Monday, July 28, 2014

एक पाती राहुल बबुआ के नाम


प्रिय राहुल बबुआ,
      जब से तुम्हारी पार्टी लोकसभा का चुनाव हारी, हम सदमे में चले गये। उत्तराखण्ड में हुए उपचुनाव में तीनों विधान सभा की सीटें कांग्रेस ने जीत ली है। इस खबर से इस मुर्दे में थोड़ी जान आई है। इसीलिये आज बहुत दिनों के बाद एक पाती लिख रहा हूं।
      बेटा, हिम्मत मत हारना। हारिए न हिम्मत बिसारिये न हरि नाम। हरि से तो तुम्हारे खानदान और परिवार का कोई वास्ता कभी नहीं रहा है लेकिन हिम्मत से हमेशा रहा है। हिम्मत के मामले में तुम्हारी दादी बेजोड़ रही हैं। कांग्रेस से अलग होकर इन्दिरा कांग्रेस बनाने तथा १९७५ में एमरजेन्सी लगाने का काम कोई बड़ी हिम्मत वाला शक्स ही कर सकता था। तुम्हारे में भी थोड़ी-बहुत हिम्मत है। जब तुम बाहें चढ़ाकर चमचों के बीच भाषण देते थे, तो लोग तुम्हें यन्ग्री यंगमैन समझने लगे थे। मीडिया ने तुमको अमिताभ बच्चन का नया अवतार कहना शुरु कर दिया था। जब तुमने दागी विधायकों और सांसदों को बचानेवाले अपने ही सरकार के अध्यादेश  को प्रेस के सामने फाड़ कर फेंक दिया था, तुम अचानक राजनीति के राबिनहुड बन गये थे। चाटुकार दरबारियों को तुमसे बहुत आशायें थी लेकिन नरेन्द्र मोदी ने सब गुड़ गोबर कर दिया। योजना तो तुमने ठीक ही बनाई थी। केजरीवाल को पटाकर लोकसभा की ४४० से अधिक सीटों पर आप के उम्मीदवार खड़ा कराकर काग्रेस विरोधी वोट बांटने का तुम्हारा और भौजी का प्रयास सराहनीय था। लेकिन केजरीवाल पर भगोड़ा होने का लेबल इस तरह चस्पा  हुआ कि वह खुद तो हारा ही अपने महारथियों की जमानत भी गंवा बैठा। तुम्हारा गुरु योगेन्द्र यादव चारों खाने चित्त हो गया। मोदी की सुनामी ने बड़े बड़ों का बन्टाढाढ़ कर दिया। बताओ, आज नेता विरोधी दल के भी लाले पड़ गए।
      पुरखे कह गये हैं - मनुष्य बली नहीं होत है, समय होत बलवान, भीलन गोपी छीन लिए वही अर्जुन वही बाण | बेटा, सपने हमेशा ऊंचे देखना चाहिये। प्रधान मंत्री का सपना देखते-देखते, नेता विपक्ष का सपना क्यों देखने लगे? तुम्हीं बताओ, ४४ की संख्या पर नेता, विपक्ष कैसे बनोगे? यह छोटा सा गणित तुम्हरी समझ में काहे नहीं आ रहा है? तुम लोगों के लिये सौ खून माफ़ है, लेकिन मोदी ने अगर एक गलती की, तो नेशनल/इन्टर नेशनल मीडिया उसे शूली पर टांग देगी। तुम्हारी दादी के किचेन में घुसकर खाना बनानेवाली प्रतिभा पाटिल को तुम्हारी मम्मी और हमारी भौजाई ही राष्ट्रपति बना सकती हैं, दूसरे किसी में इतनी हिम्मत नहीं है। बेटवा, यह माना कि तुम खानदानी शहज़ादा हो। लाल बत्ती की गाड़ी में चलने की तुम्हारे परिवार को आदत है लेकिन यह लोकतंत्र भी कभी-कभी पेनाल्टी किक दागिए देता है। इन्तज़ार करने में कवनो हरज नहीं है। पैसा-कौड़ी की तो तुम्हारे पास वैसे ही कवनो किल्लत नहीं है। अभी तो राजीव भैया के स्विटजरलैंड का पैसा ही खर्च नहीं हुआ होगा, २-जी, ३-जी, कोलगेट, कामनवेल्थ आदि-आदि का पैसा भी भौजाई बीमारी के बहाने अमेरिका जाकर सुरक्षित जगह पर रखिये आई हैं। एक नहीं, सौ जेटली आयेंगे, तो भी तुम्हारे पैसे का सुराग नहीं पा पायेंगे। इसलिये चिन्ता की कवनो बात नहीं है। लेकिन बेटा, कुछ बुरी आदतें तो छोड़नी ही पड़ेंगी। लोकसभा चल रही थी, महंगाई पर गंभीर चर्चा चल रही थी और तीसरी पंक्ति में बैठे-बैठे तुम सो रहे थे। टीवी चैनल वालों की मदद से सारी दुनिया ने यह दृश्य देखा। दूसरे दिन भौजाई ने बुलाकर फ़्रौन्ट रो में तुम्हें अपने पास बिठाया। बेटा, वे कबतक स्कूल मास्टर की भूमिका निभायेंगी। उनके आंचल की छांव में कबतक पनाह लोगे। अब तो तुम्हारी उमर भी ४५ को पार कर गई होगी। अब अपने लिये फ़ुल टिकट की व्यवस्था करो। हाफ़ टिकट पर कबतक चलोगे? कोई भी बाप अपनी बेटी के लिये एक कमाऊ और समझदार बालिग दामाद ढूंढ़ता है। जरा मैच्युरिटी दिखाओ, वरना ज़िन्दगी भर कुंवारा ही रहना पड़ेगा। कही तुमने प्रधानमन्त्री बनने के बाद ही शादी करने की कसम तो नहीं खा रखी है? अगर ऐसा है, तो बहुत बुरा है। जनता ने जिस तरह लोकतंत्र का पेनाल्टी किक लगाया है, उसको देखते हुए तो ऐसा नहीं लग रहा है कि ५ साल बाद भी कोई चान्स मिलेगा। वैसे भी मोदी जहां का चार्ज लेते हैं वहां कम से कम तीन चुनाव तो जीतते ही हैं। तबतक तुम्हारी बुढ़ौती आ जायेगी। फिर भांजों के साथ ही बारात निकालनी पड़ेगी। दिग्विजय को अमृता राय मिल भी गई, तुम्हारे लिये लड़की तलाशना लोहे  का चना चबाने जैसा होगा। फिर तुम्हें खुद ही अपने परनाना की तरह किसी एडविना माउन्टबेटन की तलाश करनी होगी।
      हमलोग यहां राजी-खुशी हैं। भगवान तुम्हें भी भौजी के साथ राजी-खुशी रखें। बबुआ मेरी बात का खयाल रखना -
            तूने रात गंवाई खाय के; दिवस गंवाया सोय के,
            हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय।
      जय रामजी की। इति शुभ।
                  तुम्हारा - चाचा बनारसी

