Thursday, January 14, 2016

कांग्रेस की सहिष्णुता


एक पत्रिका है -- ‘कांग्रेस दर्शन’।  यह कांग्रेस की अधिकृत पत्रिका है और सही अर्थों में कांग्रेस के दर्शन को प्रदर्शित करती है। इसके संपादक हैं, मुंबई कांग्रेस के बड़बोले अध्यक्ष श्री संजय निरुपम। विगत २८ दिसंबर को कांग्रेस की स्थापना दिवस के अवसर पर प्रकाशित इस पत्रिका के मुख्य लेख ने तहलका मचा दिया और संपादकीय विभाग के संपादक की बलि ले ली । पत्रिका के मुख्य लेख में एक सच्चाई को अनावृत किया गया था, जिसे सारा हिन्दुस्तान जानता है, लेकिन कांग्रेसी, विशेष रूप से नेहरू खानदान के भक्त सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते हैं। पत्रिका में दो रहस्योद्घाटन किए गए थे --
१, आज़ादी के बाद नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना देशहित में नहीं था। कांग्रेस का विशाल बहुमत पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में था, लेकिन गांधीजी के हस्तक्षेप और नेहरू का खुला समर्थन करने के कारण पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया और नेहरू प्रधानमंत्री बन गए। लेख में नेहरू की विदेश नीति की जमकर आलोचना की गई है तथा कश्मीर की समस्या और १९६२ में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया है। 
२.  दूसरा रहस्योद्घाटन यह है कि सोनिया गांधी के पिता एक ‘फ़ासीवादी सैनिक’ थे। यह सत्य है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय सोनिया के पिता इटली के तानाशाह मुसोलिनी की सेना में थे और उन्होंने मित्र राष्ट्रों के खिलाफ़ युद्ध किया था। हिटलर और मुसोलिनी के पतन के बाद रूसी सेनाओं द्वारा वे गिरफ़्तार किए गए और रुस के जेल में रखे गए। उनके जेल में रहने के दौरान ही सोनिया गांधी का जन्म हुआ। परिवार की माली हालत बहुत ही खस्ता थी जिसके कारण अल्प वय में ही सोनिया को इंग्लैंड जाना पड़ा और वहा बार-बाला की असम्मानजनक नौकरी करके परिवार का भरण-पोषण करना पड़ा।
‘कांग्रेस दर्शन’ पत्रिका में प्रकाशित उपरोक्त तथ्यों को सारी दुनिया जानती है, लेकिन अपनी ही पत्रिका का मुखर होना हाई कमान को कैसे बर्दाश्त होता? पहले संपादकीय विभाग के संपादक की छुट्टी की गई और अब संजय निरुपम पर गाज़ गिरने वाली है। अखिल भारतीय कांग्रेस की अनुशासन समिति के अध्यक्ष श्रीमान ए.के. एंटोनी ने सोनिया गांधी की टेढ़ी भृकुटि के मद्देनज़र श्री संजय निरुपम को कारण बताओ नोटिस जारी की है। निरुपम जी की अध्यक्ष पद से विदाई तय है । निरुपम जी ने पहले ही सफाई दे दी है कि यद्यपि वे पत्रिका के मुख्य संपादक हैं, लेकिन उन्हें ऐसे लेख के छपने की जानकारी नहीं थी। यह कांग्रेसी कल्चर है। मुख्य संपादक मक्खनबाज़ी के काम में इतने मशगूल रहते हैं कि संपादक होने के बावजूद छपने के पूर्व लेखों को नहीं देखते हैं। यह मनमोहिनी संस्कृति है जो सोनिया के अध्यक्ष बनने के बाद दिन दूनी रात चौगुनी की गति से फल-फूल रही है। असहिष्णुता के नाम पर अपने ३५ दरबारी सहित्यकारो द्वारा पुरस्कार वापसी का ड्रामा कराने वाली कांग्रेस की सहिष्णुता का जीता-जागता उदाहरण भी है -  श्री श्री संजय निरुपम को थमाई गई कारण बताओ नोटिस।

