Saturday, October 18, 2014

महाभारत-४

        श्रीकृष्ण आरंभ में युद्ध ही एकमात्र समाधान है, ऐसा नहीं मानते। सर्वशक्तिमान होने के बावजूद वे कभी अनायास शक्ति-प्रयोग की बात भी नहीं करते परन्तु उपमा-उपमेय के द्वारा शिष्ट भाषा में सबकुछ कह भी जाते हैं। संजय के माध्यम से वे धृतराष्ट्र को संदेश देते हैं -
वनं राजा धृतराष्ट्रः सपुत्रो व्याघ्रा वने संजय पांडवेयाः ।
मा वनं छिन्दि स व्याघ्रं मा व्याघ्रान्नीनशो वनात ॥
पुत्रों सहित धृतराष्ट्र एक वन हैं और पांडव उस वन के सिंह हैं। अतः न तो इस सिंहयुक्त वन को काटो, न वन के सिंहों का नाश करो।
निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनं ।
तस्मात व्याघ्रो वतं रक्षेत वनं व्याघ्रं च पालयेत ॥
यदि वनरहित सिंह होते हैं, तो उनका वध होता है और सिंहविहीन वन को लकड़हारे बिना किसी भय के काट डालते हैं। इससे बेहतर यही है कि सिंह वन की रक्षा करें और वन सिंहों का पालन करे।
श्रीकृष्ण शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व की बात युद्ध के पहले तक अलग-अलग अवसरों पर बार-बार कहते हैं। वे धृतराष्ट्र के कुल का नाश नहीं चाहते थे। पाण्डवों का अधिकार दिलाने एवं धृतराष्ट्र के कुल का विनाश रोकने के लिये वे तरह-तरह की उपमायें देते हैं। वे कहते हैं -
पाण्डव शाल के वृक्ष के समान हैं और धृतराष्ट्र के पुत्र लता सदृश। कोई भी लता बड़े वृक्ष के आश्रय के बिना आगे नहीं बढ़ सकती। पाण्डव और कौरव प्रेमपूर्वक रहते हैं तो इस लोक का कोई भी शत्रु उन्हें बुरी नज़र से देखने का दुस्साहस कभी नहीं कर सकता। अन्त में वे एक कड़ा संदेश देने से भी नहीं चुकते -
धर्माचारी पाण्डव शान्ति के लिये तैयार हैं और युद्ध के लिये भी समर्थ हैं। वे अपना अधिकार लेकर ही रहेंगे, इसके लिये चाहे जो भी करना पड़े। हे संजय! तुझे धृतराष्ट्र से जो कहना है, वह कह देना। हमने दो विकल्प दिए हैं। चुनाव उन्हें ही करना है।
जाते-जाते युधिष्ठिर संजय को अन्तिम संदेश देते हैं - 
धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने पृथ्वी पर जिनकी समानता नहीं है, ऐसे अनेक योद्धा एकत्र किए होंगे। पर धर्म ही नित्य है। मेरे पास इन सब शत्रुओं को नष्ट कर सके, ऐसा महाबल है। वह है मेरा धर्म! 
ददस्व वा शक्रपुरं ममैव युद्दस्व वा भारतमुख्यवीर । 
मेरा इन्द्रप्रस्थ मुझे वापस लौटा दो अथवा भारत-वंश के प्रमुख वीर, तुम युद्ध करो।
                        अगले अंक में - धृतराष्ट्र को विदुर की सलाह