Thursday, July 17, 2014

घरेलू उपकरणों में बिजली की बचत - रेफ़्रिजरेटर



     रेफ़्रिजरेटर - सब्जी, भोजन, फल व अन्य सामग्रियों को ताजा रखने के लिए रेफ़्रिजरेटर जिसे फ़्रीज भी कहते हैं, अब लगभग हर घर में प्रयोग में आने लगा है। गृहिणियों के लिए यह उपकरण बड़े काम का है। इसकी मदद से वे बच्चों को आइसक्रीम खिला सकती हैं और कोल्ड ड्रिन्क्स भी पिला सकती हैं। दिन का खाना रात में भी खिला सकती हैं और रोज-रोज सब्जी खरीदने से मुक्ति भी पा सकती हैं। फ़्रीज का परिचालन अगर थोड़ी सी सावधानी से करें, तो ३०% बिजली की बचत भी हो सकती है और फ़्रीज की आयु भी बढ़ सकती है। कुछ सुझाव निम्नवत हैं --
     १. नियमित रूप से फ़्रीज और फ़्रीजर को डिफ़्रास्ट करते रहें। फ़्रीज के अन्दर नमी बढ़ने से कम्प्रेसर अधिक चलता है जिसके कारण बिजली की      खपत ज्यादा होती है।
     २. फ़्रीज और दीवार के बीच हवा के प्रवाह के लिए कम से कम ९ इन्च जगह खाली रखें। फ़्रीज के    पिछले हिस्से से ही कम्प्रेसर की गर्मी बाहर     निकलती है। अगर गर्म हवा बिना किसी प्रतिरोध के बाहर निकलती है, तो फ़्रीज की कार्य कुशलता बढ़ जाती है और बिजली की खपत भी कम हो      जाती है।
     ३. फ़्रीज के दरवाजे को वायु निरोधक बनायें। दरवाजे से फ़्रीज के अन्दर न हवा अन्दर आनी चाहिये     और न फ़्रीज की ठंढ़ी हवा बाहर जानी    चाहिए। दरवाजा पूरी तरह एयर टाइट होना चाहिए।
     ४. फ़्रीज में रखे जाने वाले तरल एवं खाद्य पदार्थों को ढक कर रखें। बिना ढके भोज्य पदार्थ नमी पैदा   करते हैं जिससे कम्प्रेसर पर दबाव बढ़ जाता    है और बिजली की खपत ज्यादा होती है।
     ५. फ़्रीज के दरवाजे को अनावश्यक अथवा अधिक समय तक न खोलें। ऐसा करने से भी कम्प्रेसर पर     दबाव बढ़ जाता है और बिजली कि खपत बढ़   जाती है, फलस्वरूप आपका बिल ज्यादा आता है।
     ६. नियमित रूप से प्रयोग की जाने वाली चीजों के लिए छोटे कैबिनेट का प्रयोग करें।     
     ७. फ़्रीज में भोजन अथवा अन्य भोज्य पदार्थ कमरे के तापक्रम पर लाने के बाद ही रखें। गर्म भोजन अथवा पदार्थ सीधे फ़्रीज में रखने से ठंढ़ा करने के लिए फ़्रीज को ज्यादा कार्य करना पड़ता है। इससे   कम्प्रेसर अतिभारित होता है और बिजली की खपत बढ़ जाती है।
              आपके द्वारा की गई बिजली की बचत विद्युत उत्पादन करने के समतुल्य है। राष्ट्रहित में बिजली बचायें।

