Saturday, November 21, 2015

नीतिश को ताज, लालू को राज (दो किश्तों में समाप्य)


                                                                      (१)
       दिवाली और छठ मनाने के लिए मैं करीब १२ दिन बिहार के सिवान जिले में स्थित अपने गांव, बाल बंगरा (महाराजगंज) में रहा। इस प्रवास का उपयोग मैंने बिहार-चुनाव के परिणामों के अध्ययन और समीक्षा के लिए किया। इस दौरान मैंने अलग-अलग तबकों के सैकड़ों लोगों और चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों से बातें की। नीतिश-लालू की शानदार जीत और भाजपा की निराशाजनक हार के पीछे जो कारण वहां के लोगों ने बताये, उन्हें लिपिबद्ध करने का प्रयास कर रहा हूं।
१. मोहन भागवत का बयान - लालू यादव एक बहुत ही चतुर राजनेता हैं। उनपर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो चुके हैं और वे जेल भी जा चुके हैं। उनकी शुरु से ही रणनीति थी कि बिहार की जनता का ध्यान भ्रष्टाचार के मुद्दे से हटाकर जातिवाद पर केन्द्रित किया जाय। पिछड़ों को लामबंद करने के लिए ही उन्होंने नीतिश का जहर पीया और मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रुप में उनके नाम को स्वीकार किया। नीतिश और लालू -- दोनों के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न था। दोनों ने जमकर पिछड़ा कार्ड खेला। पिछले १० वर्षों से एक-दूसरे के काफी करीब आ चुके अगड़े और पिछड़ों के बीच एक चौड़ी और गहरी खाई खोदने के लिए लालू काफी कोशिशें कर रहे थे, लेकिन मोदी के राष्ट्रवाद के आगे कुछ अधिक सफल प्रतीत नहीं हो रहे थे। अचानक आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए गए बयान ने उन्हें संजीवनी प्रदान कर दी। मोहन भागवत ने वर्तमान आरक्षण-नीति की समीक्षा की बात कही थी। उनका उद्देश्य था कि इसकी समीक्षा इस तरह की जाय कि उसका लाभ उन वंचित लोगों को भी प्राप्त हो, जिन्हें अभीतक इसका कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ है। गलत समय पर दिया गया यह एक सही बयान था। लालू और नीतिश ने इसे लोक (Catch)  लिया। वे बिहार के पिछड़ों को यह समझाने में सफल रहे कि जिस तरह सोनिया का कहा कांग्रेस नहीं टाल सकती, उसी तरह आर.एस.एस. के चीफ़ की बात भाजपा और मोदी भी नहीं टाल सकते। मोहन भागवत के समीक्षा वाले बयान का इन्होंने आरक्षण खत्म करने के रूप में प्रचारित किया। मीडिया ने भी भरपूर साथ दिया। परिणाम यह रहा कि लालू-नीतिश की जोड़ी संपूर्ण आरक्षित वर्ग (पिछड़ा+दलित) के दिलो-दिमाग में यह भ्रम बैठाने में सफल रहे कि आर.एस.एस. द्वारा संचालित भाजपा के सत्ता में आते ही आरक्षण समाप्त कर दिया जायेगा। यह भ्रम या विश्वास जनता में इतनी गहराई तक पहुंच गया कि दलितों ने राम बिलास पासवान और जीतन राम मांझी पर भी विश्वास नहीं किया। मेरे गांव के समस्त दलित समुदाय ने महा गठबंधन को ही वोट दिया। मोदी और अमित शाह ने डैमेज-कंट्रोल का काफी प्रयास किया, लेकिन तबतक चुनाव सिर पर आ गया। कुछ बुद्धिजीवी पिछड़े, मोदी से भी जुड़े रहे। मेरे गांव में लगभग ४००० मतदाता हैं। इसमें ४०% प्रवासी हैं। कुल २००० वोट डाले गए। गांव में अगड़े मतदाताओं की कुल संख्या मात्र २०० है, लेकिन भाजपा को ८०० मत प्राप्त हुए। स्पष्ट है, भाजपा ने पिछड़ों का भी मत प्राप्त किया, लेकिन जीतने के लिए पर्याप्त संख्या में नहीं।
२. स्थानीय नेतृत्व का अभाव एवं उपेक्षा - भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद के लिए कोई प्रत्याशी ही नहीं था। चुनाव-प्रचार भी आयातित था। नीतिश ने इसे जमकर कैश किया। लोग यह कहते मिले, “मोदी दिल्ली से बिहार के चलइहें का? आम जनता में, चाहे चाहे वह सवर्ण हो या पिछड़ी, नीतिश कुमार की छवि एक साफ-सुथरे नेता और सुशासन बाबू की है। लालू की दागी छवि पर नीतिश की अच्छी छवि हावी रही। पूरे बिहार में दो ही नेताओं के कट-आउट, बैनर और संदेश लगे थे - नीतिश कुमार और नरेन्द्र मोदी के। जनता ने स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा जताया। यह बीजेपी की रणनीतिक विफलता थी।
