Thursday, June 20, 2019

केन्द्रीय सरकार का भावी एजेंडा

      हर आम चुनाव के बाद गठित सरकार के भावी एजेंडे को संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण के माध्यम से जनता तक पहुंचाने की परंपरा रही है। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए कल दिनांक २० जून को महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया। उन्होंने देश की आज़ादी की ७५वीं वर्षगांठ यानी २०२२ तक हर गरीब को चिकित्सा सुविधा और आवास देने का वादा किया। राष्ट्रपति महोदय ने आगामी ५ वर्षों के लिए मोदी सरकार की योजना और प्राथमिकताएं साझा की। उन्होंने सरकार को गरीबों, किसानों और जवानों के लिए समर्पित बताते हुए कहा कि आज़ादी के ७५ वर्ष पूरे होने तक विकास के नए मानकों को हासिल करेंगे। उन्होंने ‘निकाह-हलाला’ और तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं के उन्मूलन को अत्यन्त आवश्यक बताया। संक्षेप में उन्होंने देश के सभी नागरिकों के सिर पर छत, सभी को इलाज और सन २०२२ तक अन्तरिक्ष में तिरंगा लहराने की सरकार की प्रतिबद्धता से संसद को अवगत कराया। राष्ट्रपति महोदय का अभिभाषण सामान्य रूप से प्रशंसा के योग्य था, लेकिन कुछ मुद्दों पर निराशाजनक भी था। भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में किए गए कुछ महत्त्वपूर्ण वादों का अभिभाषण यानी सरकार की भावी नीतियों में उल्लेख तक नहीं था। कश्मीर की विवादित धारा ३७० और ३५ए को हटाने और राम मन्दिर निर्माण के संबन्ध में एक शब्द भी नहीं कहा गया जिसके कारण भाजपा के करोड़ों-करोड़ों कार्यकर्त्ता और समर्थकों की भावना आहत हुई। ध्यान रहे कि इन्हीं कार्यकर्ताओं और समर्थकों के दिन-रात के प्रयास के कारण ही भाजपा प्रचण्ड बहुमत के साथ पुनः सत्ता में आई है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि अबतक जितने भी प्रधान मन्त्री हुए हैं, सबके सब नेहरू बनने की दौड़ में शामिल रहे हैं। देश के प्रथम गैर कांग्रेसी प्रधान मन्त्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी भी इस दौड़ से अछूते नहीं रहे। अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधान मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी भी इस दौड़ में शामिल होने को तत्पर दिखाई देते हैं। सबका विश्वास जीतने की उनकी अव्यवहारिक मंशा कही बहुत भारी न पड़े, इसके पहले संगठन और सरकार को चेत जाना चाहिए। संसद के नए सत्र की शुरुआत में सरकार द्वारा आयोजित रात्रिभोज में आमंत्रित करने के बावजूद राहुल और सोनिया ने बहिष्कार किया। अभी-अभी मोदीजी ने राहुल के जन्मदिन पर उन्हें बधाई भी दी थी। लेकिन सब बेकार गया। ‘एक देश एक चुनाव’ के मुद्दे पर कांग्रेस का विरोध नीतिगत नहीं है। यह विरोध मोदी का अन्ध विरोध है। क्या किसी ने अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (२१-६-२०१९) पर राहुल और सोनिया को योग करते हुए देखा है? क्या आप ओवैसी और आज़म खान से वन्दे मातरम या भारत माता की जय बुलवा सकते हैं? सबका विश्वास अर्जित करने की बात पूरी तरह सैद्धान्तिक है। भगवान श्रीकृष्ण भी लाख प्रयास के बाद भी सबका विश्वास अर्जित नहीं कर सके। इसके लिए मोदीजी से आग्रह है कि जिनके विश्वास के बल पर वे पुनः सत्ता में आए हैं उनका ही विश्वास और दृढ़ करने का प्रयास करें, वरना अगले चुनाव में भारी मन से कही ये न कहना पड़े --- माया मिली न राम।
भाजपा सत्ता पाते ही अपने कोर वोटर्स की उपेक्षा करना शुरु कर देती है। गुजरात के मुख्यमन्त्री रहते हुए मोदी जी की पूरे देश में जो छवि बनी, वह थी एक अडिग और भरोसेमंद हिन्दू-रक्षक नेता की। उन्हें घोर सांप्रदायिक, अतिवादी और मौत का सौदागर भी कहा गया। देश-विदेश में उनका प्रबल विरोध किया गया। लेकिन दशकों से कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति और हिन्दुओं की उपेक्षा ने मोदी जी को अचानक हिन्दू-हृदय सम्राट बना दिया। जनता ने उनकी हिन्दुत्व-छवि को स्वीकार किया और जाति-पांति की दीवार तोड़कर उन्हें बहुमत दिया। कोई इस मुगालते में नहीं रहे कि २०१९ का चुनाव ‘सबका साथ, सबका विकास’ के कारण जीता गया। यह जीत भी मोदीजी के प्रखर राष्ट्रवाद की जीत थी। लगभग सभी जनसभाओं में अमित शाह जी ने कश्मीर से धारा ३७० और ३५ए को हटाने की बात कही थी। प्रधान मन्त्री और अमित शाह, दोनों ने राम मन्दिर के निर्माण के लिए अपनी प्रतिबद्धता जोरदार शब्दों में कई बार दुहराई थी। लेकिन सरकार के भावी एजेन्डे में ये प्रतिबद्धताएं नेपथ्य में चली गईं। नई सरकार बनते ही यह घोषणा की गई कि सभी मुस्लिम लड़कियों को हर स्तर की शिक्षा के लिए सरकारी छात्रवृत्ति दी जाएगी। क्या यह ‘सबका विकास’ कार्यक्रम का अंग प्रतीत होता है? क्या गरीब हिन्दू लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति आवश्यक नहीं है? इसे तुष्टीकरण नहीं कहा जाय तो और क्या नाम दिया जाय?
प्रधान मन्त्री मोदीजी, अध्यक्ष अमित शाह्जी और भाजपा संगठन से यह आग्रह है कि वे पहले अपने वर्तमान समर्थकों, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के विश्वास को और सुदृढ़ करने का प्रयास करें, फिर अन्यों का विश्वास अर्जित करने की कोशिश करें। एक बहुचर्चित श्लोक है ---
यः ध्रुवाणि परितज्य अध्रुवेण निशेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नश्यमेव हि ॥
जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित की तरफ भागता है, उसका अनिश्चित तो अनिश्चित ही रहता है, निश्चित अवश्य नष्ट हो जाता है।

