Sunday, October 24, 2010
हमारी न्याय पद्धति
कुछ निचली अदालतों को छोड़ दें तो भारत के सारे उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की भाषा आज भी अंग्रेजी है. यह कैसी विडंबना है कि वादी या प्रतिवादी अपनी बात सीधे जज से नहीं कह सकता. उसे अनिवार्य रूप से बिचौलिये की आवश्यकता होती है, जिसे वकील कहते हैं. सारे वकील दलाली करते हैं. पीड़ित के लिये न्याय की फ़रियाद काला कोट पहने एक दूसरा व्यक्ति जज से करता है, जिसकी भाषा भी पीड़ित समझ नहीं पाता है. न्यायालय में सत्य या न्याय की जीत नहीं होती है, बल्कि वकील के दांव-पेंच और वक्तृत्व कला की जीत होती है. अपने फ़ायदे के लिये वकील तारीख पर तारीख लिये जाता है, जज दिए जाता है - भारत की गरीब जनता पिसती जाती है. देश की ९५% जनता की औकात ही नहीं है कि वह हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जाए. गरीबों को मुकदमे में फँसाकर उनका शोषण करना अमीरों का शौक बन गया है. वर्तमान न्याय-प्रणाली बाहुबलियों, पूंजीपतियों और रा्जनीतिज्ञों के हाथ का खिलौना बन गई है.
हमारे न्यायालयों मे सफ़ेद रंग की एक सुन्दर स्त्री की मूर्ति बनी रहती है, जिसके हाथ में तराजू रहता है और आंखों पर पट्टी बंधी रहती है. मूर्ति संदेश देती है - कानून अंधा होता है. अगर कानून की आंखों पर पट्टी बंधी है, तो वह तराजू को कैसे बैलेन्स कर सकता है? इसपर किसी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया, बस नकल कर ली. कानून याने जज अंधा होता है, अंधा ही नहीं बहरा भी होता है. कोर्ट में वकील चिल्ला-चिल्ला कर अपनी बात सुनाते हैं और दस्तावेज़ दिखाते हैं. वकीलरूपी दलाल ही जज के आंख-कान हैं. कानून को जनता की चीखें सुनाई नहीं पड़तीं, भोपाल गैस त्रासदी के मृतकों की लाशें दिखाई नहीं पड़तीं. हाई कोर्ट से मौत की सज़ा पानेवाला मुज़रिम सुप्रीम कोर्ट से बाइज्जत बरी हो जाता है. अगर उसके पास पैसे नहीं होते तो? वह फ़ांसी पर झूल जाता. मुजरिम को हाई कोर्ट के जिस जज ने मौत की सज़ा दी और सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया - क्या उस जज पर हत्या के प्रयास का मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अंधे राजा (धृतराष्ट्र) और आंख पर पट्टी बांधी महारानी (गांधारी) की उपस्थिति में उनके ही बेटे कुलवधू का चीरहरण करते हैं.
हमारी निचली अदालतें पूरी तरह रिश्वतखोरी में लिप्त हैं. हाई कोर्ट में ६०% भ्रष्टाचार है तो सुप्रीम कोर्ट में ३०%. कर्नाटक के भ्रष्ट चीफ जस्टिस दिनकरन का केस हल नहीं हो पा रहा है क्योंकि अमेरिका और इंगलैंड से उधार लिये गये संविधान में कार्यवाही करने का जो तरीका दर्ज़ है, वह अड़ंगा लगाने और बच निकलने के लिये काफ़ी है. भ्रष्टाचार के प्रमाणित आरोपों के बाद भी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश चो रामास्वामी का कोई बाल बांका भी हो कर सका. लोकसभा में महाभियोग लाया गया, लेकिन दो-तिहाई बहुमत का समर्थन नहीं मिल सका. श्री शशिभूषण, भूतपूर्व कानून मन्त्री, भारत सरकार ने एक इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट के अबतक के १६ मुख्य न्यायाधिशों में से ८ को रिश्वतखोर बताया है. श्री रंगनाथ मिश्र - कांग्रेस के प्यारे न्यायाधीश और यूनियन कार्बाइड को सस्ते में छोड़वाने वाले जज न्यायमूर्ति अहमदी भी इसमें शामिल हैं.