Friday, October 17, 2014

महाभारत-३


संजय भी जल्दी हार माननेवाला कहां था। वह ज्ञानी भले ही न हो, जानकार तो था ही। सामान्य जन ज्ञान और जानकारी को एक ही मानते हैं। सत्य और असत्य को पहचानना उतना कठिन नहीं है, जितना ज्ञान और जानकारी में अन्तर समझना। ज्ञान प्राप्त होने के बाद मनुष्य मौन हो जाता है। उसकी वाणी विवेक द्वारा संचालित होने लगती है, जबकि जानकार की जिह्वा द्वारा। वह सत्य के उद्घाटन हेतु प्रबुद्ध जनों के बीच ही अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर ज्ञान बांटता है और एतदर्थ बोलता है। इसके विपरीत जानकार अपने को ज्ञानी सिद्ध करने के लिये हमेशा बोलता ही रहता है। वह सुननेवाले कुपात्रों और सुपात्रों में भी भेद नहीं करता है। अल्पबुद्धि श्रोता जानकार को ही ज्ञानी समझने की भूल सदियों से करते आए हैं। संजय ने धृतराष्ट्र की स्वार्थसिद्धि के लिये बातों के अनगिनत जाल बिछाए। श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने संजय को बीच में नहीं टोका। संजय ने अपनी बात पूरी करने के बाद आशा भरी निगाह से युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण को देखा। श्री कृष्ण ने बड़े नपे-तुले शब्दों में उत्तर दिया -
अविनाशं संजय पांडवानामिच्छाम्यहं भूमिमेषां प्रियं च।
तथा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सूत सदाशंसे बहुपुत्रस्य वृद्धिम॥
(उद्योग पर्व २९;१)
संजय! मैं पाण्डवों के लिए अविनाश चाहता हूं, उन्हें ऐश्वर्य मिले, उनका प्रिय हो, यह भी हृदय से चाहता हूं। इसके साथ ही, इसी प्रकार से, अनेक पुत्रोंवाले धृतराष्ट्र की भी वृद्धि अर्थात अभुदय चाहता हूं।
श्रीकृष्ण स्पष्टवक्ता हैं। उनकी यह विशेषता थी कि जो जिस भाषा में समझने के योग्य होता था, वे वही इस्तेमाल करते थे। युधिष्ठिर और संजय की वार्त्ता अन्तहीन वाद-विवाद में परिणत हो रही थी। इसे विराम देना आवश्यक था। श्रीकृष्ण ने अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए कहा -
संजय, मैं पाण्डवों का श्रेय चाहता हूं, पर कौरवों का अहित भी नहीं चाहता। किन्तु कौरवों ने एक महान अपराध किया है; वे परभूमि - पराई भूमि पचा जाना चाहते हैं। पराया धन प्रकट रूप से या चोरी-छिपे हरण करनेवाले चोर-लुटेरे और दुर्योधन के बीच कोई अन्तर है क्या?
श्रीकृष्ण का प्रश्न सुनकर संजय नज़रें झुका लेता है। श्रीकृष्ण की बातों में सत्य का बल है। कुतर्क सत्य के सामने बहुत देर तक कभी नहीं टिकता।
अगले अंक में - कौरवों को श्रीकृष्ण का संदेश