Thursday, June 13, 2019

क्या सचमुच न्याय अन्धा होता है

      सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रन्जन गोगोई द्वारा पिछले वर्ष १०-११ अक्टुबर को अपने आवासीय कार्यालय में अपनी ही ३५ वर्षीया महिला जूनियर कोर्ट सहायक से कथित यौन उत्पीड़न का मामला चुनावी शोरगुल में दब गया था। लेकिन अब जब देश को एक स्थाई सरकार मिल चुकी है और चुनाव का माहौल खत्म हो चुका है तो इस पर सरकार, महिला आयोग, संसद, नेता और जनता को यह विचार करना चाहिए कि क्या यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को न्याय मिल गया? अपने ही मित्र जजों की अनौपचारिक समिति द्वारा एकतरफा सुनवाई कराकर क्लीन चिट प्राप्त कर क्या माननीय चीफ जस्टिस ने न्याय का उपहास नहीं किया है? घटना और घटना की पूर्व स्थितियों का विवरण निम्नवत है ---
     १. दिनांक ९ अक्टूबर, २०१८ को पीड़ित महिला की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई महिला के देवर/बहनोई (Brother-in-law) को आदेश संख्या F-3/2018-SCA(1) New Delhi dated Oct 9, 2018 के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए अस्थाई कनिष्ठ कोर्ट अटेन्डेन्ट के पद पर नियुक्त करते हैं और १०-११ अक्टूबर को अपने आवासीय कार्यालय में महिला के यौन उत्पीड़न का प्रयास करते है। पीड़ित महिला ने अपने एफ़डेविट में यह स्पष्ट किया है। इससे तो यह साफ है कि चीफ़ जस्टिस महोदय महिला को अच्छी तरह से जानते थे और उसके प्रति कही न कही मृदु भाव रखते थे, तभी उसकी सिफारिश पर उसके निकट के संबन्धी को नौकरी देने का कार्य किया। उन्हें यह उम्मीद थी कि महिला उनके एहसान तले दब जाएगी और उनकी इच्छा की पूर्ति करेगी। यौन उत्पीड़न की घटना इसी का परिणाम थी। 
२. इस घटना की दबी जुबान चर्चा सुप्रीम कोर्ट के गलियारे में शुरु हो गई थी। पीड़ित महिला को इसका परिणाम भुगतना ही था। उसे दिनांक २१-१२-१८ को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। आरोप भी हास्यास्पद ही था -- महिला ने बिना पूर्व अनुमति के एक दिन का आकस्मिक अवकाश लिया था। क्या इतना छोटा आरोप Dissmisal का कारण बन सकता है। उत्पीड़न यही तक नहीं रुका। ९ अक्टूबर को नौकरी पाए उसके देवर/ बहनोई को भी सेवामुक्त कर दिया गया।
३. एक पुराने अप्रमाणित रिश्वत लेने के मामले में दिल्ली पुलिस पर दबाव डालकर महिला और उसके पति को राजस्थान स्थित उसकी ससुराल से गिरफ़्तार करके दिल्ली लाया गया और हिरासत में रखकर यंत्रणा दी गई।
४. पीड़ित महिला के पति और देवर जो दिल्ली पुलिस में हेड कांस्टेबुल थे, निलंबित कर दिया गए।
५. महिला को पुलिस द्वारा अपने घर बुलाकर चीफ़ जस्टिस की पत्नी के चरणों में नाक रगड़कर माफ़ी मांगने के लिए वाध्य किया गया।
६. महिला को तरह-तरह की धमकियां मिलती रही। आज़िज़ आकर महिला ने न्याय की गुहार लगाते हुए पूरी घटना का विवरण अप्रिल, २०१९ में शपथ-पत्र के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों को भेजा। इस शपथ पत्र के सोसल मीडिया पर आ जाने के बाद पूरे देश में हड़कंप मच गया। चुनाव सिर पर होने के कारण राजनेता चुप रहे।
७. भयभीत मुख्य न्यायाधीश महोदय ने आनन-फानन में तीन जजों की एक पीठ गठित की जिसकी अध्यक्षता उन्होंने स्वयं की। इसकी सूचना न पीड़िता को दी गई और ना ही उसका पक्ष सुना गया। न्यायमूर्ति गोगोई ने स्वयं महिला पर कई गंभीर आरोप लगाए और इस घटना को लोकतन्त्र और न्यायपालिका पर एक गंभीर हमला बताया।
८. सुप्रींम कोर्ट की इस अनोखी कार्यवाही पर मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया हुई। पीड़िता तो क्या, कोई भी पढ़ालिखा आदमी कोर्ट के इस फैसले से सन्तुष्ट नहीं था।
९. चीफ़ जस्टिस द्वारा Eye-wash करने का एक और प्रयास किया गया। उन्होंने घटना की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की एक समिति गठित कर दी जो न संवैधानिक थी, न वैधानिक थी और न किसी अधिकार से संपन्न थी। यह पूर्ण रूप से एक अनौपचारिक समिति थी। इस  समिति में उन्होंने जस्टिस रमन्ना को रखा जो उनके परम मित्र ही नहीं, परिवार के सदस्य की तरह हैं। पीड़िता द्वारा आपत्ति दर्ज़ कराने के बाद उनके स्थान पर जस्टिस बोगडे को रखा गया।
१०. समिति ने पीड़िता को अपनी बात रखने के लिए २६ अप्रिल को बुलाया। इस बीच भयंकर आर्थिक संकट और मानसिक तनाव के कारण महिला की श्रवण-शक्ति बाधित हो गई। वह दाहिने कान से पूर्ण रुप से और बाएं कान से आंशिक रूप से बधिर हो गई।
११. अवसाद की शिकार महिला फिर भी २६ अप्रिल को समिति के सामने उपस्थित हुई। अपनी शारीरिक और मानसिक अवस्था का हवाला देते हुए उसने वकील के माध्यम से अपनी बात कहने का अनुरोध किया। उसने कार्यवाही की विडियो/आडियो रिकार्डिंग की भी मांग की। अकेले इतने वरिष्ठ जजों के सामने उनके प्रश्नों को सुन वह नर्वस भी हो रही थी।  उस दिन की सुनवाई पूरी होने के बाद महिला ने अपने बयान की एक प्रति मांगी। उसकी किसी भी बात को समिति ने नहीं माना।
१२. महिला फिर भी दिनांक २९ अप्रील को समिति के सामने उपस्थित हुई और जांच को Enquiry in Accordance with Sexual Harassment Act 2013 के प्रावधानों के तहत करने की मांग की जिसे ठुकराते हुए समिति ने बताया कि वह समिति अनौपचारिक है, उसे कोई वैधानिक दर्ज़ा प्राप्त नहीं है और ना ही वह किसी मुकदमे का अंग है। फिर महिला ने आगे की कार्यवाही में शामिल होने से इंकार कर दिया
१३. अन्त में सुप्रीम कोर्ट की अधिकारविहीन समिति ने मुख्य न्यायाधीश महोदय को क्लीन चिट देते हुए अपनी रिपोर्ट लगा दी कि महिला द्वारा लगाए गए सभी आरोप तथ्यहीन हैं।
क्या इसी को न्याय कहते हैं? सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस संविधान, कानून और लोक मर्यादा से ऊपर हैं?
समिति के रिपोर्ट के खिलाफ दर्जनों वकीलों और महिला अधिकार के लिए समर्पित संगठन के कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन किया। सभी को गिरफ़्तार करके मन्दिर मार्ग थाने में भेज दिया गया।
पीड़ित महिला को न्याय दिलाने के लिए २६ अप्रिल को Women in Criminal Law Association ने Sexual Harassment Act 2013 के प्रावधानों और धाराओं के अनुसार विधिसम्मत जांच कराकर दोषी को सज़ा देने की मांग की है। संगठन ने सुप्रीम कोर्ट के सभी पूर्व जजों को तत्संबन्धी पत्र भी भेजा है। सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जज और दूसरे पूर्व जजों ने भी जस्टिस गोगोई द्वारा इस यौन उत्पीड़न की घटना की सुनवाई की पूरी प्रक्रिया को विधि विरुद्ध और अनैतिक करार दिया है।
देखते हैं पीड़ित महिला को न्याय मिलता भी है या नहीं? वैसे कानून की आंखों पर फिलहाल तो काली पट्टी बंधी है।

