Thursday, April 20, 2023

जीवन

 

जीवन का दॄष्टिकोण

महा‌न्‌वैज्ञानिक आइन्स्टीन दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक माने जाते हैं। उनकी पत्नी मिलेवा मैरिक भी वैज्ञानिक थीं। उन्होंने कई शोध कार्यों में आइन्स्टीन का सक्रिय सहयोग किया था। शोध में वाद-विवाद भी होता है जो आइन्स्टीन को पसन्द नहीं था। इसलिए मिलेवा ने अपनी दिशा बदल ली। वह साहित्य और कविता में रुचि लेने लगी। एक दिन आइन्स्टीन ने उसकी एक कविता सुनी जिसमें उसने नायिका के मुखमंडल की तुलना पूर्णिमा के चाँद से की थी। आइन्स्टीन ने उसका उपहास उड़ाते हुए कहा कि अब जबकि चाँद की सतह की वास्तविक तस्वीरें हमतक पहुँच गई हैं और यह सिद्ध हो चुका है कि चाँद की सतह उबड़-खाबड़ है, तुम अभी भी एक सुंदर युवती के मुखमंडल की तुलना चाँद से कर रही हो। मिलेवा ने उत्तर दिया कि तुम्हें कविता समझ में नहीं आ सकती। तुम दुनिया को Theory of relativity समझा सको, यही बहुत है। उस समय तक वैज्ञानिकों ने Theory off relativity को मान्यता नहीं दी थी।

आइन्स्टीन और मिलेवा दोनों सही थे। दोनों की व्याख्यायें स्वयं द्वारा स्वीकृत जीवन के दृष्टिकोण पर आधारित थीं। जीवन के दो दृष्टिकोण होते हैं -- पहला 2+2=4. इसका अर्थ है - जो आंखें देख रही हैं वही सत्य है। इस दृष्टिकोण वाले व्यक्ति वैज्ञानिक और गणितज्ञ बनते हैं। दूसरा दृष्टिकोण कल्पना और प्रतीकों पर आधारित है। ऐसे दृष्टिकोण वाले व्यक्ति कवि और साहित्यकार बनते हैं। आदिकवि बाल्मीकि, महर्षि व्यास, कालिदास, शेक्सपियर, तुलसीदास आदि इस दृष्टिकोण की विभूतियाँ थीं। भारत का संपूर्ण साहित्य, इतिहास और दर्शन प्रतीकों के रूप में है। रामचरित मानस के सुंदरकांड में वर्णन है कि समुद्र लांघने के क्रम में हनुमान जी को सुरसा ने बाधा पहुँचाई। वह हनुमानजी को निगलने के लिये उनके सम्मुख आई और अपने मुख का विस्तार किया। वर्णन है -- सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। २+२=४ माननेवाले इसे असंभव मानते हैं और इस आधार पर पूरी रामकथा को ही मिथ्या करार देते हैं। आइन्स्टीन की तरह वे प्रतीकों को समझने में असमर्थ हैं। एक योजन को अगर एक कोस भी मान लें तो भी इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि कोई भी जीव अपने मुँह का विस्तार सौ कोस तक नहीं कर सकता। यहाँ कवि ने प्रतीक का सहारा लिया है। उनके कहने का अर्थ इतना ही है कि सुरसा ने हनुमानजी को निगलने के लिये अपने मुख का विस्तार इतना बड़ा कर दिया जो असंभव-सा दीख रहा था। बंकिम चन्द ने वन्दे मातरम राष्ट्रगीत में भारत माता की कल्पना माँ दुर्गा के रूप में की है। आज भी करोड़ों लोग वन्दे मातरम्‌गाते समय भारत को माँ दुर्गा के रूप में ही देखते हैं। हिमालय से कन्या कुमारी तक माइक्रोस्कोप लेकर ढूँढ लीजिए, कहीं भी आपको ऐसी भारत माता नहीं मिलेंगी। बंकिम चन्द ने प्रतीकों के माध्यम से भारत माता का चित्र बनाया है जिसमें उन्होंने लेखनी रूपी ब्रश से श्रद्धा, भक्ति और अटूट देशभक्ति का रंग भरा है। २+२=४ वालों को यह बात समझ में नहीं आ सकती है।

मेरे एक मित्र हैं -श्री विजय सिंघल। वे कंप्यूटर के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने कंप्यूटर पर ५० से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। आजकल वे फ़ेसबुक पर बाल्मीकि रामायण के श्लोकों की व्याख्या कर रहे हैं। कंप्यूटर का जानकार भी २+२=४ की थ्योरी में विश्वास करता है। इस सिद्धान्त को ध्यान में रखकर अपने प्राचीन ग्रन्थों की व्याख्या नहीं की जा सकती। यह ठीक वैसा ही होगा जैसे राम नवमी को प्रभु श्रीराम का जन्मदिन मानने के लिये कोई श्रीराम का जन्म प्रमाण पत्र दिखाने की मांग करे। सिंहलजी के सिद्धान्त पर बाल्मीकि रामायण का जो भी श्लोक खरा नहीं उतरता उसे वे प्रक्षिप्त घोषित कर देते हैं। अबतक वे ५० प्रतिशत श्लोकों को प्रक्षिप्त घोषित कर चुके हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमें बाल्मीकि रामायण का जो रूप प्राप्त है वह श्रुति और स्मृति के माध्यम से विरासत में प्राप्त हुआ है जिसमें प्रक्षिप्त अंश होना अस्वभाविक नहीं है। विद्वानों ने बाल्मीकि रामायण के पूरे उत्तर कांड और बालकांड के कुछ श्लोकों को ही प्रक्षिप्त माना है। इस आधार पर बाल्मीकि रामायण के ५० प्रतिशत से अधिक भाग को प्रक्षिप्त घोषित करना आदि कवि के साथ न सिर्फ अन्याय होगा बल्कि पाप भी होगा। हमें कोई अधिकार नहीं कि हम एक पवित्र और अद्वितीय कृति को अपनी व्यक्तिगत धारणा के आधार पर विवादास्पद और प्रक्षिप्त सिद्ध करें। २+२=४ की मानसिकता वाले तथाकथित विद्वान हमारे प्राचीन ग्रन्थों की व्याख्या न करें तो हम उनके आभारी रहेंगे।

२+२ भी ४ के बराबर होता है, यह भी सत्य नहीं है। २+२, चार के सबसे ज्यादा करीब होता है। यह ३.९९९९९९९९९९९ भी हो सकता है और ४.०००००००००००००१ भी हो सकता है। इस विषय पर चर्चा फिर कभी।

 

समलैंगिक विवाह और सुप्रीम कोर्ट

 समलैंगिक विवाह और सुप्रीम कोर्ट

विभिन्न मत मतान्तरों के बावजूद भी दुनिया के सभी धर्म इस बात पर एकमत हैं कि इस ब्रह्मांड में एक सर्वशक्तिमान ईश्वर है, भले ही उसे किसी नाम से पुकारा जाय।इसी तरह दुनिया के सारे समुदायों  और धर्मों ने सृष्टि  को एक व्यस्थित ढंग से चलाने के लिये विवाह संस्था को मान्यता दी है। इसमें ध्यान देने की बात है कि विवाह सिर्फ पुरुष और स्त्री का ही हो सकता है क्योंकि सृष्टि चलाने के लिए यह अनिवार्य शर्त है। बिना विवाह के भी स्त्री-पुरुष के मिलन से सृष्टि चल सकती है लेकिन वह व्यवस्था  अराजक और आने वाली पीढ़ी के लिए विनाशक होगी। यही कारण है कि दुनिया के प्रत्येक भाग में विवाह संस्था को मान्यता दी गई है। सनातन धर्म में तो इसे जन्म जन्मान्तर का बंधन कहा गया है। हिन्दू विवाह पद्धति में कन्यादान के समय अपनी कन्या का हाथ वर के हाथ में देते हुए पिता यह मंत्र दुहराता है -- अहं सन्तानोत्पन्नार्थ त्वाम्‌ माम कन्या समर्पये। अर्थ है मैं तुम्हें सन्तान उत्पन्न करने के लिये अपनी कन्या समर्पित करता हूँ। विवाह कोई मौज-मस्ती का खेल नहीं है बल्कि परम पिता की सृष्टि को आगे बढ़ाने का एक परम पवित्र संस्कार है। पता नहीं यह छोटी सी बात सुप्रीम कोर्ट के तथाकथित विद्वान्‌ न्यायाधीशों की समझ में क्यों नहीं आ रही। उन्होंने हमारी सनातन परंपरा और मूल्यों को ध्वस्त करने की जैसे सौगंध ले रखी है। इस वाद के पहले सुप्रीम कोर्ट ने समलैगिक संबन्धों और बिना विवाह के Live in relation को मान्यता प्रदान कर रखी है जिसके परिणामस्वरूप लड़कियों के शरीर का उपयोग करके उसके शरीर को टुकड़े-टुकड़े करके चील-कौवों को खिलाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। पता नहीं अधार्मिक, अप्राकृतिक और अनैतिक संबन्धों को वैधता प्रदान करने में सुप्रीम कोर्ट को कौन सा आनन्द आ रहा है।

