Saturday, December 21, 2013

एक पाती राहुल बबुआ के नाम

      स्वस्ति श्री लिखीं चाचा बनारसी के तरफ़ से राहुल बबुआ को ढेर सारा प्यार, दुलार, चुम्मा। इहां हम राजी-खुशी हैं और उम्मीद करते हैं कि तुम भी अरविन्द-नमो के झटके से उबरने की कोशिश कर रहे होगे। बचवा, राजनीति में हार-जीत तो लगी ही रहती है। तुम्हारी दादी को भी राजनारायण ने १९७७ में तुम्हारे खानदानी गढ़, रायबरेली में ही पटखनी दे दी थी। लेकिन ढाई साल के बाद उन्होंने दुबारा दिल्ली दरबार पर कब्ज़ा किया। तुम दिलेरी से काम लो। दिल छोटा न करो। अपनी स्टाइल मत बदलो। अमिताभ बच्चन यंग्री यंगमैन की इमेज के कारण ही सुपर स्टार, मेगा स्टार और मिलेनियम स्टार बन गया। आज भी बहुतों को करोड़पति बना रहा है। तुम भी राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के चुनाव के पहले जब बांह चढ़ाकर भाषण देते थे, तो मुझे जवानी का अमिताभ बच्चन ही दिखाई देता था। दागी नेताओं को बचाने वाले मनमोहन के अध्यादेश को जब तुमने फाड़ कर कूड़ेदान में फेंक दिया था, तो मेरा मन बाग-बाग हो गया था। मुझे पूरी उम्मीद हो गई थी कि जनता को यह अदा जरूर पसन्द आयेगी। लेकिन एहसान फ़रामोश जनता नमो और केजरीवाल के बहकावे में आ गई। उसने तुम्हारे समर्पण और त्याग के बारे में सोचा तक नहीं। भरी जवानी में तुम कुंआरे हो, गर्ल फ़्रेन्ड कैलिफोर्निया में बैठी है। तुम्हारी उमर के लड़के जिन्स-शर्ट पहनकर हर वीक-एन्ड में डेटिंग करते हैं। हिन्दुस्तान में रहकर तुम यह भी नहीं कर पाते हो। मोटी खादी का सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहनना तुम्हारे पेशे की मज़बूरी है। हिन्दुस्तान का शहज़ादा होने बा्वजूद  भी तुम कलावती के घर भोजन करते हो। इस बेवफ़ा पब्लिक ने सबकुछ भुला दिया और दौड़ पड़ी एक चाय वाले के पीछे। लेकिन निराश होकर स्टाइल बदलने की कवनो ज़रूरत नहीं है। बांह चढ़ाते रहो, कागज फाड़ते रहो, बुन्देलखण्ड में कलावती-रमावती के हाथ की रोटी खाते रहो। रामचन्द्र भी शबरी का जूठा बेर खाने के बाद ही रावण को जीत पाये थे। अमिताभ बच्चन भी कई फ़्लाप फिल्म देने के बाद ही मेगा स्टार बन पाया। कभी-कभी बियाह के बाद भी सितारे चमकते हैं। अमिताभे बच्चन का केस ले लो। जया भादुड़ी से बियाह के बादे वह चमका। तुम भी बियाह कर लो। हिन्दुस्तान की तो कैटरीना कैफ़ भी तुम्हे नहीं भायेगी। तुम्हारे परनाना को लेडी माउन्टबेटन भाती थीं, तुम्हारे वालिद को इटालियन पसन्द आई, तुम अगर कैलिफ़ोर्निया से बहू लाते हो, तो मुझे कोई एतराज़ नहीं होगा। रही बात पब्लिक की, तो इतना गांठ बांध लो - अभी भी यह जनता गोरी चमड़ी को अपना आका मानती है, अंग्रेजी को अपनी भाषा और कोट-टाई को नेशनल ड्रेस। मेरी बात पर अगर शक-सुबहा हो, तो अपनी मम्मी से ही पूछ लेना। इसीलिये हम सलाह दे रहे हैं कि बचवा, बियाह कर ही लो। अगर नहीं करोगे, तो अटल बिहारी वाजपेयी की तरह लंबा इन्तज़ार करना पड़ेगा। २०१४ के चुनाव का इन्तज़ार मत करो। जो करना है, अभी कर लो। उम्मीद का दामन मत छोड़ना। मरता वही जिसकी आशा मर जाती है। मीटिंग में माईक थामते ही गीत गाना - वो सुबहा कभी तो आयेगी ........।
      समलैंगिकों का दिल से समर्थन करके तुमने बहुत अच्छा काम किया। सुप्रीम कोर्ट के ये बुढ़वे जज जवानों के ज़ज़्बातों की कोई परवाह ही नहीं करते। तुमने जवानों का मिज़ाज़ बढ़िया से भांपा है। यह काम सांप्रदायिकता वाले विधेयक लाने से भी ज्यादा फलदायी है। तुम चाहे मुसलमानों के लिये जान भी दे दो, वे बिहार में नीतिश और यू.पी. में मुलायम को ही वोट देंगे। बाकी जगह जो बी.जे.पी. को हरायेगा उसको देंगे। तुम्हारे इस बिल से हिन्दू नाराज़ होंगे अलग से। मोदी की तलवार पर काहे को सान चढ़ा रहे हो। समलैंगिकता पर ही ध्यान लगाओ तो अच्छा। इसमें न हिन्दू का भेद है, न मुसलमान का, न सिक्ख का न इसाई का। तुम एक धर्म बनाओ - गे धर्म। इसका प्रचार-प्रसार करो। सब पीछे रह जायेंगे। तुम्हारा वोट बैंक इतना मज़बूत हो जायेगा कि अरविन्द केजरीवाल, नरेन्दर मोदी, बाबा रामदेव और बुढ़ऊ अन्ना भी एकसाथ मिलकर तुम्हारा मुकाबला नहीं कर सकते। आगे बढ़ मेरे पप्पू, समलैंगिक तुम्हारे साथ हैं। ज़िन्दगी में पहली बार तुमने लीक से हटकर हिम्मत का काम किया है। कामयाबी तुम्हारे कदमों का बोसा ले। जियो राजा।
      खत में ज्यादा राज़ की बातें लिखना ठीक नहीं है। इस देश में तो बज़ट भी लीक होता है और सुप्रीम कोर्ट का जजमेन्ट भी। इसलिये मिलने पर चाचा-मन्त्र दूंगा। थोड़ा लिखना, ज़्यादा समझना। भौजी को जै राम जी की कहना। अपना खयाल रखना। इति शुभ।
            तुम्हारा अपना - चाचा बनारसी।

