Sunday, April 13, 2014

क्या इतना नीचे गिरना चाहिये केजरीवाल को

 गज़ल-सम्राट जगजीत सिंह की एक गज़ल है -
      ज़िन्दगी भर मेरे काम आए उसूल
      एक-एक कर उन्हें बेचा किया,
      आज मैंने अपना फिर सौदा किया।
गज़ल की उपरोक्त पंक्तियां अरविन्द केजरीवाल पर एकदम सटीक बैठती हैं। अपने आसपास सिद्धान्तों का जाल बुनना और फिर उचित समय पर उनका सौदा कर लेने की कला में केजरीवाल से माहिर कौन है? अन्ना की अगुआई में देशव्यापी आन्दोलन में केजरीवाल ने स्पष्ट घोषणा की थी कि यह आन्दोलन गैर राजनीतिक है और व्यवस्था परिवर्तन के लिये समर्पित है। इस सिद्धान्त का पहला सौदा उन्होंने अन्ना के विरोध के बावजूद राजनीतिक पार्टी बनाकर किया। भारत माता की जय का नारा बुलन्द करने वाले केजरीवाल ने अपनी पार्टी में प्रशान्त भूषण जैसे देशद्रोही और विनायक सेन जैसे आतंकवादियों को प्रमुखता दी। दिल्ली विधान सभा के चुनाव में अपने बच्चों की कसम के साथ स्पष्ट घोषणा की कि वे कांग्रेस या भाजपा की मदद से सरकार नहीं बनायेंगे। मुख्यमंत्री बनने के लिये सोनिया की गोद में जा बैठे। यही कारण है कि भ्रष्टाचार की जननी कांग्रेस और उसके हाई कमान मल्लिका और शहज़ादे के खिलाफ़ चुनाव न लड़कर वे मोदी के खिलाफ़ ताल ठोंकने बनारस पहुंच गये। मोदी को हराने के लिये उन्हें आई.एस.आई., सी.आई.ए., नक्सलवादी, आतंकवादी, माफ़िया डान ........ किसी का समर्थन लेने से गुरेज नहीं है। जेल में बन्द पूर्वी उत्तर प्रदेश के माफ़िया डान मुख्तार अन्सारी के बड़े भाई अफ़ज़ाल अन्सारी से केजरीवाल की लंबी मुलाकातें आखिरकार रंग लाई। मुख्तार अन्सारी कौमी एकता दल के बनारस से प्रत्याशी थे। पिछली लोकसभा के चुनाव में उन्होंने मुरली मनोहर जोशी को बहुत जबर्दस्त टक्कर दी थी। जोशीजी बमुश्किल केवल १७ हजार वोटों से जीत पाए थे। इसबार मुख्तार अन्सारी ने अरविन्द केजरीवाल के समर्थन में बनारस संसदीय सीट से न लड़ने की घोषणा पिछले गुरुवार को कर दी। अब वे घोसी से चुनाव लड़ेंगे जहां  आप अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगी। केजरीवाल और नापाक राष्ट्रद्रोहियों के बीच गठबन्धन के ये कुछ प्रमाणित नमूने हैं। केजरीवाल कोई लालू, राबड़ी या मुलायम नहीं हैं। उन्होंने आईआईटी, खड़गपुर से बी.टेक. की डिग्री ली है, भारत की सर्वाधिक प्रतिष्ठित सेवा में आला अधिकारी रहे हैं। वे उचित-अनुचित, सब जानते हैं। लेकिन राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और स्वार्थ ने उन्हें दुर्योधन बना दिया है। महाभारत के एक प्रसंग की मुझे अनायास याद आ रही है ---
      महाभारत के युद्ध की तैयारियां अपने अन्तिम चरण में थीं। दोनों पक्ष की सेनायें एकत्र हो चुकी थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने शान्ति की आशा फिर भी नहीं छोड़ी थी। समझौते के अन्तिम समाधान के लिये उन्होंने स्वयं पाण्डवों के दूत के रूप में हस्तिनापुर जाने का निर्णय लिया। सूचना प्रेषित कर दी गई। निर्धारित तिथि को हस्तिनापुर की राजसभा को उन्होंने संबोधित किया। उसका प्रभाव भी पड़ा। दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दुशासन के अतिरिक्त सभी उपस्थित सभासदों और भीष्म, द्रोण, विदुर तथा स्वयं धृतराष्ट्र ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रस्ताव से सहमति जताते हुए पाण्डवों का राज वापस करने का सत्परामर्श सार्वजनिक रूप से दिया। लेकिन दुर्योधन तो अपने निश्चय पर अटल था। भगवान श्रीकृष्ण एवं सभी सम्मानित जनों की सलाह को किनारे करते हुए उसने उत्तर दिया -
      “ प्रत्येक मनुष्य विधाता की कृति है। उससे कब, कैसे और क्या काम लेना है, विधाता ने ही निर्धारित कर रखा है। मुझे भी ईश्वर ने किसी विशेष प्रयोजन से ही रचा है। हम और आप उसके कार्यक्रम को बदल नहीं सकते। मुझे यह भी ज्ञात है कि क्या धर्म है और अधर्म क्या है। मैंने भी धर्मग्रन्थ पढ़े हैं और गुरु द्रोण से ही शिक्षा पाई है। मुझे यह भी पता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित। मैं विधाता की योजना के क्रियान्यवन के प्रति प्रतिबद्ध हूं। अगर विधाता को क्षत्रिय कुल का विनाश मेरे  माध्यम से ही स्वीकार है, तो मैं क्या कर सकता हूँ| सबकुछ विधाता पर छोड़कर, जाइये युद्ध की तैयारी कीजिये| ‘’
            दुर्योधन की तरह केजरीवाल को भी धर्म-अधर्म, उचित अनुचित सबकी पहचान है; लेकिन स्वार्थ और महत्त्वाकांक्षा ने उन्हें अन्धा बना रखा है। उन्हें न अन्ना की सलाह भाती है, न किरण बेदी की। जनता ने अपने तरीके से वाराणसी, हरियाणा और दिल्ली में उन्हें उत्तर देना आरंभ कर दिया है। लोकसभा के चुनाव के नतीजे उनके लिये महाभारत ही सिद्ध होंगे। आखिर उसूलों और मूल्यों की सौदेबाज़ी को जनता कबतक सहेगी।