भारतीय न्याय-पद्धति पंच परमेश्वर की न्याय पद्धति थी. सबके सामने दूध का दूध और पानी का पानी. बिना दलाल के जो न्याय मिलता है, वही सच्चा न्याय होता है. जज, वादी-प्रतिवादी से सीधी वार्त्ता क्यों नहीं कर सकता? उनसे अपने दावों के समर्थन में साक्ष्य क्यों नहीं ले सकता? आवश्यकता पड़ने पर स्थलीय निरीक्षण क्यों नहीं कर सकता? स्वयं जाकर आस-पास के लोगों से गोपनीय पूछ्ताछ क्यों नहीं कर सकता? वह सब कर सकता है, लेकिन करता नहीं, क्योंकि आज भी उसकी मानसिकता वही है, जो १९४७ के पहले थी. आज भी उसकी आंखों पर पट्टी बंधी है. उसके पेशे के सहयोगी, तथाकथित कानून विशेषज्ञ वकीलों की रोजी-रोटी जाने का खतरा भी है. जनता न्याय के चक्रव्यूह में पिसती रहे - क्या फ़र्क पड़ता है! न्यायालय के जज, कर्मचारी और वकील की जेब तो भर रही है न.
Tuesday, October 12, 2010
भ्रष्टाचार -- एक अनुत्तरित यक्ष-प्रश्न
१. पुलिस ४.७
राजनेता ४.७
२. न्याय ४.३
३. रजिस्ट्री ४.०
४. शिक्षा ३.८
कर ३.८
५. आधारभूत सेवाएं ३.७
६. संसद ३.४
७. वाणिज्य एवं निजी क्षेत्र ३.३
८. मीडिया २.७
९. रक्षा २.१
१०. जनता २.०
भ्रष्टाचार, कम या अधिक सभी जगहों पर हमेशा रहा है. इस समय सबसे बड़ी चिन्ता की बात यह है कि अब इसे सामाजिक मान्यता भी मिलने लगी है. पहले भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं को जनता अगले चुनाव में ही धूल चटा देती थी -- अब चर्चा भी नहीं करती. आय से अधिक संपत्ति के मामलों में कितने मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों पर सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट में मुकदमें विचाराधीन हैं, क्या आप गणना कर सकते हैं? स्व. राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व-काल में घोषित किया था कि एक रुपए का मात्र २० पैसा ही विकास पर खर्च होता है, शेष भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है. उनके सुपुत्र और भारत के युवराज राहुल गांधी ने अपने बुंदेलखंड के दौरे पर बयान दिया कि १०० पैसों में से मात्र ५ पैसे ही विकास पर व्यय हो पा रहे हैं. देश के वित्त मंत्री के रूप में काम करते हुए श्री चिदंबरम ने कहा था कि १ रूपया विकास पर खर्च करने के लिए सरकार को लगभग ३.५ रुपए का व्यय करना पडता है. मतलब साफ है -- सरकार को भी सारी चीजें पता है और उसके द्वारा इसे मान्यता भी प्राप्त है. सरकार कांग्रेस की है और उसके नेता भ्रष्टाचार की बात स्वीकार करते हैं, लेकिन दूर करने का कोई उपाय नहीं करते. क्या यह सत्य नहीं है कि कांग्रेस के शासन-काल में भ्रष्टाचार चरम पर रहता है. सभी इसमें आकंठ डूबे हैं, समाधान कौन निकलेगा? यह उजागर हो गया है कि राज नेताओं, पूंजीपतियों और भ्रष्ट नौकरशाहों के लाखों करोड़ रुपए स्विस बैंकों में जमा हैं. इस अकूत काले धन को वापस लायेगा कौन?
इन्टरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इन्स्टीट्यूट के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का स्थान दुनिया के भूखे देशों की श्रेणी में ९४ वाँ है. हमसे आगे ९० पर नेपाल, ८८ पर पाकिस्तान, ६९ पर श्रीलंका व ६६ पर म्यामार हैं. अपने देश में कुल राष्ट्रीय उत्पाद का ८०% कर्ज़ से है, जो दुनिया में सबसे अधिक है. भ्रष्ट देशों की सूची में हमारा स्थान ७२वाँ है. हमसे बेहतर कई अफ़्रीकी देश हैं. आर्थिक आज़ादी की सूची में भारत १०४वें स्थान पर है. विश्व बैंक ने अपने देश को व्यापार करने की दृष्टि से १२०वें स्थान पर, १७८ देशों की सूची में रखा है, जो दक्षिण एशिया में न्यूनतम है.
अपने गुनाहों को छिपाने के लिए सरकार जो तरक्की की तस्वीर पेड मीडिया और सरकारी आंकड़ों द्वारा प्रस्तुत कर रही है, वह धोखा है. चमकता भारत, उभरता भारत, प्रगतिशील भारत, महाशक्ति भारत का दावा मात्र छलावा है. भ्रष्टाचार के राहु ने हमारी सारी योजनाओं पर पूर्ण ग्रहण लगा रखा है. चांद और सूरज तो ग्रहण से मुक्त हो जाते हैं, क्या भारत हो पायेगा? यह एक अनुत्तरित यक्ष-प्रश्न है.