Sunday, May 26, 2019

एक पाती राहुल बचवा के नाम

 प्रिय पप्पू,
आज बहुत दिनों के बाद तोहरे पास पाती पेठा रहे हैं। का करीं बचवा, हम भी चुनाव के नतीजों का तोहसे कम बेचैनी से इन्तज़ार नहीं कर रहे थे। सोचे थे कि तुम जीतोगे तो जोरदार बधाई देंगे, लेकिन ई मोदिया सब तहस-नहस कर दिया। पिछले विधान सभा चुनाव में तुम्हारे कुर्ते का पकिटवे फड़वा दिया और इस चुनाव में पयजमवा भी उतरवा लिया। ऊ त भला हो वायनाड का कि तुम्हारी लंगोट बच गई, वरना वह कनाट प्लेस में तोके लंगटे घूमने के लिए मज़बूर कर देता। बचवा हमके VVPAT पर बहुत भरोसा रहा लेकिन एको VVPAT और EVM में गड़बड़ी नहीं मिली। एको में कुछ मिल जाता तो दुबारा चुनाव कराने की डिमांड तो तुम कर ही देते; बनारस में हम मोर्चा संभालते, फिर येचुरिया, नयडुआ, ललुआ का बेटा, हथिनी माया, टोंटीचोर अखिलेश और थप्पड़खाऊ केजरिया तो हमारे पीछे आ ही जाते। लेकिन उहो नहीं हुआ। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब और कर्नाटक में तो अपनी ही सरकार थी। तोहार कन्ट्रोल कुछ ढीला पड़ता नजर आ रहा है। एको मुख्यमन्त्री VVPAT और EVM में तनिको Discrepancy कराने में कामयाब नहीं रहा। सब कागज के शेर साबित हुए। तुम सहिए पप्पू हो। न बाल-बच्चा आ ना मेहरारू। किसके लिए अरबों-खरबों बचाए हो? इस काम का ठेका अगर ममता को ही दे देते, तो वह कर देती, काहे कि शारदा चिट घोटाले का पैसा अब खत्म हो गया है। एक वही है जो मोदी को झांपड़ मारने की घोषणा कर सकती है और भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या से लेकर VVPAT तथा EVM में कुछ गड़बड़ी करने का साहस कर सकती है। ई बात भी सांच है कि दिन भर चिचियानी एक्को बच्चा ना बियानी। लेकिन वह गंभीर प्रयास तो कर ही सकती थी। लेकिन तुम हमारी सलाह मांगते ही नहीं। तुम तो फ़्रेन्च कट वाले सैम पित्रोदा और मणि शंकर अय्यर की बात मानते हो। बुढ़वा पित्रोदवा और इमरान का यार अय्यरवा तुम्हारी लंगोट भी उतरवा के मानेंगे। अब सबकुछ भूलकर मोदी से मिलो और पैर छूकर माफ़ी मांग लो। वह शरणागत की उसी तरह रक्षा करता है जिस तरह प्रभु राम ने विभीषण की की थी। अगर अइसा नहीं करोगे तो बडरवा जीजा, छूईमुई बहिनिया प्रियंका और महतारी के साथे-साथे तोके भी तिहाड़ जेल में चक्की पीसे के पड़ी।
बचवा ई गाली-गलौज की भाषा छोड़ दो। तुमने मोदी को चोर कहा और जनता ने उसे फिर से चौकीदार बना दिया। बचवा, अमेठी में ई का भया? समाचार है कि तुम एक ईरानी मेहरारू से हार गए। बताव, मेहरारुओ से कोई लात खाता है? तुम्हारी महतारी इटालियन होकर भी एको बार नहीं हारी और तुम्हारी पैंट एक ईरानी औरत के आगे ढीली हो गई। पाती खत्म करने के पहले हमहूँ एक सलाह देना चाह रहा हूँ। कभी-कभी मेहरारू के भाग्य से भी मरद का भाग्य जाग जाता है। अब तुम्हारी जवानी भी ढलान पर है। बाणप्रस्थ के किनारे खड़े हो। ई दुर्लभ जवानी बर्बाद करने से कवनो फायदा नाहीं। तुम तो नेता विपक्ष भी नहीं बन सकते। खलिहर टाइम का क्या करोगे? कही इधर-उधर मुंह मारो और पकड़े गए तो मुंह दिखाने के भी काबिल नहीं रहोगे। मोदिया के जासूस बड़े पक्के हैं। अब देसी या बिदेसी, कवनों से बियाह कर लो। बस इतना ध्यान रखना की लड़की मोनालिसा जइसन खूबसूरत हो। एसे दुइ गो फायदा होई। एक त तोहरे देह में हरदी लाग जाई आ दूसरे कि प्रियंका के वर्क लोड भी कम हो जाई। प्रियंका की उम्र भी अब ढल रही है। कबतक मनचलों की भीड़ को रोड शो में खींच पाएगी? जनता फ़्रेश मेटेरियल चाहती है। कोट पर जनेऊ और कैलाश मानसरोवर की कृपा होगी तो शायद काम भी बन जाय़। इस मामले में अपने दोस्त इमरान खान की सलाह भी ले सकते हो। क्या छांट-छांट कर बिवियां ले आता है!
अब एसे जियादा का लिखीं। थोड़ा लिखना ज्यादा समझना। भौजी को हमारी ओर से राम-राम कह देना।
इति। कुशल।
तोहार शुभाकांक्षी
चाचा बनारसी