Wednesday, October 15, 2014

महाभारत-१


  महाभारत की रचना महर्षि वेद व्यास ने की। यह भारत का सर्वाधिक प्रचलित ग्रन्थ है जिसमें वह सबकुछ है जो इस लोक में घटित हुआ है, हो रहा है और होनेवाला है। यह हमें अनायास ही युगों-युगों से चले आ रहे उस संघर्ष की याद दिलाता है जो मानव हृदय को आज भी उद्वेलित कर रहा है। द्वापर के अन्तिम चरण में आर्यावर्त्त और विशेष रूप से हस्तिनापुर की गतिविधियों को कथानक के रूप में , क्रमवद्ध तथा नियोजित विधि से अपने में समेटे, यह अद्भुत ग्रन्थ मानवीय मूल्यों, आस्थाओं, आदर्शों, दर्शन और संवेदना के उत्कर्ष तथा कल्पनातीत पतन - दोनों के चरम की झलक प्रस्तुत करता है। महाभारत की कथा मनुष्य के चरित्र की संभावनाओं और विसंगतियों के प्रकाशन का साक्षात उदाहरण है जो आज भी प्रासंगिक है। मैं इसके कुछ मुख्य अंशों को अपनी भाषा, शैली और विवेचना के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूं।
      पाण्डव १२ वर्षों के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद विराटनगर में डेरा डाले हैं। पांचाल नरेश द्रुपद के राजपुरोहित के माध्यम से उन्होंने धृतराष्ट्र के पास इन्द्रप्रस्थ का राज वापस करने का सन्देश भिजवाया। दुर्योधन उनका राज वापस करने के लिये कतई तैयार नहीं था। धृतराष्ट्र ने अपना उत्तर अपने मन्त्री एवं दूत सन्जय के माध्यम से भिजवाया। सन्जय पाण्डवों के पास जाकर सन्देश सुनाते हैं -
     न चेद भागं कुरवोअन्यत्र युद्धात प्रयछन्ते तुभ्यमजातशत्रो ।
     भैक्षचर्यामन्धकवृष्णिराज्ये श्रेयो मन्ये न तु युद्धेन राज्यम ॥
      हे अजातशत्रु! यदि कौरव युद्ध किये बिना तुमको तुम्हारे राज्य का हिस्सा नहीं देते, तो अन्धक तथा वॄष्णिवंश के क्षत्रियों के राज्य में भिक्षा मांगकर तुम निर्वाह करो, यही तुम्हारे लिए अच्छा है। युद्ध करके राज्य प्राप्त करें यह तुम्हारे यश के अनुरूप नहीं है।
      धृतराष्ट्र महाभारत का सबसे बड़ा खलनायक है। पिता यदि अपनी सन्तान को गलत मार्ग पर चलने से नहीं रोक पाता है, तो वह अपराधी है परन्तु अपराध क्षमायोग्य है। लेकिन पिता अपनी ही सन्तान को गलत मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित करता है, तो यह बड़े अपराध की श्रेणी में आता है जो किसी भी काल में क्षम्य नहीं है। वह हमेशा किसी भी कीमत पर सिर्फ अपने बेटों का ही कल्याण चाहता है। लेकिन दुनिया की नज़रों अच्छा दीखने की लालसा भी उसके मन में किसी से कम नहीं है। कूटनीति और कूटयोजना बनाने में वह सिर्फ दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि और कर्ण की सलाह लेता है परन्तु अपने निर्णय को अनुमोदित कराने के लिये भीष्म, द्रोण और विदुर की भी सहमति का प्रयास करता है। अपने इस प्रयास में अक्सर वह सफल नहीं होता था लेकिन सलाह-मशविरा करने का ढोंग वह हमेशा करता था। सभा ने तय किया था कि संजय के माध्यम से हस्तिनापुर नरेश युधिष्ठिर को उत्तर भिजवायेंगे लेकिन क्या उत्तर भिजवायेंगे, इसका निर्णय दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि और कर्ण की चाण्डाल चौकड़ी ने किया। संजय को यह भी निर्देश दिया गया कि कहे गये संदेश में अपनी ओर से वे कोई जोड़-घटाव या गुणा-भाग नहीं करेंगे। यह संदेश धृतराष्ट्र ही नहीं, विश्व के समस्त स्वार्थी और तानाशाह शासकों की मनोदशा का प्रत्यक्ष दर्पण है। अन्धक और वृष्णिवंश की राजधानी द्वारिका थी। श्रीकृष्ण से पाण्डवों की मैत्री को लक्ष्य बनाकर यह संदेश भिजवाया गया था। स्पष्ट सलाह थी कि राज्य के लिये भयंकर विनाशकारी युद्ध करने से अच्छा होगा कि युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ द्वारिका में भिक्षा मांगकर अपना जीवन-निर्वाह करें। ऐसा संदेश एक निर्लज्ज तानाशाह ही दे सकता था।