३. टिकट बंटवारे में गड़बड़ी - Party with a difference का नारा देने वाली पार्टी से यह बोधवाक्य पूरी तरह गायब था। सभी भाजपाई लोकसभा की तरह ही मोदी-लहर के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थे। भाजपा का टिकट, मतलब जीत पक्की। जाहिर है, ऐसे में टिकट पाने के लिए भीड़ तो बढ़ेगी ही और गुणवत्ता भी प्रभावित होगी। टिकट-वितरण में भाजपा ने गुणवत्ता को तिलांजलि दे दी। जिताऊ प्रत्याशी के नाम पर तरह-तरह की धांधली की गई; कुबेरों, बाहुबलियों, दागियों और रिश्तेदारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। कुछ बानगी, अपने जिले से दे रहा हूं --
 (अ) दुरौन्धा विधान सभा  (जिला सिवान) क्षेत्र - यहां से भाजपा के प्रत्याशी थे -- जितेन्द्र सिंह। इनके पिता समीपवर्ती महाराजगंज क्षेत्र से राजद और जनता दल (यू) से कई बार विधायक और सांसद रह चुके हैं। वे एक प्रख्यात बाहुबली थे। उनके पुत्र जितेन्द्र जी उनसे कई कदम आगे हैं। उनपर हत्या और लूट के कई मामले चल रहे हैं। पिछले साल ही ६-७ साल की सज़ा भुगतने के बाद ज़मानत पर छूट कर आए हैं। आते ही चुनावी दंगल में कूद पड़े और कांग्रेस के टिकट पर महाराजगंज संसदीय क्षेत्र से भाग्य आजमाया। मोदी की लहर में ज़मानत ज़ब्त हो गई। इसबार उन्होंने दुरौन्धा विधान सभा क्षेत्र से (इसी क्षेत्र में मेरा भी गांव आता है) भाजपा का टिकट पाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया। दिल्ली में बैठे हिन्दुस्तान के ठाकुरों के तथाकथित स्वयंभू नेता भारत के गृहमंत्री ने ठाकुरों को टिकट दिलवाने में अपने प्रभाव का भरपूर इस्तेमाल किया। जितेन्द्र सिंह को टिकट मिल गया और ४० साल से भाजपा का झंडा ढो रहे जिला भाजपा अध्यक्ष योगेन्द्र सिंह का टिकट कट गया। योगेन्द्र सिंह राम जन्मभूमि आन्दोलन में जेल गए थे, श्रीनगर के लाल चौक में तात्कालीन भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के आह्वान पर तिरंगा फहराने के लिए कश्मीर जाते समय जम्मू में गिरफ़्तार किए गए थे, एक महीना जेल में भी रहे थे। उनका संपर्क घर-घर में है। आर.एस.एस. भी उनको टिकट दिए जाने के पक्ष में था। वे एक साफ-सुथरी छवि वाले, कर्मठ और ईमानदार जन नेता के रूप में पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं लेकिन राजनाथ सिंह के आगे किसी की नहीं चली और एक दलबदलू दागी को भाजपा ने टिकट दे दिया। जितेन्द्र सिंह को स्थानीय जनता ‘जनमरुआ’ (हत्या करनेवाला) के नाम से जानती और पुकारती है। चुनावी दंगल में उन्हें मात मिली। इस टिकट ने पूरे जिले में भाजपा के उम्मीदवारों की चुनावी जीत की संभावना को प्रभावित किया।
(ब) महाराजगंज विधान सभा क्षेत्र - पहले मेरा घर इसी विधान सभा क्षेत्र में आता था। नए परिसीमन में दुरौन्धा में चला गया। महाराजगंज शहर से सटे पूरब में मेरा गांव है। यहां से देवरंजन सिंह भाजपा के प्रत्याशी थे। पेशे से वे डाक्टर हैं। जनसेवा करके वे आसानी से जनता में अपनी पैठ बना सकते हैं, लेकिन सामन्तवादी प्रवृत्ति के धनी देवरंजन जी अपनी बिरादरीवालों को छोड़, किसी और को प्रणाम भी नहीं करते हैं। उनकी एकमात्र योग्यता यह है कि वे पूर्व केन्द्रीय मंत्री और बिहार भाजपा के पूर्व अध्यक्ष सी.पी. ठाकुर के दामाद हैं। रिश्तेदारों को टिकट देने का खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा। जनता ने उन्हें ठुकरा दिया।
(स) रघुनाथपुर - इस क्षेत्र से भाजपा ने अपने निवर्तमान विधायक विक्रम कुँवर का टिकट काटकर बाहुबली और दागी छवि वाले मनोज सिंह को टिकट दिया। विक्रम कुँवर क्षेत्र के लोकप्रिय नेता हैं और कई बार विधायक रह चुके हैं, परन्तु वे भी राजनाथ सिंह की पसंद नहीं थे। भाजपा ने यह सीट भी गँवा दी।
बड़हरिया विधान सभा क्षेत्र में भी भाजपा ने एक दागी बाहुबली के भाई को टिकट दिया। परिणाम वही - ढाक के तीन पात।
विधान सभा चुनाव में बिहार की भाजपा “Party with a difference" की छवि खो चुकी थी। लोग इस नारे को दुहराकर हँस रहे थे।
     ----- शेष अगले अंक में