Thursday, April 25, 2019

जज या थानेदार

         कल २५ अप्रेल को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर एक महिला के यौन उत्पीड़न के मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अरुण मिश्रा ने जो धमकी दी, साधारणतया कोई थानेदार भी सार्वजनिक रूप से किसी को नहीं देता। सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्रा ने कहा -- अमीर-ताकतवर, सुन लो, आग से मत खेलो। हमें और मत भड़काओ। हम अमीर और ताकतवर लोगों को बताना चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट से खेलना आग से खेलने जैसा है। जस्टिस मिश्रा की यह धमकी कही पीड़ित महिला के लिए भी तो नहीं है। इसपर विचार करना पड़ेगा। जांच के पूर्व ही न्यायिक पीठ में शामिल एक जज की आक्रोश भरी टिप्पणी से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि जस्टिस मिश्रा पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं और उनके रहते पीड़ित महिला को न्याय मिल पाएगा, इसमें गंभीर सन्देह है। उन्होंने आगे कहा कि न्यायिक प्रणाली में कोई मैच फिक्सिंग नहीं। सभी जानते हैं कि देश के सभी न्यायालयों में मैच फिक्सिंग आम बात है। जब आप हाई कोर्ट में स्टे लेने या हटाने या किसी और मामले के लिए जाते हैं और सुनवाई के लिए जल्दबाज़ी के लिए अपने वकील से आग्रह करते हैं, तो वकील का उत्तर होता है -- जल्दी मत कीजिए। अभी फ़ेवरेबुल बेन्च नहीं बैठ रही है। फ़ेवरेबुल बेन्च बैठते ही पीटिशन दायर कर दूंगा। मैंने विभागीय मुकदमों के सिलसिले में कई बार हाई कोर्ट के चक्कर लगाए हैं। मुझे अक्सर वकील से यह उत्तर सुनने को मिलता। फ़ेवरेबुल बेन्च का रहस्य किसी से छिपा नहीं है। क्रिकेट से भी ज्यादा मैच फिक्सिंग न्यायपालिका में होती है। क्या पंजाब के एक वकील उत्सव बैंस को अपने समर्थन के लिए खड़ा करना और बिना स्टीकर के उसकी कार को सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश की अनुमति देना मैच फिक्सिंग की प्रक्रिया का अंग नहीं है? सुप्रीम कोर्ट की ही वरिष्ठ अधिवक्ता इन्दिरा जयसिंह ने इसपर गंभीर आपत्ति दर्ज़ कराई है। 
केन्द्र में लोकायुक्त की नियुक्ति में विलंब को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की कई बार जबर्दस्त खिंचाई की थी। अब जबकि लोकायुक्त की नियुक्ति हो गई है, तो यौन उत्पीड़न जैसी संवेदनशील घटना की जांच की जिम्मेदारी लोकयुक्त को न सौंपकर अपने ही मित्र न्यायाधीश को सौंपना कहां का न्याय है? मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित अपने फ़ेवरेबुल बेंच से पीड़ित महिला को न्याय मिलना आकाश कुसुम पाने जैसा ही असंभव कार्य है। जस्टिस मिश्रा जिस मैच फिक्सिंग से इंकार करते हैं, वह तो हो चुकी है। हमें परिणाम भी पता है। पीड़ित महिला को तो जेल जाना ही है। वह हिम्मत वाली महिला वाकई आग से खेल रही है। अदालत से फैसला आने के पूर्व ही अपना फैसला सुनाने वाले टीवी चैनल, मोमबत्ती गैंग और पुरस्कार वापसी गैंग ने भी अपने मुंह में दही जमा लिया है। सुप्रीम कोर्ट का आतंक विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और प्राकृतिक न्याय की प्रक्रिया पर भारी पड़ रहा है। महिलाओं को सतर्क रहना पड़ेगा। उन्हें यह स्वीकर कर लेना चाहिए कि विशेषाधिकार प्राप्त लोगों द्वारा किए गए अपराधों के लिए उन्हें दंडित करने की व्यवस्था भारत के संविधान में नहीं है। मेरी तरह की आम जनता पीड़ित महिलाओं के साथ सिर्फ सहानुभूति व्यक्त कर सकती है। इससे आगे बढ़ने पर जस्टिस मिश्रा आग से खेलने की सज़ा देने के लिए तैयार बैठे हैं। धन्य है हमारा संविधान और धन्य है हमारी न्यायपालिका!