      अगले अंक में युधिष्ठिर का उत्तर

महाभारत-२


      युधिष्ठिर के धार्मिक एवं शान्तिप्रिय स्वभाव को लक्ष्य करके ही धृतराष्ट्र ने ऐसा संदेश भिजवाया था। मनुष्य जो भी करता है उसे उचित ठहराने की कोशिश अवश्य करता है। इसके लिये वह कभी धर्म का तर्क देता है, कभी सत्य का, कभी परंपरा का, कभी सिद्धान्त का, तो कभी नैतिकता का। वाकपटु मनुष्य असत्य को भी सत्य की चाशनी चढ़ाकर इस तरह प्रस्तुत करता है कि असत्य में सत्य का बोध होने लगता है और सत्य में असत्य का। एक पुरानी कहानी है कि सत्य और असत्य जुड़वा बहनें हैं। एक बार दोनों नदी किनारे स्नान करने गईं। अपना वस्त्र नदी के किनारे रख दोनों नदी में नहाने लगीं। असत्य ने पहले नहा लिया और सत्य के कपड़े पहन चलती बनी। सत्य नहाकर जब किनारे आई, तो पाया कि उसके कपड़े नदारद थे। मज़बूरी में उसे असत्य के कपड़े पहनने पड़े। तभी से लोग सत्य-असत्य के बीच भ्रम में पड़े रहते हैं। युधिष्ठिर को सुन्दर शब्दों में धर्म की चाशनी चढ़ाकर धृतराष्ट्र द्वारा भेजे गये संदेश की असली मंशा समझते देर नहीं लगी। उन्होंने उसी तरह का जटिल उत्तर भी दिया -
     यत्राधर्मो धर्मरूपाणि बिभ्रद कृत्स्नो धर्मः दृश्यतेअधर्मरूपः ।
     तथा धर्मो धारयन्धर्मरूपं विद्वांसस्तं सम्प्रश्यन्ति बुद्धयाः ॥
                (उद्योग पर्व २८;२)
     कही तो अधर्म ही धर्म का रूप धारण कर लेता है, कही पूर्णतया धर्म अधर्म जैसा दिखाई पड़ता है; तथा कही धर्म अत्यन्त वास्तविक स्वरूप धारण करके रहता है। विद्वान पुरुष अपनी बुद्धि से विचार करके उसके असली रूप को देख लेते हैं, समझ लेते हैं।
      युधिष्ठिर का उपरोक्त उत्तर संजय के सिर के उपर से गुजरा। दोनों अलग-अलग तल से बात कर रहे थे। अपने उत्तर को और सरल बनाते हुए युधिष्ठिर ने स्पष्ट किया -
      संजय! भिक्षावृत्ति ब्राह्मणों का धर्म है, क्षत्रियों का नहीं। मैं आजतक ज्येष्ठ पिताश्री को एक न्यायप्रिय महाराज के रूप में जानता था। अगर तुम्हारे द्वारा दिए गए प्रस्ताव पर उनकी सहमति है, तो यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। पुत्रमोह के कारण उनका अन्तर भी कलुषित हो जायेगा, इसकी अपेक्षा नहीं थी। अपने अधर्मी पुत्रों को सन्मार्ग पर लाने में असफल महाराज मुझे धर्म की शिक्षा दे रहे हैं। संजय, मैं नास्तिक नहीं हूं। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी धन है, देवताओं, प्रजापतियों और ब्रह्माजी के लोक में जो भी वैभव है, वे सभी मुझको प्राप्त होते हैं, तो भी मैं उन्हें अधर्म से लेना नहीं चाहूंगा। लेकिन अधर्म से कोई अगर मेरे अधिकार का तृण भी लेना चाहेगा, तो मैं उसे पंगु बना दूंगा। अधर्म करना और सहना, दोनों दुष्कर्म की श्रेणी में आते हैं। न्याय के लिये अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है। मैं युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अगर युद्ध अपरिहार्य हो, तो डरता भी नहीं। क्षत्रिय-कुल में जन्म लिया है, युद्ध से क्यों डरूं?
 अगले अंक में - श्रीकृष्ण का संजय को उत्तर


Wednesday, September 24, 2014

मंगल पर ऐतिहासिक विजय


      २४ सितम्बर, २०१४ का वह सुहाना सवेरा क्या कोई भारतीय भूल पाएगा? शायद कभी नहीं। यह दिन हमारे लिये उतना ही गौरवशाली और ऐतिहासिक है जितना अमेरिकियों के लिए २१ जुलाई १९६९ था जिस दिन नील ए. आर्मस्ट्रौन्ग ने चन्द्रमा पर पहला कदम रखा था। भारतीय वैज्ञानिकों ने वह कर दिखाया जिसे सारी दुनिया असंभव समझती थी। २४ सितंबर को सवेरे ७.४७ बजे हमारे स्वदेशी मंगलयान को हमारे वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक लाल ग्रह की कक्षा में स्थापित कर दिया। सारा देश खुशी और गर्व से झूम उठा। इस ऐतिहासिक क्षण का इसरो के वैज्ञानिकों के साथ साझा करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने हृदय के स्वाभाविक उद्गार व्यक्त करते हुए कहा - जब काम मंगल होता है, इरादे मंगल होते हैं, तो यात्रा भी मंगल होती है। प्रधानमंत्री का कथन सौ फीसदी सत्य है। भारत को जगत्गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता।

