Sunday, March 30, 2014

ज़िन्दगी की इमारत

मेरी ज़िन्दगी की इमारत -
पिलर पर नहीं, नींव पर बनी है।

बाबूजी बहुत डांटते थे
कभी-कभी थपड़ियाते भी थे।
दुखी हो जाता था
आंखों में आंसू भी आते थे
लेकिन आज सोचता हूं
उनकी डांट, झिड़कियां और चांटे
अनुशासन, शिक्षा और संस्कार की
नींव के पत्थर थे।

बड़का बाबूजी ने कभी डांटा नहीं
बाबूजी के हिस्से का प्यार
वही देते थे।
उन्होंने कभी एहसास होने नहीं दिया
कि बच्चे सिर्फ़ डांट के अधिकारी हैं।
नींव में उनके निर्मल प्यार का
सिमेन्ट-बालू आज भी है।

मां - मेरी प्यारी मां
क्या दुनिया में उससे अच्छी
कोई दूसरी मां हो सकती है?
शायद नहीं।
कभी कान भी उमेठा हो,
याद नहीं।
शरारतों का शहज़ादा मैं
क्षमा की मूर्ति वह।
छींक आने पर भी
गोद में समेट लेती थी।
उसकी धड़कन से
मेरा सीधा संवाद था।

बड़की माई का स्नेह
उम्र के साथ एहसास बढ़ता गया
डांटती भी थीं
पर स्नेह के साथ
आम लीची की चोरी पर
पड़ोस की ईया
जब गाली के साथ
शाप भी देती थीं,
आंखों में आंसू भर बड़की माई
सातों शावकों को बटोरकर
बार-बार समझाती थीं -
दूसरों के बगीचे से
क्यों तोड़ते हो आम-लीची,
अपने बगीचे में क्या कमी है?
मेरा मरा मुंह देखो
जो कल से ईया के बगीचे में जाओ।
क्या उनकी दी हुई कसम
हम चौबीस घण्टों से ज्यादा
याद रख पाये?

नींव पड़ी, दीवार बनी, छत पड़ा -
जीवन के उत्तरार्ध में
जब इमारत पर नज़र डालता हूं
कण-कण में
बाबूजी का अनुशासन
बड़का बाबूजी का प्यार
मां की ममता और
बड़की माई का स्नेह दीख पड़ता है।

इस चतुर्भुज को नमस्कार !
संयुक्त परिवार को नमस्कार !!
शत कोटि नमस्कार !!!

हृदय के अन्तस्तल से नमस्कार !!!!

Sunday, March 23, 2014

आडवानी की मृगतृष्णा

       महाभारत का युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नहीं था। यह धृतराष्ट्र और पाण्डवों के बीच था। युद्ध के पहले भी धृतराष्ट्र ही हस्तिनापुर के राजा थे और युद्ध में अगर कौरवों की जीत हो जाती, तो वे ही राजा बने रहते। वनवास से लौटने के बाद इन्द्रप्रस्थ का राज्य युधिष्ठिर को वापस देने का वचन उन्होंने ही दिया था और उनके ही वचन-भंग का परिणाम महाभारत था। महाभारत के पूर्व भी उन्होंने कई कुटिल योजनायें बनाईं। पाण्डवों को लाक्षागृह में भेजकर जीवित जला देने की योजना उनके ही अनुमोदन के बाद बनी। भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण उनके ही सामने हुआ। वे आंखों से अंधे थे लेकिन अंधा होने का अर्थ यह कदापि नहीं था कि उनकी इच्छायें भी समाप्त हो गई थीं। वे दुर्योधन के माध्यम से सबकुछ देखना चाहते थे और अपनी सारी दबी हुई इच्छाओं की पूर्ति करना चाहते थे। वे इतने स्वार्थी थे कि अपने पुत्र को भी नहीं बक्शा। बड़ी चालाकी और सफ़ाई से उन्होंने अपने दुष्कृत्यों के लिये दुर्योधन को जिम्मेदार ठहराया। श्री मद्भागवद्गीता के अन्त में संजय ने युद्ध के परिणाम की भविष्यवाणी करते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण और गाण्डीवधारी अर्जुन हैं, विजय वही होगी। अन्धे धृतराष्ट्र की आंखें फिर भी नहीं खुलीं। वे मृगतृष्णा के पीछे भागते रहे और युद्ध कराकर ही दम लिया। युद्ध के उपरान्त युधिष्ठिर सम्राट बने और वृद्ध धृतराष्ट्र को आजीवन जंगल में निवास करना पड़ा।