      

Thursday, April 10, 2014

जस करनी तस भोगहु ताता.......

                               लोकतंत्र में हिंसा सर्वथा वर्जित है। मर्यादा में रहकर अपनी बात कहने का अधिकार सबको है।लेकिन वाणी, हथियार या थप्पड़ के माध्यम से जबरदस्ती अपनी बात मनवाने का अधिकार किसी को भी नहीं है। अमूमन हथियार या शारीरिक शक्ति का विरोधियों पर प्रयोग को ही हिंसा की मान्यता प्राप्त है।हमने वाणी की हिंसा को हिंसा न मानने की भूल हमेशा की है। इस चुनाव में वाणी की हिंसा अपने चरम पर है। विरोधियों पर बिना सबूत के अनर्गल आरोप लगाना, गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल करना और दूसरों की भावनाओं को जानबूझ कर आहत करना आज का नेता-धर्म बन गया है। इस नेता-धर्म के निर्वहन में आप के नेता अरविन्द केजरीवाल अन्य नेताओं से मीलों आगे हैं। चूँकि इसका त्वरित लाभ उन्हें दिल्ली विधान सभा के चुनाव में बड़ी आसानी से मिल गया, उन्होंने ने इसे पेटेंट करा लिया। लोकसभा के चुनाव में उन्होंने अपनी इसी स्टाइल से जनता को लुभाने या गुमराह करने की कोशिश की। लेकिन उनके अपने ही गढ़, दिल्ली में ही उनके अपनों ने ही लघु हिंसा द्वारा अपना विरोध सार्वजनिक करना आरंभ कर दिया है। पिछले मंगलवार के दिन रोड शो के दौरान आटो रिक्शा चालक लाली द्वारा केजरीवाल के गाल पर जड़ा जोरदार तमाचा और कुछ नहीं, जनता के टूटे हुए सपनों की प्रतिध्वनि है। इसके कुछ ही दिन पहले केजरीवाल जी दिल्ली में ही गर्दन पर घूंसा खा चुके हैं और वाराणसी में स्याही से अपना चेहरा काला करा चुके हैं। इन घटनाओं का जिक्र करने का यह मकसद कही से भी नहीं है कि लेखक इनका समर्थन करता है। ऐसी घटनाओं की जितनी भी निंदा की जाय, कम होगी। लेकिन यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है की ये घटनाएँ आम आदमी के स्वघोषित प्रतिनधि के साथ ही क्यों घटित हो रही हैं? सभी नेता जनसभा और रोड शो कर रहे हैं लेकिन जनता के आक्रोश का शिकार सिर्फ केजरिवाल ही हो रहे हैं। देश की दुर्दशा के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार शहजादे और मल्लिका-ए-हिंदुस्तान भी निर्द्वन्द्व अपने कार्यक्रम कर रहे हैं परन्तु जनता या तो उन्हें सुनती है या नहीं सुनती है; इस तरह का अपमानजनक व्यवहार नहीं करती है।केजरीवाल के अलावा किसी भी नेता ने जनता की भावनाओं से इतना निर्मम खिलवाड़ नहीं किया है। मात्र 49 दिनों में ही जनता के सपनों और आकाँक्षाओं को हिमालय के समान ऊंचाई देकर उसे बेवजह हिन्द महासागर में डुबो देने का अक्षम्य अपराध अरविन्द केजरीवाल ने ही किया है। जनता मतपत्र के माध्यम से विरोध करने का धैर्य खो रही है। यह कोई शुभ संकेत नहीं है बल्कि झूठे वादे करने वाले, सत्तालोलुप, अक्षम, विदेशी शक्तियों की कठपुतली बने भगोड़े नेताओं के लिए सन्देश है। अरविन्द केजरीवाल अपने ही कर्मों की फसल काट रहे हैं।
           जस करनी तस भोगाहूँ ताता, नरक जात में क्यों पछताता?

Sunday, March 30, 2014

ज़िन्दगी की इमारत

मेरी ज़िन्दगी की इमारत -
पिलर पर नहीं, नींव पर बनी है।

बाबूजी बहुत डांटते थे
कभी-कभी थपड़ियाते भी थे।
दुखी हो जाता था
आंखों में आंसू भी आते थे
लेकिन आज सोचता हूं
उनकी डांट, झिड़कियां और चांटे
अनुशासन, शिक्षा और संस्कार की
नींव के पत्थर थे।

बड़का बाबूजी ने कभी डांटा नहीं
बाबूजी के हिस्से का प्यार
वही देते थे।
उन्होंने कभी एहसास होने नहीं दिया
कि बच्चे सिर्फ़ डांट के अधिकारी हैं।
नींव में उनके निर्मल प्यार का
सिमेन्ट-बालू आज भी है।

मां - मेरी प्यारी मां
क्या दुनिया में उससे अच्छी
कोई दूसरी मां हो सकती है?
शायद नहीं।
कभी कान भी उमेठा हो,
याद नहीं।
शरारतों का शहज़ादा मैं
क्षमा की मूर्ति वह।
छींक आने पर भी
गोद में समेट लेती थी।
उसकी धड़कन से
मेरा सीधा संवाद था।

बड़की माई का स्नेह
उम्र के साथ एहसास बढ़ता गया
डांटती भी थीं
पर स्नेह के साथ
आम लीची की चोरी पर
पड़ोस की ईया
जब गाली के साथ
शाप भी देती थीं,
आंखों में आंसू भर बड़की माई
सातों शावकों को बटोरकर
बार-बार समझाती थीं -
दूसरों के बगीचे से
क्यों तोड़ते हो आम-लीची,
अपने बगीचे में क्या कमी है?
मेरा मरा मुंह देखो
जो कल से ईया के बगीचे में जाओ।
क्या उनकी दी हुई कसम
हम चौबीस घण्टों से ज्यादा
याद रख पाये?