      

Saturday, December 14, 2013

सपनों का सौदागर - अरविन्द केजरीवाल

  भोजपुरी में एक कहावत है - ना खेलब आ ना खेले देब, खेलवे बिगाड़ देब। इसका अर्थ है - न खेलूंगा, न खेलने दूंगा; खेल ही बिगाड़ दूंगा। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी ‘आप’ ने चुनाव के बाद गैर जिम्मेदराना वक्तव्य और काम की सारी सीमायें लांघ दी है। दिल्ली में पिछले १० वर्षों से कांग्रेस सत्ता में थी। वहां की दुर्व्यवस्था, भ्रष्टाचार और निकम्मेपन के लिये कांग्रेस और सिर्फ कांग्रेस ही जिम्मेदार है। इस चुनाव में दिल्ली की जनता ने कांग्रेस के खिलाफ़ मतदान किया जिसकी परिणति आप के उदय और भाजपा का सबसे बड़े दल के रूप में उभरना रही। इस समय आप के नेताओं के बयान कांग्रेस के विरोध में न होकर पूरी तरह भाजपा के अन्ध विरोध में आ रहे हैं। भाजपा की बस इतनी गलती है कि उसने अल्पसंख्यक सरकार बनाने से इन्कार कर दिया है। बस, यही बहाना है ‘आप’ के पास असंसदीय शब्दों में गाली-गलौज करने का। श्री हर्षवर्धन और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के धैर्य और संयम की प्रशंसा करनी चाहिये कि उन्होंने अबतक शालीनता का परिचय देते हुए गाली-गलौज से अपने को दूर रखा है।
      आज मुझे यह कहने में न तो कोई झिझक हो रही है और न कोई संकोच कि अरविन्द केजरीवाल विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना हैं। वे दो एन.जी.ओ. - ‘परिवर्तन’ तथा ‘कबीर’ और एक क्षेत्रीय पार्टी ‘आप’ के सर्वेसर्वा हैं। उनकी संस्थायें विदेशी पैसों से चलती हैं। उन्होंने अपनी संस्थाओं के लिये फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन, अमेरिका से वर्ष २००५ में १७२००० डालर तथा वर्ष २००६ में १९७००० डालर प्राप्त किये जिसके खर्चे का हिसाब-किताब वे आज तक नहीं दे पाये हैं, जबकि उक्त धनराशि प्राप्त करने की बात उन्होंने स्वीकार की है। फ़ोर्ड एक मंजे हुए उद्यमी हैं। बिना लाभ की प्रत्याशा के वे एक फूटी कौड़ी भी नहीं दे सकते। केजरीवाल की संस्थाओं के संबन्ध विश्व के तीसरे देशों की सरकारों को अस्थिर कर अमेरिकी हित के अनुसार सत्ता परिवर्त्तन कराने के लिये बेहिसाब धन खर्च करनेवाली कुख्यात संस्था ‘आवाज़’ से है। ‘आवाज़’ एक अमेरिकी एन.जी.ओ. है जिसका संचालन सरकार के इशारे पर वहां के कुछ बड़े उद्योगपति करते हैं। इस संस्था का बजट भारत के आम बजट के आस-पास है। यह संस्था अमेरिका के इशारे पर अमेरिका या पश्चिम विरोधी सरकार के खिलाफ Paid Agitation चलवाती है, वहां व्यवस्था और संविधान को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है और अन्त में अपनी कठपुतली सरकार बनवाकर सारे सूत्र अपने हाथ में ले लेती है। जैसमिन रिवोल्यूशन के नाम पर इस संस्था ने लीबिया में सत्ता-परिवर्त्तन किया, तहरीर चौक पर आन्दोलन करवाया, मिस्र को अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति में ढकेल दिया तथा सीरिया में गृह-युद्ध कराकर लाखों निर्दोष नागरिकों को भेड़-बकरी की तरह मरवा दिया। वही पश्चिमी शक्तियां ‘आवाज़’ और फ़ोर्ड के माध्यम से केजरीवाल में पूंजी-निवेश कर रही हैं। यही कारण है कि कांग्रेस द्वारा बिना शर्त समर्थन देने के बाद भी अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में सरकार बनाने से बार-बार इन्कार कर रहे हैं। उन्होंने दिल्ली की जनता से जो झूठे और कभी पूरा न होनेवाले हवाई वादे किये हैं, वे भी जानते हैं कि उन्हें पूरा करना कठिन ही नहीं असंभव है। दिल्ली की जनता ने उन्हें ७०/७० सीटें भी दी होती, तो क्या वे बिजली के बिल में ५०% की कटौती कर पाते, निःशुल्क पानी दे पाते या बेघर लोगों को पक्का मकान दे पाते? मुझे पुरानी हिन्दी फिल्म श्री ४२० की कहानी आंखों के सामने आ जाती है - नायक ने बड़ी चालाकी से बंबई के फुटपाथ पर सोनेवालों में इस बात का प्रचार किया कि गरीबों की भलाई के लिये एक ऐसी कंपनी आई है जो सिर्फ सौ रुपये में उन्हें पक्का मकान मुहैया करायेगी। गरीब लोगों ने पेट काटकर रुपये बचाये और कंपनी को दिये। लाखों लोगों द्वारा दिये गये करोड़ों रुपये पाकर कंपनी अपना कार्यालय बन्द कर भागने की फ़िराक में लग गई। फुटपाथ पर सोने वालों का अपना घर  पाने का सपना, सपना ही रह गया। राज कपूर ने आज की सच्चाई की भविष्यवाणी सन १९५४ में ही कर दी थी। आज भी तमाम चिट-फंड कंपनियां सपने बेचकर करोड़ों कमाती हैं और फिर चंपत हो जाती हैं। अरविन्द केजरीवाल भी सपनों के सौदागर हैं। इस खेल में फिलवक्त उन्होंने कम से कम दिल्ली में इन्दिरा गांधी और सोनिया गांधी को मात दे दी है। वे राजनीति की प्रथम चिट-फंड पार्टी के जनक है। तभी तो कांग्रेस द्वारा समर्थन दिये जाने के बाद भी, २८+८=३६ का जादुई आंकड़ा छूने के पश्चात भी राज्यपाल से मिलने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। दिल्ली की अधिकारविहीन सरकार के पास गिरवी रखने के लिये  है भी क्या? कोई ताजमहल भी तो नहीं है। वे चन्द्रशेखर की तरह भारत के प्रधान मंत्री भी नहीं होंगे जो देश के संचित सोने को गिरवी रखकर कम से कम चार महीने अपनी सरकार चला ले।