      सत्ता की मृगतृष्णा के पीछे बीजेपी के लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवानी भी धृतराष्ट्र बन गये हैं। बन्द आंखों से वे उन्हें सिर्फ़ प्रधानमंत्री की कुर्सी दिखाई पड़ती है। ईश्वर ने उन्हें लंबी उम्र दी है लेकिन यह उम्र आश्रम-व्यवस्था के अनुसार संन्यास ग्रहण करने की है। नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता से सोनिया जलें, राहुल जलें या केजरीवाल जलें, इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं। लेकिन आडवानी का जलना अनेक प्रश्नचिह्न खड़े करता है। मोदी का बीजेपी के चुनाव-अभियान का राष्ट्रीय संयोजक चुने जाने के तत्काल बाद आडवानी का कोप-भवन में जाना उनकी छोटी सोच का परिचायक था। नरेन्द्र मोदी को बीजेपी ने जब प्रधानमंत्री पद के लिये अपना उम्मीदवार घोषित किया, तो वे पुनः कोप-भवन में गये। अनुशासनहीनता की सारी सीमायें तोड़ते हुए उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को विरोध-पत्र लिखा और उसे भी राजनाथ सिंह को देने के पहले मीडिया को दे दिया। उनकी जगह किसी और ने यह कृत्य किया होता, तो पार्टी उसे कबका बाहर का रास्ता दिखा चुकी होती। लेकिन आगामी आम चुनाव में पार्टी की संभावनायें धूमिल न हों, इसलिये पाटी ने सख्ती नहीं बरती। लेकिन अब तो पानी सिर के उपर बह रहा है। आडवानी और उनकी चाण्डाल-चौकड़ी की हर संभव कोशिश हो रही है कि बीजेपी १६० क्लब में उलझी रहे। ऐसी स्थिति में नीतिश, ममता और नवीन पटनायक के समर्थन से प्रधानमंत्री की कुर्सी पा जाने का दिवास्वप्न आडवानी आज भी देख रहे हैं। लोकसभा के लिये गांधीनगर के बदले भोपाल की सीट का चुनाव करना इसी रणनीति का हिस्सा था। वे मतदाताओं और अपने समर्थकों को स्पष्ट संदेश देना चाहते थे कि मोदी उन्हें पसन्द नहीं हैं और मोदी पर उन्हें विश्वास भी नहीं है। मोदी उन्हें गांधीनगर से हरवा भी सकते हैं। बीजेपी के १६० क्लब के लिये यह उनका आखिरी प्रयास था। दिन-रात चुनाव प्रचार में व्यस्त नरेन्द्र मोदी के अभियान में बाधा डालना ही इसका उद्देश्य था। काफी मान-मनौवल के बाद पार्टी ने इस समस्या को सुलझा लिया, लेकिन मतदाताओं में यह संदेश भेजने में आडवानी सफल रहे कि पार्टी में सबकुछ ठीकठाक नहीं है। धृतराष्ट्र की दृष्टि रखने वाले आडवानी चुनाव के बाद भी किस महाभारत की योजना बनायेंगे, यह भविष्य के गर्भ में है। परन्तु इतना तो सत्य है ही कि उनके इन कृत्यों के कारण उनके समस्त पुण्य क्षीण हो चुके हैं। धृतराष्ट्र जन्मान्ध थे, आडवानी स्वार्थान्ध हैं। महाभारत के बाद धृतराष्ट्र को घनघोर जंगल में गुमनामी के दिन काटने पड़े। मृगतृष्णा के पीछे भाग रहे इक्कीसवीं सदी के धृतराष्ट्र के साथ भी ऐसा ही कुछ हो, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