Sunday, December 27, 2015

अब तो शर्म करो केजरीवाल

            एक समय था, जब अरविन्द केजरीवाल अन्ना हजारे के प्रतिबिंब माने जाते थे। अन्ना आन्दोलन के दौरान आईआईटी, चेन्नई में उनका भाषण सुनकर मैं इतना प्रभावित हुआ कि उनका प्रबल प्रशंसक बन गया। अन्ना ने यद्यपि घोषित नहीं किया था, फिर भी भारतीय जन मानस उन्हें अन्ना के प्रवक्ता और उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता देने लगा था। उन्होंने तात्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप क्या लगाए, भाजपा समेत आरएसएस भी हिल गया। संघ के ही निर्देश पर गडकरी को भाजपा के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र भी देना पड़ा। गडकरी ने अदालत की शरण ली। केजरीवाल कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। उन्होंने गडकरी से माफ़ी मांगकर इस घटना का पटाक्षेप किया। गडकरी को उस समय निश्चित रूप से नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन केजरीवाल को ज्यादा क्षति हुई। उनकी स्थापित विश्वसनीयता का ग्राफ अब X-Axis पर लुढ़कने लगा।
      इस समय केजरीवाल लालू और दिग्विजय सिंह की श्रेणी में पहुंच गए हैं। मैं आरंभ से ही खेल संघों पर राजनीतिक हस्तियों के नियंत्रण के विरुद्ध रहा हूं। जेटली, शरद पवार, राजीव शुक्ला जैसे कद्दावर नेताओं को क्रिकेट-प्रबन्धन ज्यादा भाता है। मात्र इस कारण उनकी चरित्र हत्या नहीं की जा सकती। केजरीवाल ने अपने प्रधान सचिव के भ्रष्टाचार और उनके कार्यालय पर सीबीआई के छापे से जनता का ध्यान हटाने के लिए बदले की भावना से प्रेरित हो बिना किसी प्रमाण के अरुण जेटली की चरित्र-हत्या करने की अपनी ओर से पूरी कोशिश की। डीडीसीए में हुई कथित अनियमितता के लिए जेटली को दोषी ठहराकर उनसे इस्तीफ़े की मांग भी कर डाली। इसके पूर्व केजरी सरकार ने ही डीडीसीए में कथित भ्रष्टाचार की जांच के लिए अपने मनपसंद त्रिसदस्यीय जांच आयोग का गठन किया था जिसकी रिपोर्ट भी आ गई है। जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अरुण जेटली के नाम का उल्लेख भी नहीं किया है। ज्ञात हो कि इसके पूर्व  शीला दीक्षित की कांग्रेसी सरकार ने भी अरुण जेटली को घेरने का पूरा प्रयास किया था और डीडीसीए में कथित भ्रष्टाचार की जांच के लिए एक आयोग का गठान किया था। उसने भी जेटली को क्लीन चिट दी थी। मोदी और अन्य भाजपा नेता राजनीतिक असहिष्णुता के हमेशा से शिकार रहे हैं। पूर्व प्रधान मंत्री नरसिंहा राव ने आडवानी को हवाला काण्ड में लपेटने के लिए भरपूर प्रयास किया था, चार्ज शीट भी दाखिल की थी; लेकिन आडवानी बेदाग सिद्ध हुए। नरेन्द्र मोदी पर जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कांग्रेस ने एक दर्ज़न से अधिक मुकदमे दर्ज़ कराए। सिट से लेकर सीबीआई तक ने वर्षों तक गहन जांच की, लेकिन सत्य, सत्य ही रहा। मोदी पर एक भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ। आज वे देश के प्रधान मंत्री हैं। देश ही नहीं विदेश भी उनके मुरीद हैं।

      केजरीवाल कोई आज़म खां, ओवैसी या लालू यादव नहीं हैं। उन्होंने आईआईटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। आईआरएस में एक जिम्मेदार अधिकारी के पद की शोभा बढ़ाई है। किसी पर अनर्गल आरोप लगाना, कम से कम उन्हें शोभा नहीं देता है। राजनीति में आने के बाद केजरीवाल इतना नीचे गिर सकते हैं, किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।