नींव पड़ी, दीवार बनी, छत पड़ा -
जीवन के उत्तरार्ध में
जब इमारत पर नज़र डालता हूं
कण-कण में
बाबूजी का अनुशासन
बड़का बाबूजी का प्यार
मां की ममता और
बड़की माई का स्नेह दीख पड़ता है।

इस चतुर्भुज को नमस्कार !
संयुक्त परिवार को नमस्कार !!
शत कोटि नमस्कार !!!

हृदय के अन्तस्तल से नमस्कार !!!!

Sunday, March 23, 2014

आडवानी की मृगतृष्णा

       महाभारत का युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नहीं था। यह धृतराष्ट्र और पाण्डवों के बीच था। युद्ध के पहले भी धृतराष्ट्र ही हस्तिनापुर के राजा थे और युद्ध में अगर कौरवों की जीत हो जाती, तो वे ही राजा बने रहते। वनवास से लौटने के बाद इन्द्रप्रस्थ का राज्य युधिष्ठिर को वापस देने का वचन उन्होंने ही दिया था और उनके ही वचन-भंग का परिणाम महाभारत था। महाभारत के पूर्व भी उन्होंने कई कुटिल योजनायें बनाईं। पाण्डवों को लाक्षागृह में भेजकर जीवित जला देने की योजना उनके ही अनुमोदन के बाद बनी। भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण उनके ही सामने हुआ। वे आंखों से अंधे थे लेकिन अंधा होने का अर्थ यह कदापि नहीं था कि उनकी इच्छायें भी समाप्त हो गई थीं। वे दुर्योधन के माध्यम से सबकुछ देखना चाहते थे और अपनी सारी दबी हुई इच्छाओं की पूर्ति करना चाहते थे। वे इतने स्वार्थी थे कि अपने पुत्र को भी नहीं बक्शा। बड़ी चालाकी और सफ़ाई से उन्होंने अपने दुष्कृत्यों के लिये दुर्योधन को जिम्मेदार ठहराया। श्री मद्भागवद्गीता के अन्त में संजय ने युद्ध के परिणाम की भविष्यवाणी करते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण और गाण्डीवधारी अर्जुन हैं, विजय वही होगी। अन्धे धृतराष्ट्र की आंखें फिर भी नहीं खुलीं। वे मृगतृष्णा के पीछे भागते रहे और युद्ध कराकर ही दम लिया। युद्ध के उपरान्त युधिष्ठिर सम्राट बने और वृद्ध धृतराष्ट्र को आजीवन जंगल में निवास करना पड़ा।