Monday, July 14, 2014

घरेलू उपकरणों में बिजली की बचत


     एयर कन्डीशनर - कमरे/हाल/दूकान/कार्यस्थल के अन्दर तापमान को सुविधाजनक स्तर पर रखने के लिये एयर कन्डीशनर का प्रयोग एक आम बात हो गई है। एयर कन्डीशनर को स्वतः तापमान नियंत्रक कट आफ़ पर रखें। रेगुलटर को २२ डिग्री से २६ डिग्री पर सेट करें। यही तापमान का वह रेन्ज है जो मानव शरीर के अनुकूल है। कुछ लोग निम्नतम तापमान सेट नहीं करते हैं जिसके कारण एयर कन्डीशनर  लगातार चलता रहता है और तापमान काफी नीचे आ जता है। यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लगातार चलने से एसी का कम्प्रेसर गर्म हो जाता है और जलने की संभावना बढ़ जाती है। कम्प्रेसर एयर कन्डीशनर का दिल होता है। कम्प्रेसर बन्द तो एसी बन्द। कम्प्रेसर जैसे-जैसे गर्म होता है, बिजली की खपत वैसे-वैसे बढ़ती जाती है। अतः रेगुलेटर को २२ से २६ डिग्री के बीच ही रखें।
      एयर कन्डीशनर के साथ छत पर लगे पंखे को भी चलायें। ऐसा करने से ठंढ़ी हवा पूरे कमरे में प्रभावी ढंग से फैलती है जिससे एसी और ठंढ़क प्रदान करता है। सिर्फ़ एसी चलाने से ठंढी हवा नीचे रहती है और गर्म हवा ऊपर रहती है। इसके कारण एयर कन्डीशनर पर अनावश्यक भार पड़ता है।
      एयर कन्डीशनर खरीदते समय स्टार रेटेड एसी ही लेने का प्रयास करें। स्टार रेटेड एसी में बिजली की खपत कम होती है। कमरे की साईज़ के अनुकूल ही एसी की क्षमता का चयन करें। छोटे कमरे में बड़ी क्षमता का एसी लगाने से ठंढ़क थोड़ी ज्यादा जरूर मिलती है लेकिन बिजली की खपत बहुत बढ़ जाती है। कमरे के क्षेत्रफल के हिसाब से ही एसी कि क्षमता का चयन करें। १२० वर्गफ़ीट के कमरे के लिये १ टन की क्षमता वाले एसी की आवश्यकता होती है। एसी लगे कमरों की खिड़कियों पर पर्दे अवश्य लगायें। खिड़की और दरवाजे कभी खुला न रखें। बाहर से हवा आने-जाने वाले सभी स्रोतों को सील कर दें।
       एसी थर्मोस्टेट के निकट लैम्प, टीवी, कमप्यूटर या कोई अन्य गर्म होने वाला उपकरण न रखें। इन उपकरणों से गर्मी निकलती है जिसे थर्मोस्टेट ग्रहण करता है। इसके कारण एसी अनावश्यक रूप से अधिक समय तक चलता है। इससे बिजली ज्यादा खर्च होती है और बिल की राशि भी बढ़ जाती है।
      कमरे के बाहर निकले एसी के भाग पर हमेशा छांव रखने कि व्यवस्था करें। इसके लिए उसके आसपास लता या छोटे-बड़े पेड़ लगाएं। यदि यह संभव नहीं है तो उचित दूरी एवं ऊंचाई के शेड का प्रयोग करें। इससे १०% तक बिजली की बचत होती है।
      ध्यान रहे, विद्युत की बचत विद्युत उत्पादन के समतुल्य है।