Wednesday, March 19, 2014

शिशुपाल और केजरीवाल

         दिल्ली का मुख्यमन्त्री बनने के पहले अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस और भ्रष्टाचार-विरोध का एक मुखौटा लगा रखा था जो समय के साथ-साथ तार-तार हो रहा है। कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छुपते। केजरीवाल की हरकतें इस कहावत की सत्यता सिद्ध करती हैं। शक तो तभी होने लगा था, जब केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन दिया था। अब इस शक को साबित करने की आवश्यकता नहीं रह गई है। केजरीवाल के अन्ध मोदी-विरोध ने शक की संभावना छोड़ी ही कहां है? 
महाभारत में एक पात्र है - शिशुपाल। वह श्रीकृष्ण का फ़ुफ़ेरा भाई था। वह कही से भी स्वयं को श्रीकृष्ण से कम नहीं समझता था। श्रीकृष्ण का अद्वितीय व्यक्तित्व उसकी ईर्ष्या का मुख्य कारण था। गुणों में तो वह श्रीकृष्ण का पासंग भी नहीं था लेकिन स्वयं को उनसे कम नहीं आंकता था। भक्ति करने के लिए तो प्रयास की आवश्यकता होती है लेकिन ईर्ष्या के लिये तो कुछ भी नहीं करना होता है। यह स्वभागत विकृति होती है जो दुष्ट-जनों में अत्यधिक मात्रा में पाई जाती है। शिशुपाल की यह ईर्ष्या सार्वजनिक रूप से सामने आई जब पाण्डवों के राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण का चुनाव प्रथम पूजन के लिए किया गया। यह चुनाव सर्वसम्मति से भीष्म पितामह की पहल पर किया था। पूरी सभा ने इसका अनुमोदन किया था। शिशुपाल को जब इसकी सूचना मिली, तो वह उग्र हो गया। अपनी असहमति और नाराज़गी को वह छिपा नहीं सका और यज्ञमंडप में ही उसने अशिष्टता प्रारंभ कर दी। उसने श्रीकृष्ण पर तरह-तरह के आरोप लगाते हुए गाली बकना शुरु कर दिया। पूरा यज्ञमंडप स्तब्ध था। युधिष्ठिर ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन उसने उनकी बात नहीं मानी। उधर वह गाली दे रहा था, इधर श्रीकृष्ण मुस्कुराये जा रहे थे। अर्जुन से श्रीकृष्ण का यह अपमान सहन नहीं हुआ। वे शिशुपाल के वध के लिये आगे बढ़े लेकिन स्वयं श्रीकृष्ण ने उन्हें रोक दिया। अर्जुन को समझाते हुये उन्होंने शिशुपाल को सुनाते हुए कहा -
“अर्जुन! तुम तनिक भी चिन्ता मत करो। यह पापी अपने पापों के कारण स्वयं अपने अन्त को प्राप्त करेगा। यह मेरे प्रति घोर ईर्ष्या-भाव रखता है और प्रत्येक अवसर पर मेरा विरोध ही नहीं करता, मेरा अपमान भी करता है। इसकी माता इसके इस स्वभाव से परेशान रहती है। मैं तो इसका वध कबका कर चुका होता, परन्तु मैं स्वयं अपनी बुआ को दिये गए वचन के कारण विवश हूं। मैंने इसकी मां को वचन दिया है कि मैं इसके सौ अपराध क्षमा करूंगा। परन्तु जैसे ही इसके अपराधों की संख्या सौ के पार जायेगी, मैं तत्क्षण इसका वध कर दूंगा। संभवतः वह दिन आज आ गया है। मैं इसके अपराधों की गिनती कर रहा हूं। शीघ्र ही इसकी संख्या सौ पार करने वाली है। इसका अन्त निकट आ गया है। धैर्य रखो और देखते जाओ।”
श्रीकृष्ण का यह संदेश शिशुपाल और यज्ञमंडप में उपस्थित सभी राजाओं ने स्पष्ट सुना। श्रीकृष्ण का यह वचन शिशुपाल के लिए अन्तिम चेतावनी थी लेकिन उसने सुनकर भी अनसुना कर दिया और अपनी रफ़्तार से गाली बकता रहा। जैसे ही सौ गालियों की सीमा पार हुई उसकी गर्दन उसके धड़ से अलग थी। श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का अन्त कर दिया।
आज मैं सोचता हूं कि आखिर नरेन्द्र मोदी ने अरविन्द केजरीवाल का क्या बिगाड़ा है कि वे घूम-घूमकर, पानी पी-पीकर शिशुपाल की तरह गालियों की बौछार कर रहे हैं। पूरा देश मोदी की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा है। गुजरात को विकास के शिखर पर पहुंचाने के कारण पूरी दुनिया उन्हें विकास पुरुष के रूप में जानती, पहचानती है। उनपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप उनके धुर विरोधी शहज़ादा भी नहीं लगा सकते। अनुशासन और कर्त्तव्यनिष्ठा उनके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग हैं। सुशासन और सुप्रशासन उनके अमोघ अस्त्र हैं। वर्तमान परिवेश में उनका कोई विकल्प नहीं है। भारत की जो दुर्दशा पिछले १० वर्षों में हुई है उसके लिए वे कही से भी जिम्मेदार नहीं हैं। फिर क्या कारण है कि अरविन्द केजरीवाल कांग्रेस और सोनिया गांधी को छोड़कर नरेन्द्र मोदी के पीछे पड़े हुए हैं। अभी तक तो वे मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान सोनिया और अमेरिकी कुबेर फ़ोर्ड के ही एजेन्ट के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि वे शिशुपाल के कलियुगी अवतार हैं। 