      PSLV-C25 प्रक्षेपक से ऐतिहासिक मंगलयान गत वर्ष ५ नवम्बर, २०१३ को श्रीहरिकोटा से प्रक्षिप्त किया गया। यान ने दिनांक १ दिसम्बर, २०१३ को पृथ्वी की कक्षा का परित्याग कर लाल ग्रह के लिये अपनी महत्त्वाकांक्षी यात्रा आरंभ की। यह एक जटिल प्रक्रिया थी क्योंकि भारत परंपरागत ठोस ईंधन के स्थान पर तरल ईंधन का प्रयोग कर रहा था। सारी दुनिया इस प्रयोग को संशय की दृष्टि से देख रही थी। उन्हें विश्वास ही नहीं था कि एक विकासशील देश ऐसे प्रयोग से मंगल तक पहुंच सकता है। लेकिन सबके सन्देह उस दिन ध्वस्त हो गये जिस दिन नैनो कार की आकृति के बराबर हमारे मंगल यान ने लाल ग्रह से प्रभावित वातावरण में प्रवेश किया। यह शुभ दिन १९ सितम्बर २०१४ का था। २२ सितम्बर को हमारा यान मंगल के और करीब आया और सफलतापूर्वक मंगल के गोल मंडल में प्रवेश कर गया। विदेशी वैज्ञानिक जहां हैरान थे वही हमारे वैज्ञानिकों के चेहरे चमक रहे थे। लेकिन अन्तिम परीक्षा बाकी थी। लाल ग्रह की कक्षा में सही-सही स्थापित करने के लिये लगाया गया हमारा 440N Liquid Engine लगभग ३०० दिनों से सुप्त था। अगर वह चालू नहीं होता, तो सारा मिशन व्यर्थ हो जाता। सबके दिल धड़क रहे थे। वैज्ञानिकों की आंखों से नींद गायब हो चुकी थी। रेडियो सिग्नल की मदद से इन्जन का पायरो (Pyro)  वाल्व खोला गया और उसी दिन, २२ सितम्बर को ३३० दिनों से सुप्त 440N Liquid Engine को ४ सेकेन्ड के लिये फ़ायर करके मंगलयान की Trajectory को सही किया गया। अबतक किये गये सारे प्रयोग शत प्रतिशत सही एवं खरे उतर रहे थे। प्रधानमंत्री लगातार वैज्ञानिको के संपर्क में थे। वे अपनी उत्सुकता को दबा नहीं पाये और दिनांक २४ सितम्बर को उन वैज्ञानिकों के बीच पहुंच ही गये जिन्होंने भारत को उस मुकाम तक पहुंचाया था जहां बड़े-बड़े विकसित देश भी नहीं पहुंच पाये थे। प्रधानमंत्री की उपस्थिति में वैज्ञानिकों ने तरल इंजन को दुबारा फायर किया और खुली आंखों से देखा हुआ एक सपना साकार हो ही गया। हमारा मंगलयान सवेरे ७ बजकर ४७ मिनट पर मंगल की कक्षा में स्थापित हो गया। भारत ओलंपिक में १०० स्वर्ण पदक पा ले, एसियाड के सारे गोल्ड मेडल पर कब्जा कर ले, तो भी उतनी खुशी नहीं होगी, जितनी खुशी २४ सितम्बर का यह स्वर्णिम दिवस दे गया।
      भारत की यह उपलब्धि इसलिए और भी विशिष्ट हो जाती है कि अपने प्रथम प्रयास में ही लाल ग्रह पर पहुंचने वाला यह पहला देश बन गया है। अबतक मंगल तक पहुंचने के लिये विश्व ने ५१ प्रयास किये हैं लेकिन मात्र २१ प्रयास ही सफलता प्राप्त कर सके हैं। हमारा मंगलयान  Lyman Alpha Photometer से लैस है जो मंगल के उपरी वातावरण में deuterium और hydrogen की उपस्थिति और मात्रा की माप करेगा जिससे यह पता लगाया जा सकेगा कि ग्रह की उपरी सतह पर कभी जल था या नहीं। यान में स्थापित मिथेन सेंसर ग्रह पर मिथेन गैस की खोज करेगा और रंगीन कैमरा - Thermal infrared spectrometer वे दुर्लभ तस्वीरें लेगा जिससे ग्रह से उत्सर्जित तापीय ऊर्जा, खनिज पदार्थ एवं मिट्टी का आंकलन किया जा सकेगा। मंगल ग्रह पर यान भेजने के अपने पहले मिशन में अमेरिका ने जहां ४००० करोड़, युरोपियन यूनियन ने ३५०० करोड़, रुस ने २५०० करोड़ रुपए खर्च किये थे वहां हमने सिर्फ ४५० करोड़ खर्च करके यह उपलब्धि पाई है। दुनिया आश्चर्यचकित है। हमने असंभव को संभव कर दिखाया है। सचमुच हमारा सीना ५६ इन्च का हो गया है।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा

Saturday, September 13, 2014

ये संवैधानिक पद


          राष्ट्रपति, राज्यपाल, सी.ए.जी., मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष और विश्वविद्यालयों के वाईस चान्सलर आदि के पद संवैधानिक मान्यता प्राप्त पद हैं लेकिन पिछले ६५ वर्षों में इन पदों पर सत्ताधारी पार्टियों ने जिस तरह योग्यता और प्रतिभा की अनदेखी कर अपने चमचों की नियुक्तियां की है, उससे न सिर्फ़ इन पदों की गरिमा घटी है बल्कि आम जनता में यह धारणा पुष्ट हो गई है कि ये पद सत्ताधारी पार्टी के निष्क्रिय नेताओं और चमचों के लिये आरक्षित रहते थे, रहते हैं और रहेंगे भी। निस्सन्देह सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रहे कांग्रेसियों ने अपने कार्यकर्त्ताओं और समर्थकों को इन मलाईदार पदों का तोहफ़ा सर्वाधिक दिया है लेकिन अन्य पार्टियां भी पीछे नहीं रही हैं। जिसको जितना भी मौका मिला, जी भर के फायदा लिया। अब तो वी.सी. बनने के लिये करोड़ों रुपये एडवान्स दिये जा रहे हैं।
श्रीमती प्रतिभा पाटिल इन्दिरा गांधी की किचेन में उनकी पसन्द के स्पेशल डिश बनाती थीं। सोनिया ने उन्हें राष्ट्रपति बना दिया। ज्ञानी जैल सिंह कहते थे कि इन्दिरा जी कहें तो मैं झाड़ू भी लगा सकता हूं। उन्हें वफ़ादारी का ईनाम मिला। वे राष्ट्रपति बना दिये गये। एक-एक राष्ट्रपति की कुण्डली पर चर्चा करना बहुत उपयोगी नहीं होगा। बस इतना ही पर्याप्त है कि भारत की जनता सिर्फ़ तीन राष्ट्रपतियों को भारत का सच्चा राष्ट्रपति मानती है। वे हैं - डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और डा. ए.पी.जे. कलाम। राजभवन तो सड़े-गले नेताओं का आश्रय हो गया है। हैदराबाद के राजभवन में नारायण दत्त तिवारी ने क्या नहीं किया? उनकी रति-क्रीड़ा की सीडी के सार्वजनिक होने के बाद ही उनसे इस्तीफ़ा लिया गया। मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर विद्यमान सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री बालकृष्णन आज भी अपने कार्यकाल के दौरान दामाद द्वारा उनके नाम पर किये गये अनेक घोटालों में फ़ंसे हुए हैं। रिटायर होने के बाद अध्यक्ष पद का तोहफ़ा पा गये। सरकार के पक्ष में कुछ निर्णायक फ़ैसले जो दिये थे उन्होंने।
वीसी का पद तो आजकल पूरी तरह बिकाऊ हो गया है। जो जितनी ऊंची बोली लगायेगा, चुना जायेगा। अगर गहरी राजनीतिक पैठ है, तो मामला सस्ते में भी निपट सकता है। मैं बी.एच.यू. का छात्र रहा हूं। कालू लाल श्रीमाली से लेकर आजतक इस केन्द्रीय विश्वविद्यालय को एकाध अपवाद को छोड़कर कोई भी योग्य वीसी नहीं मिला। इतना सुन्दर विश्वविद्यालय दुर्दशा को प्राप्त हो गया है। जिस विश्वविद्यालय के कुलपति के पद को परम आदरणीय महामना मालवीय जी, डा. राधाकृष्णन, आचार्य नरेन्द्र्देव इत्यादि विभूतियों ने गौरव प्रदान किया उसी पद पर कालू लाल श्रीमाली जैसे घटिया राजनीतिज्ञ और लालजी सिंह, पंजाब सिंह जैसे जोड़-तोड़ में माहिर घोर जातिवादियों को बैठाया गया। आश्चर्य होता है कि आजकल चपरासी के पद पर भी नियुक्ति के पूर्व लिखित परीक्षा और साक्षात्कार से गुजरना पड़ता है लेकिन वीसी की नियुक्ति के लिये कुछ भी आवश्यक नहीं है। यह पद आनेवाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन प्रदान करनेवाला पद है। इसपर कार्य करनेवाले व्यक्ति के पास प्रशासनिक और प्रबन्धन की दक्षता होनी चाहिये। संघ लोकसेवा आयोग को लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के माध्यम से वीसी के चयन की जिम्मेदारी देनी चाहिए। तभी इन पदों पर योग्य व्यक्तियों की तैनाती संभव है। इन पदों पर नियुक्ति में कांग्रेस द्वारा फिलाए गए भ्रष्टाचार तो जगजाहिर हैं लेकिन उस गन्दगी को साफ करने के लिये वर्तमान सरकार की ओर से भी कोई सार्थक प्रयास नहीं किया जा रहा है। भारत की शिक्षा-व्यवस्था का भगवान ही मालिक है।