Wednesday, December 16, 2015

केजरीवाल का सच

         हिन्दुस्तान के स्वघोषित सबसे बड़े ईमानदार नेता अरविंद केजरीवाल इतनी जल्दी बेनकाब हो जायेंगे, ऐसी उम्मीद नहीं थी। इतनी जल्दी तो लालू और ए. राजा के चेहरे से भी नकाब नहीं उतरा था। भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंककर जो व्यक्ति सत्ता में आया, वही भ्रष्टाचार का संरक्षक बन गया। पटना में नीतीश के शपथ ग्रहण समारोह में खिलखिलाते हुए लालू के गले लगना, कोई  आकस्मिक संयोग नहीं था। कहीं न कहीं दोनों की केमिस्ट्री मैच कर रही थी। 
अपनी हर कमजोरी के उजागर होने पर सारा दोष प्रधान मंत्री के सिर मढ़ देने की केजरीवाल की फितरत है। उनके मंत्री मिस्टर तोमर डिग्री के फर्जिवाड़े में पकड़े गए और गिरफ़्तार किए गए। इसे मोदी की साज़िश कहा गया। सोमनाथ भारती ने अपनी पत्नी को कुत्ते से कटवाया, बेल्ट से मारा, पत्नी ने एफ़.आई.आर. दर्ज़ कराकर न्याय की गुहार की। इसमें भी केजरीवाल को मोदी का षडयंत्र नज़र आया। शुरु में केजरीवाल उपराज्यपाल नज़ीब जंग से ही जंग करते नज़र आए, लेकिन शीघ्र ही उन्हें ज्ञात हो गया कि नज़ीब जंग बहुत बड़े पहलवान नहीं हैं। उनसे लड़ने में बहुत ज्यादा प्रसिद्धि नहीं मिल रही थी। अतः उन्होंने सबसे बड़े पहलवान का चुनाव किया और मोदी से ही जंग छेड़ दिया। ताज़ा घटना उनके प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार के घर और कार्यालय पर सीबीआई द्वारा डाले गए छापे की है। छापा डालने के पूर्व सीबीआई ने अदालत से अनुमति भी ली थी। एक भ्रष्ट अधिकारी के बचाव में उतरे केजरीवाल ने शालीनता की सारी सीमायें लांघते हुए प्रधान मंत्री को  कायर और मनोरोगी तक कह डाला। अगर ऐसा वक्तव्य लालू ने दिया होता, तो कोई आश्चर्य नहीं होता। उन्होंने तो अन्ना के खिलाफ बोलते हुए उनके ब्रह्मचर्य पर भी सवाल उठाए थे। लालू विदूषक ज्यादा हैं, नेता कम। लेकिन एक आई.आई.टी. का ग्रेजुएट गाली-गलौज की भाषा का प्रयोग करेगा और वह भी जनता द्वारा चुने गए भारत के लोकप्रिय प्रधान मंत्री के लिए, अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है। 
अब हम केजरीवाल जी के मित्र, उनके प्रधान सचिव, श्री श्री १०८ राजेन्द्र बाबा के बारे में जानकारी देना अपना फ़र्ज़ समझ रहे हैं।
*४८ वर्षीय राजेन्द्र कुमार सीएम केजरीवाल के प्रधान सचिव है।
* आईआईटी खड़गपुर से बी.टेक. करने वाले राजेन्द्र १९८९ बैच के आईएएस अधिकारी हैं।
* इसी साल फरवरी में दिल्ली के मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के रूप में नियुक्त हुए।
* शहरी विकास विभाग में सचिव रह चुके हैं। ऊर्जा-ट्रांसपोर्ट जैसे विभाग भी संभाल चुके हैं।
* राजेन्द्र, केजरीवाल के सबसे विश्वासपात्र अधिकारी हैं।
* केजरी ने एल.जी. की सलाह को अनदेखा करते हुए उन्हें अपना प्रधान सचिव बनाया।
* आईआईटी, खड़गपुर में पढ़ते समय ही दोनों एक-दूसरे के काफी करीब थे, लेकिन पढ़ने में वे केजरी से तेज थे इसीलिए उनका चुनाव आएएस में हुआ और केजरी का एलाएंस सर्विसेज में।
* केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार चर्चित घोटालेबाज रहे हैं।
* उनके खिलाफ़ भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) में २०१२ तक सात शिकायतें दर्ज़ थीं, उस समय मोदी पीएम नहीं थे। 
* पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल में हुए सीएनजी घोटाले में शामिल अभियुक्तों की सूची में उनका नाम शीर्ष पर है। 
* शिक्षा और आईटी विभाग में रहते हुए एक निजी कंपनी से रिश्वत लेकर लाभ पहुँचाने का भी उनपर आरोप है। 
* अलग-अलग विभाग में रहते हुए राजेन्द्र कुमार ने कई कंपनियों की स्थापना कराई; फिर बिना टेंडर के उन्हें काम दिया और जी भरकर सरकारी खजाने को लूटा।
राजेन्द्र कुमार के राजधानी और उत्तर प्रदेश के ठिकानों पर छापा मारकर सीबीआई ने अबतक १६ लाख की अवैध संपत्ति बरामद की है। इनमें से २ लाख रुपए नकद और ३ लाख की विदेशी मुद्रा शामिल है।
ऐसे भ्रष्ट अधिकारी के आवास और कार्यालय पर छापे को मुख्यमंत्री कार्यालय पर छापे के रूप में प्रचारित किया गया। छापे के तुरन्त बाद केजरी महाशय  प्रेस कान्फ़ेरेन्स करते हैं और गंवार लालू की तरह प्रधान मंत्री को गाली देते हैं। प्याज के छिलके की भाँति केजरी के चेहरे से एक-एक करके ईमानदारी की परतें उतरती जा रही हैं। मुझे और किसी की फ़िक्र नहीं है। फ़िक्र है तो बस अन्ना की। अपने प्रिय शिष्य की हरकतों के कारण उन्हें कही हृदयाघात न हो जाय!