Saturday, July 12, 2014

ऊर्जा का महत्त्व, उपयोग एवं संरक्ष ण


    मार्च २०११ में मैं दादा बना। पोते के आगमन पर खुशी तो हो रही थी लेकिन मन में तरह-तरह की शंकाएं भी घर कर रही थीं। कारण था - मेरा पोता निर्धारित समय से एक महीना पूर्व ही आ गया था। यह एक प्री मैच्योर्ड डिलीवरी का केस था। स्वाभाविक था - बच्चा बहुत कमजोर था और वज़न भी कम था। खुशियां तो आईं लेकिन आशंकाओं और दुश्चिन्ताओं की संभावनाओं के साथ। मैंने अपनी चिन्ता डाक्टर को बताई। वे हंसी और बोलीं - "आप नाहक परेशान हो रहे हैं। हम बेबी को १५ दिन तक इन्क्यूबेटर में रखेंगे, उसके बाद ही आपको सौंपेंगे। १५ दिनों में बेबी का फ़ुल ग्रोथ हो जायेगा। चिन्ता की कोई बात नहीं है।” इन्क्यूबेटर एक ऐसा साधन है जिसका तापक्रम मां के गर्भ के समान रखा जाता है। बच्चे को भोजन और केयर बिल्कुल मां के गर्भ की तरह मिलता है। एलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग, मेकेनिकल इन्जीनियरिंग और मेडिकल साइन्स की उच्च श्रेणी की प्रतिभा के समन्वय का नाम है इन्क्यूबेटर। मेरा पोता १५ दिनों के बाद हास्पीटल से डिस्चार्ज हुआ। वह पूर्ण स्वस्थ था और वज़न भी बढ़ गया था। आजकल वह स्कूल जाता है। अपनी उम्र के लड़कों में वह सबसे ज्यादा सक्रिय है। मैं सोचता हूं कि आपरेशन थिएटर और इन्क्यूबेटर के लिए यदि हमने २४ घंटे की विद्युत आपूर्ति न दी होती, तो क्या हम अपने पोते को वर्तमान रूप में पा पाते?
      कुछ वर्ष पहले जो कार्य असंभव दिखता था, आज हम बिजली के माध्यम से चुटकी बजाते कर लेते हैं। २०वीं सदी के आरंभ में हवा और पानी ही हमारे जीवित रहने के प्रमुख कारक थे लेकिन  २१वीं सदी के आते-आते हवा और पानी के साथ बिजली का नाम भी जुड़ गया। बिजली हमारी जीवन रेखा बन गई। इस सदी के बच्चे का पहला पड़ाव होगा, बिजली से चलने वाला आपरेशन थिएटर और अन्तिम पड़ाव होगा विद्युत शवदाह गृह।
      आज की तारीख में देश का ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जो बिजली का उपयोग नहीं करता। मोबाइल फ़ोन से लेकर टीवी, किचेन से लेकर बेडरूम, झोंपड़ी से लेकर गगनचुम्बी एपार्टमेन्ट - सबमें बिजली का उपयोग अनिवार्य आवश्यकता बन गई है। हम सभी बिजली का इस्तेमाल तो करते हैं लेकि कभी हमने सोचा है कि बिजली की खपत में बचत करके आने वाली पीढ़ियों और राष्ट्र के उपर हम सीधा अनुग्रह कर सकते हैं?
      इस समय उपलब्ध बिजली का ६०% हम ताप विद्युत गृहों से प्राप्त करते हैं। ऐसी बिजली के उत्पादन के लिए कोयले की आवश्यकता होती है। कोयले का भंडार सीमित है। पूरे विश्व में अगर इसी तरह कोयले की खपत होती रही, तो आनेवाले ७५ वर्षों में कोयले का भंडार समाप्त हो जाएगा। फिर हम अगली पीढ़ी के लिए विरासत में क्या छोड़ जायेंगे? क्या हम पुनः लालटेन युग में लौट जायेंगे? समस्या भयावह है लेकिन समाधान असंभव नहीं। छोटा से बड़ा आदमी भी अगर बिजली का इस्तेमाल कंजूस के धन की तरह करे, तो हम अपनी खपत ३५% तक कम कर सकते हैं। इससे हमारा बिजली का बिल भी कम आयेगा और हमारे संसाधन भी लंबे समय तक संरक्षित रहेंगे। इसके लिए कोई कठिन श्रम करने की आवश्यकता  नहीं है, बस निम्न सुझाओं को अपनाने की जरुरत है -
      १. साधारण बल्ब या ट्यूब राड की जगह सीएफ़एल या एलईडी लैंप का उपयोग किया जाय।
      २. एसी. फ़्रीज तथा अन्य विद्युत उपकरण आई.एस.आई. अथवा स्टार रेटिंग वाला ही खरीदा जाय।
      ३. पंखा/पंप/मोटर आदि की समय-समय पत ग्रिसिंग/सर्विसिंग कराई जाय।
      ४. काम समाप्त होने पर कंप्यूटर/टीवी/माइक्रोवेव/ओवन/पंखा/लाईट स्विच से बन्द किया जाय।
      ५. एसी में लगे एयर फ़िल्टर की प्रत्येक सप्ताह सफाई की जाय।
      ६. फ़्रीज को कम से कम खोला जाय और सप्ताह में कम से कम एक बार डिफ़्रास्ट किया जाय।
      ७. घर से निकलते समय अनावश्यक विद्युत उपकरण के मेन स्विच बन्द कर दिये जांय।
            बिजली की बचत विद्युत उत्पादन करने के समतुल्य है।