      जिस अन्ना हजारे के कंधे पर खड़े होकर उन्होंने प्रसिद्धि पाई, उसी का साथ छोड़ा। अन्ना ने पिछले साल ६ दिसंबर को संवाददाता सम्मेलन में केजरीवाल को स्वार्थी और घोर लालची कहा था। अन्ना कभी झूठ नहीं बोलते। केजरीवाल का उद्देश कभी भी व्यवस्था परिवर्त्तन नहीं रहा है। सिर्फ हंगामा खड़ा करना और अव्यवस्था फैलाना ही उनका मकसद है। भारत को सीरिया और मिस्र बनाना ही उनका लक्ष्य है। साथ देने के लिये सपना देखने वाले गरीब, हत्या को मज़हब मानने वाले नक्सलवादी और पैन इस्लाम का नारा देनेवाले आतंकवादी तो हैं ही। लेकिन पानी के बुलबुले का अस्तित्व लंबे समय तक नहीं रहता। जनता सब देख रही है। जिस जनता ने राहुल की उम्मीदों पर झाड़ू फेर दिया है, अपनी उम्मीदों और सपनों के टूटने पर सपनों के सौदागर केजरीवाल के मुंह पर भी झाड़ू फेर दे, तो कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं होगा। शुभम भवेत। इति।

