Saturday, August 24, 2013

नैतिकता का मज़ाक

          गत १० जुलाई को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया था - निचली अदालत से दो या दो साल से अधिक अवधि की सज़ा पाने वाले सभी जन प्रतिनिधियों की संसद और विधान सभा की सदस्यता रद्द कर दी जाएगी तथा हिरासत या जेल में रहकर कोई भी व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ पाएगा। यह फ़ैसला संसद और विधान सभाओं में हत्या, बलात्कार, रिश्वत या अन्य गंभीर अपराध के घोषित अपराधियों के संसद या विधान सभाओं में बेरोकटोक पहुंचने और कानून बनाने में उनकी हिस्सेदारी को ध्यान में रखते हुए संविधान के प्रावधानों के अन्तर्गत लिया गया था। देश की आम जनता ने सर्वोच्च न्यायालय के इस अभूतपूर्व फ़ैसले पर अपनी हार्दिक प्रसन्नता व्यक्य की थी। एक आस बंधी थी कि अब लोकतंत्र  के सर्वोच्च मन्दिरों में अपराधी नहीं पहुंच पायेंगे। फ़ैसले की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि कैबिनेट ने  सर्वसम्मत निर्णय से सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को पलटने का निर्णय ले लिया। दिनांक २२ अगस्त को केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने दागी संसदों और विधायकों को तोहफ़ा देते हुए यह निर्णय लिया कि निचली अदालत से दो साल या उससे अधिक की सज़ा मिलने पर भी न तो सांसद-विधायकों की सदस्यता रद्द होगी और न ही हिरासत या जेल में रहने पर उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगेगी। प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में सर्वोच्च न्यायालय के इस आशय के फ़ैसले को पलटने के लिए कैबिनेट ने जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन संबन्धी प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। सरकार के इस फ़ैसले पर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी सहमति पहले ही दे रखी है। जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के इस विधेयक का सर्वसम्मति से लोक सभा और राज्य सभा में पास होना तय है।
संसद और विधान सभाओं में अपराधियों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि वे जब चाहें अपने पक्ष में संविधान में संशोधन कराके अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं। आम जनता की भावनाओं का हमारी सरकार और हमारी संसद इतनी बेशर्मी से खुलेआम गला घोंटेगी, इसकी अपेक्षा नहीं थी। लेकिन मर्यादा और नैतिकता की सारी सीमाएं लांघ चुकी इस सरकार से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? Party with a difference की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी की इस बिल को पास करने के लिए दी गई सहमति और भी आश्च्चर्यजनक है। नरेन्द्र मोदी अब किस मुंह से घूम-घूमकर नैतिकता की दुहाई दे पायेंगे? भाजपा के सांसद नरेन्द्र मोदी की हवा निकालने पर आमादा हैं। वे यह नहीं चाहते हैं कि देश का नेतृत्व एक ईमानदार और उच्च नैतिक मूल्यों से संपन्न नेता के पास जाय। इस विधेयक के समर्थन में लालू, मुलायम, मायावती, सोनिया आदि घोषित दागी नेता एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देंगे, यह तो प्रत्याशित था; लेकिन लाल कृष्ण आडवानी और अरुण जेटली भी उसी पंक्ति में खड़े हो जायेंगे, इसकी कही से भी उम्मीद नहीं थी। अब यह सिद्ध हो गया है कि सभी राजनीतिक दल और सारे नेता एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। अपनी तन्ख्वाह और अपने भत्ते बढ़ाने के लिए सारे सांसद किस तरह एकजूट हो जाते हैं, यह पहले भी देखा जा चुका है। ऐसा विधेयक बिना किसी चर्चा के संसद में दो मिनट में पारित हो जाता है।
सरकार में बैठे नेताओं और मौनी बाबा को तनिक भी सद्बुद्धि हो, तो वे संशोधन विधेयक लाने के पूर्व जनमत संग्रह करा लें। उन्हें जनता की राय मालूम हो जायेगी। लेकिन ऐसा करने की हिम्मत किसी में है क्या? कैबिनेट, सांसद और विधायकों के इन कृत्यों से देश की जनता का विश्वास इन जनतांत्रिक संस्थाओं से कही उठ न जाय। जनता का अविश्वास कालान्तर में लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। लेकिन इसकी चिन्ता ही किसे है? सब आज की मलाई चाटने में व्यस्त हैं। 