Sunday, March 9, 2014

केजरीवाल पहेली

वो कौन है, वो कौन है --
जो झूठ बोले है,
झूठ है ओढ़न, झूठ बिछावन,
झूठ खाए है --
बोलो-बोलो कौन ?
सिब्बल ?
नहीं।
सिंघवी ?
नहीं।
दिग्गी ?
दिग्गी नहीं किज्जी।

वो कौन है, वो कौन है --
जो खुद डर जाता है,
जिम्मेदारी लेकर भी,
जो भाग जाता है।
बोलो-बोलो कौन ?
राहुल ?
नहीं ।
सोनिया?
उहूं।
खुर्शीद  ?
खुर्शीद नहीं अरविन्द।

वो कौन है, वो कौन है --
जो गाली देता है,
गुरु-गोविन्द दोनों को
जो धोखा देता है --
बोलो-बोलो कौन ?
वीपी ?
नहीं ।
लालू ?
उहूं ।
सान्याल ?
सान्याल नहीं केजरीवाल ।

वो कौन है, वो कौन है --
जो ड्रामा करता है,
है विदूषक हीरो का पर,
ख्वाब रखता है ।
बोलो-बोलो कौन ?
महमूद ?
नहीं ।
जानी वाकर ?
नहीं ।
मुकरी ?
मुकरी नहीं कजरी ।

वो कौन है, वो कौन है --
जो भभकी देता है,
देवालय में जाकर भी
जो थूक देता है ।
बोलो-बोलो कौन ?
कुक्कूर ?
नहीं।
गीदड़ ?
उहूं ।
शृगाल ?
शृगाल नहीं केजरीवाल ।

वो कौन है, वो कौन है --
जो सीख देवे है,
खुद ही फेंके पत्थर
औ’ आरोप लगावे है।
बूझो-बूझो कौन ?
पड़ोसी ?
नहीं ।
दुश्मन ?
नहीं ।
बाप ?