इस समय समलैंगिक  विवाह को वैधता प्रदान करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में नियमित बहस चल  रही है। भारत सरकार के सालिसिटर जनरल श्री तुषार मेहता से मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चन्द्रचूड़ स्वयं बहस कर रहे हैं। उनके तर्कों को पढ़ने-सुनने के बाद ऐसा लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को मान्यता देने का पहले ही मन बना रखा है। ज्ञात हो कि जस्टिस चन्द्रचूड़ के एक मित्र के बेटे ने जो दिल्ली का एक बहुत बड़ा वकील है, समलैंगिक विवाह कर रखा है और सुप्रीम कोर्ट की कालेजियम ने उसका नाम अपनी अनुशंसा के साथ सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के लिए सरकार के पास भेज रखा है। सरकार ने उसका नाम वापस कर दिया है। कोर्ट समलैंगिक विवाह को वैध घोषित कर अपनी खुन्नस निकाल सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह भारत और  सनातन धर्म के लिये अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

Sunday, September 11, 2022

अष्टावक्र -- अद्भुत ज्ञानी

 

अद्वितीय ज्ञानी अष्टावक्र

                                    विपिन किशोर सिन्हा

                                                ----

            यज्ञशाला में उपस्थित सभी ब्राह्मण अष्टावक्र की आकृति देख जोर से हँसे, परन्तु अष्टावक्र ने उधर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। शास्त्रार्थ आरंभ करने का प्रथम अवसर बन्दी को दिया गया -- विषय था -- अंकशास्त्र। बन्दी ने कहा --

            "अष्टावक्र! क्या यह सत्य नहीं है कि यह सृष्टि एक से संचालित होती है। एक ही अग्नि अनेक प्रकार से प्रकाशित होती है, एक सूर्य सारे जगत्‌ को प्रकाशित करता है, शत्रुओं को नाश करनेवाला देवराज इन्द्र एक ही वीर है तथा पितरों का ईश्वर यमराज भी एक ही है।”

            अष्टावक्र ने तत्क्षण कहा --

            "विद्वन्‌! आपके कथन से दो की महत्ता कम नहीं होती। इन्द्र और अग्नि -- ये दो देवता हैं, नारद और पर्वत -- ये देवर्षि भी दो हैं, दो ही अश्विनी कुमार हैं, रथ के पहिये भी दो होते हैं और विधाता ने पति और पत्नी -- ये सहचर भी दो बनाये हैं।”

            बन्दी ने अगला प्रश्न किया --

            "यह संपूर्ण प्रजा कर्मवश तीन प्रकार के जन्म धारण करती है, सभी कर्मों का प्रतिपादन भी तीन वेद ही करते हैं, अध्वर्युजन भी प्रातः, मध्याह्न, और सायं -- इन तीनों समय यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, कर्मानुसार भोगों को  प्राप्त करने के लिये स्वर्ग, मृत्यु और नरक -- ये तीन लोक भी तीन ही हैं तथा वेदों में कर्मजन्य ज्योतियाँ भी तीन ही हैं।“

            अष्टावक्र ने चार अंक की महत्ता बताई --

            "मनुष्यों के लिये आश्रम चार हैं, वर्ण भी चार हैं, ऊँकार के अकार, उकार, मकार और अर्द्धमात्रा -- ये चार ही वर्ण हैं तथा परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी भेद से वाणी भी चार ही प्रकार की मानी गई है।“

            बन्दी ने अगला प्रश्न किया --

            "यज्ञ की अग्नियाँ -- गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, सभ्य और आवसथ्व -- पाँच हैं, पंक्ति छन्द भी पाँच पदोंवाला है, यज्ञ भी -- अग्निहोत्र, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य और सोम -- पाँच ही प्रकार के हैं तथा संसार में पवित्र नद भी पाँच ही प्रसिद्ध हैं।“

            अष्टावक्र बोले --

            "वेदों में इस प्रकार वर्णन है कि अग्नि का आधान करते समय दक्षिणा में गौएँ छः ही देनी चाहिये, कालचक्र में ऋतुएँ भी छः ही रहती हैं, मनसहित ज्ञानेन्द्रियाँ भी छः ही हैं, कृत्तिकाएँ छः हैं तथा समस्त वेदों में साधक यज्ञ भी छः ही कहे गए हैं।“

            बन्दी -- "ग्राम्य पशु सात हैं, वन्य पशु भी सात हैं, यज्ञ को पूर्ण करनेवाले छन्द भी सात  हैं और वीणा के तार भी सात ही प्रसिद्ध हैं।“

            अष्टावक्र -- "सैकड़ों वस्तुओं का तौल करनेवाले शाण (तोल) के गुण आठ होते हैं, सिंह का नाश करनेवाले शरभ के चरण भी आठ होते हैं, देवताओं में वसु नामक देवताओं को भी आठ ही सुना है और सभी यज्ञों में यज्ञस्तंभ के कोण भी आठ ही कहे गये हैं।“

            बन्दी -- "पितृयज्ञ में समिधा छोड़ने के मंत्र नौ कहे गये हैं, सृष्टि में प्रकृति के विभाग भी नौ ही किये गये हैं, बृहती छन्द के अक्षर भी नौ ही हैं और जिनसे अनेकों प्रकार की संख्याएँ उत्पन्न होती हैं ऐसे एक से लेकर अंक भी नौ ही हैं।“

            अष्टावक्र -- "संसार में दिशाएँ दस हैं, सहस्र की संख्या भी सौ को दस बार गिनने से होती है, गर्भवती स्त्री भी गर्भधारण  दस मास ही करती है, तत्त्व का उपदेश करनेवाले भी दस हैं तथा पूजन योग्य भी दस ही हैं।“

            बन्दी -- "पशुओं के शरीर में ग्यारह विकारोंवाली इन्द्रियाँ ग्यारह होती हैं, यज्ञ के स्तंभ ग्यारह होते हैं, प्राणियों के विकार भी ग्यारह हैं तथा देवताओं में रुद्र भी ग्यारह ही कहे गये हैं।“

            अष्टावक्र -- "एक वर्ष में महीने बारह होते हैं, जगती छन्द के चरणों में भी बारह ही अक्षर होते हैं, प्राकृत यज्ञ बारह दिन का ही कहा गया है और धीर पुरुषों ने आदित्य भी बारह ही कहे हैं।“

                --शेष अगले समापन अंक में

अष्टावक्र -- अद्भुत ज्ञानी

 

अद्वितीय ज्ञानी अष्टावक्र

                                    विपिन किशोर सिन्हा

                                                                        --२--

 

            मिथिला में राजा जनक अपने मुख्य पुरोहित बन्दी की देखरेख में ‘समृद्धि संपन्न यज्ञ’ कर रहे थे। अष्टावक्र अपने मामा के साथ राज महल के द्वार पर पहुँचे और द्वारपाल को राजा से मिलने की अपनी इच्छा से अवगत कराया। द्वारपाल ने प्रणाम करते हुए कहा --

            "हे ऋषिवर! राजाज्ञा के अनुसार हर किसी को यज्ञशाला में प्रवेश की अनुमति नहीं है। उसमें केवल वृद्ध और विद्वान्‌ ब्राह्मण ही प्रवेश पा सकते हैं।“

            अष्टावक्र ने द्वारपाल को समझाते हुए कहा --

            "द्वारपाल! मनुष्य अधिक उम्र या बाल पक जाने से वृद्ध या परिपक्व नहीं हो जाता। ब्राह्मणों में वही बड़ा माना जाता है जो वेदों का सच्चा ज्ञाता हो -- ऐसा ऋषि-मुनियों का मत है। मैं राजपुरोहित बन्दी से शास्त्रार्थ करने के  लिये लंबी यात्रा करके आया हूँ। तुम महाराज को यह सूचना दे दो।“

            अष्टावक्र के उत्तर से प्रभावित हो, द्वारपाल उन्हें राजा के पास ले गया। राजा जनक द्वारा आगमन का प्रयोजन पूछे जाने पर अष्टावक्र ने कहा --

            "राजन्‌! आप एक धर्मपारायण, कर्त्तव्यनिष्ठ और चक्रवर्ती सम्राट हैं। आपकी सहमति से आपके राजपुरोहित बन्दी ने यह कैसा नियम बना रखा है कि जो भी विद्वान्‌ उससे शास्त्रार्थ में पराजित हो जायेगा, उसे जल में डुबो दिया जायेगा? मैं उससे शास्त्रार्थ करके उसे पराजित करना चाहता हूँ। आप अनुमति प्रदान करें।"

            राजा आठों अंगों से टेढ़े अष्टावक्र को देखकर विस्मित हुए परन्तु उनकी वाणी के ओज से प्रभावित भी हुए। उन्होंने पहले स्वयं परीक्षा लेने का निर्णय लिया और पूछा --

            "ब्रह्मन्‌! जो पुरुष तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अरों वाले पदार्थ को जानता है, वह बड़ा विद्वान्‌ है?"

            अष्टावक्र ने उत्तर दिया --

            "राजन्‌! जिसमें पक्षरूप में चौबीस पर्व, ऋतुरूप छः नाभि, मासरूप बारह अंश और दिनरूप तीन सौ साठ अरे हैं, वह निरन्तर घूमनेवाला संवत्सररूप कालचक्र आपकी रक्षा करे।"

            अष्टावक्र के उत्तर से प्रभावित राजा ने दूसरा प्रश्न किया --

            "सोने के समय कौन नेत्र नहीं मूँदता? जन्म लेने के बाद किसमें गति नहीं होती? हृदय किस में नहीं होता और वेग से कौन बढ़ता है?