Thursday, December 3, 2015

सहिष्णुता और द्रौपदी

         शान्ति का प्रस्ताव लेकर श्रीकृष्ण हस्तिनापुर जाने के लिए तैयार हो गए थे। सिर्फ पाँच गाँवों के बदले शान्ति के लिए पाण्डवों ने स्वीकृति दे दी थी। द्रौपदी को यह स्वीकार नहीं था। १३ वर्षों से खुली केशराशि को हाथ में पकड़कर उसने श्रीकृष्ण को दिखाया। नेत्रों में जल भरकर वह बोली --
“कमलनयन श्रीकृष्ण! मेरे पाँचों पतियों की तरह आप भी कौरवों से संधि की इच्छा रखते हैं। आप इसी कार्य हेतु हस्तिनापुर जाने वाले हैं। मेरा आपसे सादर आग्रह है कि अपने समस्त प्रयत्नों के बीच मेरी इस उलझी केशराशि का ध्यान रखें। दुष्ट दुःशासन के रक्त से सींचने के बाद ही मैं इन्हें कंघी का स्पर्श दूँगी। यदि महाबली भीम और महापराक्रमी अर्जुन मेरे अपमान और अपनी प्रतिज्ञा को विस्मृत कर, युद्ध की विभीषिका से डरकर कायरता को प्राप्त कर संधि की कामना करते हैं, तो करें। धर्मराज युधिष्ठिर की सहिष्णुता तो पूरी कौरव सभा ने देखी। मैं निर्वस्त्र की जा रही थी; वे शान्त बैठे रहे। आपने भी पाँच गाँवों के बदले शान्ति के प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी है। अपमान की प्रचंड अग्नि में जलते हुए मैंने १३ वर्षों तक प्रतीक्षा की है। आज मेरे पाँचों पति कायरों की भांति संधि की बात करते हैं। वे सहिष्णुता की आड़ में नपुंसकता को प्राप्त हो रहे हैं। मेरे अपमान का बदला मेरे वृद्ध पिता, मेरा पराक्रमी भ्राता, मेरे पाँच वीर पुत्र और अभिमन्यु लेंगे। वे कौरवों से जुझेंगे और दुःशासन की दोनों सांवली भुजाएं तथा मस्तक को काट, उसके शरीर को मेरे समक्ष धूल-धूसरित कर मेरी छाती को शीतलता प्रदान करेंगे।"
---- ‘महाभारत’, विराट पर्व