मल्लिका, शहज़ादा और समलैंगिकता

     समलैंगिक संबन्धों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के खिलाफ़ एक बार सारी अनैतिक शक्तियां एकजूट हो रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को विवादास्पद बनाने की मुहीम में समलैंगिकों के साथ मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान, शहज़ादा-ए-हिन्दुस्तान और दिल्ली के बेताज़ बादशाह भी शामिल हो गये हैं। नीचे पेश है, उनके वक्तव्य -
      ‘दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को पलटने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से निराशा हुई है। लेकिन उन्हें उम्मीद है कि संसद इस मामले को सुलझायेगी और देश के सभी नागरिकों के (विशेष रूप से समलैंगिकों के) अधिकारों की स्वतंत्रता की रक्षा करेगी, जिसमें वे नागरिक भी शामिल हैं जो इस फ़ैसले से सीधे प्रभावित हुए हैं’।’
                        --सोनिया गांधी, अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, नई दिल्ली, दिनांक १२-१२-२०१३
      ‘वे दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले से सहमत हैं, जिसने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था। सरकार दिल्ली हाईकोर्ट के भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७ पर दिए गए फ़ैसले को बहाल करवाने के लिए सभी विकल्पों पर विचार कर रही है।"
                        ---- राहुल गांधी, उपाध्यक्ष,  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, नई दिल्ली, दिनांक १२-१२ २०१३
      ‘आम आदमी पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सहमत नहीं है। यह फ़ैसला संविधान के उदार मूल्यों के विपरीत और मानवाधिकारों का हनन करने वाला है। आप ने उम्मीद जताई है कि शीर्ष अदालत अपने फ़ैसले की समीक्षा करेगी और साथ ही संसद भी कानून को बदलने के लिये कदम उठायेगी।"
                        ---- प्रवक्ता, आप, नई दिल्ली, दिनांक १२-१२-२०१३
      उपरोक्त अधिकृत वक्तव्यों की विस्तार से व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है।  देश का अनपढ़ आदमी भी उनके संदेश और मन्तव्य को समझ सकता है। ये वक्तव्य देश के उन नेताओं के हैं जो देश की सरकार चला रहे हैं या जनता की नई आवाज़ होने का दावा कर रहे हैं। मेरे इस लेख का मकसद देश के इन शीर्ष नेताओं की मानसिकता से देश को अवगत कराना है।
      कांग्रेस ने आरंभ से ही अपने देश की संसकृति, सभ्यता और अखंडता को खंड-खंड करने का कभी सफल, तो कभी असफल प्रयास किया है। बांग्ला देश और पाकिस्तान १४ अगस्त, १९४७ के पूर्व अखंड भारत के ही हिस्से थे। देश के विभाजन का अक्षम्य अपराध कांग्रेस ने किया, सज़ा तीनों देशों के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक, आज तक भुगत रहे हैं। कांग्रेस ने इस पाप के लिये आजतक न माफ़ी मांगी है और न खेद प्रकट किया है। भारतीय सभ्यता, संस्कृति और भाषा से इनका रिश्ता हमेशा छ्त्तीस का रहा है। बड़े दुःख के साथ इतिहास के पुराने पन्ने खोलने पड़ रहे हैं। जवाहर लाल नेहरू की रंगीन मिज़ाज़ी के प्रमाण अनेक पुस्तकों और लेडी माउन्टबैटन के साथ उनके प्रकाशित प्रेम-पत्रों में दर्ज़ है, जिन्हें नेट पर जाकर कोई भी पढ़ सकता है। पत्नी कमला नेहरू के देहान्त के बाद भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की पुत्री पद्मजा नायडू से नेहरूजी के रिश्ते पत्नी की तरह थे। उनके प्रधान मंत्री बनने के बाद वे उनके साथ त्रिमूर्ती भवन में ही रहती थीं। नेहरूजी ने उनसे वादा किया था कि देश आज़ाद होने के बाद वे उनसे शादी कर लेंगे। लेकिन लेडी माउन्ट्बैटन के भारत आगमन के बाद सारे समीकरण बदल गये। जैसे-जैसे नेहरूजी और लेडी वायसराय के संबन्ध अन्तरंग होते गए, पद्मजा दूर होती गईं। एक दिन पद्मजा ने रोते हुए त्रिमूर्ति भवन हमेशा के लिये छोड़ दिया। नेहरूजी की बेवफ़ाई को जीवन भर सीने से लगाकर उन्होंने कुंवारा और एकाकी जीवन ही व्यतीत किया। और भी किस्से हैं ...........चर्चा फिर कभी।
      इन्दिरा गांधी ने नेहरू जी की इच्छा के खिलाफ़ विधर्मी से व्याह रचाया। महात्मा गांधी ने नव दंपत्ति का गांधीकरण किया, सिर्फ़ नाम से, जो आज भी चल रहा है। एक पुत्र की उत्पत्ति के बाद यह संबन्ध भी सिर्फ कागज पर ही रह गया। फ़िरोज़ गांधी को अकेले ही जीना पड़ा। विवाहेतर संबन्धों पर मौन ही रहा जाय तो अच्छा।
      युवा हृदय सम्राट राजीव गांधी को कोई स्वदेशी लड़की कभी भायी ही नहीं। खानदान में अबतक हिन्दू और मुसलमान का ही प्रवेश हुआ था। अब विदेशी क्रिश्चियन की बारी थी। उन्होंने इस कमी की पूर्ति की। धर्म निरपेक्षता के लिये यह आवश्यक भी था। सोनिया गांधी भारत की राजमाता (खुर्शीद आलम के शब्दों में) बनीं। शहज़ादा पीछे क्यों रहते? उन्हें हार्वार्ड यूनिवर्सिटी के अपने असफल शिक्षा-अवधि के दौरान कैलिफोर्नियायी गर्ल-फ्रेन्ड पसन्द आई। शादी हिन्दुस्तान के शहन्शाह बनने के बाद होनी थी। फिलहाल नमो ने सारा खेल बिगाड़ दिया है। अब आशा के केन्द्र समलैंगिक रह गये हैं। आम जनता ने तो चार राज्यों में धूल चटा दी है, अब समलैंगिक वोट-बैंक ही शायद नैया पार लगाये।
      इस मामले में सपनों के सौदागर अरविन्द केजरीवाल पीछे क्यों रहते। उनके प्रवक्ता कहते हैं कि युगों-युगों से विश्व के हर कोने में समलैंगिक संबन्ध रहे हैं। अतः इसे वैधानिकता प्रदान करना आवश्यक है। कोई इनसे पूछे कि क्या युगों-युगों से बलात्कार, वेश्यावृत्ति, हत्या, लूटपाट और भ्रष्टाचार का अस्तित्व नहीं रहा है? क्या इनको वैधानिक मान्यता देना आवश्यक नहीं है? केजरीवाल पिछले चुनाव में भाजपा से ४ सीटें कम पाकर दूसरे नंबर पर हैं। सरकार बना नहीं पा रहे हैं। शायद समलैंगिक वोट-बैंक पर उनकी भी नज़र हो।
      देश के हिन्दू और मुसलमान किसी विषय पर विरले ही एकमत होते हैं। अगर ये दोनों समुदाय समलैंगिक संबन्धों की एकसाथ मुखालफ़त कर रहे हैं, तो इसे नज़र अन्दाज़ करना पूरे समाज और संस्कृति के लिये घातक होगा। इस देश के हिन्दू और मुसलमानों का मूल (Origin) एक ही होने के कारण उनकी मौलिक संस्कृति एक है। सामाजिक और जीवन-मूल्य भी एक ही है। ये दोनों समुदाय जिनकी इस देश में संयुक्त आबादी ९६% है, कभी भी समलैंगिकता की वैधानिकता को स्वीकर नहीं कर सकते। यह अप्राकृतिक संबन्ध विकृत मानसिकता की उपज है। मनुष्यों के अतिरिक्त किसी भी योनि - पशु-पक्षी, पेड़-पौधे में ऐसे संबन्ध आज तक प्रकाश में नहीं आये हैं - होते ही नहीं हैं। ऐसे संबन्ध प्रकृति द्वारा प्रदत्त सृष्टि को निरन्तर आगे बढ़ाने के लिये पुरुष और स्त्री के नैसर्गिक संबन्धों को खुली अनैतिक चुनौती है। इसका पूरी शक्ति से विरोध होना चाहिए। उन अनैतिक शक्तियों को, जो इसे संवैधानिक जामा पहनाने की खुलेआम मांग कर रहे हैं को बेनकाब और ध्वस्त करने का समय भी आ गया है। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला संविधान सम्मत, मानवाधिकार सम्मत, धर्म सम्मत, लोक सम्मत और सर्वजनहितकारी है। इस फ़ैसले के लिये सुप्रीम कोर्ट की जितनी प्रशंसा की जाय, कम होगी। जजों को कोटिशः बधाई। सभ्यता, संस्कृति, जीवन-मूल्यों और नैतिकता विरोधी ताकतों को आन्दोलन, जनजागरण और चुनाव के माध्यम से सबक सिखाना सभी हिन्दुस्तानियों का दायित्व और पुनीत कर्त्तव्य है।