Saturday, August 17, 2013

चीन-पाक कोरिडोर और हमारी कुंभकर्णी नींद

राष्ट्रीय सुरक्षा की लगातार अनदेखी गहरी चिन्ता का विषय है। १९६२ के पहले सुरक्षा की अनदेखी तिब्बत पर चीन के कब्जे और साठ हज़ार वर्ग किलोमीटर भारतीय भूभाग पर चीन के अवैध कब्जे के रूप में सामने आई। १९६२ में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय नई पीढ़ी को भले ही याद न हो, लेकिन हमारे जैसे नागरिकों को एक शूल की भांति चुभता है। समझ में नहीं आता कि जिस देश ने अपने पड़ोसी देश का ऐसा विश्वासघात स्वयं झेला है, वह प्रत्यक्ष खतरे के प्रति क्यों आंखें मूंदकर बैठा है।
संसद ने पिछले ही हफ़्ते सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर यह दुहराया कि पूरा जम्मू और कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। संसद ने यह संकल्प भी दुहराया कि पाक अधिकृत कश्मीर भी भारत का अंग है और हम इसे वापस लेकर रहेंगे। मुझे याद नहीं कि भारतीय संसद ने कितनी पर इस तरह का प्रस्ताव पारित किया है। चीन अधिकृत भूभाग को वापस लेने के कई प्रस्ताव भी हमारी संसद कई बार पारित कर चुकी है। लेकिन धरातल पर हमने इस दिशा में कभी कोई काम किया भी है क्या? संसद में हम जब-जब इस तरह का प्रस्ताव पारित करते हैं, चीन और पाकिस्तान की जनता हम पर हंसती हैं। हमारा प्रस्ताव धर्मशाला में स्थित तिब्बत की निर्वासित सरकार द्वारा पारित तिब्बत की आज़ादी के प्रस्ताव से ज्यादा अहमियत नहीं रखता। हम भारत की जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए ही ऐसे प्रस्ताव पारित करते हैं। सभी को ज्ञात है कि इसके पीछे हमारी कोई दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं होती। अभी-अभी जब हमने पूरे कश्मीर पर अपने अधिकार को जताते हुए संसद में प्रस्ताव पारित किया तो उसके तीसरे ही दिन नवाज़ शरीफ़ ने गुलाम कश्मीर से होकर चीन-पाक कोरिडोर के निर्माण को हरी झंडी दी। भारत के नक्शे में पूरा कश्मीर अभी भी भारत में ही दिखाया जाता है। अगर सरकार ऐसा मानती है, तो चीन-पाक कोरिडोर पर हमारी सरकार ने तीव्र विरोध क्यों नहीं दर्ज़ कराया? चीन और पाकिस्ता को जोड़ते हुए गुलाम कश्मीर से होकर पहले ही काराकोरम मार्ग का निर्माण चीन द्वारा किया जा चुका है। हमने तब भी खामोशी ओढ़ रखी थी। हम अब भी वही काम कर रहे हैं। चीन-पाक कोरिडोर भारतीय संप्रभुत्ता को चीन और पाकिस्तान की खुली चुनौती है। हमारे भूभाग से होकर कोई भी देश कोरिडोर कैसे बना सकता है? यह कोरिडोर चीन को सीधे ग्वादर बन्दरगाह तक पहुंचने का मार्ग प्रदान करेगा जो हमारे देश के लिए अत्यन्त खतरनाक है। चीन और पाकिस्तान की भारत को चारों तरफ़ से घेरने की रणनीति का यह एक सुविचारित हिस्सा है। चीन पहले से ही हमें घेरने के लिए म्यामार और श्रीलंका में अपने सैनिक ठिकाने स्थापित कर चुका है और मालदीव में अपने प्रयोग के लिए हवाई अड्डा बना चुका है। नेपाल में चीन समर्थक पार्टियों का ही बोलबाला है। निर्वाचित सरकार बनने के बाद वह जब चाहे नेपाल का इस्तेमाल अपने हित में कर सकता है। ऐसे में चीन-पाक कोरिडोर का निर्माण हमारी सुरक्षा के लिए कितना खतरनाक हो सकता है, यह छोटी सी बात हमारी समझ में क्यों नहीं आती? 
हम अपने भूभाग में दूसरे देशों द्वारा किसी भी अनधिकृत निर्माण की इज़ाज़त नहीं दे सकते। हमें चीन और पाकिस्तान को स्पष्ट चेतावनी देनी चाहिए। इसके बावजूद भी अगर वे अपनी ज़िद पर अड़े रहते हैं, तो भारत को सैन्य-शक्ति का इस्तेमाल कर इसे रोकना होगा। अगर हम इसे रोकने में कामयाब नहीं होते हैं तो इतिहास हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। जो देश अपने इतिहास से सबक नहीं लेता है, उसका भूगोल बदल जाता है।

Thursday, August 15, 2013

आधुनिक शल्य - लाल कृष्ण आडवानी

          मद्र देश के राजा शल्य नकुल-सहदेव के सगे मामा थे। वे चले थे यह संकल्प लेकर कि वे अपने भांजों यानि पाण्डवों की ओर से युद्ध करेंगे। पाण्डवों को पूरा विश्वास था कि उनके मामाजी उनके शिविर में अपने आप आ जायेंगे। उनका यह विश्वास स्वाभाविक भी था। दुर्योधन राजा शल्य की प्रत्येक गतिविधि पर नज़र रखे हुए था। यह तय हो गया था कि श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध में शस्त्र नहीं उठायेंगे लेकिन अर्जुन के सारथि बनेंगे। युद्ध के निर्णायक पलों में सारथि का कौशल बहुत काम आता है। श्रीकृष्ण जैसा सारथि पूरे आर्यावर्त्त में दूसरा कोई नहीं था। राजा शल्य एक महारथी तो थे ही, श्रीकृष्ण के टक्कर के कुशल सारथि भी थे। दुर्योधन उन्हें कर्ण का सारथि बनाना चाहता था। लेकिन वे पाण्डवों के