Friday, June 20, 2014

किराये का मकान और केजरीवाल

       आदमी अपने कर्मों के कारण कितनी जल्दी अर्श से फ़र्श पर आता है, इसका ताज़ातरीन उदाहरण हैं आप के नेता अरविन्द केजरीवाल। जो आदमी कुछ ही दिन पहले दिल्ली की जनता का हीरो था, आज ज़ीरो है। उसको शरण देने के लिये दिल्ली में कोई तैयार नहीं हो रहा है। समाचार है कि दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल को किराये का मकान नहीं मिल रहा है। काफी ना-नुकुर के बाद केजरीवाल ने मुख्यमन्त्री के लिये आवंटित मकान को खाली किया। उस मकान पर कब्जा बनाये रखने के लिये उन्होंने वे सारे तिकड़म किये जो एक आम सरकारी अधिकारी या कर्मचारी करता है। कायदे से मुख्यमन्त्री का पद छोड़ने के बाद स्वतः उन्हें मुख्यमन्त्री का आवास खाली कर देना चाहिये था लेकिन उन्होंने प्रशासन को पत्र लिख कर मकान में रहने की अनुमति मांगी। तर्क यह दिया कि उनकी बेटी हाई स्कूल की परीक्षा दे रही है अतः वे मकान खाली नहीं कर सकते। आश्चर्य होता है कि मुख्यमन्त्री बनने के पहले वे गाज़ियाबाद में रहते थे। उनकी बेटी उनके साथ ही रहकर पढ़ती थी। ४९ दिनों तक मुख्यमन्त्री रहने के बाद ऐसा कौन सा बदलाव आ गया कि उनकी बेटी गाज़ियाबाद में रहकर परीक्षा नहीं दे सकती थी? दरअसल ४९ दिनों में कुछ नहीं बदला, केजरीवाल जरुर बदल गये। उन्हें मुख्यमन्त्री के रूप में प्राप्त सर-सुविधायें रास आने लगी। मुख्यमन्त्री बनने के पूर्व सरकारी मकान, सरकारी वाहन और सरकारी सुविधाओं को न लेने की सार्वजनिक घोषणा करने के बाद भी उन्होंने सबका भोग किया और ४९ दिनों में ही उनके आदी हो गए। वाराणसी से बुरी तरह चुनाव हारने के बाद दिल्ली के उपराज्यपाल से मिलकर केजरीवाल ने पुनः मुख्यमन्त्री बनने के लिये प्रस्ताव भी दिया जिसे स्वीकार नहीं किया गया। उनकी कथनी और करनी में फ़र्क को जनता ने अच्छी तरह समझ लिया। विश्वसनीयता के मामले में वे कांग्रेस से भी पीछे चल रहे हैं। उनके साथी भी एक-एक कर उनका साथ छोड़ते जा रहे हैं। एक बात स्पष्ट हो गई है कि अरविन्द केजरीवाल परम स्वार्थी और तानाशाही प्रवृत्ति के नेता हैं। वे अपनी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिये कुछ भी कर सकते हैं। उनकी स्वार्थी प्रवृत्ति का प्रमाण पिछला आम चुनाव था जिसमें उन्होंने भाजपा और कांग्रेस से भी ज्यादा प्रत्याशी मैदान में उतारे थे - लगभग ४३२। उन्होंने प्रत्याशी तो उतार दिये लेकिन न तो उन्हें धन मुहैया कराया और न उनका चुनाव प्रचार किया। स्वयं शुरु से लेकर अन्त तक वाराणसी में ही जमे रहे। अन्य प्रत्याशियों की कोई सुधि नहीं ली। वाराणसी में पैसा पानी की तरह बहाया गया, दूसरे प्रत्याशियों को पैंफलेट छापने के लिये भी पैसे नहीं दिए गए। चुनाव में खर्चों का केजरीवाल ने जो व्योरा दिया है, उसके अनुसार उन्होंने नरेन्द्र मोदी से भी ज्यादा पैसा खर्च किया है। यही कारण रहा कि शाज़िया इल्मी, योगेन्द्र यादव और कुमार विश्वास जैसे उनके स्टार प्रचारक और सहयोगी अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाये। अन्ना के जनान्दोलन से उपजे केजरीवाल मोदी की सुनामी में तिनके की भांति उड़ गये। रही सही कसर उनकी महत्वाकांक्षा और स्वार्थपरता ने पूरी कर दी। लोगबाग दिग्विजय सिंह से ज्यादा केजरीवाल पर अविश्वास करते हैं। आजकल वे जहां भी मकान के लिये जाते हैं, मकान मालिक ‘ना’ में सिर हिला देता है। जब सर्व सामर्थ्यशाली भारत सरकार भी पांच महीने तक उनसे मकान खाली करने में नाकाम रही तो साधारण मकान मालिक किस खेत की मूली है! वैसे यह भी केजरीवाल का एक ड्रामा ही है। उनकी पत्नी आयकर विभाग में कमिश्नर हैं और स्वयं केजरीवाल ने एनजीओ के माध्यम से कई सौ करोड़ रुपये बनाये हैं। वे एक मकान क्या पूरा अपार्टमेन्ट खरीद सकते हैं। लेकिन जिसको ड्रामा करने की आदत लग गई है, उसका क्या इलाज हो सकता है? 