Saturday, November 28, 2015

बच्चा पैदा करने वाली मशीन

         केरल के मशहूर सुन्नी मुस्लिम धर्मगुरु कांथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार ने कल दिनांक २८, नवंबर, २०१५ को कोझिकोड में मुस्लिम स्टूडेंट फ़ेडेरेशन के एक कैंप को संबोधित करते हुए कहा कि महिलाएं कभी पुरुषों के बराबर नहीं हो सकतीं, क्योंकि वे केवल बच्चों को पैदा करने के लिए बनी हैं। उन्होंने कहा कि लैंगिक समानता की अवधारणा गैर इस्लामिक है। आल इंडिया सुन्नी जमीयत उल उलेमा के प्रमुख मुसलियार ने कहा कि महिलायें मानसिक तौर पर मज़बूत नहीं होती हैं और दुनिया को नियंत्रित करने की ताकत सिर्फ मर्दों में है। लैंगिक समानता कभी हकीकत नहीं बन सकता। यह इस्लाम और मानवता के खिलाफ होने के साथ ही बौद्धिक रूप से भी गलत है। 
इसके उलट सनातन धर्म की अवधारणा है कि “यत्र नारी पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।" जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है। अगर ऐसा बयान किसी हिन्दू धर्म गुरु ने दिया होता तो कल्पना कीजिए हिन्दुस्तान के न्यूज चैनल और धर्मनिरपेक्ष क्या कर रहे होते? टीवी पर कितने डिबेट चल रहे होते, कितने फिल्म सितारे भारत छोड़ने का बयान दे रहे होते और कितने प्रगतिशील गंगा-जमुनी तहज़ीब को बचाने के लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे होते? यह गंगा-जमुनी कौन सी तहज़ीब है, मेरी समझ में आज तक नहीं आया। मेरी जो छोटी समझ है उसके अनुसार गंगा की पहचान देवाधिदेव महादेव से है और जमुना की पहचान योगीराज श्रीकृष्ण से है। भारत की पूरी संस्कृति ही गंगा और जमुना के किनारे विकसित हुई है और इस संस्कृति ने औरत को कभी हीन नहीं माना। गार्गी ने वेद की ऋचाएं रची, दुर्गा ने असुरों का संहार किया, सरस्वती ने विद्या दी और लक्ष्मी ने विश्व को धन-संपदा। आज के युग में भी अहिल्या बाई ने आदर्श राज्य-व्यवस्था की नींव रखी, तो लक्ष्मी बाई ने पराक्रम और शौर्य का नया इतिहास रचा। नारी का दर्ज़ा पुरुषों के बराबर नहीं, उनसे कहीं ऊँचा है।