सगे मामा थे। उन्हें अपने पक्ष में ले आना कठिन ही नहीं असंभव भी लग रहा था। चिन्तित दुर्योधन को शकुनि ने सलाह दी - “शल्य को खातिरदारी और प्रशंसा अत्यन्त प्रिय है। हस्तिनापुर तक आनेवाले रास्ते में कालीन बिछा दो, गुलाब-जल का छिड़काव करा दो, स्थान-स्थान पर स्वागत-द्वार बनवा दो और अपने सचिवों को हर स्वागत द्वार पर फूल-मालाओं के साथ शल्य के स्वागत में तैनात कर दो। शल्य यह समझेंगे कि यह सारी व्यवस्था युधिष्ठिर ने की है। और इस तरह वे तुम्हारे निर्दिष्ट मार्ग पर चलकर सीधे तुम्हारे पास पहुंच जायेंगे। उनके आने पर हम उनका इतना स्वागत करेंगे कि वे अपने भांजों को भूल जायेंगे और हमारी ओर से युद्ध करना स्वीकार कर लेंगे।" सारी घटनाएं शल्य की योजना के अनुसार ही घटीं। दुर्योधन की आवाभगत से प्रसन्न शल्य ने न सिर्फ दुर्योधन की ओर से लड़ना स्वीकार किया, अपितु कर्ण का सारथि बनने के लिए भी ‘हां’ कर दी। शल्य के निर्णय की सूचना पाकर पाण्डव बहुत चिन्तित हुए। लेकिन श्रीकृष्ण मुस्कुरा रहे थे। कारण पूछने पर उन्होंने स्पष्ट किया कि समय आने पर शल्य का यह निर्णय भी पाण्डवों का ही भला करेगा। हुआ भी यही। भीष्म पितामह के शर-शय्या पर जाने और द्रोणाचार्य के निधन के बाद कर्ण कौरव सेना का सेनापति बना और शल्य उसके सारथि। श्रीकृष्ण की सलाह पर पांचों पाण्डवों ने उनके नेतृत्व में शल्य के शिविर में जाकर मुलाकात की। अपने उपर हुए दुर्योधन के अत्याचारों से उन्हें अवगत कराया। साथ ही यह भी बताया कि  द्यूत-क्रीड़ा के समय कर्ण द्वारा ही दुशासन को यह निर्देश दिया गया था कि द्रौपदी को निर्वस्त्र कर दो। शल्य आखिर थे तो पाण्डवों के ही मामा। वे द्रवित हुए बिना नहीं रह सके। पाण्डवों ने उन्हें अपने पक्ष में आने का न्योता दिया। लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इसे अस्वीकार कर दिया कि वे दुर्योधन को वचन दे चुके हैं। अतः अन्त समय में वचनभंग नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण ने उनसे दूसरे ढंग से सहायता पहुंचाने का प्रस्ताव किया किया जिसपर उन्होंने अपनी सहमति दे दी। प्रस्ताव था - अर्जुन और कर्ण के युद्ध के समय शल्य अर्जुन की प्रशंसा करेंगे और कर्ण की वीरता और सामर्थ्य की निन्दा। वे कर्ण के मनोबल को गिराने की हर संभव कोशिश करेंगे। हत मनोबल और हत उत्साह से कोई युद्ध नहीं जीत सकता। श्रीकृष्ण की यह युक्ति काम आई। ऐन वक्त पर अर्जुन-कर्ण के निर्णायक युद्ध के वक्त जब श्रीकृष्ण अपनी बातों से अर्जुन का मनोबल बढ़ा रहे थे, शल्य योजनाबद्ध ढंग से कर्ण का मनोबल गिरा रहे थे। परिणाम वही हुआ जो ऐसी दशा में होना था। शाम ढलते-ढलते कर्ण को पराजय के साथ-साथ मृत्यु का भी वरण करना पड़ा।
भाजपा के तथाकथित भीष्म पितामह लाल कृष्ण आडवानी आजकल शल्य की ही भूमिका निभा रहे हैं। उनके जैसे नेता अगर चुनाव अभियान संभालेंगे, तो कांग्रेस को किसी दिग्विजय सिंह की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भुज में अपने भाषण के दौरान नरेन्द्र मोदी ने सिर्फ सत्य को अनावृत किया था। क्या लालकिले से दिया गया प्रधान मंत्री का भाषण राजनीतिक नहीं था? भारत के प्रधानमंत्रियों का उल्लेख करते समय लाल बहादुर शास्त्री या अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लेने से क्या स्वतंत्रता दिवस की फ़िज़ां खराब हो जाती? भारत की एकता और अखंडता के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य करनेवाले लौह पुरुष सरदार पटेल का नाम ले लेने से भारत की मर्यादा घट जाती? देश के जवानों का सिर काट कर ले जानेवाले पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी देने से विश्व शान्ति को खतरा उत्पन्न हो जाता? एक कठपुतली प्रधान मंत्री लाल किले की प्राचीर से भारत-विभाजन, आधे कश्मीर को पाकिस्तान को भेंट देनेवाले, १९४७ में हुए विश्व के सबसे बड़े सांप्रदायिक दंगे, तिब्बत को चीन को गिफ़्ट देनेवाले, १९६२ में चीन के हाथों भारत की पराजय के जिम्मेदार और १९८४ में देश की सर्वाधिक देशभक्त सिक्ख कौम का नरसंहार करानेवाले परिवार का गुणगान करता रहे, तो सब कुछ उचित; परन्तु एक देशभक्त इसपर प्रश्न पूछ दे तो बहुत अनुचित। किश्तवाड़ की हिंसा पर लाल कृष्ण आडवानी का कोई वक्तव्य आया हो, मुझे याद नहीं। लेकिन स्वतंत्रता दिवस के दिन ही भुज में नरेन्द्र मोदी के भाषण पर आडवानी की त्वरित प्रतिक्रिया हैरान करनेवाली है। समझ में नहीं आता कि वे भाजपा के लिए काम कर रहे हैं या कांग्रेस के लिए। बोलने के लिए सिर्फ वाणी की आवश्यकता होती है, परन्तु चुप रहने के लिए वाणी और विवेक, दोनों की आवश्यकता होती है।  