बाप नहीं आप ।

Monday, February 24, 2014

कुछ सवाल अरविन्द केजरीवाल से

  अरविन्द केजरीवाल यह हमेशा भूल जाते हैं कि जब आप एक ऊंगली दूसरे की ओर उठाते हैं, तो तीन ऊंगलियां अपने आप स्वयं की ओर उठ जाती हैं। आजकल उनके निशाने पर नरेन्द्र मोदी हैं। लेकिन क्या वे इन सवालों का उत्तर दे सकते है जिनकी अपेक्षा स्वच्छता और पारदर्शिता में विश्वास रखने वाला हर भारतीय करता है -
१. क्या परिवर्तनऔर कबीरनाम के एन.जी.ओ. उनके द्वारा संचालित नहीं होते हैं?
२. क्या कबीरने वर्ष २००५ में १७२००० डालर और वर्ष २००६ में १९७००० डालर अमेरिकी व्यवसायी फ़ोर्ड से प्राप्त नहीं किये?
३. क्या वर्ष २०१० में फ़ोर्ड से ही उन्होंने २००००० डालर नहीं वसूले?
३. क्या फ़ोर्ड एक चतुर व्यवसायी नहीं है? उसने इतने डालर केजरीवाल को क्यों दिए?
४. क्या दूसरे देशों की सरकार को अस्थिर करने और अराजकता फैलाने वाले अमेरिकी एन.जी.ओ. आवाज़से केजरीवाल के संगठन के अन्तरंग सम्बन्ध नहीं हैं?
५. क्या लीबिया, मिस्र और सीरिया में गृहयुद्ध कराकर अराजकता के माध्यम से सत्ता परिवर्तन कराने के लिये आवाज़जिम्मेदार नहीं है?
६. क्या अमेरिकी सरकार के इशारे पर फ़ोर्ड समेत सारे पूंजीपति आवाज़’, जिसका बज़ट हिन्दुस्तान के आम बजट से
ज्यादा है, को आर्थिक मदद नहीं करते हैं?
७. क्या यहुदी-अमेरिकी खूबसूरत युवती शिमिरित ली से केजरीवाल के  संबन्ध नहीं हैं?
८. क्या शिमिरित आवाज़और सी.आई.ए. की एजेन्ट नहीं है?
९. क्या शिमिरित ने केजरीवाल और सिसोदिया की संस्था कबीरसे जुड़कर चार महीने तक अन्ना आन्दोलन में सक्रिय योगदान नहीं किया?
१०. क्या कुख्यात अमेरिकी संस्था आवाज़के आदेश पर शिमिरित ने मिस्र जाकर अराजक आन्दोलन के माध्यम से सत्ता परिवर्तन में हिस्सेदारी नहीं की?
११. क्या सन २००५ में कपिल सिब्बल के एजेन्ट स्वामी अग्निवेश ने सोनिया गांधी के राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का सदस्य बनवाने के लिये केजरीवाल की लाबिंग नहीं की?
१२. क्या केजरीवाल का स्थानान्तरण दिल्ली के बाहर न करने के लिये सोनिया गांधी ने सिफ़ारिश नहीं की?
१३. क्या अरविन्द केजरीवाल की बैचमेट पत्नी सुनीता केजरीवाल पिछले २० वर्षों से आयकर आयुक्त/उपायुक्त के पद पर दिल्ली में ही पदस्थापित नहीं हैं।
१४. क्या उनका स्थानान्तरण नहीं होना सोनिया गांधी की सिफ़ारिश का नतीजा नहीं है?
१५. क्या केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनते ही अपने लिये १० बीएचके का मकान पसन्द नहीं किया था?
१६. क्या उस १० बीएचके के मकान के नवीनीकरण में दिल्ली की सरकार/जनता के २० लाख रुपए खर्च नहीं हुए, जो बेकार चले गए?
१७. क्या आम आदमी के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की सुरक्षा में यूपी और दिल्ली की सरकारों ने ४९ दिनों में २ करोड़ से ज्यादा खर्च नहीं किये?
१८. क्या केजरीवाल और उनके मंत्रियों ने अपने कार्यकाल के दौरान सरकारी गाड़ियों और सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं किया?
१९. क्या लालू, मुलायम, मायावती, वाड्रा, राहुल, सोनिया, चिदम्बरम, ए.राजा........ दूध के धुले हैं? यदि नहीं तो सोनिया गांधी का नाम अरविन्द की ज़ुबान पर क्यों नहीं आता?
२०. क्या कुख्यात नक्सलवादी विनायक सेन देशद्रोही नहीं है? उसपर चुप्पी का क्या रहस्य है?
२१.  कश्मीर को पाकिस्तान को देने की मांग करनेवाला शान्ति भूषण वकील क्या  पाकिस्तान का एजेन्ट नहीं है?
२२. बिजली का बिल हाफ़ करने की घोषणा के बाद ४९ दिनों के कार्यकाल में फ़ंड अवमुक्त किये बिना इस्तीफ़ा दे देना दिल्ली की जनता के साथ विश्वासघात नहीं है?
२३. क्या दिल्ली की जनता को अब बिजली का पूरा बकाया सरचार्ज के साथ के साथ नहीं देना पड़ेगा?
२४. क्या पांच सद्स्यों वाला परिवार एक दिन में कम से कम एक हज़ार लीटर पानी की खपत नहीं करता है? यदि हां, तो बीस हज़ार लीटर प्रति माह प्रति परिवार मुफ़्त पानी की घोषणा एक छलावा नहीं थी?
२५. अपनी की गई घोषणओं के क्रियान्यवन को सुनिश्चित किये बिना बहाना बनाकर त्यागपत्र दे देना, क्या जनता के साथ धोखा नहीं है?
२६. क्या यह सच नहीं है कि केजरीवाल एक भगोड़ा हैं?
२७. क्या केजरीवाल हमेशा जिम्मेदारी से भागते नहीं हैं?
२८. क्या यह सच नहीं है कि वे हमेशा दूसरों को गाली देने के अलावे कोई दूसरा काम नहीं कर सकते?
२९. क्या यह सच नहीं है कि उन्होंने भ्रष्टाचार की जननी कांग्रेस और सोनिया गांधी की मदद से दिल्ली की सत्ता हासिल की?
३०.क्या यह सच नहीं है कि उन्होंने महान सन्त अन्ना हजारे को धोखा नहीं दिया?
३१. क्या यह सत्य नहीं है कि वे सोनिया गांधी के इशारे पर नरेन्द्र मोदी की राह में रोड़े बिछा रहे हैं?
      दो हजार वर्ष पूर्व प्लेटो ने सुकरात से पूछा था कि एथेन्स का सबसे बड़ा संकट क्या है? सुकरात का उत्तर था - शब्दों का अन्धाधुन्ध प्रयोग? बोलने के लिये सिर्फ़ वाणी की आवश्यकता होती है। सत्य बोलने के लिये वाणी और विवेक, दोनों की आवश्यकता होती है।