Sunday, April 21, 2019

भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा महिला का कथित यौन उत्पीड़न

            सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोगोई के विरुद्ध एक ३५ वर्षीय महिला जो सुप्रीम कोर्ट में जूनियर कोर्ट सहायिका रह चुकी है, ने स्वयं के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। महिला ने शपथ पत्र के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के सभी २२ जजों को अपनी शिकायत भेजी है। उसने आरोप लगाया है कि जस्टिस गोगोई ने उसका शारीरिक शोषण किया और बाद में नौकरी से हटा दिया। महिला का आरोप है कि जस्टिस गोगोई ने चीफ़ जस्टिस बनने के पूर्व उसमें दिलचस्पी दिखाई। उसका तबादला अपने आवासीय कार्यालय में कर दिया। पिछले वर्ष यौन उत्पीड़न की घटना १०-११ अक्टूबर की रात में उस समय हुई जब वह उनके आवासीय कार्यालय में थी। वहां उसके साथ अभद्रता की गई। महिला ने पूरी शक्ति से प्रतिरोध किया जिसके कारण जस्टिस गोगोई का सिर आलमारी से टकराया था। जस्टिस गोगोई ने उसे धमकी भी दी कि इस घटना का जिक्र किसी से नहीं होना चाहिए वरना गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इसके बाद महिला का तबादला अलग-अलग विभागों में तीन बार किया गया। जस्टिस गोगोई यही तक नहीं रुके; उन्होंने बिना अनुमति छुट्टी लेने के नाम पर कार्यवाही शुरु की और अन्त में २१ दिसंबर, २०१८ को महिला को बर्खास्त कर दिया। उस समय जस्टिस गोगोई सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस थे। उन्होंने ने अपनी पहुंच का इस्तेमाल करके दिल्ली पुलिस में कांस्टेबुल के पद पर कार्यरत महिला के पति और देवर को भी २८ दिसंबर, २०१८ को निलंबित करा दिया। दिल्ली पुलिस के कुछ अधिकारी उसे चीफ़ जस्टिस के घर ले गए थे जहां जस्टिस गोगोई की पत्नी ने उससे माफी मांगने के लिए कहा। आरोप लगाने वाली महिला का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश वाट्सएप पर उसके पास निजी और आधिकारिक संदेश भेजते थे, लेकिन बाद में वे संदेश हटाने के लिए कहने लगे। वे उसे अपने कमरे में बुलाते और फोन देखकर संदेशों को हटवा देते थे।
इतिहास में पहली बार किसी जज ने अपने ऊपर लगे आरोपों पर सुनवाई स्वयं की। पिछले शनिवार यानि २० एप्रिल को जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता में गठित एक आपात्कालीन पीठ ने इस मामले पर आधे घंटे की सुनवाई की जिसमें जस्टिस गोगोई के अतिरिक्त दो और जज जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान न आरोप लगाने वाली महिला को और ना ही उसके वकील को ही बुलाया गया। समझ में नहीं आता है कि यह न्याय की कौन सी प्रक्रिया है? बाद में जस्टिस गोगोई को यह समझ में आया की पीठ में उनकी आफ़िसियल उपस्थिति न्यायसंगत नहीं है, इसलिए पीठ द्वारा पारित आदेश पर उन्होंने दस्तखत नहीं किए। जस्टिस मिश्रा और जस्टिस खन्ना ने कोई फैसला नहीं सुनाया। बस, मीडिया से अपील की कि वह जिम्मेदारी से कार्य करे, जैसा कि उससे अपेक्षित है। वह अपने विवेक से तय करे कि क्या प्रकाशित करना है और क्या नहीं क्योंकि यह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और स्वतन्त्रता से जुड़ा हुआ मामला है।
निस्सन्देह यह मामला सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता से जुड़ा है। कोर्ट मीडिया पर रोक लगाने में सक्षम है, लेकिन पीड़ित महिला के साथ भी न्याय होना चाहिए। स्मरण रहे कि इस तरह की कई घटनाएं पूर्व में भी हो चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट के ही एक पूर्व जज जस्टिस ए.के.गांगुली पर एक ला इंटर्न ने यौन शोषण का आरोप लगाया था। सन २०१४ में सुप्रीम कोर्ट की समिति ने आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए थे, फलस्वरूप जस्टिस गांगुली को पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग का पद छोड़ना पड़ा। दूसरा वाकया सुप्रीम कोर्ट के ही एक और जज जस्टिस स्वतन्त्र कुमार से जुड़ा है। उनके खिलाफ भी एक ला इंटर्न ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। यह घटना मई, २०११ की है। उस केस में कोर्ट ने मामले के कवरेज पर मीडिया पर रोक लगा दी थी। ऐसी ही एक घटना राजस्थान हाई कोर्ट के तात्कालीन जज जस्टिस अरुण मदान के साथ भी घटी थी। एक महिला चिकित्सक ने उनपर एक लंबित प्रकरण में मदद करने की एवज में अस्मिता मांगने का आरोप लगाया था। जस्टिस मदान को त्यागपत्र देना पड़ा।
  मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई कोई अपवाद नहीं है। उनके चीफ़ जस्टिस रहते पीड़ित महिला को न्याय नहीं मिल सकता। कौन जज उनके खिलाफ़ जाने का साहस कर सकता है? नैतिकता का तकाजा है कि जस्टिस गोगोई तत्काल प्रभाव से अपने पद से इस्तीफ़ा देकर निष्पक्ष न्याय का मार्ग प्रशस्त करें। सुप्रीम कोर्ट मामले के त्वरित निस्तारण और निष्पक्ष न्याय के लिए अविलंब एक पीठ का गठन करे। अगर पीड़ित महिला की शिकायत सही पाई जाती है, तो जस्टिस गोगोई को सजा मिलनी चाहिए और अगर शिकायत गलत पाई जाती है, तो महिला को सख्त सज़ा मिलनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो सर्वोच्च न्यायालय जैसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को धूमिल होने से कोई रोक नहीं सकता।