Sunday, November 1, 2015

पुरस्कार वापसी का सच

     प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय लेखिका तसलीमा नसरीन ने दिनांक २९.१०.१५ को अपने एक बयान में कहा है कि पहले मुझे लग रहा था कि सच में साहित्यकार पुरस्कार वापिस करके अपने दुख की अभिव्यक्ति कर रहे हैं, परन्तु अब भारत में जिस तरह से पुरस्कार वापिस किए जा रहे हैं और जो कारण दिया जा रहा है, सच में ये सब भारत सरकार के विरोधियों का एक षड्यंत्र है, ताकि भारत यूनाइटेड नेशन में स्थाई सदस्य न बन सके।
तसलीमा की बातों में गहराई और सच्चाई है। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों को देश के वातावरण में कथित सांप्रदायिकता और असहिष्णुता से बहुत तकलीफ है, मानो भारत ईरान, सऊदी अरब, पाकिस्तान या बांग्ला देश बन गया हो। पिछले सप्ताह ईरान में दो कवियों को ९९ कोड़े लगाए जाने की सज़ा सिर्फ इसलिए सुनाई गई कि इन कवियों ने गैर मर्द और गैर औरत से हाथ मिलाये थे। इन कवियों के नाम हैं - फ़ातिमे एखटेसरी और मेहंदी मूसावी। पिछले शनिवार को ढाका में हत्या के शिकार लेखक और ब्लागर अविजित राय के साथ काम करनेवाले एक प्रकाशक की कट्टरपंथियों ने गला काट कर हत्या कर दी। वहीं इससे कुछ घंटे पहले ही दो सेक्यूलर ब्लागरों और एक अन्य प्रकाशक पर जानलेवा हमला हुआ। दुनिया भर के अखबारों में घटना की चर्चा हुई, तस्वीरें भी छपीं, लेकिन भारत के इन बुद्धिजीवियों ने संवेदना या निंदा का एक शब्द भी उच्चारित किया। पुरस्कार वापस करने वाले तमाम बुद्धिजीवी बुजुर्ग हैं। इन सबने इमरजेन्सी देखी है। तब इन्दिरा गांधी ने सारे मौलिक अधिकार समाप्त कर दिए थे। उस समय न किसी को जुलूस निकालने का अधिकार था, न सभा करने का, न स्वतंत्र चिन्तन का, न बोलने का और न ही लिखने का। कुलदीप नय्यर की पुस्तक ‘The Judgement'  इन्दिरा गांधी, कांग्रेस और इन सत्तापोषित बुद्धिजीवियों का कच्चा चिट्ठा है। किस तरह संजय गांधी ने परिवार नियोजन के नाम पर नाबालिग बच्चों की भी नसबन्दी कराई थी, कम से कम चांदनी चौक, जामा मस्ज़िद और तुर्कमान गेट के वासिन्दे क्या अबतक भूल पाए हैं? ये बुद्धिजीवी उस समय इन्दिरा गांधी के सम्मान में कसीदे काढ़ रहे थे। १९८४ में हजारों सिक्खों को कांग्रेसियों ने मौत के घाट उतार दिया, बिहार के जहानाबाद में लालू के राज के दौरान दलितों का नरसंहार हुआ, भागलपुर में भयंकर दंगा हुआ, गोधरा में सन् २००२ में साबरमती एक्स्प्रेस की बोगियों में आग लगाकर सैकड़ों तीर्थयात्रियों को जिन्दा जला दिया गया, कश्मीर में हजारों हिन्दुओं की हत्या की गई, बहु-बेटियों से बलात्कार किया गया और अन्त में पूरी कश्मीर-घाटी के हिन्दुओं को भगाकर देश के दूसरे भागों में शरणार्थी बना दिया गया; इन बुद्धिजीवियों ने चूं तक नहीं की। देश का सांप्रदायिक माहौल खराब करने के लिए श्रीनगर, कलकत्ता, दिल्ली, चेन्नई, बंगलोर इत्यादि शहरों में विज्ञापित करके सड़क के बीचोबीच मीडिया के कैमरों के सामने ‘बीफ’ खाया और परोसा गया; इन बुद्धिजीवियों ने विरोध का एक स्वर भी नहीं निकाला।
सम्मान वापस करने वाले -- सब-के-सब चिर काल से राष्ट्रवादियों का विरोध करते आ रहे हैं। इन्हें सम्मान अच्छे लेखन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद का विरोध और चाटुकारिता के लिए मिला है। ये सभी २००२ से ही नरेन्द्र मोदी का विरोध करते आए हैं। ये वही लेखक हैं, जिन्होंने अमेरीका को पत्र लिखा था कि नरेन्द्र मोदी को वीसा न दिया जाय। चीन, पाकिस्तान, सी.आई.ए. और नेहरू खानदान के लिए काम करने वाले इन (अ)साहित्यकारों ने मोदी को रोकने के लिए पश्चिमी जगत से भी हाथ मिलाया, ईसाई लाबी को भी सक्रिय किया। वाशिंगटन पोस्ट, टाइम्स आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में गत आम चुनाव के पहले मोदी के विरोध में सैकड़ों लेख लिखवाए, लेकिन भारत की जनता ने दिग्भ्रमित हुए बिना मोदी को प्रधान मंत्री बना दिया। २०१४ के जनादेश को न इन  (अ)साहित्यकारों ने स्वीकारा और न इनके राजनीतिक आकाओं ने। ये सभी सियासी लड़ाई हारने के बाद प्रधान मंत्री के खिलाफ़ दुष्प्रचार के जरिए लड़ाई लड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं। दूसरों को असहिष्णु बताने वाले ये (अ)साहित्यकार मोदी के प्रति पूर्वाग्रह और असहिष्णुता के सबसे बड़े शिकार हैं। ये २०१४ के जनादेश को भी हजम नहीं कर पा रहे हैं। सब तरफ से निराश होने के बाद इनके आका राज्यसभा में अपने बहुमत के कारण किसी भी विकास के एजेन्डे का विरोध करने पर आमादा हैं, तो ये वो पुरस्कार, जिसके योग्य ये कभी थे ही नहीं, वापिस करके कम्युनिस्टों, कांग्रेसियों, आतंकवादियों, सांप्रदायिक तत्त्वों और सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता का विरोध करने वाली अन्तर्राष्ट्रीय ताकतों का समर्थन कर रहे हैं। इन (अ)साहित्यकारों का न लोकतंत्र में विश्वास है, न सर्वधर्म समभाव, न शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व और ना ही धार्मिक और वैचारिक सहिष्णुता में तनिक भी आस्था है। अबतक सत्ता की मलाई चाट रहे ये (अ)साहित्यकार अपनी दूकान बंद होने की संभावना के कारण बौखलाहट में विक्षिप्त हो गए हैं।