     


Tuesday, January 21, 2014

आओ धरना-धरना खेलें

सत्ता पाये भ्रष्टों के बल,
मुंह तो अब छुपाना है,
मूर्ख बनाओ जी भर-भर के,
धरना एक बहाना है।
जी भर नूरा कुश्ती खेलें,
आओ धरना-धरना खेलें। (१)
झुंझलाकर के सड़क पर बैठे,
मुझे छोड़कर सभी चोर हैं,
एक उठे पराये पर जब,
तीन ऊंगलियां अपनी ओर हैं।
भ्रष्टातंकी पाले चेले --
आओ धरना-धरना खेलें। (२)
कहां गई सस्ती बिजली,
कहां गया मुफ़्ती पानी,
कहां गया वह लोकपाल,
कहां गया झूठा दानी?
देखें दिल्ली कबतक झेले --
आओ धरना-धरना खेलें। (३)
नगर देहली रोटी सेके,
गाज़ियाबाद में चूल्हा,
बाराती हैं रजधानी में,
गायब रहता दूल्हा।
सड़क जाम लगायें ठेले --
आओ धरना-धरना खेलें। (४)
पेट नहीं भरता भाषण से,
दशकों से सुनते आये हैं,
झूठे वादे, झूठे सपने,
अबतक हम इतना पाये हैं।
कड़वा थू-थू, मीठा ले लें --

आओ धरना-धरना खेलें। (५)