            अष्टावक्र ने उत्तर दिया --

            "मछली सोने के समय नेत्र नहीं मूँदती, अंडा उत्पन्न होने पर भी चेष्टा नहीं करता, पत्थर में हृदय नहीं होता और नदी वेग से बहती है।"

            आश्चर्य से राजा जनक की आँखें फटी की फटी रह गईं। वे अष्टावक्र की विद्वता का लोहा मान गये। उन्होंने बन्दी से शास्त्रार्थ की अनुमति प्रदान कर दी। यज्ञशाला में बन्दी और अष्टावक्र के बीच शास्त्रार्थ आरंभ हुआ। निर्णायक स्वयं राजा जनक थे।

            --- शेष अगले अंक में

 

अष्टावक्र -- अद्भुत ज्ञानी

अद्वितीय ज्ञानी अष्टावक्र

                                    विपिन किशोर सिन्हा

                                                                                    --१--

            रूप और सौन्दर्य मनुष्य का वाह्य आवरण होता है तथा ज्ञान उसका आन्तरिक अलंकार। महान्‌ ज्ञानी ऋषि अष्टावक्र आन्तरिक अलंकार से युक्त एक अद्भुत विद्वान्‌ थे। वेदों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता महर्षि उद्दालक उनके नाना थे और उद्भट विद्वान्‌ श्वेतकेतु उनके मामा। अपने पिता के आश्रम में रहते हुए महर्षि श्वेतकेतु को मानवी के रूप में साक्षात्‌ देवी सरस्वती के दर्शन हुए थे। महर्षि अष्टावक्र ने नाना उद्दालक और मामा श्वेतकेतु से ही सारी विद्यायें और सारा ज्ञान प्राप्त किया था।

            महर्षि उद्दालक के आश्रम में कहोड नाम का एक ब्राह्मण शिक्षा प्राप्त कर रहा था। वह अत्यन्त मेधावी, परिश्रमी, अनुशासनप्रिय और गुरुभक्त था। उसने अल्प काल में ही अपने गुरु से वेद-वेदान्तों की शिक्षा प्राप्त कर ली। वह महर्षि उद्दालक का प्रिय शिष्य बन गया। महर्षि ने उसे हर दृष्टि से योग्य पाकर अपनी कन्या सुजाता का ब्याह उससे कर दिया। कहोड सर्वगुण संपन्न था, परन्तु अहंकार पर विजय प्राप्त नहीं कर पाया था।

            उचित समय पर सुजाता गर्भवती हुई। उसका गर्भ अग्नि के समान तेजस्वी था। एक दिन उसके पति ऋषि कहोड आश्रम में अपने शिष्यों को वेदपाठ करा रहे थे। पत्नी सुजाता भी पास में ही बैठी थी। वह अपने पुत्र को गर्भ में ही ज्ञानी बनाने के लिये संकल्पबद्ध थी। महर्षि कहोड स्वयं भी वेदपाठ कर रहे थे। गर्भ में सुन रहा अष्टावक्र बोल पड़ा --

            "पिताजी! आप सदैव वेदपाठ करते हैं, परन्तु आपका उच्चारण अशुद्ध होता है।“

            सभी शिष्यों के समक्ष गर्भस्थ शिशु की यह उक्ति सुन गुरु कहोड का अहंकार आहत हो गया। वे क्रोध से उबल पड़े और अपने ही गर्भस्थ शिशु को शाप दे डाला --

                        "तू गर्भ में रहकर भी टेढ़ी-मेढ़ी बात करता है। जैसी तेरी बातें हैं, तेरे अंग भी वैसे ही हो जायेंगे। तेरे अंग आठ स्थान से टेढ़े होंगे और तेरा नाम अष्टावक्र होगा।“

            ऋषि की वाणी सत्य सिद्ध हुई। सुजाता ने जिस शिशु को जन्म दिया, वह आठों अंगों से टेढ़ा था। नामकरण तो पहले ही हो चुका था -- अष्टावक्र

            राजा जनक मिथिला के राजा थे। उनके दरबार में बन्दी नाम का एक उद्भट ज्ञानी एवं तर्कशास्त्री विद्वान्‌ रहता था। वह उनका मुख्य पुरोहित था एवं उनक विशेष कृपापात्र था। उसे अपने ज्ञान का अत्यधिक अहंकार था। वह स्वयं को पृथ्वी का सबसे बड़ा ज्ञानी और तर्कशास्त्री मानता था। कोई भी विद्वान्‌ शास्त्रार्थ में उसके सामने ठहर नहीं पाता था। अपनी लगातार सफलता से उत्साहित होकर उसने एक राजाज्ञा पारित करा दी थी कि इस पृथ्वी का जो भी विद्वान्‌ शास्त्रार्थ में उसे पराजित कर देगा, उसे मनोवांछित धन प्रदान किया जायेगा और पराजित होने की दशा में बन्दी जल समाधि ले लेगा। परन्तु चुनौती देनेवाला विद्वान्‌ अगर बन्दी से पराजित होगा, तो उसे अनिवार्य रूप से जल समाधि लेनी पड़ेगी। अनेक विद्वान्‌ धन के लोभ में मिथिला आये और बन्दी से शास्त्रार्थ में पराजित होने के बाद मृत्यु को प्राप्त हुए।

            अष्टावक्र के जन्म के बाद परिवार चलाने के लिये अतिरिक्त धन की आवश्यकता थी। ऋषि कहोड को अपने ज्ञान और अपनी विद्वता पर अत्यधिक अभिमान और विश्वास था। उन्होंने बन्दी को हराकर धनप्राप्ति का निर्णय लिया। महर्षि उद्दालक और सुजाता उहें रोकते रहे, परन्तु वे मिथिला के  लिये चल  पड़े। मिथिला पहुँचकर उन्होंने बन्दी को शास्त्रार्थ की चुनौती दी। शास्त्रार्थ कई दिनों तक चला, परन्तु अन्तिम विजय बन्दी को ही मिली। ऋषि कहोड को जल समाधि लेनी पड़ी।

            अष्टावक्र जब बारह वर्ष के थे, तो उहें यह कहानी ज्ञात हुई। उहोंने बाल्यकाल में ही अपने नाना उद्दालक और मामा श्वेतकेतु के सान्निध्य में वेद-वेदांगों का सांगोपांग अध्ययन पूरा कर लिया था। उनकी तर्कशक्ति अद्भुत थी। वे अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिये विकल थे। एक दिन उन्होंने अपने पूज्य नाना और पूज्या माता से अनुमति प्राप्त कर मामा श्वेतकेतु के साथ मिथिला के लिये प्रस्थान कर ही दिया।

        -- शेष अगले अंक में


Saturday, June 18, 2022

मुसलमानों से अपील

          स्पेन यूरोप का एक समृद्ध् रोमन कैथोलिक देश था। था तो यह एक प्रायद्वीप लेकिन इसकी दक्षिणी सीमा के पास ही उत्तरी अफ़्रिका था, जो उस समय तक पूरी तरह एक इस्लामी साम्राज्य बन चुका था। सन्‌ ७११ में उत्तरी अफ़्रिका के मुस्लिम शासक ने स्पेन पर, जिसे उस समय आइबेरियन प्रायद्वीप कहा जाता था, पर इस्लाम की विस्तारवादी नीतियों के तहत आक्रमण कर दिया।आज का पुर्तगाल भी उस समय आइबेरियन प्रायद्वीप का हिस्सा था। सात साल तक चले लंबे युद्ध के बाद मुस्लिम शासकों ने स्पेन पर कब्ज़ा कर लिया। स्पेन के मूल निवासी ईसाई थे और कुछ संख्या यहुदियों की भी थी। मुस्लिम शासन के दौरान दोनों समुदायों के मतावलंबी दोयम दर्ज़े के नागरिक बन गए। उनकी धन-संपत्ति और औरतों पर मुसलमानों ने जबरन अधिकार करना शुरु कर दिया। स्पेन की औरतें बहुत सुंदर होती हैं। उन्हें पाने के लिए मुसलमानों ने चार-चार शादियाँ आरंभ कर दी। गैर मुस्लिम जनता भय से ग्रस्त और त्रस्त थी। अपनी माँ-बहन-बेटियों और जान-माल की रक्षा के लिए अधिकांश आबादी ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। उनके पुराने चर्च और ऐतिहासिक स्मारक तोड़ दिए गए और उनके स्थान पर मस्ज़िदों का निर्माण कराया गया। इन सारी घटनाओं के कारण धर्म परिवर्तन के बाद भी स्पेनवासियों के हृदय में विद्रोह की आग सुलगती रही। जब सारा स्पेन इस्लाम स्वीकार कर रहा था, तभी कुछ देशभक्त और स्वाभिमानी ईसाइयों ने स्पेन के उत्तरी भाग में, जो दुर्गम पहाड़ियों से घिरा है, शरण ली और भारत के महाराणा प्रताप की तरह सदियों तक युद्ध करते रहे। उनका संपर्क स्पेन के मुख्य भाग के नागरिकों से निरन्तर बना रहा। जब-जब स्पेन के प्राचीन धरोहरों, चर्चों और धार्मिक प्रतीकों को नष्ट करके मस्ज़िदें बनाई जाती थीं, स्पेन का स्वाभिमान आहत होता था, जो सन्‌ १४९२ में खुले विद्रोह के रूप में सामने आया और सन्‌ १५०२ में इसका परिणाम स्पेन से इस्लाम की विदाई के रूप में फलित हुआ स्पेनवासियों ने अपना पुराना ईसाई धर्म पुनः अपना लिया और स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वयं को स्थापित किया। आज वहाँ ईसाइयों की आबादी ९७% है।

                        भारत में इस्लाम की कहानी स्पेन से मिलती-जुलती है। यहाँ के मुसलमान भी मूलतः हिन्दू हैं। श्रीराम, श्रीकृष्ण और श्री शंकर उनके भी पूर्वज हैं। उनके पूर्वजों के पवित्र धर्मस्थलों को नष्ट कर उनके स्थान पर बनाई गईं मस्ज़िदों को देखकर उनक स्वाभिमान भी आहत होना चाहिए, उन्हें भी वेदना होनी चाहिए।

                        भारत के मुसलमानो! जागो। इतिहास और सत्य को स्वीकार करो। अपनी खोई हुई पहचान प्राप्त करो। अपनी जड़ों की ओर लौट आओ जो गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी आदि पवित्र नदियों के जल से सिंचित होती हैं। भारत माता तुम्हारी भी माँ हैं। इनकी चरणों में बैठकर अपने पूर्वजों का ध्यान करो। उज्ज्वल भविष्य तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। समय और अवसर बार-बार नहीं आते। इसका उपयोग करो। हिन्दुस्तान ही नहीं, पाकिस्तान और बांग्ला देश भी तुम्हारा है।

                                                वन्दे मातरम्‌ ! !