Sunday, June 1, 2014

स्मृति ईरानी और लार्ड मेकाले की शिक्षा

          समरस समाज, प्रेरणादायक नेतृत्व और नागरिकों के उच्च चरित्र ही देश और समाज के सर्वंगीण विकास में सहायक होते हैं। फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथेमेटिक्स, इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र की किस पुस्तक में लिखा है कि बड़ों का सम्मान करो, स्त्रियों को मां-बहन का सम्मान दो, माता-पिता-गुरु को पैर छूकर प्रणाम करो। राम, कृष्ण, गौतम, गांधी के चरित्र को हृदय से हृदयंगम किए बिना नैतिकता और चरित्र का विकास असंभव है। मैकाले की सेकुलर शिक्षा व्यवस्था ने नैतिकता और चरित्र को कालवाह्य बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।
      फरवरी १८३५ में इंग्लैंड के हाउस आफ़ कामन्स में भारत की शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन हेतु अपनी दलील देते हुए लार्ड मेकाले ने कहा था -
      "I have travelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre, that I do not think that we would ever conquer this country unless we break the very backbone of this nation, which is the cultural and the spiritual heritage, and thereof, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them - a truly dominated nation." (बिना किसी संशोधन के एक-एक शब्द, कामा फ़ुलस्टाप के साथ मेकाले के लिखित वक्तव्य से उद्धृत)
      "मैंने पूरे भारत की यात्रा की और ऐसा व्यक्ति नहीं देखा जो भिखारी हो या चोर हो। इस तरह की संपत्ति मैंने इस देश में देखी है, इतने ऊंचे नैतिक मूल्य, लोगों की इतनी क्षमता, मुझे नहीं लगता कि कभी हम इस देश को जीत सकते हैं, जबतक कि इस देश की रीढ़ को नहीं तोड़ देते जो कि उसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत है। इसलिए मैं प्रस्ताव करता हूं कि हमें इसकी पुरानी और प्राचीन शिक्षा-व्यवस्था, इसकी संस्कृति को बदलना होगा। इसके लिए यदि हम भारतीयों को यह सोचना सिखा दें कि जो भी विदेशी है और अंग्रेज है, यह उनके लिए अच्छा और बेहतर है, तो इस तरह से वे अपना आत्मसम्मान खो देंगे, अपनी संस्कृति खो देंगे और वे वही बन जायेंगे जैसा हम चाहते हैं - एक बिल्कुल गुलाम देश।"
    आज़ादी के बाद भी हमने अपनी शिक्षा व्यवस्था में कोई सुधार नहीं किया। हमने किसी भी व्यक्ति की योग्यता को लार्ड मेकाले के मापदंडों के आधार पर ही मापा। लेकिन मेकाले के अंध भक्तों ने देश को दिया क्या? सदियों पुराने देश का नाम बदलकर इंडिया रख दिया। मेकाले के सबसे बड़े भक्त जवाहर लाल नेहरू ने ५० हजार लाशों की नींव पर देश का बंटवारा करा दिया। सारी नैतिकता को ताक पर रखकर एडविना मौन्टबैटन से अनैतिक संबन्ध बनाए और कांग्रेस में वंशवाद के पुरोधा बने। इन्दिरा गांधी लार्ड मेकाले की शिक्षा पद्धति से कोई डिग्री तो नहीं ले पाईं लेकिन देश की प्रधान मंत्री अवश्य बन गईं। उन्हें भारत का इतिहास इमरजेन्सी के माध्यम से तानाशाही थोपने के लिये हमेशा याद करेगा। उनके पुत्र भी किसी विश्वविद्यालय से कोई डिग्री नहीं ले पाये। हां, हवाई जहाज उड़ाते-उड़ाते देश के पायलट जरुर बन गये। सोनिया जी लन्दन में मेकाले की शिक्षा पाने गईं अवश्य थीं लेकिन कोई डिग्री हाथ नहीं लगी। बार गर्ल की नौकरी के दौरान राजीव गांधी हाथ जरुर लग गये। उन्होंने १० वर्षों तक रिमोट कन्ट्रोल से भारत पर शासन किया। उनके सुपुत्र राहुल बबुआ भी डिग्री के लिये हिन्दुजा से डोनेशन दिलवाकर हार्वर्ड गये। पढ़ने के बदले कोलंबिया गर्ल से फ़्लर्ट