      सत्ता की मृगतृष्णा के पीछे बीजेपी के लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवानी भी धृतराष्ट्र बन गये हैं। बन्द आंखों से वे उन्हें सिर्फ़ प्रधानमंत्री की कुर्सी दिखाई पड़ती है। ईश्वर ने उन्हें लंबी उम्र दी है लेकिन यह उम्र आश्रम-व्यवस्था के अनुसार संन्यास ग्रहण करने की है। नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता से सोनिया जलें, राहुल जलें या केजरीवाल जलें, इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं। लेकिन आडवानी का जलना अनेक प्रश्नचिह्न खड़े करता है। मोदी का बीजेपी के चुनाव-अभियान का राष्ट्रीय संयोजक चुने जाने के तत्काल बाद आडवानी का कोप-भवन में जाना उनकी छोटी सोच का परिचायक था। नरेन्द्र मोदी को बीजेपी ने जब प्रधानमंत्री पद के लिये अपना उम्मीदवार घोषित किया, तो वे पुनः कोप-भवन में गये। अनुशासनहीनता की सारी सीमायें तोड़ते हुए उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को विरोध-पत्र लिखा और उसे भी राजनाथ सिंह को देने के पहले मीडिया को दे दिया। उनकी जगह किसी और ने यह कृत्य किया होता, तो पार्टी उसे कबका बाहर का रास्ता दिखा चुकी होती। लेकिन आगामी आम चुनाव में पार्टी की संभावनायें धूमिल न हों, इसलिये पाटी ने सख्ती नहीं बरती। लेकिन अब तो पानी सिर के उपर बह रहा है। आडवानी और उनकी चाण्डाल-चौकड़ी की हर संभव कोशिश हो रही है कि बीजेपी १६० क्लब में उलझी रहे। ऐसी स्थिति में नीतिश, ममता और नवीन पटनायक के समर्थन से प्रधानमंत्री की कुर्सी पा जाने का दिवास्वप्न आडवानी आज भी देख रहे हैं। लोकसभा के लिये गांधीनगर के बदले भोपाल की सीट का चुनाव करना इसी रणनीति का हिस्सा था। वे मतदाताओं और अपने समर्थकों को स्पष्ट संदेश देना चाहते थे कि मोदी उन्हें पसन्द नहीं हैं और मोदी पर उन्हें विश्वास भी नहीं है। मोदी उन्हें गांधीनगर से हरवा भी सकते हैं। बीजेपी के १६० क्लब के लिये यह उनका आखिरी प्रयास था। दिन-रात चुनाव प्रचार में व्यस्त नरेन्द्र मोदी के अभियान में बाधा डालना ही इसका उद्देश्य था। काफी मान-मनौवल के बाद पार्टी ने इस समस्या को सुलझा लिया, लेकिन मतदाताओं में यह संदेश भेजने में आडवानी सफल रहे कि पार्टी में सबकुछ ठीकठाक नहीं है। धृतराष्ट्र की दृष्टि रखने वाले आडवानी चुनाव के बाद भी किस महाभारत की योजना बनायेंगे, यह भविष्य के गर्भ में है। परन्तु इतना तो सत्य है ही कि उनके इन कृत्यों के कारण उनके समस्त पुण्य क्षीण हो चुके हैं। धृतराष्ट्र जन्मान्ध थे, आडवानी स्वार्थान्ध हैं। महाभारत के बाद धृतराष्ट्र को घनघोर जंगल में गुमनामी के दिन काटने पड़े। मृगतृष्णा के पीछे भाग रहे इक्कीसवीं सदी के धृतराष्ट्र के साथ भी ऐसा ही कुछ हो, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