कम्युनिज़्म और इस्लाम

         एक समय था, जब कम्युनिज़्म ने विश्व के एक बड़े भूभाग पर आधिपत्य जमा रखा था। सोवियत रुस के नेतृत्व में इस विचारधारा ने पूर्वी यूरोप, एशिया और अमेरिका के कई देशों में अपनी सरकारें बना ली थी। इस विचारधारा का प्रसार वैचारिक आदान-प्रदान से कम और बन्दूक की नोक पर अधिक हुआ था। इसको माननेवाले कार्ल मार्क्स को अपना मसीहा और लाल किताब को अपना धर्मग्रन्थ मानते थे। वे लोग वैचारिक मतभेद रखनेवाले दूसरे लोगों को बर्दाश्त नहीं करते थे। कम्युनिज़्म के नाम पर लाखों हत्यायें हुईं। चूंकि यह विचारधारा मानव के मूल स्वभाव और मानवता के प्रतिकूल थी, इसलिये सोवियत संघ के बिखराव के बाद विश्व से लुप्तप्राय हो गई।

कम्युनिज़्म की तरह ही इस्लाम भी सत्ता-प्राप्ति के लिये एक राजनीतिक अभियान है। कम्युनिस्ट कहते थे -- दुनिया के मज़दूरो! एक हो जाओ और पूरे विश्व में कम्युनिज़्म को स्थापित कर दो। इसी तर्ज़ पर इस्लाम के अनुयायी कहते हैं -- दुनिया के मुसलमानो! एक हो जाओ और पूरी दुनिया में इस्लाम को स्थापित कर दो। इसके लिये कोई भी उचित/अनुचित तरीका अपनाने की उहें पूरी छूट है। वे भी एक ही किताब और एक ही मसीहा से मार्गदर्शन पाते हैं। इस्लाम को न माननेवाले उनकी दृष्टि में काफ़िर हैं, जिन्हें समाप्त करने या इस्लाम स्वीकार कराने के लिए उन्हें यातना देना, हत्या कर देना, उनके माल-असबाब और उनकी औरतों पर कब्ज़ा कर लेना धर्मसंगत है। इसी आधार पर तलवार की धार के बल पर इस्लाम का विस्तार हुआ। यही कारण है कि इस्लामी जगत में इस्लामी आतंकवाद का विरोध नहीं होता है और इसे ज़िहाद के नाम से ख्याति दिलाई जाती है। इस्लाम में तर्क और विचार-विमर्श की गुंजाइश नहीं है। यह धर्म नहीं, राजनीतिक अभियान है जो मानवता विरोधी होने के कारण समय के प्रवाह में प्राकृतिक न्याय के अनुसार उसी गति को प्राप्त होगा जिसे कम्युनिज़्म ने प्राप्त किया। अति सर्वत्र वर्जयेत।

Wednesday, July 8, 2020

एक पाती प्रियंका वाड्रा गांधी के नाम



 प्रिय पिंकी बचिया,
   बनारसी चाचा के प्यार-दुलार कुबुल करो।
      आगे समाचार इ हौ कि आजकल योगीजी पर तोहरे ट्विट के काफी चर्चा हो रही है। तुम योगीजी पर सोते-जागते, उठते-बैठते रोजे ट्विट कर रही हो। इ ठीक नाहिं बा। बिटिया, एगो जवान मेहरारू के पराये पुरुष से हमेशा ट्विटिंग में उलझे रहना नीक काम नाहि है। तुम योगीजी को ठीक से समझ नहीं पा रही हो। उ कोई दिग्विजय सिंह, अभिषेक मनु सिंघवी, नारायाण दत्त तिवारी या अहमद पटेल नहीं हैं। उनुकरा सोझा अगर मेनका भी आ जैहें, तबो उनुकरा पर कौनो असर नाहिं पड़ेगा। तू आपन ध्यान अपना लड़िका-फड़िका आउर घर-गृहस्थी में लगाओ तो ज्यादा अच्छा रहेगा। रुपया पैसा, महल-बंगला के त तोहरा लगे कौनो कमी है नहीं। २-जी, ३जी, कोयला, बोफ़ोर्स आउर हेलिकोप्टर घोटाला के पैसा तोहरा महतारी के पास एतना है कि तुम्हारी सात पीढ़ी भी बैठकर खाएगी, तबो नहीं ओरायेगा। ऊपर से राजीव गांधी फाउंडेशन तो है ही। जमीन के खरीद-बिक्री में त तोहार मरद माहिरे हैं, भविष्य की चिन्ता काहे करती हो? इ बात जरूर है कि मोदीजी के रहते चीन और पाकिस्तान से जर-जमीन के कौनो सौदा ना हो पाई। ऐसी स्थिति में धैर्य रखना ज्यादा उचित होगा। घूरे के भी दिन फिरते हैं। का पता लोकतंत्रिक भारत में तोहार परिवार के भी दिन कहियो फिर जाय! अपना भैयवा आउर महतारी के कुछ अक्ल काहे नहीं दे रही हो? हिन्दुस्तानी गदहा की उमर औसतन तेरह साल की होती है। तोहार परिवार के ..हवा के उमिर त पचास साल हो गईल। फिर भी उ कोरोना के पहिले से ही दिमाग और सिर से सोसल डिस्टैंस क्यों मेंटेन कर रहा है। चीन आउर पाकिस्तान के हाथे हिन्दुस्तान के हत्या करावे के तोहार परिवार सुपारी तो नहीं लिया है? अब जबकि तोहरे परिवार के एक पैर जेल में आ एक पैर बाहर बा त, अइसन नासमझी बहुते महंगा पड़ सकता है। अब उ जमाना गया जब तोहरे परिवार की तूती बोलती रही और प्रधान मन्त्री भी तोहरी महतारी के आगे हाथ जोड़कर खड़े रहते थे। एकर ध्यान रखना कि तोहर मरद सहित तुम सभी लोग बेल पर हो।
      हम इ त मानता हूं कि तोहर माई इटली में पैदा हुई। उनसे देशभक्ति की आशा करना बेवकूफ़ी होगी, लेकिन तुम और तुम्हारे भैया पप्पू तो भारत की मिट्टी में ही पैदा हुए, भ्रष्टाचार का ही सही, यहीं का अन्न-जल खा-पीकर बड़े हुए; फिर चीन और पाकिस्तान की दलाली काहे करते हो? देश आज कठिन परिस्थिति से गुजर रहा है। एक तरफ कोरोना माई हाथ में खप्पर लेकर हाहाकार मचाई हैं तो दूसरी तरफ चीन देश का भूगोल बदलने पर ही आमादा है। ऐसे में एक तुमलोग हो जो सरकार और सेना की स्ट्रेटजी जानने के लिए बेताब हो। अरे चीन और पाकिस्तान के करोड़ों जासूस पहिलवें ए देश में मौजूद हैं।  उनको सारी सूचनाएं पहले ही मिल जाती हैं। तुम्हारे बाप के नाना, तुम्हारे बाप और तुम्हारी माई ने इसकी पुख्ता व्यवस्था पहले ही कर दी है। चीनी दूतावास में रात के अंधेरे में भाई, पति और बच्चों के साथ डिनर करने से कौनो फरक नहीं पड़ता है। खामख्वाह जनता की आंख की किरकिरी बनने से का फायदा? समाचार पत्रन में खबर रहे कि तू अपना बेटवा के नाम बदलकर उसमें गांधी जोड़ दी हो। अब उ रेहान वाड्रा गांधी हो गया है। इ काम समझदारी का रहा। रेहान के कारण मुसलमान उसे मुस्लिम समझेंगे, वाड्रा के कारण ईसाई और गांधी के कारण हिन्दू उसे हिन्दू समझेंगे। वैसे भी तुमलोगों की धमनियों में हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई का कंबाइंड खून पहिलवे से है। चुनाव में उसके हिन्दू होने पर यदि भाजपाई चूं-चपड़ करें तो कोट के ऊपर से जनेऊ पहना देना। पप्पू भैया अच्छा रास्ता दिखा गए हैं।
      तोहरा सेहत के वास्ते हम हमेशा संवेदनशील रहता हूं। इ कोरोना के समय दिल्ली में का कर रही हो। केजरीवलवा तोहरे घर तक कोरोना पहुंचाने में कोई कमी नहीं छोड़ेगा। एक बार पकड़ लेगा तो चीनी दूतावास भी कोई मदद नहीं करेगा। जिंग शिंग भी हाथ खड़े कर देगा। शिमला में महल आखिर कौने दिन वास्ते बनवाई हो। हिमालय की गोद में आराम से रहो। उहां से चीन भी नजदीके पड़ेगा। एक ठे सलाह आउर दे रहा हूं – कबहूं गलती से भी बाबा रामदेव का कवनो सौन्दर्य प्रसाधन यूज मत करिह। बबवा कोरोना का भी दवाई बनाया है। अब अगर भारत से कोरोना भाग जाय आउर चीन भी बार्डर से भाग जाय तो, कांग्रेस की तो दुकनवे बन्द हो जाएगी। होशियार रहना, बाबा के साबुन से नहाते ही देशप्रेम का कीड़ा दिमाग में घुस जाता है। उसका योग-प्राणायाम भी तुम्हारे अति कोमल गात के लिए सुटेबुल नहीं है।
      अब पाती बन्द करता हूं। थोड़ा लिखना, ज्यादा समझना। कभी-कभार जरुरत पड़े तो चाइनिज मोबाइल से फोन करके नि:शुल्क सलाह लेती रहना।
      भौजी को राम-राम आउर ..हा भतीजा को प्यार-दुलार कह देना। एक ठे बात तो रह ही गया। जमाई राजा से कह देना की डीएलएफ की तरह चीन से जमीन का सौदा करने का कवनो विचार मन में नहीं लावे, भले ही उसमें अरबों-खरबों का फायदा हो।
    इति शुभ,
            तोहार
          चाचा बनारसी