करना ज्यादा मुनासिब समझा और खाली हाथ इंडिया लौट आए। यहां तो युवराज का पद आरक्षित पड़ा ही था। मेकाले के मापदंडों पर खरा उतरने वाले पिछली सरकार के रहनुमाओं में डा. मममोहन सिंह, चिदंबरम, ए. राजा, कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, दिग्विजय सिंह, शशि थरुर, नारायण दत्त तिवारी जैसे नेताओं के नाम स्वार्णाक्षरों में अंकित रहेंगे। लेकिन इन्होंने किया क्या? किसी ने परस्त्रीगमन किया, किसी ने रिश्वत लेकर देश बेचने का काम किया, तो किसी ने भारत की अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचाने में अपना सर्वस्व झोंक दिया।
    भारत की जनता ने इनके कुकृत्यों के कारण गत माह में संपन्न हुए आम चुनाव में इन्हें बुरी तरह ठुकरा दिया। हताश मेकाले भक्तों को खांटी देसी प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री के रूप में स्मृति ईरानी दिखाई पड़ गईं। ये वही महिला हैं जिन्होंने अमीठी में शहज़ादे को लगभग धूल चटा दी थी। खुन्दक खाए चाटुकार दरबारी, स्मृति की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाने लगे। इन चाटुकारों ने इसके पहले कभी भी इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, सन्जय गांधी, सोनिया गांधी और शहज़ादे राहुल गांधी की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल नहीं उठाए। क्या यह सत्य नहीं है कि मेकाले को ईश्वर का दूत मानने के बावजूद नेहरू जी के बाद उनके खानदान में कोई स्नातक की डिग्री नहीं ले पाया?
    शिक्षा और संस्कार से दो चीजें प्राप्त होती है - १. ज्ञान २. जानकारी। मेकाले की शिक्षा से सिर्फ़ जानकारी मिलती है जिसका चरित्र और संस्कार से कोई तालमेल नहीं है। भारतीय शिक्षा पद्धति से ज्ञान प्राप्त होता है जिसमें चरित्र और संस्कार कूट-कूट कर भरे रहते हैं। बाल्मीकि, तुलसी, सूर, कालिदास, कबीर, विद्यापति, शिव पूजन सहाय, जय शंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचन्द, मैथिली शरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वर नाथ रेणु, नागार्जुन बाबा, मौसम वैज्ञानिक घाघ और अनेक देसी रत्नों ने कहीं से पी.एचडी. नहीं की थी लेकिन उनपर और उनकी कृतियों पर हजारों लोग पी.एचडी कर चुके हैं। अकबर, छत्रपति शिवाजी, महारानी लक्ष्मी बाई, अहिल्या बाई होलकर के पास लार्ड मेकाले की कोई डिग्री नहीं थी लेकिन उनकी शासन व्यवस्था, प्रबन्धन और कुशल नेतृत्व को इतिहास क्या कभी भुला पाएगा? आज के युग में हजारों इंजीनियरों और प्रबंधकों को नौकरी प्रदान करने वाले रिलायंस ग्रूप के संस्थापक धीरु भाई अंबानी के पास कौन सी डिग्री थी? एक लोटा और १०० रुपए के एक नोट के साथ पिलानी से कलकत्ता पहुंचने वाले घनश्याम दास बिड़ला तो हाई स्कूल पास भी नहीं थे। उन्होंने जो औद्योगिक साम्राज्य खड़ा किया, उसमें मेकाले का क्या योगदान है? सिर्फ़ आलोचना-धर्म के निर्वाह और चाटुकारिता के लिये माकन, सिब्बल, दिग्गी जैसे चारण स्मृति की आलोचना कर रहे हैं। उन्हें राज्य सभा में स्मृति द्वारा दिये गए विद्वतापूर्ण भाषण, टीवी चैनलों पर दिये गए साक्षात्कार और क्रान्तिकारी भाषण कभी याद नहीं आयेंगे। मेकाले की डिग्री और योग्यता  से कोई संबंध नहीं है। स्मृति के पास दृष्टि है, कार्य करने की इच्छा शक्ति है, कर्मठता है, नेतृत्व क्षमता है और सबसे बढ़कर भारत माता के प्रति अटूट निष्ठा है। ये सारे दुर्लभ गुण उन्हें सफलता के नये-नये सोपन प्रदान करेंगे। चन्द्रगुप्त की प्रतिभा को चाणक्य ने पहचाना था, स्मृति की प्रतिभा को नरेन्द्र ने पहचाना है। शुभम भवेत।