Monday, August 12, 2013

राष्ट्रीय सुरक्षा और घिनौनी राजनीति

        पिछले शुक्रवार को जम्मू के किश्तवाड़ में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में कई लोग मारे गए। हिन्दुस्तान में दंगे और वो भी जम्मू-कश्मीर में कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है। सांप्रदायिक हिंसा के कारण ही पूरी कश्मीर घाटी से सभी हिन्दू वर्षों पहले पलायन कर गए। अब जम्मू भी कट्टरपंथियों की निगाह में खटक रहा है। यह उतनी बुरी बात नहीं है जितना इन घटनाओं पर छद्म सेक्यूलरवादियों का रवैया और उनके वक्तव्य। किश्तवाड़ में दस दिन पहले से ही पाकिस्तानी तत्त्वों ने माहौल बिगाड़ने की हर संभव कोशिश की थी। जगह-जगह अफ़ज़ल गुरु और मकबूल भट्ट की तस्वीरें चिपकाई गई थीं। हर नमाज़ के बाद मस्ज़िद से भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए जाते थे। सरकार को खुफ़िया तंत्रों के माध्यम से इसकी पूर्ण जानकारी थी। लेकिन सरकार निष्क्रिय बनी रही और अन्ततः १० अगस्त को दंगा भड़क ही गया। दंगे में मारे गए लोगों की संख्या का सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता है, क्योंकि सरकार ने मीडिया समेत किसी भी नेता को वहां पहुंचने नहीं दिया। घटना की निन्दा करने और उसपर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करने के बदले वहां के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने किश्तवाड़ के दंगे की तुलना २००२ के गुजरात दंगों से करके उसे न्यायोचित ठहराने की कोशिश की। कांग्रेस ने संसद के अन्दर और बाहर भी उमर अब्दुल्ला और फ़ारुख अब्दुल्ला का समर्थन किया। दंगे तो दंगे हैं - वे चाहे गुजरात में हों, हैदराबाद में हों या कश्मीर में हों, उनकी निन्दा ही होनी चाहिए। इससे कम कुछ भी नहीं। क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए एक दंगे की आड़ में दूसरे दंगे को न्यायोचित ठहराना देशद्रोह के अलावा और कुछ भी नहीं। यह प्रवृति विघटन की ओर ले जाती है।
अब तो सैनिकों की शहादत पर भी राजनीति करने से कांग्रेसी बाज़ नहीं आ रहे हैं। पाकिस्तानी हिन्दुस्तानी सैनिकों का सिर काटकर ले जाते हैं, सरकार चुप रहती है। गश्त करते समय भारत के पांच सैनिकों की पाकिस्तानी सेना निर्मम हत्या कर देती है; रक्षा मंत्री उसे आतंकवादी कार्यवाही कहते हैं। एक टीवी चैनल पर बहस के दौरान एक कांग्रेसी नेता ने कहा कि भाजपा के शासन के दौरान सीमा पर पाकिस्तानी अतिक्रमण और जवानों की हत्या के मामले अधिक हुए थे, इसलिए वर्तमान में मात्र पांच जवानों की शहादत पर ज्यादा शोरगुल मचाने की ज़रुरत नहीं है। जवानों की शहादत और जीडीपी के आंकड़ों को समान समझने की आदत सत्ताधारी पार्टी कब छोड़ेगी? ऐसा संवेदनहीन वक्तव्य कांग्रेस पार्टी का ही कोई नेता दे सकता है। सेक्यूलर बिरादरी में नये-नये शामिल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मंत्रियों ने तो हद ही कर दी। आतंकी इशरत जहां को बिहार की बहादुर बेटी बताने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शहीद हुए बिहार के चार सपूतों के शवों को देखने हवाई अड्डे पर जाना तो दूर श्रद्धांजलि के दो बोल भी नहीं बोले। उनके मंत्री ने तो यहां तक कहा कि सेना और पुलिस में तो लोग शहीद होने के लिए ही जाते हैं। क्या भारत के सभी मुसलमानों को इन सेकुलरवादियों ने पाकिस्तानी मान रखा है? क्या पाकिस्तान विरोध मुस्लिम विरोध का पर्याय बन चुका है? सेक्यूलरवादी अगर ऐसा मानते हैं, तो यह भारत के सभी मुसलमानों का घोर अपमान है। महज़ वोट की राजनीति के लिए देश की अस्मिता का बार-बार अपमान घोर निन्दनीय है।
जहां तक सांप्रदायिकता की बात है, तो इस देश में कांग्रेस से बड़ी दूसरी सांप्रदायिक पार्टी न हुई है और न होगी। इतिहास गवाह है कि इस पार्टी ने सांप्रदायिक आधार पर देश का बंटवारा किया जिसके फलस्वरूप १९४७ में पूरे देश में भयंकर दंगे हुए जिसमें लाखों हिन्दू-मुसलमान मारे गए। उन सांप्रदायिक दंगों का कलंक अभी ज्यों का त्यों था कि इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेसियों ने देशव्यापी हिन्दू-सिक्ख दंगा करा दिया जिसमें हजारों सिक्ख दंगे की भेंट चढ़ गए। सेक्यूलरवादियों को इन घटनाओं की याद नहीं आती। राष्ट्र पर आक्रमण और दंगों को क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के चश्मे से देखना राष्ट्रद्रोह के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसकी बस निन्दा ही होनी चाहिए, तुलना नहीं।