चीन अश्वत्थामा है


अश्वत्थामा द्रोणाचार्य का पुत्र था और कौरवों तथा पाण्डवों के साथ ही उसने अपने पिता द्रोणाचार्य से शस्त्र-विद्या की शिक्षा ली थी। द्रोणाचार्य ने ब्रह्मास्त्र की शिक्षा केवल अर्जुन को ही दी थी। अश्वत्थामा और कर्ण को उन्होंने ब्रह्मास्त्र की शिक्षा नहीं दी थी क्योंकि वे इन्हें ब्रह्मास्त्र के लिए उचित पात्र नहीं मानते थे। कर्ण और अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र के लिए गुरु द्रोण से बार-बार आग्रह करते रहे लेकिन उन्होंने इन दोनों को ब्रह्मास्त्र के संचालन और सन्धान की शिक्षा देने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। कर्ण ने बाद में झूठ बोलकर परशुराम की शिष्यता ग्रहण की और ब्रह्मास्त्र का ग्यान प्राप्त किया। झूठ पकड़े जाने पर परशुराम ने कर्ण को शाप दिया था कि ऐन मौके पर वह ब्रह्मास्त्र का संचालन भूल जाएगा। लेकिन अश्वत्थामा अपने पिता से ही ब्रह्मास्त्र की शिक्षा ग्रहण करने की ज़िद पर अड़ा रहा। उसने अपनी माता के माध्यम  से द्रोणाचार्य को मनाने का प्रयास किया लेकिन असफल रहा। अन्त में उसने पिता द्वारा ब्रह्मास्त्र नहीं सिखाने के कारण आत्महत्या करने की धमकी दी। पुत्र-मोह के कारण द्रोणाचार्य को झुकना पड़ा और उन्होंने  न चाहते हुए भी अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र की शिक्षा दे डाली।
महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद भी अश्वत्थामा ने रात में सोते हुए द्रौपदी-पुत्रों का वध कर दिया। उसको पकड़ने और दंडित करने के लिए भीम और अर्जुन ने अश्वत्थामा की खोज की। जब वह अर्जुन के सामने पड़ा तो बचने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग कर दिया। श्रीकृष्ण की सलाह पर अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। दोनों के द्वारा प्रक्षेपित ब्रह्मास्त्र आकाश में टकराए और फलस्वरूप सृष्टि के तबाह होने की स्थिति आ गई। महर्षि व्यास समेत ऋषि-मुनियों ने दोनों से ब्रह्मास्त्र वापस लेने का अनुरोध किया। अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया लेकिन अश्वत्थामा ने यह बहाना करके कि उसे ब्रह्मास्त्र को लौटाना नहीं आता अपना ब्रह्मास्त्र वापस नहीं किया। ऋषियों ने बहुत अनुनय-विनय किया लेकिन उसने अपना ब्रह्मास्त्र वापस नहीं लिया। अन्त में ऋषियों ने उससे आग्रह किया कि वह अपने ब्रह्मास्त्र का लक्ष्य इस तरह निर्धारित करे कि कम से कम क्षति हो। दुष्ट अश्वत्थामा ने अभिमन्यु के गर्भ में पल रहे शिशु को नष्ट करने के लिए उसे उत्तरा के गर्भ को निशाना बनाया। शिशु गर्भ में ही मर गया। बाद में श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से मृत शिशु को जीवित कर दिया। द्रोणाचार्य सच ही कहते थे थे कि अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र का पात्र नहीं था।
चीन भी कलियुग का अश्वत्थामा है। यद्यपि उसने गलवान घाटी और लद्दाख से अपनी सेना हटाने के लिए अपनी सहमति दे दी है। सेनाएं पीछे हट भी रही है लेकिन अश्वत्थामा की तरह कभी भी भारत को धोखा दे सकता है। पूरी दुनिया जानती है कि चीन समझौता तोड़ने के लिए कुख्यात है। इसलिए भारत को सदैव सजग रहना होगा। कोरोना वायरस और भारत की सीमा पर अतिक्रमण के कारण चीन पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है। अपनी खीझ मिटाने के लिए वह कभी भी आक्रमण कर सकता है। इसलिए भारत को हमेशा उच्च स्तरीय सावधानी बरतने की परम आवश्यकता है।

Tuesday, July 7, 2020

एक पाती प्रियंका वाड्रा गांधी के नाम



 प्रिय पिंकी बचिया,
   बनारसी चाचा के प्यार-दुलार कुबुल करो।
      आगे समाचार इ हौ कि आजकल योगीजी पर तोहरे ट्विट के काफी चर्चा हो रही है। तुम योगीजी पर सोते-जागते, उठते-बैठते रोजे ट्विट कर रही हो। इ ठीक नाहिं बा। बिटिया, एगो जवान मेहरारू के पराये पुरुष से हमेशा ट्विटिंग में उलझे रहना नीक काम नाहि है। तुम योगीजी को ठीक से समझ नहीं पा रही हो। उ कोई दिग्विजय सिंह, अभिषेक मनु सिंघवी, नारायाण दत्त तिवारी या अहमद पटेल नहीं हैं। उनुकरा सोझा अगर मेनका भी आ जैहें, तबो उनुकरा पर कौनो असर नाहिं पड़ेगा। तू आपन ध्यान अपना लड़िका-फड़िका आउर घर-गृहस्थी में लगाओ तो ज्यादा अच्छा रहेगा। रुपया पैसा, महल-बंगला के त तोहरा लगे कौनो कमी है नहीं। २-जी, ३जी, कोयला, बोफ़ोर्स आउर हेलिकोप्टर घोटाला के पैसा तोहरा महतारी के पास एतना है कि तुम्हारी सात पीढ़ी भी बैठकर खाएगी, तबो नहीं ओरायेगा। ऊपर से राजीव गांधी फाउंडेशन तो है ही। जमीन के खरीद-बिक्री में त तोहार मरद माहिरे हैं, भविष्य की चिन्ता काहे करती हो? इ बात जरूर है कि मोदीजी के रहते चीन और पाकिस्तान से जर-जमीन के कौनो सौदा ना हो पाई। ऐसी स्थिति में धैर्य रखना ज्यादा उचित होगा। घूरे के भी दिन फिरते हैं। का पता लोकतंत्रिक भारत में तोहार परिवार के भी दिन कहियो फिर जाय! अपना भैयवा आउर महतारी के कुछ अक्ल काहे नहीं दे रही हो? हिन्दुस्तानी गदहा की उमर औसतन तेरह साल की होती है। तोहार परिवार के ..हवा के उमिर त पचास साल हो गईल। फिर भी उ कोरोना के पहिले से ही दिमाग और सिर से सोसल डिस्टैंस क्यों मेंटेन कर रहा है। चीन आउर पाकिस्तान के हाथे हिन्दुस्तान के हत्या करावे के तोहार परिवार सुपारी तो नहीं लिया है? अब जबकि तोहरे परिवार के एक पैर जेल में आ एक पैर बाहर बा त, अइसन नासमझी बहुते महंगा पड़ सकता है। अब उ जमाना गया जब तोहरे परिवार की तूती बोलती रही और प्रधान मन्त्री भी तोहरी महतारी के आगे हाथ जोड़कर खड़े रहते थे। एकर ध्यान रखना कि तोहर मरद सहित तुम सभी लोग बेल पर हो।
      हम इ त मानता हूं कि तोहर माई इटली में पैदा हुई। उनसे देशभक्ति की आशा करना बेवकूफ़ी होगी, लेकिन तुम और तुम्हारे भैया पप्पू तो भारत की मिट्टी में ही पैदा हुए, भ्रष्टाचार का ही सही, यहीं का अन्न-जल खा-पीकर बड़े हुए; फिर चीन और पाकिस्तान की दलाली काहे करते हो? देश आज कठिन परिस्थिति से गुजर रहा है। एक तरफ कोरोना माई हाथ में खप्पर लेकर हाहाकार मचाई हैं तो दूसरी तरफ चीन देश का भूगोल बदलने पर ही आमादा है। ऐसे में एक तुमलोग हो जो सरकार और सेना की स्ट्रेटजी जानने के लिए बेताब हो। अरे चीन और पाकिस्तान के करोड़ों जासूस पहिलवें ए देश में मौजूद हैं।  उनको सारी सूचनाएं पहले ही मिल जाती हैं। तुम्हारे बाप के नाना, तुम्हारे बाप और तुम्हारी माई ने इसकी पुख्ता व्यवस्था पहले ही कर दी है। चीनी दूतावास में रात के अंधेरे में भाई, पति और बच्चों के साथ डिनर करने से कौनो फरक नहीं पड़ता है। खामख्वाह जनता की आंख की किरकिरी बनने से का फायदा? समाचार पत्रन में खबर रहे कि तू अपना बेटवा के नाम बदलकर उसमें गांधी जोड़ दी हो। अब उ रेहान वाड्रा गांधी हो गया है। इ काम समझदारी का रहा। रेहान के कारण मुसलमान उसे मुस्लिम समझेंगे, वाड्रा के कारण ईसाई और गांधी के कारण हिन्दू उसे हिन्दू समझेंगे। वैसे भी तुमलोगों की धमनियों में हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई का कंबाइंड खून पहिलवे से है। चुनाव में उसके हिन्दू होने पर यदि भाजपाई चूं-चपड़ करें तो कोट के ऊपर से जनेऊ पहना देना। पप्पू भैया अच्छा रास्ता दिखा गए हैं।
      तोहरा सेहत के वास्ते हम हमेशा संवेदनशील रहता हूं। इ कोरोना के समय दिल्ली में का कर रही हो। केजरीवलवा तोहरे घर तक कोरोना पहुंचाने में कोई कमी नहीं छोड़ेगा। एक बार पकड़ लेगा तो चीनी दूतावास भी कोई मदद नहीं करेगा। जिंग शिंग भी हाथ खड़े कर देगा। शिमला में महल आखिर कौने दिन वास्ते बनवाई हो। हिमालय की गोद में आराम से रहो। उहां से चीन भी नजदीके पड़ेगा। एक ठे सलाह आउर दे रहा हूं – कबहूं गलती से भी बाबा रामदेव का कवनो सौन्दर्य प्रसाधन यूज मत करिह। बबवा कोरोना का भी दवाई बनाया है। अब अगर भारत से कोरोना भाग जाय आउर चीन भी बार्डर से भाग जाय तो, कांग्रेस की तो दुकनवे बन्द हो जाएगी। होशियार रहना, बाबा के साबुन से नहाते ही देशप्रेम का कीड़ा दिमाग में घुस जाता है। उसका योग-प्राणायाम भी तुम्हारे अति कोमल गात के लिए सुटेबुल नहीं है।
      अब पाती बन्द करता हूं। थोड़ा लिखना, ज्यादा समझना। कभी-कभार जरुरत पड़े तो चाइनिज मोबाइल से फोन करके नि:शुल्क सलाह लेती रहना।
      भौजी को राम-राम आउर ..हा भतीजा को प्यार-दुलार कह देना। एक ठे बात तो रह ही गया। जमाई राजा से कह देना की डीएलएफ की तरह चीन से जमीन का सौदा करने का कवनो विचार मन में नहीं लावे, भले ही उसमें अरबों-खरबों का फायदा हो।
    इति शुभ,
            तोहार
          चाचा बनारसी