Tuesday, January 14, 2014

एक पाती अन्ना काका के नाम

पूजनीय काका,
                                         चरण-कमलों में सादर परनाम!
      आगे काका के मालूम हो कि ईहां का समाचार अच्छा है, हम राजी खुशी हैं। बस, ठंढ़िए कभी-कभी वाणप्रस्थी हडियन में समा जाती है। काका, तुम तो जानते ही हो कि अपनी दिहाड़ी की मज़दूरी से सिर्फ नून, तेल और लकड़ी का ही इन्तज़ाम हो पाता है। तोहार चेलवा दिल्ली का मुख्यमंत्री बन गया है। आम आदमी है, इसलिये बड़े अरमान से एगो चिट्ठी लिखकर खिचड़ी पर कुछ पैसा-कौड़ी मनीआर्डर से भेजने का निवेदन किया था। का बतायें काका, ई परब-त्योहार हमलोगों के गले का फांस बनकर आता है। अपने घर खाने के लिये नून-रोटी-मुरई लेकिन बहिनौरा और फुफु के यहां चिऊड़ा, लाई, मिठाई, आलू, गोभी, मटर, दाल आऊर कुछ नकदी अगर खिचड़ी पर न भेजी जाय, तो बहन-बुआ की जगहंसाई तो होगी ही, बहनोई और फुफा शादियो-बियाह में आना बन्द कर देंगे। इहे कुल्ही सोच के अरविन्दजी को एक पाती लिखे रहे। लेकिन ऊ कौनो जवाबे नहीं दिये। अब तो ऊ सचिवालय की छत से जनता दरबार चला रहे हैं। का करते; उधार-पाईंच लेकर खिचड़ी भेज दिये।
      काका, एक बात हमरी समझ में नहीं आ रही है। ई तोहार टोपिया केजरीवलवा लेकर कैसे भाग गया? हम तोहके बचपन से देख रहे हैं। तुम्हरी टोपी तो झकाझक सफेद हुआ करती थी, अभी भी है। उसपर कवनो भाषा में कुछ लिखा नहीं रहता था। आदर्श, चरित्र और ईमानदारी की कोई भाषा तो होती नहीं। गांधीजी की टोपी पर भी एको अच्छर नहीं लिखा था। अगर वे कुछ लिखवाते भी, तो उसपर रामराज्य ही लिखवाते। लेकिन वे जानते थे कि कांग्रेस के काले-भूरे अंग्रेज उसको लाइक नहीं करेंगे। सो, उन्होंने टोपिया को ब्लैंक ही छोड़ दिया। बाद में जवाहर लाल नेहरू ने टोपिया हथिया ली। उसपर कभी सेकुलरिज्म लिखा, तो कभी समाजवाद। बड़े आराम से तीन पीढ़ी राज की। चौथी पीढ़ी करने को तैयार है। काका, जब तुम्हरी टोपिया केजरिवलवा किडनैप कर रहा था, तो तुम्हारी समझ में का कुच्छो नहीं आया? पहिले उसपर लिखा - मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना। इन्कम टैक्स कमिश्नर को चेला बनाकर तुम भी खूब खुश हुए थे। जब टोपिया पर वह आम आदमी लिखवाया, तब तुम्हारी आंख खुली। तब तक तो बहुत देर हो चुकी थी; वह आम आदमी छाप, अन्ना टोपी का पेटेन्ट करा चुका था। गांधी जी की पार्टी में औरतें टोपी नहीं पहनती थीं। इसने तो औरतों को भी टोपी पहना दी है। हिम्मत तो देखो इसकी, जिस लोकपाल को खून-पसीना, अनशन-आन्दोलन, जूस-पानी से सींचकर तुमने राहुल बबुआ की मदद से संसद से पास कराकर रिकार्ड पीरियड में पर्णबो मुखर्जी से दस्तखत करा लिया, उसी को वह बकवास कह रहा है। माना कि उसमें न एनजीओ है, न मीडिया है और न कारपोरेट घराना। फिर भी कुछ तो है। उसकी नीयत ठीक नहीं है। तुम जब दिल्ली में अनशन करते थे, तो वह रतिया में गाज़ियाबाद पहुंच जाता था। बीवी के साथ मालपुआ खाता था और फिर भिनसहरे तुम्हारे पास हाज़िर हो जाता था। तुम तो ठहरे भोले बाबा। स्वामी अग्निवेश को भी अपने साथ बिठा लिया था। वह तो भला हो पुलिस कप्ताईन किरण बेदी का। पता नहीं कैसे कैमरा अग्निवेशवा के घर पर लगवा दी, स्वामी-सिब्बल वार्त्तालाप तो टेप किया ही, फोटुआ भी खींच लिया। न्यूज चैनलों को वीडियो भी दे दिया। तब जाकर तुम्हारा