भारत-पाक क्रिकेट शृंखला

              समझ में नहीं आता है कि पाकिस्तान के साथ क्रिकेट सीरीज न खेलने से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पेट में दर्द क्यों होने लगता है! दुनिया में बहुत-से क्रिकेट खेलने वाले देश हैं। हम उनके साथ नियमित रूप से क्रिकेट खेलते हैं। पाकिस्तान में कौन सुर्खाब के पंख लगे हैं कि हम कुछ ही समय के बाद उसके साथ क्रिकेट खेलने के लिए बेताब हो जाते हैं। खेल को राजनीति के साथ भले ही न जोड़ा जाए, लेकिन देश की सुरक्षा और स्वाभिमान की कीमत पर हम अपने दुश्मन देश को वह वरीयता नहीं दे सकते, जो एक मित्र देश को देते हैं। फिर, भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट कभी खेल भावना से खेला भी नहीं जाता है। मुझे याद है कि एक बार भारत की टीम पाकिस्तान गई थी। गावास्कर भी उस टीम में थे। भारत की टीम बुरी तरह हारी थी। शृंखला के अन्त में पाकिस्तान के कप्तान इमरान खान ने वक्तव्य दिया था कि कश्मीर के भाग्य का फ़ैसला क्यों नहीं हम क्रिकेट-सीरीज खेल कर तय कर लें। भारत चुप था, क्योंकि वह शृंखला हार चुका था। पाकिस्तान और कश्मीर सहित भारत के कुछ हिस्सों में लगातार कई दिनों तक जश्न मनाया जाता रहा। अभी एक सीरीज दक्षिण अफ्रीका के साथ चल रही है। भारत सीरीज जीत चुका है, लेकिन कहीं जश्न का माहौल नहीं है। अच्छा खेलने वाली टीम जीत रही है। जीतने वाली टीम खुश तो हो रही है, लेकिन प्रतिद्वंद्वी टीम के दिल को कोई बात छू जाय, ऐसा वक्तव्य कप्तान, कोच या कोई खिलाड़ी नहीं दे रहा है। विरोधी टीम भी बहुत नपा-तुला और समझदारी का बयान दे रही है। दोनों पक्ष के खिलाड़ियों में भी कोई कटुता नहीं है। परन्तु पाकिस्ता के साथ भी क्या क्रिकेट मैच इसी खेल भावना के साथ खेलना संभव है? कदापि नहीं। भारत और पाकिस्ता के बीच क्रिकेट का खेल युद्ध के रूप में लड़ा जाता है। भारत की जनता और खिलाड़ी भी हर मैच युद्ध की भावना से खेलते हैं। न चाहते हुए भी सबके मन-मस्तिष्क में कश्मीर, आतंकवाद, १९६५, १९७१ और कारगिल युद्ध घर कर जाता है। पाकिस्तान की जनता और खिलाड़ी भी इन घटनाओं को जेहन में रखकर ही खेलते हैं। कुछ पाकिस्तान परस्त लोग कहते हैं कि क्रिकेट से दोनों देशों के लोग करीब आते हैं। यह सरासर गलत है। हम लोग भारत और पाकिस्तान में दर्जनों सीरीज खेल चुके हैं। अगर ऐसा होता, तो कम से कम आतंकवाद तो समाप्त हो गया होता। सच्चाई यह है कि हर मैच के बाद दूरियां और बढ़ जाती है। पाकिस्तान के साथ उसके जन्म के बाद से लेकर आजतक कभी नज़दीकी रही नहीं। सबसे दुःख की बात यह है कि पाकिस्ता से मैच के बाद भारत की दो कौमों के बीच दूरी और बढ़ जाती है। पाकिस्तान की जीत के बाद जब हिन्दुस्तान में आतिशबाज़ी होने लगती है, तो बहुसंख्यकों के मन में एक वितृष्णा स्वभाविक रूप से घर कर जाती है। मैच के दौरान भी सारा हिन्दुस्तान उच्च रक्तचाप का मरीज नज़र आता है। ऐसी सीरीज खेलने से क्या लाभ?
अभी कुछ दिन पहले तुर्की ने रूस का एक विमान मार गिराया। तुर्की का बहिष्कार करने का सरकार ने कोई फ़रमान नहीं निकाला। लेकिन रूस की देशभक्त जनता ने स्वयं की प्रेरणा से तुर्की का बहिष्कार किया। बड़ी संख्या में रूसी पर्यटक तुर्की जाते हैं; रुसियों ने तुर्की के किए वीजा मांगना बंद कर दिया और तुर्की के सामान का बहिष्कार शुरु कर दिया। एक हम हैं कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों और कलाकारों के लिए पलक-पावड़े बिछाने के लिए हमेशा प्रस्तुत रहते हैं। हम भूल जाते हैं कि यह पाकिस्तान ही है जिसने १९४७ से लेकर आजतक हमपर युद्ध थोपकर हमें बर्बाद करने की कोशिश की है। युद्ध में बार-बार मुंह की खाने के बाद आतंकवाद के माध्यम से हमारी शान्ति, हमारी सुरक्षा और हमारे भाईचारे को लगातार चुनौती देता रहा है। हमारे असंख्य जवान और जनता आतंकवाद की बलि चढ़ चुकी है। लेकिन बीसीसीआई को इससे क्या मतलब? उसे तो अपनी कमाई से मतलब है। पता नहीं यहां के क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष, पाकिस्तानी समकक्ष के साथ दुबई में क्या समझौता कर आए हैं कि श्रीलंका में सीरीज खेलने पर सहमति बन गई। सेक्युलरिस्टों के विरोध और बिहार में पराजय से डरी केन्द्र सरकार इस सीरीज के लिए अनुमति दे देगी, इसकी पूरी संभावना है। मोदी सरकार भी मन मारकर कांग्रेस की ही नीतियों पर चलने लगी है। लेकिन बिना सामान्य संबन्धों के पाकिस्तान के साथ कोई सीरीज खेलना देशहित में नहीं होगा। हम करोड़ों देशवासियों को उच्च रक्तचाप और हृदयाघात का मरीज बनाने का समर्थन नहीं कर सकते।