Friday, October 1, 2010
शांतिपूर्ण सह अस्तित्व
श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी मस्ज़िद विवाद पर आखीरकार हाई कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुना ही दिया. काश! यह फ़ैसला २० वर्ष पहले आया होता. लेकिन विलंब से आया फ़ैसला भी ऐतिहासिक है. कोई पक्ष पूर्ण जीत या हार का दावा नहीं कर सकता. हाई कोर्ट ने देश के विभाजन के बाद हिन्दू और मुसलमान, दोनों समुदायों को एक दूसरे की भावनाओं को समझने, आपसी भाईचारा और सौहार्द्र स्थापित करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान किया है. किसी भी पक्ष को इस फ़ैसले के खिलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में नहीं जाना चाहिए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख श्री मोहन भागवत औए ज़ामा मस्ज़िद के इमाम के वक्तव्य को इसी परिप्रेक्ष्य में देश की जनता को ध्यान से सुनना और पढ़ना चाहिए. हिन्दू-मुसलमान लड़ेंगे तो देश कमजोर होगा. दोनों व्यक्तियों ने इसे पहली बार एकसाथ महसूस किया है. यह देश का सौभाग्य है.
कुछ कट्टरपन्थी हिन्दू यह मानते हैं कि पाकिस्तान बन जाने के बाद मुसलमानों को हिन्दुस्तान में रहने का हक नहीं है. उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए. इसी तरह कुछ कट्टरपन्थी मुसलमानों ने हिन्दुस्तान को दारुल इस्लाम बनाने की ज़ेहाद छेड़ रखी है. वे भारत मे मुगलकलीन इस्लामिक आधिपत्य का सपना देखते हैं. धरातलीय सत्य यह है कि दोनों ही बातें आज की तारीख में असंभव हैं. ना तो आप २० करोड़ मुसलमानों को देश निकाला देकर इसे हिन्दू राष्ट्र बना सकते हैं और न ही बना सकते हैं धर्मनिरपेक्ष भारत को इस्लामिक राष्ट्र. यह देश मुसलमानों की भी जन्मभूमि और मातृभूमि है, उतनी ही जितनी हिन्दुओं की. दोनों की चमड़ी का रंग एक है, खून एक है, बोलचाल की भाषा एक है, रहन-सहन का ढंग एक है, पहिरावा एक है, आदतें एक हैं. पूजा-पद्धति को छो्ड़ दिया जाय, तो सभ्यता और संस्कृति भी एक है. कार्यालय, स्कूल और कालेज में देखकर क्या आप बता सकते हैं कि अमुक लड़का हिन्दू है और अमुक लड़का मुसलमान? कोई नहीं बता सकता जबतक नाम न पूछा जाय. हिन्दू और मुसलमान में भारत की जनता का वर्गीकरण कृत्रिम है. सच्चाई यह है कि दोनों एक हैं. कट्टरवादी दोनों समुदायों में विभिन्नता की दलील देकर अबतक दोनों समुदायों को अलग रखने के अपने प्रयासों में कमोबेस सफल रहे हैं. लेकिन अब समय आ गया है कि हम दोनों समुदायों में व्याप्त समानता की चर्चा करें. फूट डालो और राज करो, यह विदेशियों की कूट्नीति थी, जिसने हमें लंबी अवधि की दासता के अलावे कुछ नहीं दिया. क्या हम एक दूसरे की भावनाओं और पूजा-पद्धति का सम्मान नहीं कर सकते? अवश्य कर सकते हैं.
हिन्दुओं के पुरखों ने नारा दिया था - वसुधैव कुतुंबकम. सर्वे भवन्तु सुखिना. महाकवि इकबाल ने तराना गाया था - मज़हब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना. हम आदिम या मध्यकालीन युग में नहीं हैं. इक्कीसवीं सदी की आवश्यकता है - शांतिपूर्ण सह अस्तित्व. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ का फ़ैसला इस दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है.