Thursday, July 25, 2013

नारी - आदिशक्ति या कमोडीटी

         पूरे विश्व के नारियों  में एक होड़ सी मची है - अधिक-से अधिक सुन्दर और आधुनिक दीखने का। भारत में यह चूहादौड़ १५ वर्ष पहले ना के बराबर थी, लेकिन बढ़ते उपभोक्तावाद ने अपने देश में भी इस रेस को ऐसी गति दी है कि अब यह रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। फैशन और आधुनिकता के पीछे भागती महिलाओं को यह एहसास ही नही हो रहा है कि वे इस दौड़ में बिना सोचे समझे भाग लेकर अपना, नारी जाति, अगली पीढ़ी और संपूर्ण मानवता का कितना बड़ा अहित कर रही हैं। 
सृष्टि द्वारा सृजित हर तरह के प्राणियों में मादा प्राणी स्वयं में पूर्ण आकर्षण रखता है। मादा को रिझाने के लिए नर प्राणी हर तरह का उपक्रम करता है। नर प्राणी या तो स्वयं शृंगार करके मादा को रिझाने का प्रयास करता है या मीठी ध्वनि निकालकर अपनी ओर आकर्षित करता है। कोयल की जिस सुरीली तान पर असंख्य कविताएं लिखी जा चुकी हैं, वह सुरीली ध्वनि नर कोयल ही निकालता है। मादा चुप ही रहती है। नर मयूर ही अपने सतरंगे पंख फैलाकर नृत्य करता है, मादा चुपचाप देखती है। मादा मोर के पंख भी सतरंगे नहीं होते हैं। मादा मुर्गी के सिर पर कोई कलंगी नहीं होती जबकि नर मुर्गे के सिर पर सुन्दर-सी कलंगी होती है। प्राकृतिक रूप से मादा को रिझाने के लिए पुरुह के शृंगार की ही परंपरा रही है। नारी का नारी होना ही अपने आप में पूर्ण है। कुकुरमुत्ते की तरह गांव से लेकर महानगरों में उग आये ब्यूटी पार्लरों के अस्तित्व में आने के पहले भी नारियां सुन्दर हुआ करती थीं। शृंगार रस की श्रेष्ठ कविताएं उस युग की ही हैं जब नारियां ब्यूटी पार्लर का नाम भी नहीं जानती थीं। समाज के समस्त स्त्रियों का विवाह भी हो जाता था। लेकिन तब न कोई विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता हुआ करती थी और न कोई स्त्री कण्डोम बेचा करती थी। आज विश्व में सौन्दर्य प्रसाधनों का बाज़ार इतना बड़ा हो गया है कि प्रोक्टर और गैम्बुल जैसी कंपनियां दवा बनाना छोड़ कौस्मेटिक के बाज़ार में उतर आई हैं। सौन्दर्य प्रसाधनों का बाज़ार स्टील और इलेक्ट्रानिक उत्पादों के बाज़ारों से प्रतियोगिता कर रहा है। इस समय विश्व में प्रति वर्ष १७० बिलियन अमेरिकी डालर के मूल्य के सौन्दर्य प्रसाधनों की खपत है। स्कूल-कालेज जानेवाली लड़कियां भी घर से निकलने के पहले फ़ुल मेकप करने लगी हैं। पहले वही स्त्रियां अपने को सुन्दर दिखाने के लिए सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रयोग करती थीं जिनके लिए सौन्दर्य एक बिकाऊ वस्तु था और उनकी आजीविका का साधन था। पश्चिम में नारी स्वातन्त्र्य आन्दोलन के बाद उभरती हुई नारी शक्ति से भयभीत पुरुष समाज ने आधुनिकता के नाम पर स्त्रियों के दोहन की सुविचारित योजनाएं बनाई। सौन्दर्य प्रतियोगिताएं और विज्ञापनों में नारी देह का प्रदर्शन इन योजनाओं में प्रमुख हैं। पुरुषों द्वारा बिछाए गए जाल में पूरे विश्व की औरतें फंसती गईं और अब हालत यह है कि इस दलदल से बाहर निकलना असंभव-सा दिख रहा है।
पुरुषों की मानसिकता की समझ के बिना कोई नारी मुक्ति आन्दोलन सफल नहीं हो सकता। संसद या न्यायालयों में ऊंची-ऊंची बात करनेवाला पुरुष समाज औरतों को मूल रूप में एक कमोडीटी ही मानता है। यही कारण है कि पुरुष हर विज्ञापन में अल्प वस्त्रों वाली कमसीन लड़की या महिला को ही देखना पसन्द करता है। अब तो हद ही हो गई है। खेल में भी सौन्दर्य का धंधा जोर पकड़ रहा है। क्रिस गेल का छक्का बाउन्ड्री पार क्या करता है कि आयातित चीयर गर्ल्स का डान्स शुरु हो जाता है। दर्शक रिप्ले का इन्तज़ार करता है कि करीना विज्ञापन लेकर हाज़िर हो जाती है। हाकी मैचों में भी यही तमाशा है। वह दिन भी दूर नहीं, जब संसद और सरकारी दफ़्तरों में भी चीयर गर्ल्स नियुक्त करने के लिए कानून बन जाएगा। पता नहीं औरतों में जागरण कब आएगा जब वे अपनी विशेष देहयष्टि और कृत्रिम सौन्दर्य का सहारा लिए बिना स्वाभिमान के साथ अपनी प्रतिभा के बल पर पूरे विश्व पटल पर मैडम क्यूरी की तरह अपनी पहचान बना पायेंगी।