बांगला देश में तीन ब्लागरों पर हमला, प्रकाशक की हत्या

          बांग्लादेश के दिवंगत लेखक और ब्लागर अविजित राय के साथ काम करनेवाले एक प्रकाशक की अज्ञात हमलावरों ने शनिवार को गला काटकर हत्या कर दी। वहीं इसके कुछ घंटे पहले ही दो सेक्यूलर ब्लागरों और राय के एक अन्य प्रकाशक पर हमला हुआ। ढाका के मध्य शाहबाग इलाके में फ़ैजल आर्फ़ीन दीपान(४३) पर तीसरी मंजिल स्थित उनके आफिस में ही हमला किया गया। यह स्थान उस इमारत के बिल्कुल पास है जहाँ कई महीने तक ज़मीयत-ए-इस्लामी नेताओं और १९७१ के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों से सांठगांठ करनेवाले कट्टरपंथियों की फांसी की सज़ा की मांग को लेकर प्रदर्शन हुए थे।
     -- अमर उजाला, ०१-११-२०१५
           इस समाचार को बिकाऊ टीवी मीडिया ने प्रसारित नहीं किया और न ही इसपर किसी तथाकथित सेक्यूलर बुद्धिजीवी ने अपनी छाती पीटी। कलकत्ता, बंगलोर, चेन्नई, दिल्ली और श्रीनगर में सड़कों पर ठेला लगाकर सार्वजनिक रूप से "बीफ" खानेवालों ने एक बूंद घड़ियाली आँसू भी नहीं बहाया। यही चरित्र और आचरण है इन तथाकथित सेक्यूलरिस्टों और पुरस्कार वापस करने वाले कांग्रेस पोषित  बुद्धिजीवियों का।