Monday, September 27, 2010
क्या यही लोकतन्त्र है
सत्ता के लिये चुनाव के बाद गठबंधन बनाकर सरकार बना लेना लोकतन्त्र का सबसे बड़ा मज़ाक और जनता के साथ धोखा है. विभिन्न पार्टियां आम चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ़ विष-वमन करती हैं, ताल ठोकती हैं और चुनाव के बाद बंद कमरों में समझौता कर सत्ता का बंदरबांट करती हैं. धुर विरोधी पार्टियां भी सत्ता के लिये जनता की आंखों में धूल झोंककर चुनाव के बाद एक हुई हैं. सन २००४ के आम चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल और केरल में एक दूसरे के खिलाफ़ चुनाव लड़ा. कई स्थानों पर खूनी संघर्ष हुए. दोनों पक्षों के कई कार्यकर्त्ता मारे भी गये. लेकिन चुनाव बाद? दोनों पार्टियों ने दिल्ली में समझौता कर लिया. सत्ता की मलाई दोनों ने खाई. कांग्रेस के मनमोहन सिंह प्रधान मन्त्री बने, तो मार्क्सवादी सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष. राज्यों में दोनों पार्टियों ने एक दूसरे का विरोध करना जारी रखा. भोली-भाली जनता ठगी सी सारा खेल देखती रही.
भारत के उधारी संविधान द्वारा स्थापित फ़र्ज़ी लोकतन्त्र अब वंशवाद के कारण राजतन्त्र का रूप लेता जा रहा है. जिस लोकतन्त्र की तारीफ़ करते राजनेता और मीडिया थकते नहीं, वह मात्र मृगमरीचिका है. लोकतन्त्र के नाम पर जिस प्रकार की राजशाही चल रही है, उसके लिये किसी नये उदाहरण की जरूरत नहीं. जिस तरह बेखौफ़ अंदाज़ में बिहार में चल रही कांटे की चुनाव मुहिम के बीच राजद सुप्रीमो लालू यादव ने अपने २० वर्षीय बेटे तेजस्वी की ताज़पोशी की है, यह किस्सा भारतीय राजनीति में निर्लज्जता के जो कई अध्याय हैं, उनमें सुनहरे अक्षरों में अपनी जगह अवश्य बनाएगा. राजशाही की यह बीमारी किसी एक राज्य या दल में थमने वाली नहीं है.जम्मू-कश्मीर से लेकर तमिलनाडु, महाराष्ट्र से लेकर उड़ीसा-बिहार तक सभी राज्यों और केन्द्र में भी एक ही हाल है. नेहरू-इन्दिरा-राजीव-सोनिया-राहुल, पवार, अब्दुल्ला, लालू, मुलायम, बादल, बंसी लाल, देवी लाल, चरण सिंह, गौड़ा, मारन, करुणानिधी, नायडु, रेड्डी, ठाकरे, शिबू सोरेन.........................आप लिखते रहिए भारतीय राजनीति में वर्चस्व जमाए परिवारवाद की सूची, भारतीय लोकतन्त्र और राजशाही के पोषक नेताओं के कानों पर जूं भी नहीं रेंगने वाली. वंशवाद में आकंठ डूबे देश में सैकड़ों राजनीतिक परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र को जैसे अगवा कर अपने परिवार का बंधक बना रखा है. दुनिया के तथाकथित सबसे बड़े लोकतन्त्र की यह सबसे बड़ी त्रासदी है. हमारे नेताओं ने इस देश की जनता और हमारे लोकतन्त्र को अपनी व्यक्तिगत जागीर समझ ली है. अपना सबकुछ अपने परिवार के नाम ये नेता लिखकर चले जाना चाहते हैं............यह देश, लोकतन्त्र, हम और आप जाएं भाड़ में.
Thursday, February 25, 2010
SACHIN
Thursday, January 28, 2010
लोकतन्त्र
Monday, November 16, 2009
PROBLEM IN TAPPING BEST TALENTS
Addressing the National Education Day function in
The government can open 20 more IITs, 10 NITs, 6 IIMs and 600 model schools during the 11th plan (2007-12), but how can it ensure that high quality teaching staff are also recruited? Our scholar Prime minister has realized the problem but suggested no solution. He and our learned education minister Mr. Kapil Sibbal, both know the problem and solution as well, but their hands are tied in present set up of democracy and appeasement policy launched by their predecessors. This is the main reason as to why a scientist working in
Not only educational institutes but all government departments are also facing the quality problem due to the burden of numerous incompetent staff and officers as a byproduct of policy of reservations in recruitment and promotion. At present almost all the top managerial and technical posts of U.P. Power Corporation Ltd, Utpadan Nigam, Jal nigam, Setu Nigam, Irrigation, PWD etc. are held by members of a particular reserved category ignoring the talents and competency of officers and staff of general category. The quality of work in all government departments is getting deteriorated day by day. Here, in our country opportunities are snatched from the real talents in the name of social justice.
B.K.Sinha,