Tuesday, September 9, 2014

फ़िरकापरस्त और कश्मीर की बाढ़


आज का समाचार है कि कश्मीर में चार लाख लोग अभी भी बाढ़ में फ़ंसे हैं। राहत कार्य में सेना के एक लाख जवान जुटे हैं। ६० हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।
कश्मीर में अपनी जान को जोखिम में डालकर बाढ़ पीड़ितों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचानेवाले सेना के ये वही जवान हैं जिन्हें  वहां के राजनेता, फ़िरकापरस्त और कट्टरपन्थी कल तक काफ़िर कहकर संबोधित करते थे। ज़िहादी उनके खून के प्यासे थे। वही सेना के जवान आज देवदूत बनकर कश्मीरियों की रक्षा के लिये अपनी जान की बाज़ी लगा रहे हैं। पिछले आम चुनाव में फ़ारुख अब्दुल्ला ने सार्वजनिक बयान दिया था कि नरेन्द्र मोदी और उनको वोट देने वालों को समुन्दर में फ़ेंक देना चाहिये। उसी नरेन्द्र मोदी ने कश्मीरियों के लिये केन्द्र का खज़ाना खोल दिया है। बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिये न तो हिज़्बुल मुज़ाहिदिन आगे आया और न तालिबान। न आई.एस.आई.एस. ने पहल की न अल-कायदा ने। न आज़म खां आगे बढ़े, न ओवैसी। उनकी मदद की है तथाकथित सांप्रदायिक सेना ने, मौत का सौदागर कहे जाने वाले नरेन्द्र मोदी ने और ज़िहाद के शिकार करोड़ों काफ़िरों ने।
कश्मीर में आई बाढ़ से लाखों लोग विस्थापित हो गये हैं। अपना घर छोड़कर शरणार्थी बनने का दर्द अब उन्हें महसूस होना चाहिये। प्रकृति ने उन्हें यह अवसर प्रदान किया है। इन बाढ़ पीड़ितों को तो सिर्फ़ अपना घर छोड़ना पड़ा है लेकिन तनिक खयाल कीजिए उन हिन्दू विस्थापितों का जिन्हें कश्मीरी आतंकवादियों और अलगाववादियों ने बम-गोले और एके-४७ की मदद से जबरन घाटी से निकाल दिया था। किसी ने अपनी जवान बेटी खोई, तो किसी ने अपनी बहू। किसी ने अपना पिता खोया, किसी ने बेटा। न फ़ारुख की आंख से आंसू का एक बूंद टपका न उमर का दिल पसीजा। न सोनिया ने एक शब्द कहा, न राहुल ने बांहें चढ़ाई। इसके उलट ओवैसी के हैदराबाद और आज़म के रामपुर में मिठाइयां बांटी गईं।
यह वक्त है स्थिर चित्त से चिन्तन करने का। क्या धारा ३७० की उपयोगिता अभी भी है?