Wednesday, June 26, 2019

आपात्काल : स्वतन्त्र भारत का काला इतिहास


जो देश अपने इतिहास को भूल जाता है, उसका भूगोल भी बदल जाता है। हमारे देश का भूगोल बार-बार इसलिए बदला कि हम अपने इतिहास से कोई सबक नहीं ले पाए, बल्कि उसे भूल भी गए। कांग्रेसियों और वामपन्थियों ने हमारी पाठ्य पुस्तकों और इतिहास में सप्रयास इतनी झूठी बातें लिखीं और फैलाई कि नई पीढ़ी में हमेशा के लिए एक हीन भावना जागृत हो गई। पिछले पांच वर्षों में नई पीढ़ी महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, रानी लक्ष्मी बाई का नाम तो जान गई है लेकिन उसे यह नहीं पता कि वे कब और कैसे अपने ही लोगों के षडयंत्र के शिकार हुए। मान सिंह, महाराणा प्रताप के रिश्तेदार थे, लेकिन निजी स्वार्थों के कारण पहले उन्होंने अपनी बहन की शादी अकबर से कराकर, अकबर का विश्वास अर्जित किया फिर चित्तौड़ पर चढ़ाई करके महाराणा प्रताप को बेघर किया। वामपन्थियों ने मान सिंह को तथाकथित गंगा-जमुनी संस्कृति का सबसे बड़ा पोषक करार दिया है और इस घटना को सदियों पहले भारत में धर्म निरपेक्षता का प्रमाण बताया है। वीर शिवाजी को धोखे से दिल्ली बुलाकर उन्हें औरंगज़ेब द्वारा गिरफ़्तार कर कारागार में डालने के सूत्रधार और कोई नहीं मिर्ज़ा राजा जयसिंह थे। अंग्रेजों के दांत खट्टे कर देने वाली अद्भुत वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई ने झांसी छोड़ ग्वालियर की ओर कूच करने के पूर्व सिन्धिया परिवार के ग्वालियर के तात्कालीन राजा को पत्र लिखकर स्वतन्त्रता संग्राम में सहायता देने का आग्रह किया था। महारानी झांसी की हस्तलिपि में लिखा वह पत्र आज भी ग्वालियर के राज महल के संग्रहालय में सुरक्षित है। उस ऐतिहासिक पत्र के उत्तर में ग्वालियर के राजा ने रानी लक्ष्मीबाई के ग्वालियर पहुंचने पर गिरफ़्तार करके अंग्रेजों को तोहफ़े में देने की योजना बनाई। लेकिन उन्हीं की सेना ने इस निर्णय के खिलाफ़ बगावत कर दी और झांसी की रानी का पक्ष लेते हुए अंग्रेजों से युद्ध किया। महारानी ने अपने जीवन का अन्तिम युद्ध ग्वालियर में ही लड़ा था। हमारी भुलक्कड़ जनता ने सबकुछ भुला दिया और आज़ाद हिन्दुस्तान में उनके वंशजों को केन्द्र और राज्यों में मन्त्री पद से नवाजा। कौन नहीं जानता कि पाकिस्तान के निर्माण से लेकर आधा कश्मीर पाकिस्तान को देने में पंडित नेहरू की कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। तिब्बत को चीन को थाली में सजाकर देने में उन्होंने नायक की भूमिका निभाई और चीन को अपना पड़ोसी बना लिया। हमारी सीमा चीन से कहीं नहीं मिलती थी। उसे पड़ोसी बनाने की कीमत १९६२ में चीन को अपनी ६०००० वर्ग कि.मी. देकर देश को चुकानी पड़ी। ऐसे देशद्रोही नेता के वंशजों को हमने ५५ साल तक देश की बागडोर सौंपी और अपना ही सत्यानाश कराया। आज भी उस वंश के एक पप्पू  द्वारा रुठने-मनाने का खेल जारी है और हजारों चाटुकार उससे पद पर बने रहने के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं।
आज़ाद हिन्दुस्तान में अपनी सत्ता बचाने के लिए नेहरू जी की पुत्री और तात्कालीन प्रधान मन्त्री इन्दिरा गांधी ने लोकतन्त्र का गला घोंटते हुए जिस तरह पूरे देश में आपात्काल लगाकर असंख्य लोगों को जेल में डाला और यातनाएं दी, वैसा अत्याचार गुलाम भारत में अंडमान निकोबार द्वीप में कालापानी की सज़ा पा रहे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों के साथ अंग्रेजों ने भी नहीं किया था। हां, ऐसे अत्याचार मुगल काल में अवश्य हुए थे। आपात्काल में अस्वस्थ लोकनायक जय प्रकाश नारायण के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया गया, परिणामस्वरूप उनकी किडनी बुरी तरह खराब हो गई। बाद में उनकी मृत्यु किडनी खराब होने से ही हुई। दक्षिण भारत की प्रख्यात लोकप्रिय अभिनेत्री श्रीमती स्नेहलता रेड्डी को अकारण उनके घर से गिरफ़्तार करके बंगलोर के जेल में रखा गया। उनका अपराध यही था कि वे एक कुशल कलाकार होने के साथ-साथ एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्त्ता भी थीं। समाजवाद में उनका विश्वास था और जार्ज फ़र्नाण्डीस के द्वारा किए गए आन्दोलनों में उन्होंने सक्रिय साझेदारी की थी। जार्ज फ़र्नाण्डिस पर उस समय बड़ौदा डायनामाईट काण्ड गढ़कर देशद्रोह का कल्पित और झूठा मुकदमा चलाया जा रहा था। जार्ज पुलिस की गिरफ़्त से बाहर थे। बेचारी स्नेहलता से जार्ज का पता पूछा जाता। उन्हें पता होता, तब तो वे बतातीं। उन्हें असंख्य असह्य यातनाएं दी गईं। उनके नारीत्व के साथ खिलवाड़ किया गया। यातनाओं को सहते-सहते अन्त में जनवरी १९७७ में वे मृत्यु को प्राप्त हुईं। ऐसी यातनाओं की हजारों घटनाएं घटीं। कुछ प्रकाश में आईं, कुछ दबी रह गईं। मैं उस समय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग का छात्र था। मेरे कई मित्रों को हास्टल से, सड़क पर चलते हुए और कालेज परिसर से अकारण गिरफ़्तार किया गया और जेल में डाल दिया गया। मैं अपने उन मित्रों -- सर्वश्री विष्णु गुप्ता, इन्द्रजीत सिंह, होमेश्वर वशिष्ठ, राज कुमार पूर्वे, प्रदीप तत्त्ववादी, अरुण प्रताप सिंह, श्रीहर्ष सिंह जैसे क्रान्तिकारियों का नाम बड़ी श्रद्धा और सम्मान के साथ लेता हूं। इन्हें गिरफ़्तार करके भेलुपुर थाने के सीलन भरे कमरे में जिसमें मल-मूत्र की दुर्गंध लगातार आती थी, कई रातों तक रखा गया और नानाजी देशमुख का पता पूछा जाता रहा। वे नानाजी का पता बताने में असमर्थ थे। नानाजी भूमिगत थे। उनका पता किसे मालूम था? नहीं बताने पर उन्हें बेंतों से पीटा गया। किसी की हड्डी टूटी, तो किसी का सिर फटा। कुछ पर मीसा तामिल किया गया तो कुछपर डी.आई.आर.। डीआईआर वाले कुछ दिनों के बाद जमानत पर छूट गए लेकिन उपकुलपति ने उन्हें हास्टल में रहने की अनुमति नहीं दी। ये लोग रवीन्द्रपुरी में एक किराये का मकान लेकर रहे और येन-केन-प्रकारेण अपनी पढ़ाई पूरी की। श्री दुर्ग सिंह चौहान छात्र संघ के अध्यक्ष थे और आर.एस.एस. के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता थे। उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए इतना कारण पर्याप्त था। वे एम.टेक. के विद्यार्थी थे। जमानत पर रिहा होने के बाद भी बी.एच.यू. के वी.सी. कालू लाल श्रीमाली ने उन्हें निष्कासित कर दिया। वे एम.टेक. पूरा नहीं कर पाए। बाद में दक्षिण भारत के किसी इंजीनियरिंग कालेज से उन्होंने एम.टेक पूरा किया और आई.आई.टी. दिल्ली से पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त की। लेकिन इस प्रक्रिया में उनके कई बहुमूल्य वर्ष बर्बाद हो गए। हमारे इंजीनियरिंग कालेज के फार्मास्युटिकल इंजीनियरिंग के प्रोफ़ेसर डा. शंकर विनायक तत्त्ववादी को उनके विभाग से गिरफ़्तार किया गया। गिरफ़्तारी के बाद सबको यातनाएं देना पुलिसिया प्रक्रिया का एक आवश्यक अंग बन गया था। दिल्ली में गिरफ़्तार स्वयंसेवकों के नाखून उखाड़े गए, उनके नंगे बदन को सिगरेट की जलती बटों से दागा गया। वहां अत्याचार चरम पर था क्योंकि वहां संजय गांधी और उनकी चहेती रुखसाना सुल्ताना के अत्याचारों का खुला ताण्डव चल रहा था। इलाहाबाद से कानपुर जा रही एक बारात को रास्ते में रोककर दुल्हा समेत सभी बारातियों की जबर्दस्ती नसबन्दी की गई। कहां तक गिनाएं। अत्याचारों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है जिनमें से कुछ का जिक्र प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी पुस्तक ‘दी जजमेन्ट’ में भी किया है। नेहरू-गांधी परिवार के वंशज आज भी विभिन्न अपराधों में लिप्त होने के के बावजूद न्यायपालिका की कृपा से जमानत पर होने के बावजूद भी खुलेआम घूम रहे हैं और प्रधान मन्त्री मोदी जी के कार्यकाल की तुलना इमर्जेन्सी से कर रहे हैं। बेशर्मी की हद है!
मैं यह लेख इसलिए लिख रहा हूं कि नई पीढ़ी आपात्काल के अत्याचारों से परिचित हो और इतिहास से सबक ले। आज भारत में लोकतंत्र कायम है, इसका श्रेय आर.एस.एस. के लाखों यातनाभोगी स्वयंसेवकों को है जिन्होंने अपने कैरियर और जीवन की परवाह न करते हुए संघर्ष जारी रखा, जिसके कारण हम स्वतन्त्र जीवन जी रहे हैं। उन योद्धाओं को शत कोटि नमन!