Tuesday, October 13, 2015

महात्मा गांधी, महामना मालवीय और डा. हेडगेवार


            गांधीजी न तो दयानन्द और अरविन्द के समान मेधावी पंडित एवं बहुपठित विद्वान्‌ थे, न उनमें विवेकानन्द की तेजस्विता थी। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह - ये, जो हिन्दू संस्कृति के सदियों से आधार-स्तंभ थे, उन्होंने अपने जीवन में साकार किया। वे जो कहते थे, वही करते थे। साधनापूर्वक उन्होंने सभी प्राचीन सत्यों को अपने जीवन में उतारकर संसार के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि जो उपदेश अनन्त काल से दिए जा रहे हैं, वे सचमुच ही जीवन में उतारे जाने योग्य हैं। उनके इन्हीं गुणों के कारण भारत का विशाल जनमानस उनका अनुयायी और परम भक्त बन गया, जिसका लाभ कांग्रेस और पूरे देश को आज़ादी प्राप्त करने में मिला। उन्होंने कई बार स्वयं को सनातनी हिन्दू घोषित किया था, पर उनका हिन्दुत्व किसी धर्म का विरोधी नहीं था। वे "ईश्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान" में हृदय से विश्वास करते थे और हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। इसके लिए कई बार हिन्दुओं को रुष्ट करके भी उन्होंने मुसलमानों का समर्थन किया था, खिलाफ़त आन्दोलन का समर्थन और देश के विभाजन को स्वीकार कर लेना, उनके उदाहरण हैं। उन्हें अन्त अन्त तक भी यह विश्वास था कि वे मुसलमानों का हृदय परिवर्तन करने में सफल  होंगे। लेकिन मुसलमानों ने जिन्ना के प्रचार पर अधिक विश्वास किया और कांग्रेस से अधिक मुस्लिम लीग का साथ दिया। गांधीजी राजनीति में भी शुचिता के प्रबल समर्थक थे लेकिन उनकी ही पार्टी कांग्रेस ने आज़ादी के बाद इससे किनारा कर लिया। आज की तिथि में विश्व गांधीवाद से ज्यादा प्रभावित है, भारत कम।
            महामना मालवीय गांधीजी के समकालीन थे। उनमें दयानन्द और अरविन्द का मेधावी पांडित्य तथा विवेकानन्द की तेजस्विता, एक साथ थी। वे एक बड़े ही ओजस्वी वक्ता थे। उनमें अद्भुत राजनीतिक सूझबूझ थी। अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वे चार बार अध्यक्ष रहे। वे भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ रहे पश्चिमी प्रभाव से वे आहत थे। भारतीय मूल्यों के आधार पर आधुनिक और परंपरागत शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने राजनीति छोड़कर भविष्य-निर्माण का संकल्प लिया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना करके उन्होंने इसे साकार भी किया। वे एक कट्टर हिन्दू थे, लेकिन, उनका हिन्दुत्व सर्वधर्म समभाव, धार्मिक सहिष्णुता और शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व में विश्वास करता था। उन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय के माध्यम से हिन्दू जागरण का ऐसा केन्द्र खड़ा किया जो आनेवाली कई पीढ़ियों को नई दिशा प्रदान करता रहेगा।
            डा. केशव बलिराम हेडगेवार महात्मा गांधी और महामना मदन मोहन मालवीय के समकालीन थे। आरंभ में वे कांग्रेस के कार्यकर्ता थे। बाद में उन्होंने महसूस किया कि हिन्दू अपने दुश्मन आप हैं। वे जातिवाद, छूआछूत, भाषा, प्रान्त और ऊँच-नीच की सीमा में इस तरह विभाजित हैं कि सिर्फ शव की अन्तिम यात्रा में ही वे एक दिशा में चलते हैं। बाकी समय कई पंथों और संप्रदायों में बँटे हिन्दू अपनी-अपनी डफली अलग-अलग बजाते हैं। इनकी बुराइयों को दूर करके इन्हें एक मज़बूत संगठन की डोर से बांधने की आवश्यकता उन्हें महसूस हुई। देश की आज़ादी हो या भविष्य का निर्माण, इसके लिए जिस शक्तिशाली और चरित्रवान हिन्दू की कल्पना स्वामी विवेकानन्द ने की थी उसको मूर्त रूप देने के लिए डा. हेडगेवार ने सन्‌ १९२५ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। भारत में जितने भी गैर हिन्दू हैं, लगभग वे सभी (९८%) हिन्दू से ही धर्मान्तरित हैं। हिन्दुस्तान में रहनेवाले सभी लोगों के पुरखे एक ही थे और संस्कृति, सभ्यता भी एक ही थी। हालांकि इस तथ्य को गांधी, जिन्ना और इकबाल भी जानते थे, लेकिन सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार करने या उद्गोषणा करने से अपने को दूर रखते थे। डा. हेडगेवार ने साह्स और पूर्ण दृढ़ता से यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से देश और विश्व के सामने रखी। उनके अनुसार भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है, जो इस देश को अपनी मातृभूमि, भारत माता को अपनी माता को  मानता है तथा इस मातृभूमि को देवभूमि मानते हुए इसे परम वैभव के शिखर पर पहुंचाने के लिए तन, मन और धन से पूर्णरूपेण समर्पित हो। हिन्दुत्व में घुस आई जाति, छूआछूत, भाषावाद, प्रान्तवाद, संप्रदायवाद आदि बुराइयों को दूर करते हुए एक शक्तिशाली हिन्दू संगठन ही उनका अभीष्ट था। उन्होंने जो बिरवा १९२५ में लगाया था, आज वटवृक्ष बनकर विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के रूप में खड़ा है। इस संगठन पर आज़ादी के पहले अंग्रेजों की और उसके बाद कांग्रेस की वक्रदृष्टि हमेशा रही। कांग्रेसी शासन ने तरह-तरह के भ्रामक आरोप लगाकर इसे तीन-तीन बार प्रतिबंधित किया, परन्तु, यह संगठन कुन्दन की भाँति पहले से ज्यादा निखरकर सामने आया। आज यह भारत ही नहीं विश्व के लगभग समस्त हिन्दुओं की आशाओं का एकमात्र केन्द्र बन गया है। देश को दो-दो  अतुलनीय प्रधान मंत्री प्रदान करने के कारण इसकी स्वीकार्यता विश्वव्यापी हो गई है।

