहीं, बच्चे, बूढ़े, औरत-मर्द सब तुम्हारे प्रेमी हैं। करोड़ों का दिल तोड़ना अच्छा नहीं है। कालिदास के मेघदूत की प्रेमिका ने इसी आषाढ़ में काले-काले मेघों के माध्यम से अपने प्रेमी को संदेश भेजा था। मैं भी आषाढ़ के महीने में ही सोसल मीडिया के माध्यम से अपना प्रेम-पत्र भेज रहा हूं। आ जा, अब विलंब न कर। मुकेश के दर्दभरे गीतों से काम नहीं चल रहा है। हम घर, आंगन, दुअरा, खेत, खलिहान, राजपथ, पगडंडी -- हर जगह तुम्हारा नृत्य देखना चाहते हैं।
        कम लिखना, ज्यादा समझना।
इति।
                   तुम्हारा पुराना प्रेमी
                    चाचा बनारसी

Wednesday, March 22, 2017

सुप्रीम कोर्ट की चाल


            गत् मंगलवार को रामजन्मभूमि-बाबरी मस्ज़िद मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह सलाह देकर कि मामले का समाधान आपसी बातचीत के द्वारा निकालना ज्यादा अच्छा होगा, अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट अपने दायित्वों से भागने की कोशिश कर रहा है, जिसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती। कल को सुप्रीम कोर्ट यह भी सलाह दे सकता है कि सेना और आतंकवादी मिलबैठकर कश्मीर में पत्थरबाज़ी रोकने का समाधान निकाल लें तो बहुत अच्छा होगा। तीन तलाक के मुद्दे पर भी कोर्ट कह सकता है कि मौलाना और मुस्लिम महिलाएं बातचीत से समाधान तलाश करें।
            मन्दिर-मस्ज़िद विवाद कितना जटिल है, सुप्रीम कोर्ट को पता होना चाहिए। सन्‌ १५२८ में बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा तोड़े जाने के पूर्व वहां एक भव्य राम मन्दिर था। हिन्दू धर्म में आस्था रखनेवालों का यह अटूट विश्वास है कि प्रभु श्रीराम का जन्म वहीं हुआ था। हिन्दुओं ने रामजन्मभूमि फिर से प्राप्त करने के लिए असंख्य संघर्ष किए हैं। अकबर के समय भी तुलसीदास ने वहां रामकथा कहने का निर्णय लिया था। जनमानस के दबाव में वहां राम चबूतरा बनवाकर अकबर को रामकथा की अनुमति देनी पड़ी। मन्दिर-मस्ज़िद का मामला पहली बार अदालत में तब पहुंचा जब एक हिन्दू पुजारी ने १८८५ में एक याचिका दायर करके मस्ज़िद के बगल में मन्दिर बनाने की इज़ाज़त मांगी। काशी और मथुरा में मन्दिर और मस्ज़िद साथ-साथ हैं। हालांकि वहां भी मन्दिर तोड़कर ही मस्ज़िद बनाई गई थी, लेकिन वर्तमान में न कोई तनाव है और ना ही कोई विशेष विवाद है। कोर्ट ने समस्या का कोई समाधान नहीं निकाला और समस्या बनी रही। लगभग ६५ वर्षों के बाद सन्‌ १९४९ में मस्ज़िद में जिसे हिन्दू मन्दिर का गर्भगृह मानते हैं प्रभु श्रीराम का विग्रह प्रकट हुआ और उस समय से लगातार हिन्दू वहां पूजा-अर्चना करने लगे। तात्कालीन कांग्रेस सरकार ने मस्ज़िद से मूर्ति हटाने का प्रयास किया लेकिन १९५० में महन्थ परमहंस रामचन्द्रदास ने अदालत से मूर्ति न हटाए जाने की गुहार की और मूर्ति यथावत रही और अखंड कीर्तन भी जारी रहा। १९५९ में निर्मोही अखाड़ा ने परिसर के स्वामित्व का दावा कोर्ट में ठोका जिसकी प्रतिक्रिया में सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड ने भी १९६१ में अपना दावा ठोका। कोर्ट में मामला चलता रहा। इसी बीच विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल पर भव्य मन्दिर की स्थापना के लिए एक देशव्यापी प्रभावी आन्दोलन आरंभ किया। फ़ैज़ाबाद की ज़िला अदालत ने १९८६ में विवाद का आंशिक समाधान तलाशते हुए गर्भगृह का ताला खुलवाया और पूजा करने की अनुमति प्रदान की। इस निर्णय के विरोध में बाबरी मस्ज़िद एक्शन कमिटी का गठन किया गया। उनके विरोध को नज़रअन्दाज़ करते हुए तात्कालीन प्रधान मन्त्री राजीव गान्धी ने विश्व हिन्दू परिषद को १९८९ में विवादित स्थल के समीप ही मन्दिर के शिलान्यास की अनुमति प्रदान की और शिलान्यास कार्यक्रम सफलता पूर्वक संपन्न भी हो गया। सितंबर १९९० में भव्य राम मन्दिर निर्माण के लिए विश्व हिन्दू परिषद द्वारा चलाए जा रहे प्रबल जन आन्दोलन का भारतीय जनता पार्टी का सक्रिय सहयोग मिला। श्री लालकृष्ण आडवानी ने मन्दिर निर्माण के समर्थन में ऐतिहासिक रामरथ-यात्रा निकाली। आन्दोलन को खत्म करने की नीयत से तात्कालीन प्रधान मन्त्री वी. पी. सिंह ने एक अध्यादेश लाकर विवादित भूमि विश्व हिन्दू परिषद को देने की तैयारी कर ली थी, तभी रथयात्रा के दौरान बिहार के समस्तीपुर में आडवानी को गिरफ़्तार करके लालू यादव ने सारे किए कराए पर पानी फेर दिया। रामजन्मभूमि आन्दोलन थमने के बजाय वृहद्‌ रूप लेता गया जिसकी परिणति कारसेवकों द्वारा विवादित ढांचे को ६, दिसंबर १९९२ में जबरन गिराए जाने के रूप में हुई। विवादित स्थल पर एक अस्थाई मन्दिर का निर्माण भी आन्दोलन के दौरान कर दिया गया लेकिन सरकारी हस्तक्षेप के कारण मन्दिर की छत नहीं पड़ पाई। आज की तारीख में वहां मूर्ति भी है, तिरपाल की छत के साथ एक छोटा मन्दिर भी है तथा पुलिस की देखरेख में पूजा-अर्चना भी चल रही है।
            इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्वामित्व का मामला फिर गरमाया। कोर्ट के निर्देश पर भारतीय पुरातत्त्व विभाग ने मन्दिर के पास काफी खुदाई कराई और १५२८ के पूर्व वहां मन्दिर होने के अनेक साक्ष्य प्राप्त किए जिसके आधार पर ३०, सितंबर २०१० को हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपना ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसके अनुसार विवादित परिसर की एक तिहाई जमीन मुसलमानों को और शेष दो तिहाई जमीन हिन्दुओं को देने का आदेश पारित किया गया। लेकिन कोर्ट ने गर्भगृह पर रामलला का ही स्वामित्व स्वीकार किया। मुसलमानों ने कोर्ट के इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट की शरण ली। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी आदत के अनुसार बड़ी आसानी से हाई कोर्ट के  आदेश पर मई २०११ में स्टे लगा दिया। मामला आज भी वहां लंबित है। ६ साल के बाद टालने के अंदाज़ में सुप्रीम कोर्ट ने आपसी बातचीत के द्वारा समाधान निकालने की सलाह दी है। ऐसा नहीं है कि आपसी बातचीत द्वारा समाधान निकालने के प्रयास नहीं हुए हैं। १९९० में स्व. चन्द्रशेखर के प्रधान मन्त्री के काल एवं उसके बाद स्व. नरसिंहा राव के प्रधान मन्त्री के काल में भी दोनों पक्षों के धार्मिक नेताओं द्वारा स्वयं प्रधान मन्त्री के सक्रिय सहयोग से वार्ताओं के कई दौर चले लेकिन सफलता दूर की कौड़ी रही। सन्‌ २००२ में प्रधान मन्त्री बनने के बाद श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधान मन्त्री कार्यालय में अलग से एक अयोध्या सेल का गठन किया और वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी श्री शत्रुघ्न सिंह उसके प्रभारी बनाए गए। वार्ताओं के कई दौर चले लेकिन मुस्लिम धार्मिक गुरुओं की हठधर्मी के कारण कोई परिणाम नहीं निकल सका। सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सेक्रेटरी जेनरल मौलाना वली रहमानी ने  कहा है कि वार्त्ता से समस्या का समाधान निकलना असंभव है। इस मुकदमें पर निर्णय सुप्रीम कोर्ट को ही लेना होगा।
            सुप्रीम कोर्ट को यह समझना चाहिए कि समाधान के जब सारे रास्ते बंद हो गए, तभी दोनों पक्ष उसकी शरण में गए। सुप्रीम कोर्ट को अपना प्रो-सेकुलर चरित्र का त्याग करते हुए मुकदमे की त्वरित सुनवाई करनी चाहिए। समझ में नहीं आता है कि आतंकवादियों के मुकदमें सुप्रीम कोर्ट रात में भी सुनता है, गोवा में सरकार बनाने के राज्यपाल के आमंत्रण पर विचार करने के लिए मा. मुख्य न्यायाधीश रात के १२ बजे भी कांग्रेसियों के लिए अपने दरवाजे खोल देते हैं और राम मन्दिर के मुकदमे की त्वरित सुनवाई करने के बदले सिर्फ सलाह देकर छुट्टी पा लेते हैं। क्या कश्मीर समस्या का समाधान बातचीत से संभव है? क्या ISIS को बातचीत के माध्यम से आतंकवाद से विमुख किया जा सकता है? हमारी समझ से कभी नहीं। उसी तरह बातचीत से मन्दिर-मस्ज़िद विवाद के निपटारे की बात सोचना दिवास्वप्न के अलावे और कुछ भी नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुसलमानों को हजार वर्ष बाद देश के दोनों बड़े समुदायों के बीच सौहार्द्र स्थापित करने का एक सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ है, लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं कि वे इसका सदुपयोग नहीं कर पायेंगे।