Thursday, June 20, 2019

केन्द्रीय सरकार का भावी एजेंडा

      हर आम चुनाव के बाद गठित सरकार के भावी एजेंडे को संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण के माध्यम से जनता तक पहुंचाने की परंपरा रही है। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए कल दिनांक २० जून को महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया। उन्होंने देश की आज़ादी की ७५वीं वर्षगांठ यानी २०२२ तक हर गरीब को चिकित्सा सुविधा और आवास देने का वादा किया। राष्ट्रपति महोदय ने आगामी ५ वर्षों के लिए मोदी सरकार की योजना और प्राथमिकताएं साझा की। उन्होंने सरकार को गरीबों, किसानों और जवानों के लिए समर्पित बताते हुए कहा कि आज़ादी के ७५ वर्ष पूरे होने तक विकास के नए मानकों को हासिल करेंगे। उन्होंने ‘निकाह-हलाला’ और तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं के उन्मूलन को अत्यन्त आवश्यक बताया। संक्षेप में उन्होंने देश के सभी नागरिकों के सिर पर छत, सभी को इलाज और सन २०२२ तक अन्तरिक्ष में तिरंगा लहराने की सरकार की प्रतिबद्धता से संसद को अवगत कराया। राष्ट्रपति महोदय का अभिभाषण सामान्य रूप से प्रशंसा के योग्य था, लेकिन कुछ मुद्दों पर निराशाजनक भी था। भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में किए गए कुछ महत्त्वपूर्ण वादों का अभिभाषण यानी सरकार की भावी नीतियों में उल्लेख तक नहीं था। कश्मीर की विवादित धारा ३७० और ३५ए को हटाने और राम मन्दिर निर्माण के संबन्ध में एक शब्द भी नहीं कहा गया जिसके कारण भाजपा के करोड़ों-करोड़ों कार्यकर्त्ता और समर्थकों की भावना आहत हुई। ध्यान रहे कि इन्हीं कार्यकर्ताओं और समर्थकों के दिन-रात के प्रयास के कारण ही भाजपा प्रचण्ड बहुमत के साथ पुनः सत्ता में आई है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि अबतक जितने भी प्रधान मन्त्री हुए हैं, सबके सब नेहरू बनने की दौड़ में शामिल रहे हैं। देश के प्रथम गैर कांग्रेसी प्रधान मन्त्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी भी इस दौड़ से अछूते नहीं रहे। अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधान मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी भी इस दौड़ में शामिल होने को तत्पर दिखाई देते हैं। सबका विश्वास जीतने की उनकी अव्यवहारिक मंशा कही बहुत भारी न पड़े, इसके पहले संगठन और सरकार को चेत जाना चाहिए। संसद के नए सत्र की शुरुआत में सरकार द्वारा आयोजित रात्रिभोज में आमंत्रित करने के बावजूद राहुल और सोनिया ने बहिष्कार किया। अभी-अभी मोदीजी ने राहुल के जन्मदिन पर उन्हें बधाई भी दी थी। लेकिन सब बेकार गया। ‘एक देश एक चुनाव’ के मुद्दे पर कांग्रेस का विरोध नीतिगत नहीं है। यह विरोध मोदी का अन्ध विरोध है। क्या किसी ने अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (२१-६-२०१९) पर राहुल और सोनिया को योग करते हुए देखा है? क्या आप ओवैसी और आज़म खान से वन्दे मातरम या भारत माता की जय बुलवा सकते हैं? सबका विश्वास अर्जित करने की बात पूरी तरह सैद्धान्तिक है। भगवान श्रीकृष्ण भी लाख प्रयास के बाद भी सबका विश्वास अर्जित नहीं कर सके। इसके लिए मोदीजी से आग्रह है कि जिनके विश्वास के बल पर वे पुनः सत्ता में आए हैं उनका ही विश्वास और दृढ़ करने का प्रयास करें, वरना अगले चुनाव में भारी मन से कही ये न कहना पड़े --- माया मिली न राम।
भाजपा सत्ता पाते ही अपने कोर वोटर्स की उपेक्षा करना शुरु कर देती है। गुजरात के मुख्यमन्त्री रहते हुए मोदी जी की पूरे देश में जो छवि बनी, वह थी एक अडिग और भरोसेमंद हिन्दू-रक्षक नेता की। उन्हें घोर सांप्रदायिक, अतिवादी और मौत का सौदागर भी कहा गया। देश-विदेश में उनका प्रबल विरोध किया गया। लेकिन दशकों से कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति और हिन्दुओं की उपेक्षा ने मोदी जी को अचानक हिन्दू-हृदय सम्राट बना दिया। जनता ने उनकी हिन्दुत्व-छवि को स्वीकार किया और जाति-पांति की दीवार तोड़कर उन्हें बहुमत दिया। कोई इस मुगालते में नहीं रहे कि २०१९ का चुनाव ‘सबका साथ, सबका विकास’ के कारण जीता गया। यह जीत भी मोदीजी के प्रखर राष्ट्रवाद की जीत थी। लगभग सभी जनसभाओं में अमित शाह जी ने कश्मीर से धारा ३७० और ३५ए को हटाने की बात कही थी। प्रधान मन्त्री और अमित शाह, दोनों ने राम मन्दिर के निर्माण के लिए अपनी प्रतिबद्धता जोरदार शब्दों में कई बार दुहराई थी। लेकिन सरकार के भावी एजेन्डे में ये प्रतिबद्धताएं नेपथ्य में चली गईं। नई सरकार बनते ही यह घोषणा की गई कि सभी मुस्लिम लड़कियों को हर स्तर की शिक्षा के लिए सरकारी छात्रवृत्ति दी जाएगी। क्या यह ‘सबका विकास’ कार्यक्रम का अंग प्रतीत होता है? क्या गरीब हिन्दू लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति आवश्यक नहीं है? इसे तुष्टीकरण नहीं कहा जाय तो और क्या नाम दिया जाय?
प्रधान मन्त्री मोदीजी, अध्यक्ष अमित शाह्जी और भाजपा संगठन से यह आग्रह है कि वे पहले अपने वर्तमान समर्थकों, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के विश्वास को और सुदृढ़ करने का प्रयास करें, फिर अन्यों का विश्वास अर्जित करने की कोशिश करें। एक बहुचर्चित श्लोक है ---
यः ध्रुवाणि परितज्य अध्रुवेण निशेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नश्यमेव हि ॥
जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित की तरफ भागता है, उसका अनिश्चित तो अनिश्चित ही रहता है, निश्चित अवश्य नष्ट हो जाता है।