Wednesday, December 5, 2018

राम-जन्मभूमि मन्दिर अयोध्या की प्राचीनता


प्रो. दीनबन्धु पाण्डेय अद्‍भुत प्रतिभा धनी के इतिहासकार हैं। वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला इतिहास एवं पर्यटन प्रबन्धन विभाग के अध्यक्ष रहे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उनके शोध और कार्यक्षेत्र का और विस्तृत विकास हुआ। उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि बिना पुष्ट प्रमाण के वे एक वाक्य भी नहीं लिखते हैं। संप्रति वे ‘स्थापत्यम’ (जर्नल आफ़ दि इन्डियन साइंस आफ़ आर्किटेक्चर एण्ड अलायेड सर्विसेस) के अतिथि संपादक हैं और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद तथा शोध परियोजना समिति, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार) के सदस्य हैं। उन्होंने अभी-अभी एक पुस्तक लिखी है जिसका नाम है -- ‘राम-जन्मभूमि मन्दिर अयोध्या की प्राचीनता’ जिसे एस्टैन्डर्ड पब्लिशर्स इण्डिया, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। रामजन्मभूमि की ऐतिहासिकता का ऐसा प्रमाणित विवरण विरले ही किसी अन्य पुस्तक में उपलब्ध हो। 
यह पुस्तक अयोध्या का प्राचीनतम संदर्भ पुर(नगर) के संकेत से अथर्व वेद में वर्णित विवरणों से आरंभ होती है। वैदिक नगर वास्तु-परम्परया कालिदास के रघुवंश में चतुर्मुखी तोरण-धारिणी ब्रह्मा के रूप में प्राप्त है। अयोध्या में रामजन्मभूमि का प्रसिद्ध परिसर हिन्दुओं की आस्था का केन्द्र एवं सांस्कृतिक धरोहर है। ब्रिटिश और मुसलमानी अभिलेखों में भी इस स्थान का उल्लेख ‘रामजन्मभूमि’ या ‘जन्मभूमि’ या जन्मस्थान के रूप में है। इस स्थान के विवादित ढाँचे की ऐतिहासिकता मात्र १५२८ ई. तक जाती है जिसकी रचना पूर्वकालिक विष्णु-हरि मन्दिर के ध्वंसावशेष का प्रयोग करते हुए की गई। इसे बाबर के सेनापति मीरबाकी ने ध्वस्त किया था। उस समय आक्रमणकारी की जघन्य बर्बरता का उल्लेख सन्त तुलसीदास जी ने अपने ‘तुलसी दोहा शतक’ में किया है --
      तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किए अनखानि।
राम जनम महि मन्दिरहिं तोरि मसीत बनाय॥
कवितावली में तुलसीदास जी ने हक जताते हुए लिखा है -- ‘माँगि के खैबो मसीत को सोइबो’। प्राचीन मन्दिर के अवशेष विवादित ढाँचे में प्रयुक्त थे, अलंकृत स्तंभ व प्रस्तर खण्डों पर हिन्दू प्रतीकों का अंकन था। ६ दिसंबर १९९२ को सन्दर्भित ढाँचे की दी्वार के मलबे से प्राप्त १२वीं शती का संस्कृत में लिखा अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें गाहड़वाल शासक गोविन्दचन्द्र के राज्यकाल (१११४-११५५) में साकेत के मण्डलपति मेघसुत द्वारा विष्णु-हरि के भव्य मन्दिर बनाए जाने का उल्लेख है -- साकेतमण्डलपति ... मेघसुत: श्रुताढ्य: ... टंकोत्खात विशाल शैल शिखर श्रेणी शिला संहति व्यूहैर्विष्णुहरेर्हिण्यकलश श्री सुन्दरं मन्दिरं...कृतं, जिसे आयुषचन्द्र ने पूरा कराया था। इसी मन्दिर को मीरबाकी ने ध्वस्त किया था। अभिलेख में मेघसुत के पूर्व के राजाओं द्वारा भी मन्दिर को रचे जाने और संवारे जाने का उल्लेख है... पूर्वैरर्प्यकृतं नृपतिर्भि:...। अति प्राचीन कालीन अयोध्या के उद्धार का श्रेय जनश्रुति में पौराणिक परम्परा के आधार पर ‘विक्रमादित्य’ को है। ‘विक्रमादित्य’ विरुद वाला सर्वाधिक प्रसिद्ध राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय हैं। २००३ के पुरातात्विक उत्खननों में गुप्तकालीन ईंटें, कलाकृतियाँ एवं चन्द्रगुप्त का सिक्का भी मिला है। रामजन्मभूमि स्थल पर प्राचीनतम मन्दिर का निर्माण चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय (लगभग ३७५-४१४ ई,) तक सिद्ध होता है। जयपुर के सवाई राजा जयसिंह ने मुगल पीढ़ी के छठे बादशाह फ़र्रुखशियर से रामजन्मभूमि स्थल की ९८३ इलाही वर्गगज भूमि प्राप्त कर राम मन्दिर का पुनर्निर्माण कराया था। संबन्धित प्रपत्र जयपुर के संग्रहालय में आज भी सुरक्षित है। इस सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरवयुक्त धर्म-स्थली को बहस और मुकदमों से निजात मिलनी चाहिए। इतिहास के नजरिए से मुकम्मल न्याय यही होगा कि रामजन्मभूमि स्थल पर मन्दिर का पुनर्निर्माण कराया जाय।
प्रो. दीनबन्धु पाण्डेय जी ने बड़े श्रम, लगन और शोध के साथ उपरोक्त पुस्तक की रचना की है जो पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है।