Wednesday, May 28, 2014

भारत की आज़ादी


१५ अगस्त १९४७ को इन्डिया आज़ाद हुआ था। वह एक अधूरी आज़ादी थी। हम मानसिक रूप से गुलामी की अवस्था में ही जी रहे थे। २६ मई, २०१४ को भारत आज़ाद हुआ। हमने मानसिक गुलामी की जंजीरें तोड़ डाली। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में सर्वत्र भारत दिखाई पड़ रहा था। ब्रिटेन और अमेरिका के अखबारों ने अन्त अन्त तक मोदी का घोर विरोध किया। लोकसभा चुनाव के पहले ब्रिटेन का प्रमुख अन्तराष्ट्रीय अखबार ‘गार्जियन’ यूरोप, अमेरिका और भारत के भी उन अंग्रेजी अखबारों में शामिल था, जिन्होंने भारतीय मतदाताओं से विभाजनकारी नरेन्द्र मोदी को न चुनने की  सेक्युलर बुद्धिजीवियों की अपीलें जोरदार ढंग से छापी थीं। लेकिन मोदी की भारी जीत के बाद इनके सुर अचानक बदल गये। १८ मई को गार्जियन ने अपने संपादकीय में लिखा - “मोदी की जीत दिखाती है कि अंग्रेज आखिर भारत से चले गए।” पश्चिम के एक और अखबार ने उन्हीं दिनों लिखा - “भारत एक केन्द्रीकृत, बाड़ों में बन्द, सांस्कृतिक रूप से दबा हुआ और पूर्ववर्तियों की तरह अपेक्षाकृत छोटे, अंग्रेजी बोलने वाले संभ्रान्त वर्ग द्वारा शासित देश था, जिसका आम लोगों के प्रति नज़रिया उनको नज़रानें बांटने और उनका फायदा उठाने का तो था, लेकिन सबको साथ लेकर चलने वाला कभी नहीं था।” इस अखबार समेत कई विचारक अब मान रहे हैं कि “नया भारत खैरात नहीं, अवसर और अपनी पहचान चाहता है और यह किसी की धौंस में आने को राजी नहीं है।” चर्चित समाचार वेबसाईट ‘हफ़िंगटन पोस्ट’ में प्रख्यात ब्लागर वामसी जुलुरी ने भाजपा विरोधी पार्टियों के सेक्युलरिज्म को ‘हिन्दुफ़ोबिया’ बताया है और लिखा है कि यह जनादेश जितना सुशासन और विकास के लिये है, उससे कही अधिक इस नए उभरते हुए विचार की घोषणा के लिये भी है कि विश्व में हिन्दू और भारतीय होने का क्या मतलब है; सर्व धर्म समादर और शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व जिसके सभ्यतागत जीवन मूल्य हैं। यह नया रूप १९८०-९० दशक के हिन्दू राष्ट्रवादी उभार से अलग है। भारतीयता का यह बोध उग्र राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों की लानत-मलामत को तवज्जो नहीं देता, फ़र्जी सेक्युलरवाद और उद्धत राष्ट्रवादी अतिरेक, दोनों को नकारता है। प्रचलित धारणा के उलट भारत के लोगों ने ठीक ही सोचा कि यह चुनाव सेक्युलरिज्म और हिन्दू उग्रवाद के बीच नहीं बल्कि ‘हिन्दूफ़ोबिया’ और ‘भारत सबके लिए’ के बीच है।”
पश्चिमी जगत के अखबारों के ये बदलते स्वर अनायास नहीं हैं। सचमुच भारत की जनता को भी यह विश्वास है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को विश्व में एक नई पहचान देते हुए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी इसे विकास की नई ऊंचाई प्रदान करेंगे। अगर हम निष्पक्ष समीक्षा करेंगे तो यह पायेंगे कि १९४७ में आज़ादी पाने के बाद भी हम मानसिक रूप से अंग्रेजों के गुलाम रहे। भारत की संसद, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की कार्यवाही देखने के बाद क्या कोई विश्वास के साथ कह सकता है कि हम एक आज़ाद देश के वासी हैं। हम भारतवासी अंग्रेजी, अंग्रेज और अंग्रेजियत के इस कदर गुलाम रहे कि एक वंश के शासन को ६० वर्षों तक स्वीकार करते रहे। हद तो तब हो गई जब अंग्रेजों के खिलाफ़ आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली कांग्रेस ने एक आयातित गोरी चमड़ी का नेतृत्व सहज भाव से स्वीकार कर लिया। कांग्रेस के कुशासन से तंग आकर जनता ने एक खांटी देसी व्यक्ति को देश की कमान देकर भारत में कांग्रेस मुक्त राज की कल्पना को साकार किया है। कांग्रेस से मुक्ति पाये बिना सुशासन की कल्पना एक दिवास्वप्न थी। चाटुकारों और स्वार्थी तत्वों ने इस देश के स्वाभिमान को रसातल में पहुंचा दिया है। जनता ने उन्हें नकार दिया। लेकिन अभी भी कई काम अधूरे हैं। चुनाव ने तो राज को कांग्रेस मुक्त बना दिया लेकिन अगर कांग्रेसियों में तनिक भी स्वाभिमान शेष है तो भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को विदेशी नेतृत्व से मुक्त कराना होगा। वंशवाद की जिस बेल का कांग्रेस ने खाद-पानी देकर ६७ वर्षों से हरा-भरा किया, वह विषबेल अब भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़ सभी पार्टियों को अपनी गिरफ़्त में ले चुकी है। यह विषबेल लोकतंत्र और भारत के लिये भी गंभीर चुनौती है। अच्छे दिन आ गये हैं। हम आशा करते हैं कि हमारे महान राष्ट्र को वंशवाद से भी शीघ्र मुक्ति मिल जायेगी। बिहार ने राह दिखा दी है। अन्यों को सिर्फ़ अनुसरण करना है।