Wednesday, November 27, 2013

मानवाधिकार आयोग के साथ एक दिन

        दिनांक २६-११-२०१३, मंगलवार को वाराणसी में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की फुल बेंच की बैठक हुई। वाराणसी के कमिश्नर के सभागार में आयोजित खुली सुनवाई का उद्घाटन भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और वर्तमान अध्यक्ष, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, न्यायमूर्ति श्री बाककृष्णन ने किया। इस खुली सुनवाई (Open Hearing) में उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लि. से संबन्धित कई मामले थे। इसे बिजली विभाग ने काफी गंभीरता से लिया था। अतः खुली बहस में हमलोग पूरी तैयारी से गए थे। लखनऊ से पावर कार्पोरेशन का प्रतिनिधित्व श्री राधे मोहन, निदेशक (पी एन्ड ए) तथा वाराणसी से पूर्वान्चल विद्युत वितरण निगम लि. का प्रतिनिधित्व मैं स्वयं, मुख्य अभियन्ता (प्रशासन) के रूप में कर रहा था। दो दिवसीय सुनवाई के लिये वाराणसी, गाज़ीपुर, जौनपुर और चन्दौली जिले के १२३ मामले सूचीबद्ध थे। सुनवाई के लिये दो न्यायालय गठित किए गए थे - एक कमिश्नर के सभागार में दूसरा वही प्रेक्षागृह में। एक तरफ शिकायतकर्त्ता बैठे थे और दूसरी तरफ जिला प्रशासन और संबन्धित विभागों के सरकारी अधिकारी। जज के अतिरिक्त सभी एक ही तरह की कुर्सियों पर बैठे थे। बैठने की व्यवस्था में कोई भेदभाव नहीं था।
सुनवाई की शुरुआत चन्दौली जिले की शिकायतों से हुई। दिन के १.३० बजे तक चन्दौली की सभी १४ शिकायतों का निस्तारण हो गया। माननीय न्यायाधीश ने सभी शिकायतों पर अपना निर्णय सार्वजनिक रूप से न सिर्फ सुना दिया बल्कि रिकार्ड भी करा दिया। दोपहर के बाद चार बजे गाज़ीपुर जिले की सभी १२ शिकायतों का निस्तारण इसी कोर्ट ने किया। अपनी दो दिवसीय खुली सुनवाई के दौरान सभी १२३ मामले निस्तारित किये गए। मानवाधिका आयोग का जनता के बीच जाकर खुली सुनवाई के द्वारा मामलों के निस्तारण का यह अभिनव प्रयोग था। इसके लिये न्यायमूर्ति श्री बालकृष्णन बधाई के पात्र हैं।
हाई स्कूल के हिन्दी के पाठ्यक्रम में महान कथाकार मुन्शी प्रेमचन्द की एक कहानी पढ़ी थी - पंच परमेश्वर। अंग्रेजी न्यायप्रणाली के आगमन के पूर्व भारत में गांव की पंचायत ही गांव के सभी दीवानी-फ़ौज़दारी मामलों की सुनवाई करती थी और अमूमन एक ही बैठक में फ़ैसला भी सुनाती थी। तब शायद सबको न्याय मिलता था। प्रेमचन्द ने इसी न्याप्रणाली का अत्यन्त सशक्त और प्रभावशाली वर्णन एक रोचक कहानी के माध्यम से ‘पंच परमेश्वर’ में किया था। प्रेमचन्द ही नहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की भी गहरी आस्था हिन्दुस्तान की पारंपरिक न्याय-व्यवस्था में थी। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में स्पष्ट रूप से ग्राम पंचायत की वकालत की है। लेकिन आज़ादी के बाद हमने अंग्रेजों द्वारा लागू की गई न्याय-प्रणाली को ज्यों-का-त्यों स्वीकार लिया और पूरे भारत के न्याय को काले कोट वालों को सुपुर्द कर दिया। गांधीजी ने लिखा है कि ये काले कोट वाले (न्याय के दलाल) वेश्या से भी गये गुजरे हैं। वेश्या कम से कम पैसे लेकर देनेवाले को उपकृत तो करती है, लेकिन ये काले कोट वाले जिससे पैसा पाते हैं, उसीका अहित करते हैं। जबतक मुवक्किल का घर-द्वार बिक नहीं जाता, वह दौड़ता ही रहता है, उसका शोषण होता ही रहता है। ऐसी न्याय-व्यवस्था में उसी व्यवस्था के अवकाशप्राप्त न्यायाधीशों द्वारा खुली सुनवाई के दौरान मामलों का त्वरित और उचित निस्तारण मेरे लिये घोर आश्चर्य का विषय था। बिल्कुल पंच परमेश्वर की शैली में न्याय किया जा रहा था। न कोई वकील, न पैरोकार, न दलाल और ना ही कोई बिचौलिया। केस नंबर और शिकायतकर्त्ता के नाम की उद्घोषणा सर्वप्रथम की जाती थी। शिकायतकर्त्ता ध्वनि उद्घोषक के माध्यम से अपनी पूरी बात जज के सामने रखता था। संबन्धित सरकारी अधिकारी शिकायत का उत्तर देता था। जज और शिकायतकर्त्ता क्रास एक्जामिनेशन के लिये स्वतंत्र थे। अनुभवी जज कुछ ही मिनटों में सही स्थिति को भांप लेते थे। वादी-प्रतिवादी से जज की कुछ ही मिनटों के उत्तर-प्रत्युत्तर में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता था। फैसला सुनकर मैं आंखें फाड़कर जज को देखने के सिवा कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि वहां ताली बजाने की मनाही थी। न्याय पाने में अपने घर से वाराणसी आने में हुए खर्चे के अलावे वादी का एक पैसा भी खर्च हुआ होगा, मुझे ऐसा नहीं लगा। सभी मामले दलित उत्पीड़न के थे। सुनवाई के पूर्व जिन दलितों की आंखों में निराशा और अविश्वास के भाव थे, सुनवाई के बाद उनकी आंखों में एक चमक थी। उन्हें न सिर्फ न्याय मिल रहा था बल्कि न्याय दीख भी रहा था।
मानवाधिकार आयोग ने एक अभिनव प्रयोग किया है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाय, कम पड़ेगी। यह प्रयोग वर्तमान न्याय-प्रणाली को एक संदेश दे रहा है। क्या हमारा हाई कोर्ट, जिला कोर्ट और लोवर कोर्ट गांव, कस्बों में अपनी खुली अदालतें नहीं लगवा सकते हैं, जिसमें वादी हों, प्रतिवादी हों, गवाह हों लेकिन कोई काला कोट वाला न हो। 