Thursday, October 11, 2018

मेनका -- Me too


      Me too अभियान की सफलता से प्रोत्साहित स्वर्ग की अप्सरा मेनका ने भी ब्रह्मर्षि विश्वमित्र के खिलाफ सीधे भारत के सुप्रीम कोर्ट में यौन उत्पीड़न का मामला दायर किया। चूंकि मामला हाई प्रोफ़ाइल था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इसे सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। मेनका के समर्थन में प्रशान्त भूषण, इन्दिरा जयसिंह, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंहवी ने आधी फ़ीस में ही मुकदमा लड़ने के लिए अपनी सहमति दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों की सलाह पर इस सुनवाई के लिए जस्टिस एक्स.जेड भरभूड़ को दायित्व दिया। विश्वमित्र ने पूरे भारत का भ्रमण किया, लेकिन उन्हें कोई योग्य वकील नहीं मिला। विश्वमित्र एक तो आर्यावर्त्त में पैदा हुए थे, दूसरे पुरुष जाति से संबन्ध रखते थे और तीसरे वे सवर्ण (क्षत्रिय समुदाय) थे, अतः भारत के संविधान  और कानून के अनुसार उनके अधिकार नगण्य थे। फिर भी उन्होंने प्रयास जारी रखा। राजस्थान की करणी सेना ने उनका साथ दिया और जिला स्तर के एक वकील को उनके साथ लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सम्मन जारी किया जा चुका था। लिहाज़ा निर्धारित तारीख पर अपने झोला छाप वकील के साथ विश्वमित्र कोर्ट में पहुँचे। वहां वकीलों की भारी भरकम फौज के साथ मेनका पहले से ही उपस्थित थी। विश्वमित्र की ओर वह कुटिल मुस्कान फेंक रही थी। जस्टिस भरभूड़ निर्धारित समय से एक घंटे की देरी से अदालत पहुंचे। सबने खड़े होकर उनका स्वागत किया। उन्होंने एक विहंगम दृष्टि कोर्ट में उपस्थित लोगों पर डाली। मेनका के अलौकिक सौनदर्य, समयानुकूल अद्भुत मेकअप, और अन्तर्लोकीय perfume से वे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। अचानक उनकी दृष्टि लंगोट पहने ब्रह्मर्षि विश्वमित्र पर पड़ी। उन्होंने विश्वमित्र को कोर्ट से बाहर निकल जाने का आदेश दिया और शीघ्र ही कोर्ट के ड्रेस कोड के अनुसार कपड़े पहनकर आने की हिदायत दी। बिचारे विश्वमित्र बाहर आये। कुछ दयालू लोगों ने उनकी मदद की और वे एक पैंट, एक शर्ट और एक टाई खरीदने में सफल हो गए। जज साहब उन्हें ड्रेस कोड के अनुसार कपड़े पहने देखकर प्रसन्न हुए। विश्वमित्र अपराधी के कटघरे में खड़े हो गए। कोर्ट की कार्यवाही आरंभ हुई। मेनका ने जज साहब से यह जानना चाहा कि सुनवाई की Live telecast  की व्यवस्था है या नहीं? जज साहब ने बताया कि Live telecast की व्यवस्था के लिए आदेश कर दिए गए हैं, परन्तु अभी ठेकदार ने काम पूरा नहीं किया है। मेनका और उसके वकील तमतमा गए। मेनका ने कहा कि जबतक Live telecast की व्यवस्था नहीं होती, वह कार्यवाही में भाग नहीं ले सकती। जज साहब ने बताया कि एक सप्ताह में Live telecast की व्यवस्था हो जाएगी। सुनवाई अगले हफ़्ते के लिए टाल दी गई। मेनका ने अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा बुक कराए गए एक पंच सितारा होटल में रहकर दिल्ली के प्रसिद्ध माल में खरीददारी की और बुद्धा गार्डेन में घूमकर अपना समय बिताया। इस बीच कई न्यूज चैनल के कई पत्रकारों ने उसका इन्टर्व्यू लिया, चैनल पर डिबेट किया और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के पहले ही महर्षि विश्वमित्र के खिलाफ अपने-अपने निर्णय सुना दिए। उधर विश्वमित्र राजघाट, बिरला मन्दिर और लोटस टेंपल के चक्कर लगाते रहे। समय से वे शीशगंज गुरुद्वारे में पहुंच जाते और लंगर में भोजन करके भूख मिटाते। वे लोगों से बचकर रहते। टीवी चैनल वालों ने उनके खिलाफ ऐसा महौल बना दिया था कि कहीं भी उनके साथ माब लिंचिंग हो सकती थी।
      खैर जैसे-तैसे एक हफ़्ते का समय बीत गया। आरोपी और प्रत्यारोपी अपने-अपने वकीलों के साथ कोर्ट में पहुंचे। जज साहब हमेशा की तरह मात्र एक घंटे विलंब से आये। मेनका को देख उनका हृदय हर्षित हो उठा। उन्होंने आते ही बताया कि Live telecast की व्यवस्था हो गई है। हर्षित दर्शकों और मेनका ने तालियां बजाई। जज साहब ने मेज पर हथौड़ा ठोका और कहा -- silence, silence, please. सब शान्त हो गए। कार्यवाही आरंभ हो गई। जज साहब ने मेनका से अपने ऊपर हुए यौन उत्पीड़न को विस्तार से बताने का अनुरोध किया। मेनका ने कहना शुरु किया --