  ----  विपिन किशोर सिन्हा, स्वतंत्र चिंतक एवं विचारक

Sunday, August 23, 2015

अतुलनीय मुकेश - न भूतो न भविष्यति

अतुलनीय मुकेश - न भूतो न भविष्यति
(पुण्य-तिथि २५-२६ अगस्त पर विशेष)
      अमर गायक मुकेश उन सौभाग्यशाली कुछ गायकों में एक हैं, जिन्हें फिल्म-जगत में सफलता प्राप्त करने के लिए कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा। शहद मिश्रित स्वर के बेताज बादशाह मुकेश को जब संगीतकार अनिल विश्वास ने पहली बार सुना, तो आश्चर्य से उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई नवागन्तुक, कुंदन लाल सहगल के गाने इतनी सहजता से और स्वर में उसी माधुर्य के साथ गा सकता है! वह ज़माना के.एल.सहगल का था जिनके सामने पंकज मल्लिक और सी.एच.आत्मा जैसे नैसर्गिक प्रतिभा के धनी गायक भी पानी भरते थे। अनिल विश्वास ने मुकेश पर अप्रतिम विश्वास जताते हुए अपने संगीत निर्देशन में बन रही फिल्म ‘पहली नज़र’ में गाने का अवसर दिया। मुकेश ने अपनी सारी प्रतिभा उड़ेल दी उस गाने में। कौन भूल सकता है स्वर-सम्राट मुकेश का वह पहला गीत - “दिल जलता है तो जलने दे, आँसू ने बहा फ़रियाद न कर......!" गाना सुपरहिट हुआ। एक बार सहगल जी ने इस गाने को सुना, तो वे भी आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सके। अपने सेक्रेटरी से उन्होंने पूछा - “यह गाना मैंने कब गाया?" सेक्रेटरी का उत्तर था -“यह गाना आपने नहीं, नवागन्तुक गायक मुकेश ने गाया है।" सहगल ने मुकेश से मिलने की इच्छा जताई। जैसे ही मुकेश को यह समाचार मिला, वे अपने आदर्श कुंदन लाल सहगल से मिलने उनके आवास पर पहुँच गए। सहगल ने उन्हें बार-बार सुना और स्नेह से मुकेश के कंधे पर हाथ रखकर कहा - “अब मैं चैन से मर पाऊँगा। मुझे मेरा उत्तराधिकारी मिल गया। मेरी विरासत सुरक्षित रहेगी।" उन्होंने अपना वह हारमोनियम, जिसपर स्वयं अभ्यास करते थे, मुकेश को सौंप दिया। मुकेश जीवन भर उसी हारमोनियम पर अभ्यास करते रहे। लता मंगेशकर भी सहगल जी की अनन्य प्रशंसिका हैं। वे मुकेश को भी उतना ही पसंद करती हैं। उनका कहना है कि मुकेश जी की आवाज में मुझे के.एल.सहगल की प्रतिछाया दिखाई पड़ती है। जब मुकेश अपने कैरियर के उठान पर थे, सहगल जी का देहावसान हो गया। मुकेश ने सहगल की कमी खलने नहीं दी। वे सभी संगीतकारों के पसंदीदा गायक थे। फिल्म जगत के वे ऐसे एकमात्र गायक/गायिका थे, जिनके गाए लगभग सभी गाने जनता कि जुबान अविलंब पर चढ़ जाते थे।
      समय किसी को भी नहीं बक्शता है। मुकेश को भी ५० के दशक में काफी दिक्कतें आईं। १९४७ में देश के बंटवारे के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के बीच पनपी असुरक्षा की भावना ने फिल्म जगत में भी अपना असर दिखाना शुरु कर दिया। नौशाद, शकील बदायूंनी, दिलीप कुमार (युसुफ़ खान), महबूब इत्यादि नामी-गिरामी हस्तियों ने अपना एक कैंप स्थापित कर दिया जिसे दिलीप कैंप कहा जाने लगा। उस समय फिल्म-जगत में इन लोगों का बोलबाला था। दिलीप कुमार ट्रेजेडी किंग थे और मुकेश थे दर्द भरे गीतों के शहंशाह। मुकेश ने दिलीप कुमार के लिए जितने भी गाने गाए, वे सुपर हिट ही नहीं हुए बल्कि मील के पत्थर साबित हुए। दिलीप कुमार पर मुकेश की आवज़ बहुत फबती थी। फिल्म अन्दाज़ के गाने – तू कहे अगर जीवन भर तुझे गीत सुनाता जाऊँ......., झूम-झूम के नाचो..., मेला का – गाए जा गीत मिलन के....,धरती को आकाश पुकारे....., मेरा दिल तोड़ने वाले.....,यहूदी का - ये मेरा दीवानापन है....., मधुमती का - सुहाना सफ़र और ये मौसम हंसी........, दिल तड़प-तड़प के दे रहा है ये सदा.... इत्यादि को कौन भूल सकता सकता है जो मुकेश की आवाज़ में दिलीप पर फिल्माए गए थे। दिलीप कैंप के उदय के बाद दिलीप कुमार ने मो. रफ़ी का पार्श्वगायन लेना आरंभ कर दिया, लेकिन दिलीप के लिए रफ़ी द्वारा गाए गीत मुकेश द्वारा गाए गीतों की ऊँचाई नहीं प्राप्त कर सके। कारण स्पष्ट था – दिलीप की ट्रेजेडी एक्टिंग में मुकेश का दर्द भरा सहज स्वर एक अद्भुत प्रभाव का सृजन करता था। कैंपबाजी का सर्वाधिक नुकसान हिन्दी फिल्मी संगीत को हुआ। गायिकाओं में भी इस कैंप ने लता के विकल्प के रूप में शमशाद बेगम को प्रोत्साहित किया; लेकिन लता का विकल्प कोई बन सकता है क्या? लता और मुकेश का विकल्प न कभी था और न आगे होगा भी। मुकेश गुमनामी के अंधेरे में गुम होने के कगार पर आ गए थे। भला हो महान कला पारखी राज कपूर का जिसने मुकेश की प्रतिभा को सही ढंग से पहचाना और ‘आग’ से जो सफ़र इन दोनों ने साथ-साथ शुरु किया वह ‘मेरा नाम जोकर’ तक निर्बाध गति से चलता रहा। मुकेश राज कपूर की आवाज़ बन गए। फिल्म आवारा में राज पर फिल्माया गया, शंकर-जयकिशन के संगीत निर्देश्न में मुकेश की आवाज़ में कालजयी गीत ‘आवारा हूँ, आसमान का तारा हूँ, की लोकप्रियता ने देश में ही नहीं विदेश में भी लोकप्रियता के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए। तात्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू जब राजकीय यात्रा पर रूस गए, तो सारे प्रोटोकाल तोड़कर वहाँ की जनता ने “आवारा हूँ, आसमान का तारा हूँ...... समवेत स्वर में गाकर नेहरू जी का स्वागत किया था।