Saturday, November 21, 2015

नीतीश को ताज, लालू को राज (समापन किश्त)

४. नीतीश की छवि -- अभीतक नीतीश कुमार की छवि एक साफ-सुथरे और ईमानदार प्रशासक की रही है। उनके द्वारा मनोनीत मुख्यमंत्री जीतन राम के बड़बोलेपन से बिहार का बुद्धिजीवी वर्ग प्रसन्न नहीं था। जीतन राम को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बनने की घटना को बिहार के बाहर नीतीश की सत्तालोलुपता के रूप में देखा गया, लेकिन बिहार की जनता ने इस घटना को इस रूप में नहीं लिया। जनता ने नीतीश की वापसी पर राहत की साँस ली। अपने शासन-काल में नीतीश ने मुस्लिम लड़कियों और कमजोर वर्ग की लड़कियों के लिए हाई स्कूल के बाद १५००० रुपए की अनिवार्य छात्रवृत्ति लगातार दिलवाई, सूबे की सभी लड़कियों को सायकिल और यूनिफार्म मुफ़्त में मुहैय्या कराई तथा वृद्धा्वस्था पेंशन नियमित रूप से बंटवाई। इसका श्रेय लेने का भाजपा के सुशील मोदी ने भी प्रयास किया, परन्तु मुख्यमंत्री होने के कारण लोगों ने इसका श्रेय नीतीश को ही दिया। विकास के नाम पर कुछ विशेष तो नहीं हुआ, परन्तु बड़े पैमाने पर सड़कों का कायाकल्प अवश्य हुआ। आज की तिथि में बिहार की सड़कें उत्तर प्रदेश की तुलना में कई गुना अच्छी हैं। इन सबका श्रेय नीतीश ने अपने योजनाबद्ध प्रचार के कारण स्वयं लेने में सफलता प्राप्त की। लालू के भ्रष्टाचार की कहानी नीतीश के कारण ज्यादा चर्चा में नहीं आ सकी। 
५. दाल और प्याज - चुनाव में भाजपा की अलोकप्रियता के लिए रही-सही कसर दाल और प्याज ने पूरी कर दी। १५ साल पहले दिल्ली में प्याज ने भाजपा को खून के आँसू रुलाया था। उस समय भाजपा सत्ता से बेदखल क्या हुई, दिनानुदिन कमजोर होती चली गई और आज भी दिल्ली के भाजपाई मुख्यमंत्री की कुर्सी को हसरत से देखने के अलावे कुछ नहीं कर पा रहे। दाल और प्याज की महंगाई ने जन असंतोष की आग में घी का काम किया। हालांकि इस महंगाई के लिए राज्य सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं थी, लेकिन नीतीश और विशेष रूप से लालू ने बिहार की जनता से ठेठ देहाती में सीधा संवाद स्थापित करके केन्द्र सरकार को मुज़रिम बना दिया। आश्चर्य है कि जो दाल ८ नवंबर के पहले जिस खुदरा दुकान में २१० रुपए प्रति किलो की दर से बिक रही थी,  उसी दुकान में ९ नवंबर को १६० रुपए प्रति किलो बिकी। मैंने खुद खरीदा। यह महंगाई प्रायोजित थी या स्वाभाविक - राम जाने। चुनाव के बाद पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकारों के तेवर की तरह प्याज का भाव भी शान्त हो गया। इसका भाव अचानक ८० से घटकर ३०-३५ रुपए पर आ गया।