“मी लार्ड! यह विश्वमित्र एक नंबर का व्यभिचारी, झूठा और बेवफ़ा है। एक बार सत्ययुग के अन्त में या त्रेता युग के प्रारंभ में (ठीक समय याद नहीं है) मैं पृथ्वी पर विचरण कर रही थी। घूमते-घूमते मैं एक जंगल में गई जहां ये तथाकथित महर्षि तपस्या कर रहे थे। वहां के प्राकृतिक अति सुन्दर दृश्य को देखकर मैं नृत्य करने लगी, तभी इस महर्षि ने मुझे देखा। बड़ी देरतक घूरने के बाद ये सज्जन मेरे पास आये और बिना विलंब किए प्रणय निवेदन कर दिया। जंगल में उस समय मैं अकेली थी। मेरा कोई सहायक नही था, अतः मैंने मज़बूरी में इनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इनके साथ मैं एक वर्ष तक रही, एक पुत्री की माँ भी बनी। जैसे ही इन्हें यह पता लगा कि मैं माँ बन गई हूँ और मैं इन्द्रलोक की अप्सरा हूं, ये आग बबूला हो गए और तत्काल मुझे पृथ्वी से ही निष्कासित कर दिया। यही नहीं इन्होंने मेरी नवजात कन्या को भी अपनाने से इंकार कर दिया। मुझे अपनी अबोध नवजात कन्या को महर्षि कण्व के आश्रम के पास अकेला बेसहारा छोड़कर स्वर्गलोक में इन्द्र के पास  जाना पड़ा। विश्वमित्र ने मेरा भयंकर यौन शोषण किया और घर से निष्कासित भी कर दिया। मैं आपसे न्याय की गुहार करती हूं।”
       मेनका के वकीलों ने मेनका का समर्थन करते हुए जज साहब को इंडियन पेनल कोड की विभिन्न धाराओं का ज्ञान देते हुए विश्वमित्र के लिए फांसी की सज़ा की मांग की।
     जज साहब ने विश्वमित्र को अपना पक्ष रखने का आदेश दिया। विश्वमित्र सिर झुकाए अपराधी की तरह कटघरे में खड़े थे। उनका वकील अंग्रेजी में बहस करने में अक्षम था, अतः विश्वमित्र ने स्वयं अपना पक्ष रखा --
“मी लार्ड! मेनका ने मेरे साथ गंधर्व विवाह किया था, इसलिए उसके साथ मैंने वही व्यवहार किया जो एक पति से अपेक्षित है। मैंने कोई यौन शोषण नहीं किया है। मैं महर्षि से ब्रह्मर्षि बनने के लिए घोर तपस्या में रत था। ईर्ष्यालू इन्द्र के निर्देश पर यह सुन्दरी मेरी तपस्या को भंग करने के लिए मेरे पास आई और तरह-तरह से मुझे अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करने लगी। मुझे यह पता नहीं लगा कि यह एक षडयंत्र के तहत मेरी तपस्या को भंग करने के लिए मेरे पास आई थी। अपने अभियान में यह सफल भी हो गई। लेकिन जब मुझे षडयंत्र का पूरा व्योरा पता लग गया कि मैं Honey trap में फंसाया गया हूं, तो मैंने इसका परित्याग कर दिया। मैंने कोई अपराध नहीं किया है बल्कि अपराध मेनका ने किया है। इसने मुझे धोखा दिया है और मेरी वर्षों की तपस्या भंग की है। श्रीमान जी मुझे न्याय मिलना चाहिए।”
       मेनका के वकीलों ने विश्वमित्र के कथन का जोरदार विरोध किया और घंटों अंग्रेजी में बहस करते रहे। अन्त में विद्वान जज ने अपना फैसला सुनाया ---
“वादी और प्रतिवादी के वक्तव्य और सम्मानित वकीलों के तर्कों को ध्यान से सुनने के बाद अदालत इस निष्कर्स पर पहुंचती है कि ब्रह्मर्षि विश्वमित्र यौन शोषण के अपराधी हैं। उन्होंने एक अबला सुन्दरी का अपनी इच्छा के अनुसार तबतक यौन शोषण किया, जबतक उनकी इच्छा थी। मन भरते ही इन्होंने एक नारी का उस अवस्था में परित्याग किया जब वह अभी-अभी माँ बनी थी। इनका यह कृत्य जघन्यतम अपराध की श्रेणी में आता है, अतः इन्हें प्राप्त राजर्षि, महर्षि और ब्रह्मर्षि आदि उपाधियों से इन्हें वंचित किया जाता है तथा इन्हें कलियुग में सात बार, सत्ययुग में छः बार, त्रेता में पांच बार और द्वापर में चार बार फांसी पर लटकाने की सज़ा सुनाई जाती है। इनकी बिरादरी के अन्य साधु-सन्तों को भी जो दाढ़ी बढ़ाकर गुरु बने बैठे हैं आजीवन कारावास की सजा दी जाती है तथा वकील और कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी को छोड़कर संपूर्ण पुरुष जाति से औरतों की ओर देखने का अधिकार वापस लिया जाता है।”
        ब्रह्मर्षि विश्वमित्र चूंकि क्षत्रिय समाज से आते थे, इसलिए सभी क्षत्रियों ने करणी सेना के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ देशव्यापी बन्द का आह्वान किया जिसमें एक हजार बसें जलाई गईं, ५०० कि.मी. रेल लाईन उखाड़ी गई, लाखों दुकानों में आग लगाई गई, लक्ष-लक्ष लोगों की हत्या की गई और सारे हाई वे पर जाम लगाया गया।
करणी सेना ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है और केन्द्र सरकार से अनुरोध किया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने के लिए अध्यादेश लाये। अन्यथा की स्थिति में वे १९१९ के चुनाव में नोटा का बटन दबायेंगे या ब्रह्मचारी पप्पू की पार्टी को वोट देंगे।