Wednesday, March 19, 2014

शिशुपाल और केजरीवाल

         दिल्ली का मुख्यमन्त्री बनने के पहले अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस और भ्रष्टाचार-विरोध का एक मुखौटा लगा रखा था जो समय के साथ-साथ तार-तार हो रहा है। कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छुपते। केजरीवाल की हरकतें इस कहावत की सत्यता सिद्ध करती हैं। शक तो तभी होने लगा था, जब केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन दिया था। अब इस शक को साबित करने की आवश्यकता नहीं रह गई है। केजरीवाल के अन्ध मोदी-विरोध ने शक की संभावना छोड़ी ही कहां है? 
महाभारत में एक पात्र है - शिशुपाल। वह श्रीकृष्ण का फ़ुफ़ेरा भाई था। वह कही से भी स्वयं को श्रीकृष्ण से कम नहीं समझता था। श्रीकृष्ण का अद्वितीय व्यक्तित्व उसकी ईर्ष्या का मुख्य कारण था। गुणों में तो वह श्रीकृष्ण का पासंग भी नहीं था लेकिन स्वयं को उनसे कम नहीं आंकता था। भक्ति करने के लिए तो प्रयास की आवश्यकता होती है लेकिन ईर्ष्या के लिये तो कुछ भी नहीं करना होता है। यह स्वभागत विकृति होती है जो दुष्ट-जनों में अत्यधिक मात्रा में पाई जाती है। शिशुपाल की यह ईर्ष्या सार्वजनिक रूप से सामने आई जब पाण्डवों के राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण का चुनाव प्रथम पूजन के लिए किया गया। यह चुनाव सर्वसम्मति से भीष्म पितामह की पहल पर किया था। पूरी सभा ने इसका अनुमोदन किया था। शिशुपाल को जब इसकी सूचना मिली, तो वह उग्र हो गया। अपनी असहमति और नाराज़गी को वह छिपा नहीं सका और यज्ञमंडप में ही उसने अशिष्टता प्रारंभ कर दी। उसने श्रीकृष्ण पर तरह-तरह के आरोप लगाते हुए गाली बकना शुरु कर दिया। पूरा यज्ञमंडप स्तब्ध था। युधिष्ठिर ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन उसने उनकी बात नहीं मानी। उधर वह गाली दे रहा था, इधर श्रीकृष्ण मुस्कुराये जा रहे थे। अर्जुन से श्रीकृष्ण का यह अपमान सहन नहीं हुआ। वे शिशुपाल के वध के लिये आगे बढ़े लेकिन स्वयं श्रीकृष्ण ने उन्हें रोक दिया। अर्जुन को समझाते हुये उन्होंने शिशुपाल को सुनाते हुए कहा -