      वैसे तो मुकेश ने सभी संगीतकारों के निर्देश्न में पार्श्वगायन किया था, लेकिन उनकी मधुर आवाज़ का सबसे सुन्दर उपयोग करने में शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, खैयाम, रोशन, उषा खन्ना, सरदार मलिक और दान सिंह का नाम सबसे ऊपर है। मुकेश हमेशा चुनिन्दा गाने ही गाते थे, इसलिए समकालीन गायकों की तुलना में उनके द्वारा गाए गीतों की संख्या बहुत कम है, लेकिन गुणवत्ता और लोकप्रियता बेमिसाल है। कहते हैं कि किशोर कुमार होंठों से गाते थे, मो. रफ़ी कंठ और होंठ - दोनों से गाते थे; लेकिन मुकेश, कंठ और होंठ के साथ दिल से गाते थे। उस अमर गायक मुकेश को उनकी ३९वीं पुण्य-तिथि पर शत-शत नमन।

Friday, August 21, 2015

श्रीकृष्ण-जन्मभूमि

              पुण्य नगरी मथुरा में  चार दिवसीय प्रवास के बाद मैं कल ही बनारस लौटा. प्रवास अत्यन्त आनन्दायक था. मेरी प्रबल इच्छा थी कि अपने नवीनतम पौराणिक उपन्यास ‘यशोदानन्दन’ की पाण्डुलिपि श्रीकृष्ण-जन्मभूमि में जाकर उनके श्रीचरणों में अर्पित करने के बाद ही प्रकाशक को भेजूं। मैं अपने अभियान में सफल रहा। मैं वहां अपने परम मित्र प्रो. दुर्ग सिंह चौहान जी, कुलपति जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा का अतिथि था। आदरणीया भाभीजी श्रीमती ज्योत्सना चौहान और अग्रज दुर्ग सिंह जी ने मेरे अभियान को सफल बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया। मैंने जो भी पुण्य अर्जित किया, उसके ५०% के वे स्वाभाविक अधिकारी हैं।
      जन्मभूमि और श्रीकृष्ण-राधा के विग्रह के दर्शन से मन आनन्द से ओतप्रोत हो उठा, लेकिन उससे सटे मस्ज़िद को देखकर मन में एक टीस-सी उठी। मस्ज़िद या चर्च के प्रति मेरे मन में कभी भी असम्मान की भावना नहीं रही है, परन्तु श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर निर्मित मस्ज़िद का इतिहास याद कर मन वितृष्णा से अनायास ही भर उठता है। करोड़ों दर्शनार्थी काशी, मथुरा और अयोध्या में अपने आराध्यों के दर्शनार्थ आते हैं और मेरे समान ही अनुभव लेकर वापस जाते हैं तथा अपने मित्रों, करीबियों तथा ग्रामवासियों को अपने हृदय की पीड़ा बताते हैं। निश्चय ही मुसलमानों ने इस देश के एक बड़े भूभाग पर लगभग ६०० वर्षों तक राज किया लेकिन वे हिन्दुओं के हृदय पर एक पल भी राज नहीं कर सके। जबतक काशी और मथुरा के पवित्र मन्दिरों के समीप पुराने मन्दिरों को तोड़कर बनाई गई मस्ज़िदें वे देखते रहेंगे, तबतक हर हिन्दू के हृदय में एक स्वाभाविक टीस बनी ही रहेगी। मुसलमानों को हिन्दुओं की इस भावना को समझना चाहिए और स्वेच्छा से सुधारात्मक प्रयास करना चाहिए। तभी वे हिन्दुओं का विश्वास जीत पायेंगे और देश में नए सिरे से स्थायी सांप्रदायिक सौहार्द्र की स्थापना हो पाएगी।