Friday, July 12, 2013

यक्ष -प्रश्न - तीसरी कड़ी

यक्ष-प्रश्न (१६) - किस वस्तु के त्यागने से मनुष्य प्रिय होता है? किसे त्यागने पर शोक नहीं करता? किसे त्यागने पर वह अर्थवान होता है? और किसे त्यागकर वह सुखी होता है?
युधिष्ठिर - मान (अहंकार) को त्यागने से मनुष्य प्रिय होता है। क्रोध को त्यागने पर शोक नहीं करता। काम को त्यागने पर वह अर्थवान होता है और लोभ को त्यागकर वह सुखी होता है।
यक्ष (१७) - ब्राह्मण को किसलिए दान दिया जाता है? नट और नर्त्तकों को क्यों दान देते हैं? सेवकों को दान देने का क्या प्रयोजन है? और राजा को क्यों दान दिया जाता है?
युधिष्ठिर - ब्राह्मण को धर्म के लिए दान दिया जाता है। नट-नर्त्तकों को यश के लिए दान (पुरस्कार) दिया जाता है। सेवकों को भरण पोषण के लिए दान (वेतन) दिया जाता है और राजा को भय के कारण दान दिया जाता है।
यक्ष (१८) - यह जगत किस वस्तु से ढंका हुआ है? किसके कारण वह प्रकाशित नहीं होता? मनुष्य मित्रों को किसलिए त्याग देता है? और स्वर्ग में किस कारण नहीं जाता?
युधिष्ठिर - यह जगत अज्ञान से ढंका हुआ है। तमोगुण के कारण वह प्रकाशित नहीं होता। लोभ के कारण मनुष्य मित्रों को त्याग देता है और आसक्ति के कारण स्वर्ग में नहीं जाता।
यक्ष (१९) - पुरुष किस प्रकार मरा हुआ कहा जाता है? राष्ट्र किस प्रकार मरा हुआ कहलाता है? श्राद्ध किस प्रकार मृत हो जाता है? और यज्ञ कैसे मृत हो जाता है? 
युधिष्ठिर - दरिद्र पुरुष मरा हुआ है। बिना राजा के राष्ट्र मरा हुआ है। श्रोत्रिय ब्राह्मण के बिना, श्राद्ध मृत हो जाता है और बिना दक्षिणा के यज्ञ मरा हुआ है।
यक्ष (२०) - दिशा क्या है? जल क्या है? अन्न क्या है? विष क्या है और श्राद्ध का समय क्या है?
युधिष्ठिर - सत्पुरुष दिशा हैं क्योंकि वे मुक्ति का मार्ग बताते हैं। आकाश जल है, क्योंकि बादल उसी में उत्पन्न होते हैं। गौ अन्न है क्योंकि गौ से दूध-घी आदि हव्य प्राप्त होता है, उससे हवन होता है, हवन से वर्षा होती है और वर्षा से अन्न होता है। कामना विष है और उत्तम ब्राह्मण की प्राप्ति ही श्राद्ध का समय है।
यक्ष (२१) - उत्तम क्षमा क्या है? लज्जा किसे कहते हैं? तप का लक्षण क्या है? और दम क्या कहलाता है?
युधिष्ठिर - द्वन्द्वों को सहना क्षमा है। अकरणीय कार्य से दूर रहना लज्जा है। अपने धर्म में स्थिर रहना तप है और मन का शमन दम है।
यक्ष (२२) - ज्ञान किसे कहते हैं? शम क्या कहलाता है? दया किसका नाम है? और आर्जव (सरलता) किसे कहते हैं? 
युधिष्ठिर - वास्तविक वस्तु को ठीक-ठीक जानना ज्ञान है। चित्त की शान्ति शम है। सबके सुख की इच्छा रखना दया है और और समचित्त होना आर्जव (सरलता) है।
यक्ष (२३) - मनुष्यों का दुर्जय शत्रु कौन है? अनन्त व्याधि क्या है? साधु कौन माना जाता है? और असाधु किसे कहते हैं? 
युधिष्ठिर - क्रोध दुर्जय शत्रु है। लोभ अनन्त व्याधि है। समस्त प्राणियों का हित करने वाला साधु है और निर्दय पुरुष असाधु हैं।
यक्ष (२४) - मोह किसे कहते हैं? मान क्या कहलाता है? आलस्य किसे जानना चाहिए? और शोक किसे कहते हैं?
युधिष्ठिर - धर्ममूढ़ता ही मोह है। आत्माभिमान ही मान है। धर्म न करना आलस्य है और अज्ञान शोक है।
यक्ष (२५) - ऋषियों ने स्थिरता किसे कहा है? धैर्य क्या कहलाता है? स्नान किसे कहते हैं? और दान किसका नाम है? 
युधिष्ठिर - अपने धर्म में स्थिर रहना ही स्थिरता है। इन्द्रियनिग्रह धर्म है। मानसिक मलों को छोड़ना स्नान है और प्राणियों की रक्षा करना दान है।
यक्ष (२६) - किस पुरुष को पण्डित समझना चाहिए? नास्तिक कौन कहलाता है? मूर्ख कौन है? काम क्या है और मत्सर किसे कहते हैं?
युधिष्ठिर - धर्मज्ञ को पण्डित समझना चाहिए। मूर्ख नास्तिक कहलाता है। नास्तिक ही मूर्ख है। वासना काम है और हृदय का ताप मत्सर है।
यक्ष (२७) - अहंकार किसे कहते हैं? दंभ क्या कहलाता है? परम दैव क्या है? और पैशुन्य किसका नाम है?
युधिष्ठिर - महान अज्ञान अहंकार है। अपने को झूठमूठ बड़ा धर्मात्मा प्रसिद्ध करना दंभ है। दान का फल दैव कहलाता है और दूसरों को दोष लगाना पैशुन्य है।
यक्ष (२८) - धर्म, अर्थ और काम - इन परस्पर विरोधी तत्त्वों का एक स्थान पर कैसे संयोग हो सकता है?
युधिष्ठिर - धर्म और भार्या परस्पर वशवर्ती हों, तो धर्म, अर्थ और काम - तीनों का संयोग हो सकता है।
यक्ष - विस्तार से बताओ।
युधिष्ठिर - जब भार्या धर्मानुवर्तिनी हो, तो इन तीनों का संयोग हो सकता है, क्योंकि भार्या काम का साधन है; वह यदि अग्निहोत्र एवं दानादि धर्म का विरोध नहीं करेगी, तो उनका यथावत अनुष्ठान होने से वे अर्थ के भी साधक हो जाएंगे। इस प्रकार काम, धर्म और अर्थ - तीनों का साथ-साथ संपादन हो सकेगा।
यक्ष (२९) - भरतश्रेष्ठ! अक्षय नरक किस पुरुष को प्राप्त होता है?
युधिष्ठिर - जो पुरुष भिक्षा मांगनेवाले किसी अकिंचन ब्राह्मण को स्वयं बुलाकर, फिर उसे दान नहीं देता, वह अक्षय नरक प्राप्त करता है। जो वेद, धर्मशास्त्र, ब्राह्मण, देवता और पितृधर्मों में मिथ्याबुद्धि रखता है और धनवान होते हुए भी लोभवश दान और भोग से रहित है और कह देता है कि मेरे पास कुछ भी नहीं है, वह अक्षय नरक को प्राप्त करता है।
यक्ष (३०) - राजन! कुल, आचार, स्वाध्याय और शास्त्रश्रवण - इनमें किसके द्वारा ब्राह्मणत्व सिद्ध होता है? 
युधिष्ठिर - कुल, स्वाध्याय और शास्त्रश्रवण - इनमें से कोई भी ब्राह्मणत्व का कारण नहीं है। निःसन्देह सदाचार ही ब्राह्मणत्व का कारण है। अतः प्रयत्नपूर्वक सदाचार की रक्षा करनी चाहिए। जिसका सदाचार अक्षुण्य है, उसका ब्राह्मणत्व भी बना रहता है। जिसका आचार नष्ट हो गया, वह तो स्वयं ही नष्ट हो जाता है। पढ़नेवाले, पढ़ानेवाले और शास्त्र का विचार करनेवाले - ये सब व्यसनी और मूर्ख हैं, पण्डित तो वह है जो अपने कर्त्तव्य का पालन करता है। चारों वेद पढ़ा होने पर भी यदि कोई दूषित आचरण वाला हो, तो वह किसी भी प्रकार शूद्र से बढ़कर नहीं है। वस्तुतः जो अग्निहोत्र में तत्पर और जितेन्द्रिय है, वही ‘ब्राह्मण’ है।
शेष अगली कड़ी (समापन) में।