Monday, November 4, 2013

अंग्रेजी मानसिकता


      आजकल मैं बंगलोर में हूं, बेटे के पास। त्योहारों में अकेले वाराणसी में रहना थोड़ा खलता है। इसलिये हर साल की तरह इस साल भी मैंने बंगलोर में ही दीपावली मनाने का निश्चय किया। दीपावली के दिन पता ही नहीं लगा कि मैं वाराणसी के बाहर हूं। वही शोर-शराबा, वही उत्साह, वही तैयारी, वही सज़ावट और वही पटाखेबाज़ी। उत्तर भारतीय, मराठी, गुजराती, बंगाली और कर्नाटकवासी - सभी बड़े उत्साह से दीपावली मना रहे थे। सब जगह छुट्टी थी। स्कूल, कालेज,  अस्पताल और प्रेस तक बन्द थे। अखबार दूसरे दिन निकला। डेक्कन क्रोनिकल यहां का सर्वाधिक लोकप्रिय अंग्रेजी अखबार है। घर पर यही अखबार आता है; इसलिये मैं भी यही पढ़ता हूं। दीपावलीसे संबन्धित जो मुख्य समाचार इस अखबार के मुख्यपृष्ठ पर था, वह दीपावली की आतिशबाज़ी के कारण प्रदूषण से था। समाचार था कि इस बार पिछले सालों की तुलना में धुएं और आवाज़ का प्रदूषण कम था। जनता ने कितने उत्साह से यह पर्व मनाया, क्या-क्या आयोजन किये गये थे और किन-किन लोगों ने दीपावली की शुभकामनायें जनता को दी थी, इसका कहीं जिक्र तक नहीं था। अखबार के अन्दर पेज संख्या ८ पर गया, तो अनिल धरकर का लेख पढ़ने को मिला। शीर्षक था - Our obsession with the personality cult. पूरा लेख गुजरात में नरेन्द्र मोदी द्वारा सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची लौह प्रतिमा स्थापित करने के विरोध में था। लेखक का मानना है कि प्रतिमा की स्थापना से भारत में व्यक्ति-पूजा की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, जो कही से भी प्रशंसनीय नहीं है। लेखक को मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनल और वहां के हवाई अड्डे का नाम छत्रपति शिवाजी के नाम पर रखने का भी बहुत मलाल है।
      अंग्रेजी के लेखक, चाहे वे पत्रकार हों, इतिहासकार हों, उपन्यासकार हों, अपने Speriority complex से हमेशा ग्रस्त रहे हैं। भारत के देसी महापुरुष, देसी संस्कृति, देसी परंपरायें और देसी रहन-सहन उनके लिये सदा ही उपहास के विषय रहे हैं। उसी शृंखला में वे न तो शिवाजी को मान्यता देते हैं, न सरदार पटेल को और ना ही दीपावली के त्योहार को। इनका एजेन्डा गुप्त तो है लेकिन समाज पर अपना शिकंजा कसता जा रहा है। कारपोरेट घराने की मदद और कुकुरमुत्ते की तरह उग आये समाचार चैनलों के माध्यम से इन्होंने आंग्ल नववर्ष, क्रिसमस और वेलेन्टाइन डे को राष्ट्रीय त्योहार तो बना ही दिया है, अब कुदृष्टि बहुसंख्यक समुदाय के अन्दर गहरा पैठ रखने वाले उनके मुख्य त्योहारों पर है। ध्वनि और धूएं के नाम पर दीपावली को बदनाम करना, पानी के ज्यादा उपयोग पर होली को कोसना और नदियों एवं समुद्र के प्रदूषण के नाम पर गणेशोत्सव और दुर्गापूजा की आलोचना करना अंग्रेजीदां बुद्धिजीवियों का प्रमुख शगल है। इन महानुभावों को क्रिसमस और आंग्ल नववर्ष तथा शबेबारात के अवसर पर की जा रही आतिशबाज़ी कही दिखाई नहीं पड़ती। बकरीद के अवसर पर सामूहिक जीवहत्या और उसके कचड़े को मुख्य मार्ग पर फेंक देना कभी नज़र नहीं आता। ये लोग दिल्ली के औरंगज़ेब और अकबर मार्ग पर गलती से भी कोई टिप्पणी नहीं करेंगे लेकिन विक्टोरिया टर्मिनल को छत्रपति शिवाजी टर्मिनल के नामकरण पर सैकड़ों लेख लिख डालेंगे। ये लोग आज भी अंग्रेजों के शासन-काल को बेहतर मानते हैं। ये लोग नेहरू, इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल को इसलिये पसन्द करते हैं कि ये सभी आपस में अंग्रेजी में ही बात करते थे, करते हैं और करते रहेंगे। अंग्रेजी मीडिया इन्हें अंग्रेजों का वास्तविक उत्तराधिकारी मानती है। अंग्रेजी की प्रख्यात लेखिका एवं पत्रकार तवलीन सिंह ने अपनी पुस्तक ‘दरबार’ में इस मानसिकता का विस्तार से वर्णन किया है। हालांकि उन्होंने इस मानसिकता के विरोध में एक हल्की आवाज़ उठाई है परन्तु वे स्वयं इस मानसिकता से बुरी तरह ग्रस्त दिखती है। अंग्रेजी बोलनेवाले जिस Elite क्लास का उन्होंने प्रशंसा के साथ वर्णन किया है उसमें मर्दों के साथ औरतों के मुक्त विचरण, सार्वजनिक रूप से पार्टियों में शराब और सिगरेट का सेवन और सपना भी अंग्रेजी में देखने की आदत को अभिजात्य वर्ग की सामान्य आदतों के रूप में स्वीकार करना शामिल है। ऐसी ही पार्टियों के माध्यम से लेखिका ने सोनिया और राजीव गांधी से निकटता बढ़ाई थी, यह तथ्य उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है। उनके अनुसार राजनीति में आने के पहले सोनिया पूरी तरह अंग्रेजी रंग में रंगी थीं। यहां तक कि वे खाना भी इटालियन ही पसन्द करती थीं, कपड़े के नाम पर वे फ़्राक पहनती थीं और दोस्ती भी उन्हीं से करती थी जो अंग्रेजी अंग्रेजों की तरह बोल लेते थे। अगर कोई इटालियन बोलने वाला मिल गया, तो फिर क्या कहने। क्वात्रोची को इटालियन बोलने का ही लाभ मिला था।
      अपने देसी अन्दाज़ के ही कारण सरदार पटेल आज़ादी के पहले और बाद में भी अंग्रेजी अखबारों के किये खलनायक से कम नहीं थे। उन्होंने जवाहर लाल नेहरू को इतना महिमामंडित किया कि सरदार पटेल, सुभासचन्द्र बोस, डा. राजेन्द्र प्रसाद, वीर सावरकर तो क्या गांधीजी का भी आभामंडल फीका पड़ गया। भारत के हर कोने में, चाहे वह पूरब हो या पश्चिम, उत्तर हो या दक्खिन, ७५% सड़को, मुहल्लों, स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों, चौराहों, अस्पतालों, हवाई अड्डों, बस स्टेशन, शोध केन्द्रों, सेतुओं, योजनाओं और भवनों के नाम नेहरू, इन्दिरा, राजीव और संजय गांधी के नाम पर ही हैं। गांधी बाबा भी इनके पीछे ही हैं। पूरे हिन्दुस्तान में इनकी न जाने कितनी मूर्तियां लगी हैं, लेकिन सरदार पटेल की नरेन्द्र मोदी द्वारा एक प्रतिमा स्थापित करने पर इन काले अंग्रेज बुद्धिजीवियों (तथाकथित) को घोर आपत्ति है। सरदार पटेल उन्हें आज भी नेहरू को चुनौती देते दीख रहे हैं। एक तो करेला, उसपर नीम चढ़ा। मोदी के बदले राहुल प्रतिमा की स्थापना करते (जो असंभव था), तो उन्हें कोई विशेष आपत्ति नहीं होती। लेकिन ठेठ देसी नरेन्द्र मोदी ऐसा कर रहे हैं, उनके अनुसार यह लोहे की बर्बादी और व्यक्तिवाद को बढ़ावा देने के निन्दनीय प्रयास के अलावा और कुछ भी नहीं है।
      अंग्रेजी अखबार आज़ादी के पहले अंग्रेजों का गुणगान करते थे। कांग्रेस और आज़ादी की जोरदार आलोचना करते थे। आज़ादी के बाद इनकी निष्ठा नेहरू-परिवार की चेरी बनी। इन्होंने आपात काल और इन्दिरा की शान में बेइन्तहां कसीदे काढ़े। जयप्रकाश नारायण और संपूर्ण क्रान्ति को जी भरकर कोसा। न तो वे देश को आज़ाद होने से रोक पाये और न ही १९७७ में जनता पार्टी को सत्तारुढ़ होने से डिगा सके। आज भी वे समय की नब्ज़ पहचान पाने में असमर्थ हैं। दूर अमेरिका और इंगलैन्ड में नरेन्द्र मोदी की विजय-दुन्दुभि अभी से सुनाई पड़ने लगी है लेकिन ये देखकर भी अन्धेपन का और सुनकर भी बहरेपन का अभिनय करने को विवश हैं। ये खाते हैं दाल-रोटी और पीते हैं शैंपेन। हंसते हैं हिन्दी में, बोलते अंग्रेजी में। लार्ड मैकाले की आत्मा गदगद हो रही होगी। जो काम गोरे अंग्रेज नहीं कर पाये, वह काले अंग्रेज कर रहे हैं - उनसे भी ज्यादा निष्ठा, ईमानदारी, लगन, भक्ति और शक्ति से।