६. सरकारी तंत्र का सदुपयोग -- चुनाव परिणाम अपनी मर्जी के अनुसार मैनेज करने में लालू सिद्धहस्त हैं। यह कला उन्होंने ज्योति बसु से सीखी थी। १५ सालों तक उन्होंने इसी के बल पर बिहार में एकछत्र राज किया। EVM आ जाने और राष्ट्रपति शासन में चुनाव होने के कारण १५ वर्षों के बाद बिहार में लालू की भयंकर  पराजय हुई थी। इस बार लालू की सलाह पर सरकारी तंत्र का सत्ता के लिए अच्छा उपयोग किया गया। चुनाव की अधिसूचना के पहले बिहार के सभी ३१ जिलों में मन पसंद जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षकों की तैनाती की गई। मतगणना में तैनात कई सरकारी अधिकारियों से मैंने बात की। नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि मतगणना के समय कई EVM के कवर खुले और सील टूटी पाई गई। उन्होंने रिटर्निंग आफिसर (जिलाधिकारी) को दिखाया भी, परन्तु आर.ओ. ने वैसे EVM  में पड़े मतों की भी गणना जारी रखने का आदेश दिया। ज्ञात हो कि सिवान जिले के जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी - दोनों ही यदुवंशी हैं। अधिकांश बूथों पर प्रिजाइडिंग आफिसर से प्राप्त मतों के विवरण और EVM के द्वारा गिने गए मतों में भिन्नता पाई गई। ऐसे में मतगणना रोक दी जाती है, परन्तु वरिष्ठ मतगणना पर्यवेक्षक द्वारा ध्यान आकर्षित करने के बावजूद भी जिलाधिकारी के निर्देश पर मतगणना जारी रही। चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक जिलाधिकारी द्वारा दी गई रात्रि-पार्टियों से अनुगृहित थे। प्रत्येक चरण की मतगणना के बाद यह तो बताया जा रहा था कि फलाँ प्रत्याशी आगे चल रहा है लेकिन विभिन्न प्रत्याशियों द्वारा प्राप्त मतों को बोर्ड पर प्रदर्शित नहीं किया जा रहा था। अब मुझे भी कुछ-कुछ समझ में आने लगा है कि ८ नवंबर को दिन के १०.१५ बजे दो तिहाई बहुमत की ओर अग्रसर भाजपा गठबंधन १०.२० पर अचानक पीछे क्यों हो गया। CNN और ETV को पहले ही मैनेज कर लिया गया था। प्रसिद्ध टीवी एंकर रवीश कुमार ने भी प्रसारण के दौरान ही १० मिनट के अंदर परिणामों में उलटफेर पर घोर आश्चर्य व्यक्त किया था। दिन के १०.२५ बजे महागठबंधन दो तिहाई बहुमत के पास था और भाजपा औंधे मुंह गिर चुकी थी। चुनाव आयोग ने चुनाव तो निष्पक्ष कराए पर मतगणना में निष्पक्षता बरकरार नहीं रख सका। EVM के खुले कवर और टूटी सीलें, चिप्स के हेरफेर की ओर संकेत तो करते ही हैं। कुछ भी हो, लालू अपना खोया साम्राज्य पाने में सफल तो हो ही गए। किसी ने सच ही कहा है - खुदा मेहरबान, तो गधा पहलवान। सेक्युलरिस्टों के २०% खुदा तो लालू के साथ हमेशा रहते हैं।
    (समाप्त)