Monday, July 8, 2013

यक्ष-प्रश्न - दूसरी कड़ी


यक्ष (६) - देवतर्पण करनेवालों के लिए कौन वस्तु श्रेष्ठ है? पितरों का तर्पण करनेवालों के लिए क्या श्रेष्ठ है? प्रतिष्ठा चाहनेवालों के लिए कौन वस्तु श्रेष्ठ है? तथा सन्तान चाहनेवालों के लिए क्या श्रेष्ठ है?
युधिष्ठिर - देवतर्पण करनेवालों के लिए वर्षा श्रेष्ठ फल है। पितरों का तर्पण करनेवालों के लिए बीज श्रेष्ठ है। प्रतिष्ठा चाहनेवालों के लिए गौ श्रेष्ठ है और सन्तान चाहनेवालों के लिए पुत्र श्रेष्ठ है।
यक्ष (७) - ऐसा कौन पुरुष है जो इन्द्रियों के विषयों को अनुभव करते हुए, श्वास लेते हुए तथा बुद्धिमान, लोक में सम्मानित और सब प्राणियों का माननीय होकर भी वास्तव में जीवित नहीं है?
युधिष्ठिर - जो देवता, अतिथि, सेवक, माता-पिता और आत्मा - इन पांचों का पोषण नहीं करता, वह श्वास लेने पर भी जीवित नहीं है।
यक्ष (८) - पृथ्वी से भी भारी क्या है? आकाश से भी ऊंचा क्या है ? वायु से भी तेज चलनेवाला क्या है? और तिनकों से भी अधिक संख्या में क्या है?
युधिष्ठिर - माता भूमि से भी भारी (अधिक महत्त्वपूर्ण) है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। मन वायु से भी तेज चलनेवाला है और चिन्ता तिनकों से भी बढ़कर है।
यक्ष (९) - सो जाने पर पलक कौन नहीं मूंदता? उत्पन्न होने पर चेष्टा कौन नहीं करता? हृदय किसमें नहीं है? और वेग से कौन बढ़ता है?
युधिष्ठिर - मछली सोने पर भी पलक नहीं मूंदती। अण्डा उत्पन्न होने पर भी चेष्टा नहीं करता। पत्थर में हृदय नहीं होता और नदी वेग से बढ़ती है।
यक्ष (१०) - विदेश में जानेवाले का मित्र कौन है? घर में रहनेवाले का मित्र कौन है? रोगी का मित्र कौन है? और मृत्यु के पास पहुंचे हुए मानव का मित्र कौन है?
युधिष्ठिर - साथ में जानेवाले यात्री विदेश जानेवाले के मित्र हैं। स्त्री घर में रहनेवाले की मित्र है। वैद्य रोगी का मित्र है और दान मुमूर्षु (मृत्यु के समीप पहुंचा हुआ) का मित्र है।
यक्ष (११) - समस्त प्राणियों का अतिथि कौन है? अमृत क्या है? सनातन धर्म क्या है?  और यह सारा जगत क्या है?
युधिष्ठिर - अग्नि समस्त प्राणियों का अतिथि है। गौ का दूध अमृत है। अविनाशी नित्यधर्म ही सनातन धर्म है और वायु यह सारा जगत है।
यक्ष (१२) - अकेला कौन विचरता है? एक बार उत्पन्न होकर पुनः कौन उत्पन्न होता है? शीत की औषधि क्या है? और महान देवतर्पण क्षेत्र क्या है?
युधिष्ठिर - सूर्य अकेला विचरता है। चन्द्रमा एक बार जन्म लेकर पुनः जन्म लेता है। अग्नि शीत की औषधि है और पृथ्वी सबसे महान देवतर्पण क्षेत्र है।
यक्ष (१२) - धर्म का मुख्य स्थान क्या है? यश का मुख्य स्थान क्या है? स्वर्ग का मुख्य स्थान क्या है? और सुख का मुख्य स्थान क्या है?
युधिष्ठिर - धर्म का मुख्य स्थान दक्षता है। यश का मुख्य स्थान दान है। स्वर्ग का मुख्य स्थान सत्य है और सुख का मुख्य स्थान शील है।
यक्ष (१३) - मनुष्य की आत्मा क्या है? उसका दैवकृत सखा कौन है? उपजीवन (जीने का सहारा) क्या है? और उसका परम आश्रय क्या है?
युधिष्ठिर - पुत्र मनुष्य की आत्मा है। स्त्री इसकी दैवकृत सखा है। मेघ उपजीवन है और दान परम आश्रय है।
यक्ष (१४) - धन्यवाद के योग्य पुरुषों में उत्तम गुण क्या है? धनों में उत्तम धन क्या है? लाभों में प्रधान लाभ क्या है? और सुखों में श्रेष्ठ सुख क्या है?
युधिष्ठिर - धन्य पुरुषों में दक्षता ही उत्तम गुण है। धनों में शास्त्रज्ञान प्रधान है। लाभों में आरोग्य प्रधान है और सुखों में संतोष श्रेष्ठ सुख है।
यक्ष (१५) - लोक में श्रेष्ठ धर्म क्या है? नित्य फलवाला धर्म क्या है? किसको वश में रखने से शोक नहीं होता? और किसके साथ की हुई संधि नष्ट नहीं होती?
युधिष्ठिर - लोक में दया श्रेष्ठ धर्म है। वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है। मन को वश में रखने से शोक नहीं होता और सत्पुरुषों के साथ की हुई संधि कभी नष्ट नहीं होती।
शेष प्रश्न और उत्तर अगली कड़ी में।
यक्ष-प्रश्न - दूसरी कड़ी
यक्ष (६) - देवतर्पण करनेवालों के लिए कौन वस्तु श्रेष्ठ है? पितरों का तर्पण करनेवालों के लिए क्या श्रेष्ठ है? प्रतिष्ठा चाहनेवालों के लिए कौन वस्तु श्रेष्ठ है? तथा सन्तान चाहनेवालों के लिए क्या श्रेष्ठ है?
युधिष्ठिर - देवतर्पण करनेवालों के लिए वर्षा श्रेष्ठ फल है। पितरों का तर्पण करनेवालों के लिए बीज श्रेष्ठ है। प्रतिष्ठा चाहनेवालों के लिए गौ श्रेष्ठ है और सन्तान चाहनेवालों के लिए पुत्र श्रेष्ठ है।
यक्ष (७) - ऐसा कौन पुरुष है जो इन्द्रियों के विषयों को अनुभव करते हुए, श्वास लेते हुए तथा बुद्धिमान, लोक में सम्मानित और सब प्राणियों का माननीय होकर भी वास्तव में जीवित नहीं है?
युधिष्ठिर - जो देवता, अतिथि, सेवक, माता-पिता और आत्मा - इन पांचों का पोषण नहीं करता, वह श्वास लेने पर भी जीवित नहीं है।
यक्ष (८) - पृथ्वी से भी भारी क्या है? आकाश से भी ऊंचा क्या है ? वायु से भी तेज चलनेवाला क्या है? और तिनकों से भी अधिक संख्या में क्या है?
युधिष्ठिर - माता भूमि से भी भारी (अधिक महत्त्वपूर्ण) है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। मन वायु से भी तेज चलनेवाला है और चिन्ता तिनकों से भी बढ़कर है।
यक्ष (९) - सो जाने पर पलक कौन नहीं मूंदता? उत्पन्न होने पर चेष्टा कौन नहीं करता? हृदय किसमें नहीं है? और वेग से कौन बढ़ता है?
युधिष्ठिर - मछली सोने पर भी पलक नहीं मूंदती। अण्डा उत्पन्न होने पर भी चेष्टा नहीं करता। पत्थर में हृदय नहीं होता और नदी वेग से बढ़ती है।
यक्ष (१०) - विदेश में जानेवाले का मित्र कौन है? घर में रहनेवाले का मित्र कौन है? रोगी का मित्र कौन है? और मृत्यु के पास पहुंचे हुए मानव का मित्र कौन है?
युधिष्ठिर - साथ में जानेवाले यात्री विदेश जानेवाले के मित्र हैं। स्त्री घर में रहनेवाले की मित्र है। वैद्य रोगी का मित्र है और दान मुमूर्षु (मृत्यु के समीप पहुंचा हुआ) का मित्र है।