Tuesday, August 4, 2015

डिब्बाबंद पेय पदार्थों का सच

               डिब्बाबन्द पेय पदार्थों में स्वाद तो होता है, परन्तु पौष्टिकता नहीं होती। अपने उत्पादन स्थल से फुटकर दुकानों तक पहुँचने में यह लंबा समय लेता है। दूकान से उपभोक्ता के पास पहुँचने में यह और लंबा समय लेता है। कायदे से इनका भंडारण रेफ़्रीजेरेटर में किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। पूरे देश में कुछ महानगरों को छोड़कर अंधाधुंध बिजली-कटौती होती है। फुटकर विक्रेता चाहकर भी रेफ़्रीजेरेटर नहीं चला सकते हैं। कस्बों और गाँवों के दूकानदारों के पास रेफ़्रीजेरेटर होता भी नहीं है, लेकिन सभी फ्रूटी, माज़ा, गोल्ड क्वायन आदि आदि पेय तरल रखते हैं और धड़ल्ले से बेचते भी हैं। डिब्बाबन्द पेय पदार्थों का उत्पादन स्थल से डीलर तक  ट्रान्स्पोर्टेशन भी वातानुकूलित कन्टेनर में किया जाना चाहिए, लेकिन लाभ कमाने के शगल में पागल कंपनियां किसी भी नियम का पालन नहीं करतीं। नतीजा यह होता है कि उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते ये डिब्बाबंद पेय पदार्थ  फंगस लगने के कारण जहर में परिवर्तित हो जाते हैं। आज से ३० साल पहले जब मैं ओबरा ताप विद्युत गृह में तैनात था, तो उसी पावर हाउस में कार्यरत मेरे मित्र रिज़वान अहमद की मृत्यु फ़्रूटी पीने के कारण हो गई। धूंआ, गर्द, दूषित जल, प्रदूषित हवा और रासायनिक खादों की सहायता से उत्पादित अन्न-जल खाते-पीते भारत के लोगों के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता विकसित देशों की जनता से ज्यादा होती है। लेकिन इसी में जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, वे डिब्बाबन्द पेयों के सेवन से स्वर्ग सिधार जाते हैं। इनमें बच्चों की संख्या अधिक होती है।
आज (अगस्त,५,२०१५) को ‘अमर उजाला’ के प्रथम पृष्ठ पर एक समाचार पढ़ा, जो मैं ज्यों का त्यों, नीचे प्रस्तुत कर रहा हूं --
                                          “फ्रूटी में निकली मरी छिपकली"
“बहराइच (ब्यूरो)। छह साल की मासूम पोती को खुश करने के लिए दादा ने जो फ्रूटी खरीदकर दी , उसमें मरी हुई छिपकली निकली। उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज़ के बाद घर भेज दिया गया। खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने दुकान पर छापा मारकर फ्रूटी का पैकेट सीज़ कर सैम्पुल परीक्षण के लिए गोरखपुर प्रयोगशाला भेजा है। इसी के साथ दुकान से मिली संबंधित बैच की तीन पेटी फ्रूटी सीज़ कर पाँच सैम्पुल परीक्षण के लिए भेजे गए हैं।”
मैगी पर इतना बवाल हुआ; क्या फ्रूटी पर भी होगा? मेरी समझ से नहीं। इस समस्या का समाधान हम-आपको मिलकर करना होगा। इसका एक ही समाधान है - डिब्बाबंद पेय पदार्थों का बहिष्कार।