Thursday, June 13, 2019

क्या सचमुच न्याय अन्धा होता है

      सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रन्जन गोगोई द्वारा पिछले वर्ष १०-११ अक्टुबर को अपने आवासीय कार्यालय में अपनी ही ३५ वर्षीया महिला जूनियर कोर्ट सहायक से कथित यौन उत्पीड़न का मामला चुनावी शोरगुल में दब गया था। लेकिन अब जब देश को एक स्थाई सरकार मिल चुकी है और चुनाव का माहौल खत्म हो चुका है तो इस पर सरकार, महिला आयोग, संसद, नेता और जनता को यह विचार करना चाहिए कि क्या यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को न्याय मिल गया? अपने ही मित्र जजों की अनौपचारिक समिति द्वारा एकतरफा सुनवाई कराकर क्लीन चिट प्राप्त कर क्या माननीय चीफ जस्टिस ने न्याय का उपहास नहीं किया है? घटना और घटना की पूर्व स्थितियों का विवरण निम्नवत है ---
     १. दिनांक ९ अक्टूबर, २०१८ को पीड़ित महिला की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई महिला के देवर/बहनोई (Brother-in-law) को आदेश संख्या F-3/2018-SCA(1) New Delhi dated Oct 9, 2018 के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए अस्थाई कनिष्ठ कोर्ट अटेन्डेन्ट के पद पर नियुक्त करते हैं और १०-११ अक्टूबर को अपने आवासीय कार्यालय में महिला के यौन उत्पीड़न का प्रयास करते है। पीड़ित महिला ने अपने एफ़डेविट में यह स्पष्ट किया है। इससे तो यह साफ है कि चीफ़ जस्टिस महोदय महिला को अच्छी तरह से जानते थे और उसके प्रति कही न कही मृदु भाव रखते थे, तभी उसकी सिफारिश पर उसके निकट के संबन्धी को नौकरी देने का कार्य किया। उन्हें यह उम्मीद थी कि महिला उनके एहसान तले दब जाएगी और उनकी इच्छा की पूर्ति करेगी। यौन उत्पीड़न की घटना इसी का परिणाम थी। 
२. इस घटना की दबी जुबान चर्चा सुप्रीम कोर्ट के गलियारे में शुरु हो गई थी। पीड़ित महिला को इसका परिणाम भुगतना ही था। उसे दिनांक २१-१२-१८ को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। आरोप भी हास्यास्पद ही था -- महिला ने बिना पूर्व अनुमति के एक दिन का आकस्मिक अवकाश लिया था। क्या इतना छोटा आरोप Dissmisal का कारण बन सकता है। उत्पीड़न यही तक नहीं रुका। ९ अक्टूबर को नौकरी पाए उसके देवर/ बहनोई को भी सेवामुक्त कर दिया गया।
३. एक पुराने अप्रमाणित रिश्वत लेने के मामले में दिल्ली पुलिस पर दबाव डालकर महिला और उसके पति को राजस्थान स्थित उसकी ससुराल से गिरफ़्तार करके दिल्ली लाया गया और हिरासत में रखकर यंत्रणा दी गई।
४. पीड़ित महिला के पति और देवर जो दिल्ली पुलिस में हेड कांस्टेबुल थे, निलंबित कर दिया गए।
५. महिला को पुलिस द्वारा अपने घर बुलाकर चीफ़ जस्टिस की पत्नी के चरणों में नाक रगड़कर माफ़ी मांगने के लिए वाध्य किया गया।
६. महिला को तरह-तरह की धमकियां मिलती रही। आज़िज़ आकर महिला ने न्याय की गुहार लगाते हुए पूरी घटना का विवरण अप्रिल, २०१९ में शपथ-पत्र के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों को भेजा। इस शपथ पत्र के सोसल मीडिया पर आ जाने के बाद पूरे देश में हड़कंप मच गया। चुनाव सिर पर होने के कारण राजनेता चुप रहे।
७. भयभीत मुख्य न्यायाधीश महोदय ने आनन-फानन में तीन जजों की एक पीठ गठित की जिसकी अध्यक्षता उन्होंने स्वयं की। इसकी सूचना न पीड़िता को दी गई और ना ही उसका पक्ष सुना गया। न्यायमूर्ति गोगोई ने स्वयं महिला पर कई गंभीर आरोप लगाए और इस घटना को लोकतन्त्र और न्यायपालिका पर एक गंभीर हमला बताया।
८. सुप्रींम कोर्ट की इस अनोखी कार्यवाही पर मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया हुई। पीड़िता तो क्या, कोई भी पढ़ालिखा आदमी कोर्ट के इस फैसले से सन्तुष्ट नहीं था।
९. चीफ़ जस्टिस द्वारा Eye-wash करने का एक और प्रयास किया गया। उन्होंने घटना की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की एक समिति गठित कर दी जो न संवैधानिक थी, न वैधानिक थी और न किसी अधिकार से संपन्न थी। यह पूर्ण रूप से एक अनौपचारिक समिति थी। इस  समिति में उन्होंने जस्टिस रमन्ना को रखा जो उनके परम मित्र ही नहीं, परिवार के सदस्य की तरह हैं। पीड़िता द्वारा आपत्ति दर्ज़ कराने के बाद उनके स्थान पर जस्टिस बोगडे को रखा गया।
१०. समिति ने पीड़िता को अपनी बात रखने के लिए २६ अप्रिल को बुलाया। इस बीच भयंकर आर्थिक संकट और मानसिक तनाव के कारण महिला की श्रवण-शक्ति बाधित हो गई। वह दाहिने कान से पूर्ण रुप से और बाएं कान से आंशिक रूप से बधिर हो गई।
११. अवसाद की शिकार महिला फिर भी २६ अप्रिल को समिति के सामने उपस्थित हुई। अपनी शारीरिक और मानसिक अवस्था का हवाला देते हुए उसने वकील के माध्यम से अपनी बात कहने का अनुरोध किया। उसने कार्यवाही की विडियो/आडियो रिकार्डिंग की भी मांग की। अकेले इतने वरिष्ठ जजों के सामने उनके प्रश्नों को सुन वह नर्वस भी हो रही थी।  उस दिन की सुनवाई पूरी होने के बाद महिला ने अपने बयान की एक प्रति मांगी। उसकी किसी भी बात को समिति ने नहीं माना।
१२. महिला फिर भी दिनांक २९ अप्रील को समिति के सामने उपस्थित हुई और जांच को Enquiry in Accordance with Sexual Harassment Act 2013 के प्रावधानों के तहत करने की मांग की जिसे ठुकराते हुए समिति ने बताया कि वह समिति अनौपचारिक है, उसे कोई वैधानिक दर्ज़ा प्राप्त नहीं है और ना ही वह किसी मुकदमे का अंग है। फिर महिला ने आगे की कार्यवाही में शामिल होने से इंकार कर दिया
१३. अन्त में सुप्रीम कोर्ट की अधिकारविहीन समिति ने मुख्य न्यायाधीश महोदय को क्लीन चिट देते हुए अपनी रिपोर्ट लगा दी कि महिला द्वारा लगाए गए सभी आरोप तथ्यहीन हैं।
क्या इसी को न्याय कहते हैं? सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस संविधान, कानून और लोक मर्यादा से ऊपर हैं?
समिति के रिपोर्ट के खिलाफ दर्जनों वकीलों और महिला अधिकार के लिए समर्पित संगठन के कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन किया। सभी को गिरफ़्तार करके मन्दिर मार्ग थाने में भेज दिया गया।
पीड़ित महिला को न्याय दिलाने के लिए २६ अप्रिल को Women in Criminal Law Association ने Sexual Harassment Act 2013 के प्रावधानों और धाराओं के अनुसार विधिसम्मत जांच कराकर दोषी को सज़ा देने की मांग की है। संगठन ने सुप्रीम कोर्ट के सभी पूर्व जजों को तत्संबन्धी पत्र भी भेजा है। सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जज और दूसरे पूर्व जजों ने भी जस्टिस गोगोई द्वारा इस यौन उत्पीड़न की घटना की सुनवाई की पूरी प्रक्रिया को विधि विरुद्ध और अनैतिक करार दिया है।
देखते हैं पीड़ित महिला को न्याय मिलता भी है या नहीं? वैसे कानून की आंखों पर फिलहाल तो काली पट्टी बंधी है।