“अर्जुन! तुम तनिक भी चिन्ता मत करो। यह पापी अपने पापों के कारण स्वयं अपने अन्त को प्राप्त करेगा। यह मेरे प्रति घोर ईर्ष्या-भाव रखता है और प्रत्येक अवसर पर मेरा विरोध ही नहीं करता, मेरा अपमान भी करता है। इसकी माता इसके इस स्वभाव से परेशान रहती है। मैं तो इसका वध कबका कर चुका होता, परन्तु मैं स्वयं अपनी बुआ को दिये गए वचन के कारण विवश हूं। मैंने इसकी मां को वचन दिया है कि मैं इसके सौ अपराध क्षमा करूंगा। परन्तु जैसे ही इसके अपराधों की संख्या सौ के पार जायेगी, मैं तत्क्षण इसका वध कर दूंगा। संभवतः वह दिन आज आ गया है। मैं इसके अपराधों की गिनती कर रहा हूं। शीघ्र ही इसकी संख्या सौ पार करने वाली है। इसका अन्त निकट आ गया है। धैर्य रखो और देखते जाओ।”
श्रीकृष्ण का यह संदेश शिशुपाल और यज्ञमंडप में उपस्थित सभी राजाओं ने स्पष्ट सुना। श्रीकृष्ण का यह वचन शिशुपाल के लिए अन्तिम चेतावनी थी लेकिन उसने सुनकर भी अनसुना कर दिया और अपनी रफ़्तार से गाली बकता रहा। जैसे ही सौ गालियों की सीमा पार हुई उसकी गर्दन उसके धड़ से अलग थी। श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का अन्त कर दिया।
आज मैं सोचता हूं कि आखिर नरेन्द्र मोदी ने अरविन्द केजरीवाल का क्या बिगाड़ा है कि वे घूम-घूमकर, पानी पी-पीकर शिशुपाल की तरह गालियों की बौछार कर रहे हैं। पूरा देश मोदी की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा है। गुजरात को विकास के शिखर पर पहुंचाने के कारण पूरी दुनिया उन्हें विकास पुरुष के रूप में जानती, पहचानती है। उनपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप उनके धुर विरोधी शहज़ादा भी नहीं लगा सकते। अनुशासन और कर्त्तव्यनिष्ठा उनके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग हैं। सुशासन और सुप्रशासन उनके अमोघ अस्त्र हैं। वर्तमान परिवेश में उनका कोई विकल्प नहीं है। भारत की जो दुर्दशा पिछले १० वर्षों में हुई है उसके लिए वे कही से भी जिम्मेदार नहीं हैं। फिर क्या कारण है कि अरविन्द केजरीवाल कांग्रेस और सोनिया गांधी को छोड़कर नरेन्द्र मोदी के पीछे पड़े हुए हैं। अभी तक तो वे मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान सोनिया और अमेरिकी कुबेर फ़ोर्ड के ही एजेन्ट के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि वे शिशुपाल के कलियुगी अवतार हैं। 

Sunday, March 9, 2014

केजरीवाल पहेली

वो कौन है, वो कौन है --
जो झूठ बोले है,
झूठ है ओढ़न, झूठ बिछावन,
झूठ खाए है --
बोलो-बोलो कौन ?
सिब्बल ?
नहीं।
सिंघवी ?
नहीं।
दिग्गी ?
दिग्गी नहीं किज्जी।

वो कौन है, वो कौन है --
जो खुद डर जाता है,
जिम्मेदारी लेकर भी,
जो भाग जाता है।
बोलो-बोलो कौन ?
राहुल ?
नहीं ।
सोनिया?
उहूं।
खुर्शीद  ?
खुर्शीद नहीं अरविन्द।