Wednesday, January 11, 2017

एक पाती मुलायम भाई के नाम

       स्वस्तिश्री लिखीं चाचा बनारसी के तरफ से मुलायम भाई को शुभकामना पहुँचे। आगे समाचार हौ कि तुम्हरे बाप-बेटा की लड़ाई से हमार चिन्ता बढ़ गई है। ना तो तुम पीछे हटने के लिए तैयार हो और न तुम्हारा बेटवा। तुम तो पहलवान रहे हो। अपने बाहुकण्टक दांव में फँसाकर तुमने कितनों को चित किया है। सोनिया भौजी तो तुम्हारा बाहुकण्टक दांव ताउम्र नहीं भूल सकतीं, जब तुमने अटल जी की तेरह महीने की सरकार  गिरने के बाद उनके पी.एम. बनने के सपने को ऐन वक्त पर चकनाचूर कर दिया था। तुम्हारे दांव को मायावती आज भी याद करती हैं, जब गेस्ट हाउस में तुम्हारे चेलों ने उनकी साड़ी-ब्लाउज़ के तार-तार कर दिए थे। हमारी समझे में नहीं आ रहा है कि पहलवान तुम हो और धोबिया पाट का इस्तेमाल अखिलेशवा कर रहा है। भाइ मुलायम, बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है। दूसरी पत्नी के चक्कर में बुढ़ापा बर्बाद करने पर काहे तुले हुए हो। हमहुं यह मानता हूँ कि पहली बीबी पांव की जूती होती है और दूसरी सिर की टोपी। अमर सिंह ने बुढ़ौती में सुन्दर युवती से तोहर बियाह कराके तोके बांड़ होने से बचा लिया; लेकिन एकर मतलब इ तो नाहीं है न कि अपने सगे बेटवा को अपना दुश्मन बना लो। भैया, तोहरी आवाज और तोहरे पैर तो अभिए से लड़खड़ाय लगे हैं; अब तो गिनती के दिन बचे हैं, राजपाट बेटवा को दे देना ही हमके उचित लग रहा है। पाण्डवों के पूर्वज ययाति की भोगलिप्सा इतनी बढ़ गई थी कि उन्होंने अपने बेटे की जवानी उधार ले ली, फिर भी वे तृप्त नहीं हुए। तुम भी काहे ययाति बन रहे हो? अब टैम आ गया है संन्यास लेने का। अडवानी और जोशी की तरह मार्ग दर्शक काहे नहीं बन जाते? शिवपलवा, अमर और साधना के चक्कर में पड़कर अपना इहलोक तो बर्बाद करिए रहे हो, परलोकवा भी हाथ से चला जाएगा। सायकिल के पीछे काहे पड़े हो, अब तुम्हरी उमर छड़ी लेकर चलने की हो गई है।
            कभी-कभी हमरे दिमाग में यह भी आता है कि जो टीवी पर देख रहा हूँ वही सत्य है या पर्दे के पीछे कोई और ड्रामा खेला जा रहा है। तुम छोटे-मोटे पहलवान नहीं हो। तुम्हारा दांव वी.पी. सिंह, चन्द्रशेखर, सोनिया भौजी और बहन मायावती भी नहीं समझ पाईं, तो हमार का औकात हौ? हम तो ऐसही कचौड़ी-जिलेबी के बाद भांग का एक गोला खाकर पान घुलाते हुए अन्दाज लगाता रहता हूँ। कही तुम और अखिलेश नूरा कुश्ती तो नहीं लड़ रहे हो? पिछला पांच साल में ५०० दंगा, बुलन्द शहर का रेप काण्ड, कैराना से हिन्दुओं को भगाने, कानून व्यवस्था गुण्डों के हवाले करने, जमीनों पर जबरन कब्जा करने, गो हत्यारों को करोड़ों रुपया देने और अपनी बिरादरी के लोगों को ऊंचे पदों पर बैठाने के अलावे बेटवा की भी कोई उपलब्धि नहीं है। कहीं इन मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए तुम दोनों शो मैच तो नहीं खेल रहे हो? भाई मुलायम, तोहर थाह पाना बहुते मुश्किल काम है। अगर झगड़ा सचमुच का है, तो एमें तोके खुशे होना चाहिए। कम से कम तोहर बेटवा इ काबिल तो हो गया कि अब धोबिया पाट में एक्सपर्ट हो गया है। हर बाप चाहता है कि बेटे का कद और पद बाप से बड़ा हो जाय। तोके परेशानी कवना बात के हौ? अगर अगले चुनाव के बाद वह मुख्यमन्त्री नहीं भी बना, तो भी वह बेकार नहीं बैठ सकता। तुम उसको विदेश में भेजकर इंजीनियर बनाये  हो। वह सोनिया भौजी के पपुआ की तरह तो है नहीं कि कंपीटिशन देकर चपरासी की नोकरी भी हासिल न कर सके। अपना अखिलेशवा बंगलोर में कवनों कंपनी में नोकरी करके बीबी बच्चों का पेट पाल सकता है। तोके त अपना बेटवा पर नाज़ होखे के चाहीं आ इहां तू ओकरे टांग खींचने पर तुले हो। देखऽ मुलायम। हमार बात के गांठ बांध लेना, अन्त समय में बेटवे काम आयेगा। शिवपलवा सबसे पहले साथ छोड़कर भागेगा।
            चिट्ठी में केतना सलाह दूं। जल्दिए लखनऊ आऊंगा, तब डिटेल में बतकही होगी।
          इति शुभ,
                                                तोहार आपन