आन्दोलन बचा। वह भेदिया तो केजरीवाल की मदद से तुम्हारे बगल का आसन तो हथियाइये लिया था। उसने भी केजरीवाल की काफी मदद की थी। सोनिया भौजी की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद का मेम्बर बनवाने के लिये उसने एड़ी-चोटी एक कर दी थी। एक बार भौजी के साथ चाय भी पिलवाई थी। तुमने उसे पहचाना, लेकिन देर से। इससे अब कम से कम इतना तो फायदा होगा ही कि वह तुम्हारी झकाझक सफ़ेद धोती और कुर्ते का अपहरण नहीं कर पायेगा।
      काका, ई जाड़ा-पाला का दिन जब बीत जाय, तो अपनी सेहत को ध्यान में रखते हुए देश के लिये कुछ करने का मन बनाओ। केजरीवलवा तो क्वीन का प्यादा बन गया, आम से खास हो गया, प्रशान्त भूषणवा कश्मीर पाकिस्तान को दे रहा, ऊ विदूषक का क्या नाम है ...... कुमार विश्वास। कुछ ही दिन पहले नरेन्दर मोदी को सामने बैठाकर राग दरबारी की कवितायें सुना रहा था, अब नक्सलवादी विनायक सेन के कसीदे काढ़ रहा है। शहज़ादा के खिलाफ़ चुनाव लड़ेगा, लखनऊ के फाइव-स्टार होटल से। सुना है उस होटल के एक कमरे का एक दिन का किराया ५००० रुपिया है। रुपये-पैसे की चिन्ता अब आम आदमी को क्यों होगी? सैंया भये कोतवाल ........। कही खुदा-न-खाश्ते पैसे की कमी पड़ भी गई, तो अमेरिका का एनजीओ आवाज़और महादानी फ़ोर्ड किस काम आयेंगे। काका, फ़ोर्ड को तो आप जानते ही होंगे। आपके चेले के एनजीओ परिवर्तनऔर कबीरके लिये उसने अबतक साढे तीन लाख डालर से ज्यादा पैसे दिये हैं। चलते-चलते आवाज़के बारे में भी बता दें। अमेरीकी पूंजीपतियों के द्वारा स्थापित यह संगठन अमेरिकी हितों के लिये विदेशी सरकारों को गिराकर अव्यवस्था फैलाने का काम करती है। इसका बजट भारत के वार्षिक बजट से ज्यादा है। जैसमिन क्रान्ति के नाम पर मिस्र, लीबिया और सीरिया के गृहयुद्ध में इसका प्रत्यक्ष योगदान है। काकू, चुप बैठने का समय नहीं है। अभी नहीं, तो कभी नहीं। तुमने राष्ट्र-सेवा का व्रत ले रखा है। अब जब सारा राष्ट्र नरेन्दर मोदी के नेतृत्व में राष्ट्र निर्माण का संकल्प ले रहा है और बहुरुपिया केजरीवाल को आगे कर भ्रष्ट वंशवाद, प्रौक्सी वार की तैयारी कर रहा है, चुप बैठना या तटस्थ रहना ऐतिहासिक भूल होगी। जिस भूमिका का निर्वाह श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में किया था, उसी भूमिका में आओ। आओ अन्ना, आओ, देर मत लगाओ।
      ई पाती जरुरत से ज्यादा ही लंबी हो गई। भारत में कवनो चीज छोटे में कब खत्म होती है। रामजी के राज मिलल -चौदह साल के बाद, पाण्डवन के राज मिलल - तेरह साल के बाद, उहो सबकुछ गंववला के बाद और आज़ादी भी मिली, त उहो एक हज़ार साल बाद - भारत माता के अंग-भंग के साथ. सुराज का मौका ६५ साल के बाद उपस्थित हुआ है। मैं इन्हीं आंखों से, इसी देह से भारत माता को परम वैभव पर आसीन होते देखना चाहता हूं। भतीजे की ख्वाहिश पूरी करो काका। छोटी मुंह बड़ी बात। अगर गलती हो गई हो तो माफ़ करना। छमा बड़न को चाहिये, छोटन को अपराध।
      पाती बन्द करता हूं। थोड़ा लिखना, ज्यादा समझना। बाल-बच्चे और तोहरी बहुरिया तोके पयलग्गी बोल रहे हैं। अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना। उमर भी कोई चीज है। किसी के चढ़ावे में आकर अन्न-जल जिन त्यागना। तुम्हारी हुंकार ही काफी है। शेष कुशल। इति शुभ।
            तोहार भतीजा - चाचा बनारसी