Wednesday, October 30, 2013

अगर यह ब्लास्ट अहमदाबाद में होता

  कल्पना कीजिये कि दिनांक २७-१०-१३ को नरेन्द्र मोदी की पटना रैली के दौरान गांधी मैदान और पटना रेलवे स्टेशन पर हुए सिरियल बम ब्लास्ट जैसे बम ब्लास्ट राहुल गांधी की अहमदाबाद की रैली में हुए होते? देश-विदेश, सरकार, मीडिया, स्वघोषित सेकुलर, जातिवादी और वंशवादी पार्टियों की क्या प्रतिक्रिया होती? क्या नरेन्द्र मोदी वैसे विस्फोट के बाद एक दिन भी सत्ता में रह पाते? इन छद्म सेकुलरिस्टों ने बवाल मचा कर उन्हें कब का पदच्युत कर दिया होता। याद कीजिये - राम-मन्दिर - बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा था उत्तर प्रदेश में और कांग्रेसियों ने बर्खास्त की थीं राजस्थान, मध्यप्रदेश और हिमाचल की भाजपा की सरकारें। ऐसा लोकतंत्र और ऐसी संसदीय प्रणाली सिर्फ भारत में संभव है।
      देश की सबसे बड़ी और चुस्त सुरक्षा व्यवस्था का उपयोग करने वाले राजवंशी परिवार के राहुल गांधी कहते हैं कि इन लोगों ने मेरी दादी को मार डाला, मेरे पिता को मार डाला और अब मेरी जान के पीछे पड़े हैं। अपनी जान को खतरे में बताकर वे जनता से सहानुभूति की उम्मीद रखते हैं। अगले चुनाव में कांग्रेस के पास जनता से कहने के लिये है ही क्या? इस पार्टी ने सदा जनता की भावनाओं का दोहन किया है और दी है देश विभाजन की त्रासदी, कश्मीर की समस्या, चीन के हाथों शर्मनाक पराजय, विभाजन और उसके बाद के दंगों में लक्ष-लक्ष जनता कत्लेआम, १९८४ में सिक्खों का सामूहिक नरसंहार, गरीबी, बेरोजगारी, भूखमरी और समाज का विभाजन। आज जब नरेन्द्र मोदी कांग्रेस के कुकृत्यों का जवाब मांग रहे हैं, तो बौखलाए राजनेता षडयंत्र पर उतर आये हैं।
      नरेन्द्र मोदी की पटना की रैली के दौरान हुए बम-विस्फोट सुनियोजित थे। यहश विस्फोट नीतीश और कांग्रेस की युगलबन्दी का सीधा परिणाम था। नरेन्द्र मोदी को हमेशा के लिये मिटा देने की साज़िश थी। देश की राजनीति को इन छद्म सेकुलरिस्टों ने उस अंधेरी गली में ढकेल दिया है जहां सहिष्णुता का स्थान व्यक्तिगत घृणा ने ले लिया है। इन फ़ासिस्ट ताकतों को हिन्दुस्तान से कोई प्यार नहीं। इन्हें सिर्फ़ सत्ता चाहिये, चाहे वह नरेन्द्र मोदी की हत्या के मार्फ़त आये, आई.एस.आई. से हाथ मिलाकर आये, नक्सलवाद से आये, जातिवाद फैलाकर आये या जनता के भावनात्मक शोषण से आये।

      पटना में बम-विस्फोट होता है और देश का गृह-मंत्री मुम्बई में फिल्मी शो करता है। राहुल, सोनिया और प्रधानमंत्री संवेदना के दो बोल नहीं बोलते हैं। ओसमा बिन लादेन की मौत पर भी आंसू बहाने वाली मीडिया सलाह दे रही है कि मोदी को ब्लास्ट के बाद रैली नहीं करनी चाहिए थी। नीतीश ने तो कृतघ्नता की हद कर दी। अगर भाजपा का सहयोग नहीं मिला होता तो वे कभी भी बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बन पाते। लेकिन नरेन्द्र मोदी से व्यक्तिगत द्वेष उन्हें नीचता की इस हद तक ले जा सकता है, इसकी कल्पना नहीं थी। मोदी की अत्यन्त सफल रैलियों से आक्रान्त कोई आईएसआई और कांग्रेस से इतना घृणित समझौता कैसे कर सकता है? लालू ने आडवानी को सम्मान जनक ढंग से सिर्फ़ गिरफ़्तार किया था, जान से मारने की साज़िश नहीं रची थी। नीतीश लालू से कई योजन आगे निकल गये। केन्द्र और खुफ़िया एजेन्सियों की हिदायतों के बाद भी इरादतन लापरवाही बरती गई। बिहार सरकार का यह अपराध अक्षम्य है। इसका फ़ैसला जनता की अदालत में ही हो सकता है और वह दिन भी अब ज्यादा दूर नहीं। पटना में विस्फोट कराकर केन्द्र सरकार यू.पी और अन्य राज्यों की छद्म सेकुलरिस्ट सरकारों को यह संदेश भी देना चाहती है कि सुरक्षा, दंगों और शान्ति-व्यवस्था के नाम पर नरेन्द्र मोदी की होनेवाली रैलियां रोक दी जांय। कुछ भी कर सकती हैं ये स्वार्थी सरकारें, लेकिन जनता का मन नहीं बदल सकतीं। लोकनायक जय प्रकाश नारायण के बाद हिन्दुस्तान ने पहली बार नरेन्द्र मोदी के रूप में एक जन-नायक पाया है। उसे कई जयचन्द, कई मिरज़ाफ़र और कई पप्पू भी एक साथ मिलकर नहीं रोक सकते।