                                                चाचा बनारसी

Friday, January 6, 2017

हैवानियत का नया साल


            बंगलोर को बड़े शहरों में लड़कियों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है। यही कारण है कि सुदूर बिहार और यू.पी. से भी लड़कियां यहां इन्जीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेन्ट पढ़ने के लिए अकेले आ जाती हैं और अकेले रहकर ही पढ़ाई भी पूरी कर लेती हैं। यही नहीं यहां नौकरी भी अकेले रहकर कर लेती हैं। लेकिन ३१ दिसंबर २०१६ की रात में हुई दो घटनाओं ने न सिर्फ बंगलोर को कलंकित किया बल्कि देश का भी सिर शर्म से झुका दिया। पिछले  साल की अन्तिम रात को बंगलोर के कमनहल्ली में सड़क से गुजर रही एक युवती को दो मोटर सयकिल चालक युवकों ने अपहरण की नीयत से पकड़ लिया। लडकी द्वारा विरोध करने पर उससे अभद्र ढंग से छेड़खानी की गई, मोलेस्टेशन किया गया और अपने उद्देश्य में अस्फल होने पर सड़क पर ही बलपूर्वक फेंक कर गिरा दिया गया। दोनों युवक नए साल का जश्न मनाकर आ रहे थे और नशे में धुत्‌ थे। दूसरी घटना इसी शहर के महात्मा गांधी रोड की है जहां प्रशासन ने शहर के हर्ट में स्थित खुली, चौड़ी सड़क पर आधी रात के बाद दो घंटे तक सामूहिक रूप से नए साल का जश्न मनाने की अनुमति दी थी। नशे में धुत्‌ युवक-युवतियां देर तक एक-दूसरे के साथ नाचते रहे। लड़कियों को जबतक कुछ समझ में आता, नशेड़ी युवकों ने उन्हें पकड़कर चूमना शुरु कर दिया, जबर्दस्ती पकड़ कर अश्लील हरकतें आरंभ कर दी और सरे आम मोलेस्टेशन भी प्रारंभ कर दिया। पुलिस बहुत देर के बाद हरकत में आई। किसी तरह लड़कियों को बचाया गया। सबसे चौकाने वाली बात यह रही कि इन दोनों घटनाओं पर कर्नाटक के गृहमन्त्री का बयान आया कि नये साल के जश्न में ऐसी घटनाएं तो होती रहती हैं। ऐसी घटनाओं में हमेशा नंबर एक पर रहने वाली दिल्ली में भी नशे में धुत्‌ युवकों ने मुख्य मार्ग पर एक लड़की को अपना शिकार बनाया। गनीमत थी कि वहां पुलिस उपस्थित थी। पुलिस ने लड़की को बचाया। पुलिस की इस कार्यवाही से उत्तेजित लड़कों ने अपने सैकड़ों साथियों के साथ थाने पर ही हमला बोल दिया। जमकर पत्थरबाज़ी और तोड़फोड़ की।

            नये साल का जश्न मनाना बुरा नहीं है, लेकिन इस दिन शराब पीकर इन्सानियत की हद पारकर हैवानियत पर उतर आना घोर निन्दनीय है। पता नहीं पश्चिम का उअह कैसा त्योहार है जिसदिन सवेरे से ही युवक-युवतियों पर इश्कबाज़ी का नशा सवार हो जाता है। इस दिन शराब की बिक्री बेतहाशा बढ़ जाती है। अधिकांश युवक अपने को मजनू और राह चलती लड़की को लैला समझने लगते हैं। मनुष्य और पशु में अन्तर सिर्फ विवेक का होता है, वरना भूख-प्यास, निद्रा-मैथुन -- दोनों में समान होते हैं। शराब मनुष्य के विवेक को ही नष्ट कर देती है, फिर वह पशुता को प्राप्त हो जाता है। ऐसे में वह कुछ भी कर सकता है। नई पीढ़ी का अपने मूल संस्कारों से कट जाना और पश्चिम का अन्धानुकरण समस्या के मुख्य करणों मे से एक बड़ा कारण है। पाठ्यपुस्कों से तुलसी, सूर, रसखान, जायसी, सुब्रह्मण्यम भारती, चन्द्रबरदाई जैसे कवियों और लेखकों के लुप्त होने के कारण अब युवा पीढ़ी टीवी के बिग बास और देल्ही-वेली जैसी फिल्मों से ही संस्कार ग्रहण करने के लिए वाध्य है। परिणाम सामने है। यह देश जबतक India रहेगा, तबतक ऐसा होता रहेगा। इसे भारत बनाइये, ऐसी समस्याएं अपने आप सुलझ जायेंगीं। हमें नहीं चाहिए आंग्ल नव वर्ष और वेलेन्टाईन डे, जो हमारे युवक-युवतियों को हैवानियत की ओर ले जाय।  हम अपने, दिवाली, दशहरा, पोंगल, उगाडी, वर्ष प्रतिपदा, बैसाखी और ईद-बकरीद में ही खुश हैं।