वो कौन है, वो कौन है --
जो गाली देता है,
गुरु-गोविन्द दोनों को
जो धोखा देता है --
बोलो-बोलो कौन ?
वीपी ?
नहीं ।
लालू ?
उहूं ।
सान्याल ?
सान्याल नहीं केजरीवाल ।

वो कौन है, वो कौन है --
जो ड्रामा करता है,
है विदूषक हीरो का पर,
ख्वाब रखता है ।
बोलो-बोलो कौन ?
महमूद ?
नहीं ।
जानी वाकर ?
नहीं ।
मुकरी ?
मुकरी नहीं कजरी ।

वो कौन है, वो कौन है --
जो भभकी देता है,
देवालय में जाकर भी
जो थूक देता है ।
बोलो-बोलो कौन ?
कुक्कूर ?
नहीं।
गीदड़ ?
उहूं ।
शृगाल ?
शृगाल नहीं केजरीवाल ।

वो कौन है, वो कौन है --
जो सीख देवे है,
खुद ही फेंके पत्थर
औ’ आरोप लगावे है।
बूझो-बूझो कौन ?
पड़ोसी ?
नहीं ।
दुश्मन ?
नहीं ।
बाप ?

बाप नहीं आप ।

Monday, February 24, 2014

कुछ सवाल अरविन्द केजरीवाल से

  अरविन्द केजरीवाल यह हमेशा भूल जाते हैं कि जब आप एक ऊंगली दूसरे की ओर उठाते हैं, तो तीन ऊंगलियां अपने आप स्वयं की ओर उठ जाती हैं। आजकल उनके निशाने पर नरेन्द्र मोदी हैं। लेकिन क्या वे इन सवालों का उत्तर दे सकते है जिनकी अपेक्षा स्वच्छता और पारदर्शिता में विश्वास रखने वाला हर भारतीय करता है -
१. क्या ‘परिवर्तन’ और ‘कबीर’ नाम के एन.जी.ओ. उनके द्वारा संचालित नहीं होते हैं?
२. क्या ‘कबीर’ ने वर्ष २००५ में १७२००० डालर और वर्ष २००६ में १९७००० डालर अमेरिकी व्यवसायी फ़ोर्ड से प्राप्त नहीं किये?
३. क्या वर्ष २०१० में फ़ोर्ड से ही उन्होंने २००००० डालर नहीं वसूले?
३. क्या फ़ोर्ड एक चतुर व्यवसायी नहीं है? उसने इतने डालर केजरीवाल को क्यों दिए?
४. क्या दूसरे देशों की सरकार को अस्थिर करने और अराजकता फैलाने वाले अमेरिकी एन.जी.ओ. ‘आवाज़’ से केजरीवाल के संगठन के अन्तरंग सम्बन्ध नहीं हैं?
५. क्या लीबिया, मिस्र और सीरिया में गृहयुद्ध कराकर अराजकता के माध्यम से सत्ता परिवर्तन कराने के लिये ‘आवाज़’ जिम्मेदार नहीं है?
६. क्या अमेरिकी सरकार के इशारे पर फ़ोर्ड समेत सारे पूंजीपति ‘आवाज़’, जिसका बज़ट हिन्दुस्तान के आम बजट से
ज्यादा है, को आर्थिक मदद नहीं करते हैं?
७. क्या यहुदी-अमेरिकी खूबसूरत युवती शिमिरित ली से केजरीवाल के  संबन्ध नहीं हैं?
८. क्या शिमिरित ‘आवाज़’ और सी.आई.ए. की एजेन्ट नहीं है?
९. क्या शिमिरित ने केजरीवाल और सिसोदिया की संस्था ‘कबीर’ से जुड़कर चार महीने तक अन्ना आन्दोलन में सक्रिय योगदान नहीं किया?
१०. क्या कुख्यात अमेरिकी संस्था ‘आवाज़’ के आदेश पर शिमिरित ने मिस्र जाकर अराजक आन्दोलन के माध्यम से सत्ता परिवर्तन में हिस्सेदारी नहीं की?
११. क्या सन २००५ में कपिल सिब्बल के एजेन्ट स्वामी अग्निवेश ने सोनिया गांधी के राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का सदस्य बनवाने के लिये केजरीवाल की लाबिंग नहीं की?
१२. क्या केजरीवाल का स्थानान्तरण दिल्ली के बाहर न करने के लिये सोनिया गांधी ने सिफ़ारिश नहीं की?