Friday, October 25, 2013

एक थे मन्ना डे

      कौन कहता है कि मन्ना डे अब नहीं रहे? उनकी सुरीली आवाज़ फ़िजाओं में अनन्त काल तक तैरती रहेगी। बेशक उन्हें उनके समकालीन गायक मुकेश, मो. रफ़ी और किशोर की तरह लोकप्रियता नहीं मिल पाई, लेकिन उनका क्लास और उनकी गायकी हर दृष्टि से अपने समकालीनों से बेहतर थी। मन्ना डे मुकेश, रफ़ी, किशोर या महेन्द्र कपूर के सारे गाने उतनी ही दक्षता से गा सकते थे, लेकिन कोई भी गायक मन्ना डे की तरह नहीं गा सकता था। मो. रफ़ी ने अपने जीवन-काल में ही अपने प्रशंसकों से कहा था - आप लोग मुझे सुनते हैं लेकिन मैं सिर्फ़ मन्ना डे को सुनता हूं। १९५० से १९७० के बीच की अवधि को संगीत की दृष्टि से हिन्दी सिनेमा का स्वर्ण-युग कहा जाता है। इस कालखंड में मुकेश, रफ़ी, महेन्द्र कपूर और मन्ना डे की चार ‘एम’ की चौकड़ी ने अपनी-अपनी विधाओं से हिन्दी गीतों को हिमालय जैसी ऊंचाई प्रदान की। आज की तिथि में चारों ‘एम’ खामोश हैं, परन्तु उनकी सुरीली आवाज़ें सदियों-सदियों तक संगीत प्रेमियों को चरम आनन्द प्रदान करती रहेंगी।
बड़ी मुश्किल से मिलते हैं ऐसे लोग इस ज़माने में,
लगेंगी सदियां हमें आपको भुलाने में। 
मन्ना डे एक उच्चस्तरीय गायक थे। उनकी प्रतिभा को बहुत कम संगीतकारों ने पहचाना। श्रोता वर्ग भी उन्हें चरित्र नायकों, बुढ़े फ़कीर या कामेडियनों के गायक मानते थे। इस भ्रम को राज कपूर ने फ़िल्म श्री ४२० के माध्यम से तोड़ा। उन्होंने मन्ना दा का स्वर लिया और अविस्मरणीय़ गीत गवाया - प्यार हुआ इकरार हुआ .... दिल का हाल सुने दिलवाला। ये गाने मुकेश द्वारा गाये गये गीत, मेरा जूता है जापानी....से कम लोकप्रिय नहीं हुए। राजकपूर ने अपनी फिल्म ‘चोरी-चोरी’ के सारे गीत मन्ना डे से ही गवाए और सारे गीत मील के पत्थर बन गये। ‘आ जा सनम मधुर चांदनी में हम.......जहां भी जाती हूं वही चले आते हो - लता के साथ गाये इन युगल गीतों को कौन संगीत प्रेमी भूल सकता है? राज कपूर को प्रतिभा की सही पहचान थी। अगर उनका साथ नहीं मिला होता तो शायद मुकेश भी फिल्मी भेंड़चाल के शिकार हो गये होते। राजकपूर को मन्ना डे और मुकेश पर बहुत भरोसा था। नायक के रूप में अपनी अन्तिम फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में उन्होंने मन्ना डे की आवाज़ में जो गीत - ऐ भाई ज़रा देख के चलो........गाया था, वह अविस्मरणीय बन गया।
ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछ्ड़े चमन...सुर ना सजे क्या गाऊं मैं.........कसमें वादे प्यार वफ़ा सब........यारी है ईमान मेरा.......लागा चुनरी में दाग छुपाऊं कैसे.... मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा.....चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनिया................नदिया बहे, बहे रे धारा......ज़िन्दगी कैसी है पहेली.............कितने गानों का मुखड़ा लिखें इस लेख में? मन्ना डे ने ३५०० से अधिक गाने गाये और सबके सब बेमिसाल।
मन्ना डे का जन्म १ मई १९१९ को कोलकाता में हुआ था। उस समय के प्रख्यात गायक के.सी.डे उनके चाचा थे। उन्हीं की प्रेरणा से मन्ना डे हिन्दी फिल्म जगत में आये। संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये उन्हे भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ और पद्मभूषण’ से सम्मानित किया उन्हें फिल्म जगत में अपने अद्वितीय योगदान के लिए सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ भी प्रदान किया गया। देर से ही सही मन्ना डे के साथ न्याय हुआ। उनके गायन में सागर सी गहराई थी।
प्यार के एक सागर में जब ज़िन्दगी किसी को एक पहेली लगती हो, तो दूर से आती है एक आवाज़ - आंधी कभी, तूफान कभी, कभी मजधार! जीत है उसी की, जिसने मानी नहीं हार। तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूंद के प्यासे हम। वह आवाज़ खामोश हो गई है। मन्ना डे नहीं रहे। विश्वास नहीं होता। संगीत का एक सफर अपनी सदी को छूने से पहले ठहर सा गया। फिर भी दुनिया भर में संगीत के करोड़ों प्रेमी उन्हें उनके गाये गीतों के जरिए अपने करीब महसूस करते रहेंगे। हिन्दी सिनेमा में मुश्किल गीतों की जब भी बारी आयेगी, मन्ना डे याद आयेंगे।