यक्ष (११) - समस्त प्राणियों का अतिथि कौन है? अमृत क्या है? सनातन धर्म क्या है?  और यह सारा जगत क्या है?
युधिष्ठिर - अग्नि समस्त प्राणियों का अतिथि है। गौ का दूध अमृत है। अविनाशी नित्यधर्म ही सनातन धर्म है और वायु यह सारा जगत है।
यक्ष (१२) - अकेला कौन विचरता है? एक बार उत्पन्न होकर पुनः कौन उत्पन्न होता है? शीत की औषधि क्या है? और महान देवतर्पण क्षेत्र क्या है?
युधिष्ठिर - सूर्य अकेला विचरता है। चन्द्रमा एक बार जन्म लेकर पुनः जन्म लेता है। अग्नि शीत की औषधि है और पृथ्वी सबसे महान देवतर्पण क्षेत्र है।
यक्ष (१२) - धर्म का मुख्य स्थान क्या है? यश का मुख्य स्थान क्या है? स्वर्ग का मुख्य स्थान क्या है? और सुख का मुख्य स्थान क्या है? 
युधिष्ठिर - धर्म का मुख्य स्थान दक्षता है। यश का मुख्य स्थान दान है। स्वर्ग का मुख्य स्थान सत्य है और सुख का मुख्य स्थान शील है।
यक्ष (१३) - मनुष्य की आत्मा क्या है? उसका दैवकृत सखा कौन है? उपजीवन (जीने का सहारा) क्या है? और उसका परम आश्रय क्या है?
युधिष्ठिर - पुत्र मनुष्य की आत्मा है। स्त्री इसकी दैवकृत सखा है। मेघ उपजीवन है और दान परम आश्रय है।
यक्ष (१४) - धन्यवाद के योग्य पुरुषों में उत्तम गुण क्या है? धनों में उत्तम धन क्या है? लाभों में प्रधान लाभ क्या है? और सुखों में श्रेष्ठ सुख क्या है?
युधिष्ठिर - धन्य पुरुषों में दक्षता ही उत्तम गुण है। धनों में शास्त्रज्ञान प्रधान है। लाभों में आरोग्य प्रधान है और सुखों में संतोष श्रेष्ठ सुख है।
यक्ष (१५) - लोक में श्रेष्ठ धर्म क्या है? नित्य फलवाला धर्म क्या है? किसको वश में रखने से शोक नहीं होता? और किसके साथ की हुई संधि नष्ट नहीं होती?
युधिष्ठिर - लोक में दया श्रेष्ठ धर्म है। वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है। मन को वश में रखने से शोक नहीं होता और सत्पुरुषों के साथ की हुई संधि कभी नष्ट नहीं होती।
शेष प्रश्न और उत्तर अगली कड़ी में।
यक्ष-प्रश्न - दूसरी कड़ी
यक्ष (६) - देवतर्पण करनेवालों के लिए कौन वस्तु श्रेष्ठ है? पितरों का तर्पण करनेवालों के लिए क्या श्रेष्ठ है? प्रतिष्ठा चाहनेवालों के लिए कौन वस्तु श्रेष्ठ है? तथा सन्तान चाहनेवालों के लिए क्या श्रेष्ठ है?
युधिष्ठिर - देवतर्पण करनेवालों के लिए वर्षा श्रेष्ठ फल है। पितरों का तर्पण करनेवालों के लिए बीज श्रेष्ठ है। प्रतिष्ठा चाहनेवालों के लिए गौ श्रेष्ठ है और सन्तान चाहनेवालों के लिए पुत्र श्रेष्ठ है।
यक्ष (७) - ऐसा कौन पुरुष है जो इन्द्रियों के विषयों को अनुभव करते हुए, श्वास लेते हुए तथा बुद्धिमान, लोक में सम्मानित और सब प्राणियों का माननीय होकर भी वास्तव में जीवित नहीं है?
युधिष्ठिर - जो देवता, अतिथि, सेवक, माता-पिता और आत्मा - इन पांचों का पोषण नहीं करता, वह श्वास लेने पर भी जीवित नहीं है।
यक्ष (८) - पृथ्वी से भी भारी क्या है? आकाश से भी ऊंचा क्या है ? वायु से भी तेज चलनेवाला क्या है? और तिनकों से भी अधिक संख्या में क्या है?
युधिष्ठिर - माता भूमि से भी भारी (अधिक महत्त्वपूर्ण) है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। मन वायु से भी तेज चलनेवाला है और चिन्ता तिनकों से भी बढ़कर है।
यक्ष (९) - सो जाने पर पलक कौन नहीं मूंदता? उत्पन्न होने पर चेष्टा कौन नहीं करता? हृदय किसमें नहीं है? और वेग से कौन बढ़ता है?
युधिष्ठिर - मछली सोने पर भी पलक नहीं मूंदती। अण्डा उत्पन्न होने पर भी चेष्टा नहीं करता। पत्थर में हृदय नहीं होता और नदी वेग से बढ़ती है।
यक्ष (१०) - विदेश में जानेवाले का मित्र कौन है? घर में रहनेवाले का मित्र कौन है? रोगी का मित्र कौन है? और मृत्यु के पास पहुंचे हुए मानव का मित्र कौन है?
युधिष्ठिर - साथ में जानेवाले यात्री विदेश जानेवाले के मित्र हैं। स्त्री घर में रहनेवाले की मित्र है। वैद्य रोगी का मित्र है और दान मुमूर्षु (मृत्यु के समीप पहुंचा हुआ) का मित्र है।
यक्ष (११) - समस्त प्राणियों का अतिथि कौन है? अमृत क्या है? सनातन धर्म क्या है?  और यह सारा जगत क्या है?
युधिष्ठिर - अग्नि समस्त प्राणियों का अतिथि है। गौ का दूध अमृत है। अविनाशी नित्यधर्म ही सनातन धर्म है और वायु यह सारा जगत है।
यक्ष (१२) - अकेला कौन विचरता है? एक बार उत्पन्न होकर पुनः कौन उत्पन्न होता है? शीत की औषधि क्या है? और महान देवतर्पण क्षेत्र क्या है?
युधिष्ठिर - सूर्य अकेला विचरता है। चन्द्रमा एक बार जन्म लेकर पुनः जन्म लेता है। अग्नि शीत की औषधि है और पृथ्वी सबसे महान देवतर्पण क्षेत्र है।
यक्ष (१२) - धर्म का मुख्य स्थान क्या है? यश का मुख्य स्थान क्या है? स्वर्ग का मुख्य स्थान क्या है? और सुख का मुख्य स्थान क्या है? 
युधिष्ठिर - धर्म का मुख्य स्थान दक्षता है। यश का मुख्य स्थान दान है। स्वर्ग का मुख्य स्थान सत्य है और सुख का मुख्य स्थान शील है।
यक्ष (१३) - मनुष्य की आत्मा क्या है? उसका दैवकृत सखा कौन है? उपजीवन (जीने का सहारा) क्या है? और उसका परम आश्रय क्या है?
युधिष्ठिर - पुत्र मनुष्य की आत्मा है। स्त्री इसकी दैवकृत सखा है। मेघ उपजीवन है और दान परम आश्रय है।
यक्ष (१४) - धन्यवाद के योग्य पुरुषों में उत्तम गुण क्या है? धनों में उत्तम धन क्या है? लाभों में प्रधान लाभ क्या है? और सुखों में श्रेष्ठ सुख क्या है?
युधिष्ठिर - धन्य पुरुषों में दक्षता ही उत्तम गुण है। धनों में शास्त्रज्ञान प्रधान है। लाभों में आरोग्य प्रधान है और सुखों में संतोष श्रेष्ठ सुख है।
यक्ष (१५) - लोक में श्रेष्ठ धर्म क्या है? नित्य फलवाला धर्म क्या है? किसको वश में रखने से शोक नहीं होता? और किसके साथ की हुई संधि नष्ट नहीं होती?
युधिष्ठिर - लोक में दया श्रेष्ठ धर्म है। वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है। मन को वश में रखने से शोक नहीं होता और सत्पुरुषों के साथ की हुई संधि कभी नष्ट नहीं होती।
शेष प्रश्न और उत्तर अगली कड़ी में।