१३. क्या अरविन्द केजरीवाल की बैचमेट पत्नी सुनीता केजरीवाल पिछले २० वर्षों से आयकर आयुक्त/उपायुक्त के पद पर दिल्ली में ही पदस्थापित नहीं हैं।
१४. क्या उनका स्थानान्तरण नहीं होना सोनिया गांधी की सिफ़ारिश का नतीजा नहीं है?
१५. क्या केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनते ही अपने लिये १० बीएचके का मकान पसन्द नहीं किया था?
१६. क्या उस १० बीएचके के मकान के नवीनीकरण में दिल्ली की सरकार/जनता के २० लाख रुपए खर्च नहीं हुए, जो बेकार चले गए?
१७. क्या आम आदमी के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की सुरक्षा में यूपी और दिल्ली की सरकारों ने ४९ दिनों में २ करोड़ से ज्यादा खर्च नहीं किये?
१८. क्या केजरीवाल और उनके मंत्रियों ने अपने कार्यकाल के दौरान सरकारी गाड़ियों और सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं किया?
१९. क्या लालू, मुलायम, मायावती, वाड्रा, राहुल, सोनिया, चिदम्बरम, ए.राजा........ दूध के धुले हैं? यदि नहीं तो सोनिया गांधी का नाम अरविन्द की ज़ुबान पर क्यों नहीं आता?
२०. क्या कुख्यात नक्सलवादी विनायक सेन देशद्रोही नहीं है? उसपर चुप्पी का क्या रहस्य है?
२१.  कश्मीर को पाकिस्तान को देने की मांग करनेवाला शान्ति भूषण वकील क्या  पाकिस्तान का एजेन्ट नहीं है?
२२. बिजली का बिल हाफ़ करने की घोषणा के बाद ४९ दिनों के कार्यकाल में फ़ंड अवमुक्त किये बिना इस्तीफ़ा दे देना दिल्ली की जनता के साथ विश्वासघात नहीं है?
२३. क्या दिल्ली की जनता को अब बिजली का पूरा बकाया सरचार्ज के साथ के साथ नहीं देना पड़ेगा?
२४. क्या पांच सद्स्यों वाला परिवार एक दिन में कम से कम एक हज़ार लीटर पानी की खपत नहीं करता है? यदि हां, तो बीस हज़ार लीटर प्रति माह प्रति परिवार मुफ़्त पानी की घोषणा एक छलावा नहीं थी?
२५. अपनी की गई घोषणओं के क्रियान्यवन को सुनिश्चित किये बिना बहाना बनाकर त्यागपत्र दे देना, क्या जनता के साथ धोखा नहीं है?
२६. क्या यह सच नहीं है कि केजरीवाल एक भगोड़ा हैं?
२७. क्या केजरीवाल हमेशा जिम्मेदारी से भागते नहीं हैं?
२८. क्या यह सच नहीं है कि वे हमेशा दूसरों को गाली देने के अलावे कोई दूसरा काम नहीं कर सकते?
२९. क्या यह सच नहीं है कि उन्होंने भ्रष्टाचार की जननी कांग्रेस और सोनिया गांधी की मदद से दिल्ली की सत्ता हासिल की?
३०.क्या यह सच नहीं है कि उन्होंने महान सन्त अन्ना हजारे को धोखा नहीं दिया?
३१. क्या यह सत्य नहीं है कि वे सोनिया गांधी के इशारे पर नरेन्द्र मोदी की राह में रोड़े बिछा रहे हैं?
      दो हजार वर्ष पूर्व प्लेटो ने सुकरात से पूछा था कि एथेन्स का सबसे बड़ा संकट क्या है? सुकरात का उत्तर था - शब्दों का अन्धाधुन्ध प्रयोग? बोलने के लिये सिर्फ़ वाणी की आवश्यकता होती है। सत्य बोलने के लिये वाणी और विवेक, दोनों की आवश्यकता होती है।